भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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६६६ रामायणमीमांसा विंश देवताओं, वानरों और भालुओं के समक्ष होनेवाली अग्निपरीक्षा द्वारा सीताशुद्धि का प्रचार स्वयं न कर के उसकी जिम्मेदारी अन्भक्ष, वायुभक्ष, वल्कलवसनधारी महर्षियों पर डालकर स्वयं कर्त्तव्य-पालन में ही व्यस्त रहे और यह प्रतिज्ञा चरितार्थ कर दिखायी कि स्नेह, दया, सुख, राज्य आदि तथा जानकी को भी लोकरञ्जन के लिए त्यागने में मुझे व्यथा नहीं होगी— “स्नेहं दयांश्च सौख्यञ्च यदि वा जानकीमपि । आराधनाय लोकस्य मुञ्चतो नास्ति मे व्यथा ।।” ( उ० रा० च० ) इतने पर भी माधुर्य सारसर्वस्व की अधिष्ठात्री सीता के प्रति अखण्ड प्रेम ज्यों का त्यों बना ही रहा । राम की हृदयसिंहासनाधीश्वरी सीता ही रहीं। कुन्दमालाकार ने कितने सुन्दर शब्दों में राम के भावों का चित्रण किया है— “त्वं देवि चित्तनिहिता गृहदेवता मे स्वप्नागता शयनमध्यसखी त्वमेव । दारान्तरग्रहणनिःस्पृहमानसस्य यागे तव प्रतिकृतिर्मम धर्मपत्नी ॥” ( कुन्दमाला १।१४ ) हे देवि, तुम मेरे चित्त की अधिष्ठात्री गृहलक्ष्मी हो । स्वप्न में भी एकमात्र तुम्हीं मेरे शयन की सखी हो । मेरे मन में दूसरी पत्नी का ग्रहण करने की किञ्चिन्मात्र भी स्पृहा नहीं है। तुम्हारी सुवर्णमयी प्रतिमा ही यज्ञ में मेरी धर्मपत्नी है । राम ने अपने सौशील्य से वानर एवं भालुओं को अपना सखा स्वीकार किया । और उनका परिचय देते हुए अपने गुरु वसिष्ठ से कहा कि ये सब मेरे सखा हैं । समरसागर में इन्होंने बेड़े का काम किया है। मेरे हित के लिए इन्होंने अपना जन्म ही लगा दिया है । ये भरत से भी अधिक मेरे प्रिय हैं— “ये सब सखा सुनिय मुनि मेरे । भये समर सागर मह बेरे ॥ ( रा० मा० ७।७।४ ) राम ने वानरों को गुरु वसिष्ठजी का परिचय देकर प्रणाम करने को कहा— “गुरु वसिष्ठ कुलपूज्य हमारे । इनकी कृपा दनुज रन मारे ॥” ( रा० मा० ७।७।३ ) मित्रता के लिए यह राम का आदर्श वाक्य है— “जे न मित्र दुख होहिं दुखारी । तिनहिं विलोकत पातक भारी ॥” ( रा० मा० ४।६।१ ) आढ्य हो या दरिद्र हो, निर्दोष हो अथवा सदोष हो मित्र के लिए वही परम गति है— “आढ्यो वापि दरिद्रो वा दुःखितः सुखितोऽपि वा । निर्दोषश्च सदोषश्च वयस्यः परमा गतिः ॥” ( वा० रा० ४।८।८ ) शरण में आये हुए को राम ने त्यागने में महान् दोष देखा है— “शरणागत कहँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि । ते नर पामर पापमय तिन्हहि विलोकत हानि ॥ ( रा० मा० ५।४३ )