रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६४ रामायणमीमांसा विश स्वाध्यायोऽध्येतव्यः । अग्निहोत्रं जुहुयात् । दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेत । सोमेन यजेत । अश्वमेधेन यजेत । ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च सत्यं च तपश्च दमश्च शमश्च । सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायान्मा प्रमदः । आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः । सत्यान्न प्रमदितव्यम् । कुशलान्न प्रमदितव्यम् । भूत्यै न प्रमदितव्यम् । स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् । देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदित- व्यम् । मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव । यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि त्वया सेवितव्यानि नो इतराणि । यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि ।” ( तैत्ति० आ० १।९।११।१,२ ) “सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः । अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या ॥ अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रा भरतु संमनाः । जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शान्तिवाम् ॥ मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्मा स्वसारमुत स्वसा । सम्यञ्चः सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया ॥ ज्यायस्वन्तश्चित्तिनो मा वियोष्ट संराध्यन्तः मधुराश्चरन्तः । अन्यो अन्यस्मै वल्गु वदन्त एत सध्रीचीनान् वः संमनसस्कृणोमि ॥ समानी प्रपा सह वोन्नभागाः समाने योक्त्रे सह वो युनज्मि । सम्यञ्चोऽग्निं सपर्यतारा नाभिमिवाभितः ॥” ( अथ० सं० ३।१२,३,५,६ ) स्वाध्यायपदवाच्य सकल वेदराशि का अध्ययन करना । अग्निहोत्र करना । दर्श, पूर्णमास, ज्योतिष्टोम, अश्वमेध आदि यज्ञ करना । सूनृता वाणी बोलना । स्वाध्याय तथा प्रवचन में संलग्न रहना । सत्य भाषण, तप, दम, शम और स्वाध्याय आदि करना । सत्य बोलना । धर्म का आचरण करना । स्वाध्याय में प्रमाद न करना । आचार्य को अभीष्ट दक्षिणा प्रदान कर के समावर्तन संस्कार कर गृहस्थ होकर प्रजातन्तु का व्यवच्छेद न करना, सत्य से, धर्म से, शुभ कर्म से तथा ऐश्वर्यप्राप्ति से प्रमाद न करना । माता को देवता मानना, पिता को देवता मानना, आचार्य को देवता मानना, अतिथि को देवता मानना, निर्दोष कर्म करना । सदोष कर्म से बचना । आचार्य जनों के सुचरितों का अनुवर्तन करना । सांमनस्य सूक्तों द्वारा सबसे सहृदयता, सांमनस्य एवं अविद्वेष स्थापित करके परस्पर ऐसा प्रेम बढ़ाया जाता है जैसे गौ अपने नवजात बछड़े में प्रेम करती है । पुत्र पिता के प्रति अनुवर्ती हो, माता के प्रति भक्तिमान् हो, जाया पति के साथ मधुर तथा शान्तियुक्त वाणी बोले । भाई भाई से विद्वेष न करे, बहन बहन से द्वेष न करे । सभी पवित्र व्रत धारण करके एक दूसरे से भद्रबुद्धि से व्यवहार करें । बड़ों के प्रति उत्तम विचार रखो । परस्पर विलग मत होओ । सम्यक् कर्म करते हुए अग्रणी बनो । परस्पर मधुर भाषण करो । हम सबको सांमनस्य करते हैं । तुम लोगों की प्रपा एवं अन्नभाग समान हो । हम समान सूत्र में तुम सबको संबन्धित करते हैं । तुम लोग सम्यक् प्रकार से अग्नि तथा ज्योतिर्मय ब्रह्म की पूजा करो । जैसे रथचक्र की नाभि का आश्रयण अर करते हैं वैसे ही सब उस परमेश्वर का आश्रयण करें । उक्त तथा अनुक्त सभी धर्म राम में परिलक्षित होते हैं । राम ने कहा था कि सत्य ही ईश्वर है । सत्य में ही धर्म स्थित है । दत्त, इष्ट, हुत, तप सब सत्यमूलक ही हैं— ‘सत्यमेवेश्वरः’, ‘सत्ये धर्मः सदा स्थितः ।' ( वा० रा० २।१०९।१३ )