रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 744, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६६७ राम सदा प्रशान्तात्मा और मृदुता के साथ बोलते थे । कोई रूक्षता या कठोरता से बोलता था तो भी वे उससे कठोर नही बोलते थे । वे भूल में भी किये गये एक उपकार से भी तुष्ट हो जाते थे । परन्तु सैकड़ों अपकारों को वे स्मरण भी नहीं करते थे, क्योंकि आत्मवान् थे । वे बुद्धिमान्, मधुरभाषी और पहले ही बोलते थे । वीर्यवान् थे, परन्तु अपने वीर्य से गर्व का अनुभव नहीं करते थे— “सदा नित्यं प्रशान्तात्मा मृदुपूर्वं प्रभाषते । उच्यमानोऽपि परुषं नोत्तरं प्रतिपद्यते ॥ कदाचिदुपकारेण कृतेनैकेन तुष्यति । न स्मरत्यपकाराणां शतमप्यात्मवत्तया ॥ बुद्धिमान् मधुराभाषी पूर्वभाषी प्रियंवदः । वीर्यवान् न च वीर्येण महता स्वेन विस्मितः ।।” (वा० रा० २।१।१०-१३) राम कोई बात दो बार नहीं करते थे, जो कह दिया वह कह दिया । वह पाषाणरेखा के तुल्य अमिट होता था । राम यद्यपि अङ्गुल्यग्रमात्र से संसार के सभी दानवों, यक्षों, गन्धर्वों तथा राक्षसों को मार सकते हैं— “पृथिव्यां दानवान् सर्वान् पिशाचान् गुह्यकांस्तथा । अङ्गुल्यग्रेण तान् हन्यामिच्छन् हरिगणेश्वर ॥” ( वा० रा० ६।१८।२३ ) फिर क्या शत्रु-वध में वानर और भालुओं की सहायता अपेक्षित थी— “किं तस्य शत्रुहनने कपयः सहायाः ।” फिर भी राम की कृतज्ञता उदारता देखते ही बनती है । आप हनुमान् से कहते हैं, जो तुमने मेरे साथ उपकार किया है उसका बदला मैं चुका नहीं सकता। यदि एक एक उपकार के बदले मैं प्राणों को भी समर्पण कर दूँ तो भी तुम्हारे बहुत उपकार शेष ही रहेंगे । उनके लिए मैं सदा ही ऋणी रहूँगा । फिर भी मैं चाहता हूँ कि वे ऋण मेरे अन्दर ही जीर्ण हो जायें मेरे लिए उनके बदले प्रत्युपकार करने का अवसर ही न आये । क्योंकि प्राणी विपत्ति में ही प्रत्युपकार का पात्र बनता है। राम कभी यह नहीं चाहते हैं कि [कभी हनुमान् पर विपत्ति आये और उस समय राम को उपकार के बदले में प्रत्युपकार करने का अवसर आये— “एकैकस्योपकारस्य प्राणान् दास्यामि ते कपे । शेषस्योपकाराणां भवाम ऋणिनो वयम् ॥ मदङ्गे जीर्णतां यातु यत् त्वयोपकृतं कपे । नरः प्रत्युपकाराणां आपत्स्वायाति पात्रताम् ॥” (वा० रा० ७।४०।२३, २४) “रामरावणयोर्युद्धं रामरावणयोरिव ।” राम का पराक्रम दुर्धर्ष है । वैसे तो अनन्त ब्रह्माण्ड का उत्पादन, पालन तथा संहरण सबसे बड़ा पराक्रम है ही । व्यवहार में भी राम और रावण के संग्राम की दूसरी उपमा नहीं है— आरम्भिक युद्धों में रावण ने घोर संग्राम में लक्ष्मण को शक्ति से आहत करके विभिन्न वीरों को आहत कर क्षत-विक्षत कर दिया । राम ने अपने तीक्ष्ण बाणों से धनुष तथा किरीट को ध्वस्त कर रावण को दयनीय बनाकर अनुकम्पा दिखाते हुए कहा कि तुमने महाभीम कर्म किया है । तुमने हमारे बड़े-बड़े योद्धाओं को मार दिया है। फिर भी तुम परिश्रान्त हो, इसलिए मैं इस समय तुम्हें नहीं मारता हूँ। जाओ लङ्का में विश्राम करो, रथी और धन्वी होकर आओ, फिर मेरा बल देखना ।