भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 742

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६६५ राम ने कहा था कि पिता के वचन से मैं पावक में प्रविष्ट हो सकता हूँ, समुद्र में गिर सकता हूँ। चन्द्रमा से उसकी लक्ष्मी (शोभा) भले पृथक् हो जाय, हिमवान् हिमरहित हो जाय एवं समुद्र मर्यादा भले छोड़ दे, पर मैं पिता की आज्ञा नहीं टाल सकता— ‘लक्ष्मीश्चन्द्रादपेयाद्वा हिमवान् वा हिमं त्यजेत् । अतीयात् सागरो वेलां न प्रतिज्ञामहं पितुः ॥” (वा० रा० २।११२।१८) कैकेयी भी मानती हैं कि राम कौशल्या से अधिक मेरा मान करते हैं— "कौशल्यातोऽतिरिक्तञ्च मम शुश्रूषते बहु ।" अन्य माताओं ने भी अनुभव किया था कि राम झूठा कलङ्क लगाने पर भी क्रोध नहीं करते और स्वयं क्रोध करानेवाली बातें नहीं करते। क्रुद्ध लोगों को भी प्रसन्न कर लेनेवाले तथा दूसरों के दुःख में समान दुःखवाले राम अब कहाँ चले जा रहे हैं। महातेजा राम जैसे कौशल्या में भक्ति रखते हैं वैसे ही हम सब में भी भक्ति रखते हैं। "न क्रुध्यत्यभिशस्तोऽपि क्रोधनीयानि वर्जयन् । क्रुद्धान् प्रसादयन् सर्वान् समदुःखः क्व गच्छति ॥ कौशल्यायां महातेजा यथा मातरि वर्तते । तथा यो वर्त्ततेऽस्मासु महात्मा क्व नु गच्छति ॥” (वा० रा० २।४१।३,४) भाइयों के प्रति राम ने कहा था—लक्ष्मण, मैं प्रतिज्ञापूर्वक कहता हूँ कि मैं धर्म, अर्थ, काम और पृथ्वी का राज्य तुम भाइयों के लिए चाहता हूँ। भ्राताओं के संग्रहार्थ एवं सुखार्थ ही मैं राज्य भी चाहता हूँ। यह मैं आयु- धका स्पर्श कर सत्य कहता हूँ। बिना भरत के, बिना तुम्हारे और बिना शत्रुघ्न के जो भी सुख हो अग्निदेव उसे जला कर भस्म कर दें— “धर्ममर्थं च कामञ्च पृथिवीं चापि लक्ष्मण । इच्छामि भवतामर्थे एतत् प्रतिशृणोमि ते ॥ भ्रातॄणां संग्रहार्थं च सुखार्थं चापि लक्ष्मण । राज्यमप्यहमिच्छामि सत्येनायुधमालभे ॥ यद् विना भरतं त्वां वा शत्रुघ्नं वापि मानद । भवेन्मम सुखं किञ्चिद् भस्म तत्कुरुतां शिखी ॥” (वा० रा० २।९७।५-८) विभीषण ने लङ्का-विजय के बाद राम से अनुरोध किया कि लङ्का में कुछ समय रह कर मेरा आतिथ्य ग्रहण करके तब अयोध्या के लिए प्रस्थान किया जाय। इसपर शीलसिन्धु राम ने कहा कि मैं तुम्हारी बात न मानूं यह सर्वथा असंभव है। परन्तु मेरा मन उस भाई भरत के लिए त्वरावान् हो रहा है, जिसने चित्रकूट तक आकर मुझे लौटाने के लिए बहुत प्रार्थना की थी, किन्तु मैंने उसे स्वीकार नहीं किया था— “न खल्वेतान्न कुर्यां ते वचनं राक्षसेश्वर । तं तु मे भ्रातरं द्रष्टुं भरतं त्वरते मनः ॥” (वा० रा० २।१२३।१८) रामने बहुजनहिताय बहुजनसुखाय नहीं, किन्तु सर्वजनसुखाय सर्वजनहिताय अपनी प्राणेश्वरी स्वात्मभूता जनकनन्दिनी जानकी को वनवास देकर भाईभतीजावाद या कुनबापरस्ती का स्पर्श नहीं होने दिया। सीताजी की निन्दा करनेवाले का भी अघौघ नष्ट कर उसे भी बसाया— "सिय निन्दक अघ ओघ नसाये। लोक विशोक बनाइ बसाये ॥”