रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६६७ राम सदा प्रशान्तात्मा और मृदुता के साथ बोलते थे । कोई रूक्षता या कठोरता से बोलता था तो भी वे उससे कठोर नही बोलते थे । वे भूल में भी किये गये एक उपकार से भी तुष्ट हो जाते थे । परन्तु सैकड़ों अपकारों को वे स्मरण भी नहीं करते थे, क्योंकि आत्मवान् थे । वे बुद्धिमान्, मधुरभाषी और पहले ही बोलते थे । वीर्यवान् थे, परन्तु अपने वीर्य से गर्व का अनुभव नहीं करते थे— “सदा नित्यं प्रशान्तात्मा मृदुपूर्वं प्रभाषते । उच्यमानोऽपि परुषं नोत्तरं प्रतिपद्यते ॥ कदाचिदुपकारेण कृतेनैकेन तुष्यति । न स्मरत्यपकाराणां शतमप्यात्मवत्तया ॥ बुद्धिमान् मधुराभाषी पूर्वभाषी प्रियंवदः । वीर्यवान् न च वीर्येण महता स्वेन विस्मितः ।।” (वा० रा० २।१।१०-१३) राम कोई बात दो बार नहीं करते थे, जो कह दिया वह कह दिया । वह पाषाणरेखा के तुल्य अमिट होता था । राम यद्यपि अङ्गुल्यग्रमात्र से संसार के सभी दानवों, यक्षों, गन्धर्वों तथा राक्षसों को मार सकते हैं— “पृथिव्यां दानवान् सर्वान् पिशाचान् गुह्यकांस्तथा । अङ्गुल्यग्रेण तान् हन्यामिच्छन् हरिगणेश्वर ॥” ( वा० रा० ६।१८।२३ ) फिर क्या शत्रु-वध में वानर और भालुओं की सहायता अपेक्षित थी— “किं तस्य शत्रुहनने कपयः सहायाः ।” फिर भी राम की कृतज्ञता उदारता देखते ही बनती है । आप हनुमान् से कहते हैं, जो तुमने मेरे साथ उपकार किया है उसका बदला मैं चुका नहीं सकता। यदि एक एक उपकार के बदले मैं प्राणों को भी समर्पण कर दूँ तो भी तुम्हारे बहुत उपकार शेष ही रहेंगे । उनके लिए मैं सदा ही ऋणी रहूँगा । फिर भी मैं चाहता हूँ कि वे ऋण मेरे अन्दर ही जीर्ण हो जायें मेरे लिए उनके बदले प्रत्युपकार करने का अवसर ही न आये । क्योंकि प्राणी विपत्ति में ही प्रत्युपकार का पात्र बनता है। राम कभी यह नहीं चाहते हैं कि [कभी हनुमान् पर विपत्ति आये और उस समय राम को उपकार के बदले में प्रत्युपकार करने का अवसर आये— “एकैकस्योपकारस्य प्राणान् दास्यामि ते कपे । शेषस्योपकाराणां भवाम ऋणिनो वयम् ॥ मदङ्गे जीर्णतां यातु यत् त्वयोपकृतं कपे । नरः प्रत्युपकाराणां आपत्स्वायाति पात्रताम् ॥” (वा० रा० ७।४०।२३, २४) “रामरावणयोर्युद्धं रामरावणयोरिव ।” राम का पराक्रम दुर्धर्ष है । वैसे तो अनन्त ब्रह्माण्ड का उत्पादन, पालन तथा संहरण सबसे बड़ा पराक्रम है ही । व्यवहार में भी राम और रावण के संग्राम की दूसरी उपमा नहीं है— आरम्भिक युद्धों में रावण ने घोर संग्राम में लक्ष्मण को शक्ति से आहत करके विभिन्न वीरों को आहत कर क्षत-विक्षत कर दिया । राम ने अपने तीक्ष्ण बाणों से धनुष तथा किरीट को ध्वस्त कर रावण को दयनीय बनाकर अनुकम्पा दिखाते हुए कहा कि तुमने महाभीम कर्म किया है । तुमने हमारे बड़े-बड़े योद्धाओं को मार दिया है। फिर भी तुम परिश्रान्त हो, इसलिए मैं इस समय तुम्हें नहीं मारता हूँ। जाओ लङ्का में विश्राम करो, रथी और धन्वी होकर आओ, फिर मेरा बल देखना ।
६६८ रामायणमीमांसा विंश राम के गुण तथा स्वभाव “वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि । लोकोत्तराणां चेतांसि को हि विज्ञातुमर्हति ॥” ( उ० रा० च० ) उत्तररामचरित के अनुसार लोकोत्तर ईश्वरों के चरित वज्र से भी कठोर एवं कुसुम से भी कोमल होते हैं । उन्हें कौन जान सकता है । ‘अप्यहं जीवितं जह्यां त्वां वा सीते सलक्ष्मणाम् । न तु प्रतिज्ञां संश्रुत्य ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः॥” (वा० रा० ३।१०।१८,१९) राम कहते हैं—सीते, मैं लक्ष्मण और तुमको भी त्याग सकता हूँ, परन्तु मैं प्रतिज्ञा का, विशेषतः ब्राह्मणों के प्रति की गयी प्रतिज्ञा का, त्याग नहीं कर सकता हूँ । “दद्यान्न प्रतिगृह्णीयात् सत्यं ब्रूयान्न चानृतम् । अपि जीवितहेतोर्वा रामः सत्यपराक्रमः ॥” ( वा० रा० ५।३३।२५ ) सत्यपराक्रमी राम देते ही हैं, प्रतिग्रह नहीं करते हैं । सत्य ही बोलते हैं, अनृत नहीं बोलते हैं । “नास्य क्रोधः प्रसादश्च निरर्थोऽस्ति कदाचन । हन्त्येष नियमाद् वध्यानवध्येषु न कुप्यति ॥” ( वा० रा० १।१।४५,४९ ) राम के क्रोध और प्रसाद निरर्थक नहीं होते अर्थात् उनके क्रोध और प्रसाद अमोघ हैं । वे वध्य व्यक्ति का अवश्य वध करते हैं और निर्दोष अवध्य के प्रति कभी भी कुपित नहीं होते हैं । “धर्मे तत्परता मुखे मधुरता दाने समुत्साहता मित्रेऽवञ्चकता गुरौ विनयिता चित्तेऽतिगम्भीरता । आचारे शुचिता गुणे रसिकता शास्त्रेऽतिविज्ञानता रूपे सुन्दरता हरौ भजनिता चैते गुणा राघवे ॥” ( चाणक्य १२।१५ ) राम की धर्म में तत्परता एवं मुख में मधुरता स्तुत्य थी । दान में उनका समुत्साह तथा मित्र के प्रति अवञ्चकता भी लोकोत्तर थी । गुरु के प्रति वे विनयी थे । उनके चित्त में गम्भीरता, आचार में पवित्रता, गुणों में रुचि, शास्त्रों में अभिज्ञता, रूप में सुन्दरता एवं हरि में भक्ति भी अत्यन्त उत्कृष्ट था । इसी लिए ऋषियों की दृष्टि में राम से भिन्न कोई काव्यों के यश का भाजन हो ही नहीं सकता— “नह्यन्योऽर्हति काव्यानां यशोभाग् राघवादृते ।” “आनृशंस्यमनुक्रोशः श्रुतं शीलं दमः शमः । राघवं शोभयन्त्येते षड्गुणाः पुरुषर्षभम् ॥” ( वा० रा० २।३३।१२ ) मृदुता, करुणा, श्रुत (परम्परा से वेदादि शास्त्रों का ज्ञान), शील, इन्द्रिय-निग्रह तथा मनोनिग्रह ये छः गुण राघवेन्द्र राम को शोभित करते हैं । शोभा, कान्ति, छवि, वर्ण, लक्षण, लावण्य, आभिजात्य, सौभाग्य, राग आदि रूप के सभी भेद राम के सम्बन्ध से ही शोभित होते हैं । “रूपं वर्णः प्रभा राग आभिजात्यं विलासिता । लावण्यं लक्षणं छाया सौभाग्यं चेत्यमी गुणाः ॥”
“अवयवानां रेखास्पाष्ट्यं रूपम्, गौरत्वादिधर्मविशेषो वर्णः, चाकचिक्यरूपा कान्तिः प्रभा, नैसर्गिकस्मेरत्वादिः सर्वेषां चक्षुर्बन्धको रागः, कुसुमधर्मा मार्दवादिस्पर्शविशेष आभिजात्यम्, कटाक्षादिः विलासः, तरलता लावण्यम् ।” अङ्गों की रेखाओं की स्पष्टता रूप है, गौरत्वादि धर्मविशेष वर्ण है, चाकचिक्यादि कान्ति प्रभा है, चक्षुओं को बाँधनेवाला स्मितमुखत्वादि ही राग है, कुसुम के समान कोमल स्पर्शविशेष आभिजात्य है, कटाक्षादि विलास है एवं तरलता लावण्य है । गर्भिणी स्त्री जैसे गर्भस्थ शिशु की हित-दृष्टि से ही सब कार्य करती है वैसे ही राजा की सम्पूर्ण चेष्टाएँ प्रजाहित की दृष्टि से ही होती हैं । फिर लोकदृष्टि से कुछ असम्मत भी क्यों न हो। ताटका (ताड़का) के मारने में राम को स्त्रीवध के सम्बन्ध में अधिक संकोच था । तभी विश्वामित्र ने कहा था— “नहि ते स्त्रीवधकृते घृणा कार्या नरोत्तम । चातुर्वर्ण्यहितार्थं हि कर्तव्यं राजसूनुना ॥ नृशंसमनृशंसं वा प्रजारक्षणकारणात् । पातकं वा सदोषं वा कर्तव्यं रक्षता सदा ॥” (वा० रा० १।२६।१७,१८) तुम्हें स्त्रीवध के लिए घृणा नहीं करनी चाहिये, क्योंकि चातुर्वर्ण्य के रक्षण के लिए राजपुत्र को ऐसी आततायी स्त्री का भी वध करना चाहिये । प्रजारक्षणार्थ राजा को नृशंस, अनृशंस, क्रूर, अक्रूर, पातकयुक्त, सदोष सब कुछ करना पड़ सकता है । जैसे हाथी के पैर में सबका पैर आ जाता है वैसे ही राजधर्म में सब धर्म आ जाते हैं । प्रजा एवं प्रजाकल्याणकारी वर्णाश्रमधर्म की रक्षा करना राजा का प्रधान कर्म है । और सब धर्मकर्म उसके ही अङ्गोपाङ्ग हैं । प्रधान के अविरुद्ध ही अन्य धर्मों का महत्त्व है । रामचन्द्र परम ब्रह्मण्य थे । वाल्मीकिरामायण में उन्हें ब्राह्मणों का उपासक कहा गया है—‘‘ब्राह्मणानामुपासिता’’ फिर भी ब्राह्मण द्वारा आहत निरपराध श्वान को न्याय देने का जब प्रश्न आया तब राम को न्याय का ही पक्ष लेना पड़ा, क्योंकि उनकी दृष्टि में न्याय सबसे बड़ा था । इसी तरह २१ बार पृथ्वी को निःक्षत्र करनेवाले ब्राह्मण परशुराम का उग्ररूप जब राम के क्षात्र तेज को अभिभूत करने लगा तब राम ने बड़ी बुद्धिमानी से अपनी ब्रह्मण्यता की रक्षा करते हुए क्षात्र धर्म की भी रक्षा की ओर कहा— “वीर्यहीनमिवाशक्तं क्षत्रधर्मेण भार्गव । अवजानासि मे तेजः पश्य मेऽद्य पराक्रमम् ॥” ( वा० रा० १।७६।३ ) “ब्राह्मणोऽसीति पूज्यो मे विश्वामित्र कृतेन च । तस्माच्छक्तो न ते राम मोक्तुं प्राणहरं शरम् ॥ इमां वा त्वद्गतिं राम तपोबलसमर्जितान् । लोकानप्रतिमान् वापि हनिष्यामीति मे मतिः ॥” ( वा० रा० १।७६।६,७ ) भार्गव ! क्षात्रधर्मयुक्त होने पर भी मुझे आपने वीर्यहीन एवं असमर्थ समझकर क्षात्रतेज का अपमान किया है, अतः अब आप मेरा पराक्रम देखिये । यह कहकर राम ने उनसे धनुष लेकर क्षण में उसे चढ़ाकर कहा—आप ब्राह्मण होने से मेरे पूज्य हैं और विश्वामित्र की भगिनी सत्यवती के पौत्र हैं, इसलिए मैं आपके लिए प्राणहर बाण छोड़ नहीं सकता, किन्तु आपकी दिव्यगति अथवा तपोबल से अर्जित लोकों को नष्ट करूँगा । किन्तु जहाँ धर्मोल्लङ्घन का प्रश्न राम के सामने आया वहाँ राम ने जैसे धर्मविमुख शम्बूक शूद्र का वध कर ब्राह्मण शिशु को पुनर्जीवित किया वैसे ही धर्मविमुख ब्राह्मण रावण का वध कर सम्पूर्ण मानवता को जीवन प्रदान किया ।
माता-पिता की आज्ञा के पालन के प्रसङ्ग में श्रीराम ने अखण्ड भूमण्डल के राज्य को तृणवत् त्यागकर सहर्ष वनवास स्वीकार किया । बड़े आदरणीय कुलपूज्य महर्षि जाबालि से भी जब राम को लौटाने की दृष्टि से ही उनके द्वारा कही गयी वेदशास्त्रविरुद्ध माता-पिता के श्राद्ध, तर्पण, यज्ञ, होम तथा परलोक के अपलाप से युक्त नास्तिकता की बातें सुनीं तो राम क्षुब्ध हो उठे और उनके कथन का युक्तियुक्त खण्डन करके यहाँ तक कह दिया कि इस प्रकार की बुद्धि से व्यवहार करनेवाले तथा धर्म-मार्ग से हटे हुए आप जैसे नास्तिक को मेरे पिता ने याजक बनाया था मैं उनके उस कार्य की निन्दा करता हूँ— “निन्दाम्यहं कर्म कृतं पितुस्तद् यस्त्वामगृह्णाद्विषमस्थबुद्धिम् । बुद्ध्यानयैवंविधया चरन्तं सुनास्तिकं धर्मपथादपेतम् ॥” (वा० रा० २।१०९।३३ ) अपने प्रिय लक्ष्मण ने भी जब कैकेयी की उचित निन्दा की तो राम ने स्पष्ट कह दिया—तात, मेरी मध्यमा अम्बा कैकेयी की निन्दा मत करो, भरत की ही चर्चा करो— “न तेऽम्बा मध्यमा तात गर्हितव्या कदाचन ।” ( वा० रा ३।१६।३९ ) यद्यपि वाली ने राम का कोई अपराध नहीं किया था तो भी सुग्रीव का अपराध करने से ही राम ने उसे अपना ही अपराधी माना और उसके वध की प्रतिज्ञा कर ली । वाली के वध के अनेक हेतुओं में राम ने उसका भी उल्लेख किया है— “प्रतिज्ञा च मया दत्ता तदा वानरसन्निधौ । प्रतिज्ञा च कथं शक्या मद्विधेनानवेक्षितुम् ॥” ( वा० रा० ४।१८।२६ ) “धनुर्वेदविदां श्रेष्ठो लोकेऽतिरथसम्मतः । अभियाता प्रहर्ता च सेनानयविशारदः ॥ अप्रधृष्यश्च संग्रामे क्रुद्धैरपि सुरासुरैः । अनसूयो जितक्रोधो न दृप्तो न च मत्सरी ॥” (वा० रा० २।१।२९,३०) राम धनुर्वेदविदों में सर्वश्रेष्ठ थे एवं अतिरथियों में भी उनकी धाक थी । वे शत्रु-सेना पर आक्रमण और प्रहार करने में दक्ष और सैन्यसंचालन में विशेष निपुण थे । संग्राम में क्रुद्ध देवता एवं दानव भी उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकते थे । इतने पर भी वे दूसरों की असूया नहीं करते थे और न ही क्रुद्ध होते थे । घमण्ड एवं परोत्कर्ष की असहिष्णुता उनमें नहीं थी । फिर भी उनकी युद्धकुशलता और दृढ़ प्रहार शत्रुओं पर अपना इतना गहरा प्रभाव डालते थे कि वे सदा आतंकित रहते थे । तभी तो मारीच राम से इतना प्रभावित था कि वह रत्न, रथ आदि शब्दों के रकार को सुनकर राम समझकर भयभीत हो जाता था— “रकारादीनि नामानि रामत्रस्तस्य रावण । रत्नानि च रथांश्चैव वित्रासं जनयन्ति मे ॥” (वा० रा० ३।३९।१८) रावण के गुप्तचर भी यह अनुभव करते हैं कि राम के कुपित होने पर उन्हें कोई वश में नहीं कर सकता । वे सम्पूर्ण लोकों का संहार करके नये सिरे से प्रजासृष्टि करने में समर्थ हैं । सब देवगण एवं असुर मिलकर भी उनका वध नहीं कर सकते । राम के अनुसार शत्रु भी यदि शरण में आये एवं हाथ जोड़ कर दया की याचना करे तो आनृ- शंस्य की दृष्टि से कभी भी उसपर प्रहार नहीं करना चाहिये । आर्त्त हो या दृप्त हो यदि वह शत्रु के शरण आया हो तो शत्रु को अपने प्राणों का त्याग कर भी उसकी रक्षा ही करनी चाहिये—
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६७१ "बद्धाञ्जलिपुटं दीनं याचन्तं शरणागतम् । न हन्यादानृशंस्यार्थमपि शत्रुं परन्तप ॥ आर्त्तो वा यदि वा दृप्तो परेषां शरणं गतः । अरिः प्राणान् परित्यज्य रक्षितव्यः कृतात्मना ।।" (वा० रा० ६।१८।२७, २८) महर्षि वसिष्ठ, विश्वामित्र तथा अगस्त्य से राम को उत्तमोत्तम शस्त्रास्त्र प्राप्त थे। वे चाहते तो उन्हें उपयोग में लाकर अनायास ही सबका संहार कर सकते थे, किन्तु राम ने कभी भी उन शस्त्रास्त्रों का प्रयोग नहीं किया। मेघनाद छलपूर्वक ऐसे दिव्यास्त्रों का प्रयोग कर वानरों, मनुष्यों तथा राम और लक्ष्मण दोनों को परेशान करता था। एक बार लक्ष्मण ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करने की आज्ञा चाही, पर राम ने कहा एक के लिए पृथ्वी भर के अयुद्धमान, प्रच्छन्न, प्राञ्जलि, शरणागत, पलायमान, मत्त सब राक्षसों को मारना उचित नहीं है। इन्द्रजित् के मारने के लिए मैं प्रयत्न करता हूँ— "नैकस्य हेतो रक्षांसि पृथिव्यां हन्तुमर्हसि । अयुध्यमानं प्रच्छन्नं प्राञ्जलिं शरणागतम् ॥ पलायमानं मत्तं वा न हन्तुं त्वमिहार्हसि । तस्यैव तु वधे यत्नं करिष्यामि महाभुज ।।" (वा० रा० ६।८०।३८-४०) उसी आदर्श के अनुसार ब्रह्मास्त्र तथा पाशुपतास्त्र रहने पर भी अर्जुन ने भारत-युद्ध में उसका प्रयोग नहीं किया था। इसी तरह यदि आज भी परमाणु बम तथा हाइड्रोजन बम बनाया जाय तो भी कोई आपत्ति नहीं। आवश्यकता है उसके प्रयोग पर नियन्त्रण की। शक्ति का दुरुपयोग निन्य होने पर भी सदुपयोग प्रशंसनीय ही है। इतना ही क्यों राम ने तो श्रान्त, विरथ तथा निःशस्त्र रावण को भी अवसर दिया कि वह स्वस्थ, रथी और धन्वी होकर आये, तब उससे युद्ध किया जाये। तभी मारीच जैसे राक्षस ने भी राम को निर्दोष विग्रहवान् धर्म ही बतलाया था। "रामो विग्रहवान् धर्मः साधुः सत्यपराक्रमः । (वा० रा० ३।३७।१३) राम धर्म के मूर्त्तिमान् रूप हैं। साधु एवं सत्यपराक्रमी हैं। रावण-वध के बाद विभीषण ने पहले शोक व्यक्त करते हुए रावण के गुणों का वर्णन किया, परन्तु अन्त में जब उसकी अन्त्येष्टि का प्रसङ्ग आया तब उसके सीता- हरण आदि दुष्कृत्यों का स्मरण कर के अन्त्येष्टि करना उन्होंने अस्वीकार कर दिया। तब राम ने कहा— "मरणान्तानि वैराणि निवॄत्तं नः प्रयोजनम् । क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव ।।" (वा० रा० ६।११९।१००, १०१) मरने तक ही वैर रहता है। हमारा प्रयोजन सिद्ध हो चुका है। अब यह जैसा तुम्हारा भाई है वैसा ही मेरा भी है। तुम इसका दाह्ादि संस्कार करो। राम ने उसकी प्रशंसा भी की। रावण अधर्मी, असत्यवादी होने पर भी संग्राम में तेजस्वी, बलवान् तथा शूरवीर रहा है। इन्द्रादि देवता भी इसे परास्त नहीं कर सके थे। इसने अनेकों दान, यज्ञ एवं श्रेष्ठ कर्म भी किये हैं। विराध के इच्छानुसार राम ने विराध का अवटनिक्षेप ( फारसी में दफन ) कर तथा कबन्ध के इच्छानुसार उसका दाह कर उन्हें कृतार्थ किया। लङ्का जैसे वैभवशाली राष्ट्र को जीतकर भी राम ने उसके वैभव पर दृष्टि नहीं डाली। रावण के भाई विभीषण को ही लङ्का सौंप दी।
६७२ रामायणमीमांसा विंश "द्विः शरं नाभिसन्धत्ते", "रामो द्विर्नाभिभाषते ।" (वा० रा० २।१८।३०) राम दो बार बाण नहीं चलाते और दो बार नहीं बोलते अर्थात् एक ही बाण से सब अभीष्टों की सिद्धि हो जाती थी। श्रीभागवत ने भी कृष्ण के सुदर्शन चक्र को राम के शर से उपमित किया है। ब्राह्मण-बालकों को लाने के लिए कृष्ण का सुदर्शन चक्र गहन अन्धकार को विदीर्ण करता ऐसे वेग से बढ़ रहा था जैसे राम के धनुष की प्रत्यञ्चा से छूटा हुआ बाण शत्रु-सेना में प्रविष्ट होता है— "तमः सुघोरं गहनं कृतं महद् विदारयद् भूरितरेण रोचिषा । मनोजवं निर्विविशे सुदर्शनं गुणच्युतो रामशरो तथा चमूः ॥" ( १०।८९।५१ ) श्रीभागवत के अनुसार एक ही बाण से राम ने रावण का वध किया था— "एवं क्षिपन् धनुषि सन्धितमुत्ससर्ज बाणं स वज्रमिव तद्धृदयं बिभेद । सोऽसृग्वमन् दशमुखैर्न्यपतद्विमानाद्धा हेति जल्पति जने सुकृतोव रिक्तः ।।" (भाग० १०।८९।५१) अर्थात् इस तरह धनुष पर सन्धान किये हुए बाण का प्रक्षेप करते हुए राम ने उस बाण से वज्रतुल्य रावण के हृदय को छिन्न-भिन्न कर डाला। वह दसों मुखों से रुधिर वमन करता हुआ वैसे ही विमान से गिर पड़ा जैसे सुकृतक्षय होने पर लोगों के हाहाकार के बीच सुकृती विमान में गिर पड़ता है । पाश्चात्यों की धारणा पाश्चात्य विद्वानों विशेषतः यहूदी, ईसाई तथा इस्लाम मतानुयायियों के लिए अवतारवाद कठिन पड़ता है, क्योंकि उनके मतानुसार पुरुष मनुष्य को छोड़कर स्त्री आदि किसी प्राणी में आत्मा नहीं होती । उनके अनुसार वृक्ष, लता आदि भी आत्मविहीन हैं । मनुष्य-जन्म केवल एक ही बार होता है। इस जीवन के कर्मों के फलस्वरूप या तो अक्षय स्वर्ग या अनन्त नरक मिलता है। सुदूर भविष्य में कभी जिब्रायल देवदूत तुरही बजायेंगे तब जितने मनुष्य हैं सबके सब कब्र से पूर्ववत् रूप धारणकर ईश्वर के सिंहासन के सामने विचारार्थ उपस्थित होंगे। पुण्यवान् ईसाई, मुसलमान आदि दायीं ओर तद्भिन्न हिन्दू आदि बायीं ओर खड़े होंगे । पुण्यवान् स्वर्ग जायेंगे। पापियों को दोजख की आग में झुलसना पड़ेगा। इसी दृष्टि से देह को कफन में लपेट कर कब्र में गाड़ने की प्रथा है। अभी स्वर्ग और दोजख दोनों के द्वार बन्द हैं या दोनों खाली पड़े हैं। इनके अनुसार स्वर्ग में देवी नहीं है। जुहोवा, गॉड या अल्लाह अकेले ही एकेश्वर हैं । रोमन कैथोलिक यद्यपि यीशु की कुमारी माता मेरी की उपासना करते हैं, परन्तु वह महामाया या मूल प्रकृति नहीं है । निर्गुण ब्रह्म या मोक्ष भी उन मतों में नहीं है ! साधारण जीव शिव तो है ही नहीं । उसका आत्मा नहीं है। जुहोवा, गॉड या अल्लाह देवदूतों की सहायता से पृथ्वी पर शासन चलाते हैं। ईसाइयों के अनुसार यीशु या ख्रीष्ट ईश्वर का पुत्र है। ईश्वर, पुत्र तथा पवित्र आत्मा ये तीनों दैवी शक्तियां हैं, जिनके ही जीव का उस मत में पुर्वजन्म नहीं होता तब फिर ईश्वर का अवतार कैसा ? ईसाइयों के अनुसार ईश्वरपुत्ररूप यीशु मानवजाति के पाप ग्रहण करने के लिए अवतीर्ण हुए हैं। मुसलमानों के अनुसार हजरत मुहम्मद एकमात्र पैगम्बर हैं। ईसाई-मत के अनुसार ई० पू० ४००४ अर्थात् आज से केवल ६ हजार वर्ष पूर्व ही जगत् की सृष्टि हुई थी। परन्तु आधुनिक वैज्ञानिकों के अनुसार कोटि-कोटि वर्षों के प्राचीन प्रस्तर उपलब्ध होते हैं। समुद्र की क्षारता के आधार पर पृथ्वी अरबों वर्ष पुरानी सिद्ध होती है। एक जन्म के कर्मों के फलस्वरूप अनन्त स्वर्ग या नरक की प्राप्ति
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६७३ तथा मिश्रित पाप-पुण्यवालों की अनिश्चित गति आदि के कारण बुद्धिवादियों के मन में उक्त बातें बैठती नहीं। इसी कारण हिन्दुओं के असंख्य देवी-देवता एवं अवतारवाद उनकी समझ में नहीं आते । विकासवादियों की सहायता से पाश्चात्य विद्वान् वेद, रामायण, महाभारत, पुराण आदि तथा ईश्वरावतार आदि का छद्मपूर्वक खण्डन करते हैं। इनके अनुसार अमीबा हाइड्रा से प्राणियों की उत्पत्ति होती है। उसी से मत्स्य, सरीसृप, बहुपद, चतुष्पद, द्विपद, स्तन्यपायी जीवों का विकास होता है । इनकी दृष्टि में मनुष्य बन्दर नहीं तो बन्दर का चचेरा भाई अवश्य है । मनुष्य पहले असभ्य जङ्गली था । अब क्रमशः सभ्य हो रहा है। हिन्दुओं के पूर्व पुरुष आर्य जाति से निकले । ग्रीक, रोमन, स्लाव, नर्दिक, पारसीक सब एक जाति, एक भाषा और एक धर्म के थे । यह कल्पना एक शताब्दी के भीतर की ही है, परन्तु अब यह कल्पना विश्व के इतिहास को आधारशिला हो गयी है। आर्य, द्रविड़, ब्राह्मण, शूद्र आदि कल्पना भी इन्हीं लोगों के मस्तक का फितूर है। इनके अनुसार वेद अनादि न होकर ई० पूर्व तीन चार हजार वर्ष के आर्य कवियों के काव्यमात्र हैं । ऋग्वेद प्राचीन तथा यजुर्वेद और सामवेद अर्वाचीन हैं। अथर्ववेद और भी निम्न श्रेणी का वेद है। ब्राह्मण ग्रन्थ वेद नहीं हैं । उपनिषद् क्षत्रियों द्वारा प्रणीत ग्रन्थ हैं । ब्राह्मण यज्ञसम्बन्धी कर्मकाण्ड के आडम्बर में व्यस्त रहते थे। वे बहुदेवपूजक होने से एकेश्वरवाद की कल्पना नहीं कर सके । निर्गुण निराकार ब्रह्मवाद की कल्पना पहले नहीं थी। कई लोगों के अनुसार तो भीरु, जंगली मनुष्यों की भूत-प्रेत की कल्पना ही सभ्यता के साबुन से धुल-धुलकर देवकल्पना और वही वैज्ञानिक चमत्कृति से चमत्कृत होकर निर्विकार ब्रह्मकल्पना बन गयी । इन मतों का विस्तृत खण्डन मार्क्सवाद और रामराज्य के विकास प्रकरण में तथा वेदस्वरूप एवं उसका प्रामाण्य में किया गया है । इनके अनुसार रामायण तथा महाभारत महर्षि वाल्मीकि एवं कृष्णद्वैपायन व्यास की कृति नहीं हैं, अपितु चारण, भाट तथा काव्योपजीवी कुशीलवों द्वारा रचित गाथाएँ हैं, जो एक दूसरे के मुख से सुनकर कण्ठस्थ कर ली जाती थीं। उनका संकलन ही ये दोनों ग्रन्थ हैं । १८ पुराण गुप्त-युग के बाद के हैं। जो व्यास के नाम से लिखे गये हैं। सोलहवीं शती तक इनका विकास और परिवर्तन हुआ है। हिन्दुओं ने बौद्धों से संन्यास, मूर्तिपूजा, कथा आदि सीखी थी । जन्म द्वारा जातियां पहले नहीं थीं। क्रमशः श्रमविभाग के आधार पर जातिभेद की सृष्टि हुई है। ब्राह्मणों और क्षत्रियों का बराबर संघर्ष चलता रहता था । इस देश में प्राचीन आदिवासियों को ही दस्यु एवं क्रमेण दास संज्ञा दी गयी थी । 'चातुर्वर्ण्यसंस्कृति-मीमांसा' में इन सब बातों का खण्डन किया गया है। इन लोगों के अनुसार अवतारवाद मिथ्या है। अवतारवाद क्रमविकास का प्रतीक है। मत्स्य, कूर्म, जलचर; कूर्म, वराह जलचर और स्थलचर; नृसिंह अर्द्धनर पशु, वामन असभ्य ह्रस्वकाय जाति, परशुराम निष्ठुर, दुर्दान्त, वन्य लोग, राम कृषि का विस्तार करनेवाले, बलराम हलधर कृषिविशेषज्ञ, शिव, दुर्गा आदि असभ्य जातियों से वैदिक धर्म में लिये गये हैं। राम और कृष्ण पहले विभिन्न जातियों के नेता थे। पश्चात् क्रमशः जातीय नायक हुए, अन्त में देव मान लिये गये । इन अंशों का भी विस्तृत खण्डन उसी ग्रन्थ में देखिये । संक्षेप से यहाँ भी जगह जगह पर है ही । बेवर के अनुसार रामायण दाक्षिणात्य एवं सिंहलद्वीप स्थित आर्यसभ्यता के विकास की कहानी है । लासेन के अनुसार आर्यों की दक्षिणविजय की प्रथम चेष्टा का रूपक इसमें वर्णित है । मैकडानल एवं याकोबी रामायण को प्राचीन भारतीय उपाख्यानों पर प्रतिष्ठित मानते हैं । उनके अनुसार सीता ऋग्वेद के खेत की हल-सम्बन्धी रेखा थी । राम इन्द्र या पर्जन्य देवता थे । राम और रावण का युद्ध इन्द्र तथा वृत्र के संग्राम की कहानी है । इन्द्रजित् या इन्द्रशत्रु ऋग्वेद में वृत्र का नाम है । इन्द्र की शुनी सरमा रामायण की सीता को सान्त्वना देनेवाली सरमा राक्षसी है । वायुपुत्र हनुमान् मरुद्गण सहित इन्द्र के वैभव का स्मरण दिलाते हैं ।
मैकडानल के अनुसार याकोबी की यह कल्पना ठीक मालूम पड़ती है कि हनुमान् के साथ कृषि-कार्य का कुछ सम्पर्क था और वे वर्षा के एक उपदेवता थे । इन पाश्चात्यों के अनुसार रामायणग्रन्थ अयोध्याकाण्ड से लेकर युद्ध काण्ड तक ही था। मागध और वन्दियों ने पीछे से बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड उसमें जोड़ दिये हैं। उनके अनुसार मूल काव्यखण्ड के जातीय नायक आगे जोड़े गये अंशों से जातीय नायक के रूप में परिवर्तित हो गये । वह समस्त जन-समाज के लिए नैतिक आदर्श के प्रतीक बन गये । कुछ प्रक्षिप्त अंशों को छोड़कर मूल पाँच काण्डों में मनुष्यनायक बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड में देवता के रूप में परिणतः होकर भगवान् विष्णु के साथ एकाकार हो गये । प्रो० विंटरनित्स के अनुसार असल रामायण में राम की भगवत्ता या विष्णु का अवतार होने का कोई उल्लेख नहीं था । कीथ के अनुसार रामायण दो उपाख्यानों का तालमेल है । उनमें से दूसरा है सीताहरण के कारण राम और रावण का युद्ध । यह मूलतः एर्क प्राकृतिक आख्यान है। इनमें अनेक काल्पनिक घटनाओं का समावेश है। इन्हीं आधारों पर कामिल बुल्के ने भी अनेक दुष्कल्पनाएँ की हैं । समाधान वस्तुतः वेद अनादि अपौरुषेय नित्य ग्रन्थ हैं । मन्त्र, ब्राह्मण और उपनिषद् उन्हीं के भेद हैं । रामायण, महाभारत, पुराण और आगम सब उन्हीं वेदों की व्याख्या एवं उपबृंहणमात्र हैं। पाश्चात्यों की कल्पनाएँ निर्मूल एवं दुरभिसन्धिपूर्ण हैं । वेदों और उपनिषदों में राम की कथा है । वाल्मीकिरामायण में उसी का विस्तृत विवेचन है । वाल्मीकि राम के समसामयिक त्रिकालदर्शी महर्षि थे । कृष्णद्वैपायन कृष्ण के समय विद्यमान थे। फिर भी इन महर्षियों ने समाधिजा ऋतम्भरा प्रज्ञा से सीता, राम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, हनुमान् आदि के सभी स्थूल तथा सूक्ष्म चरित्रों का साक्षात्कार कर रामायणकाव्य या आर्ष इतिहास लिखा है । रामायण के अनुसार ही बालकाण्ड से लेकर युद्धकाण्ड तक ६ काण्ड और उत्तरकाण्ड वाल्मीकिकृत रामायण है । यह महर्षियों का उद्घोष परम्पराप्राप्त, महाभारतादि ग्रन्थों से समर्थित एवं महान् भाष्य-टीकाकारों से आदृत है । उसके विरुद्ध पाश्चात्य-कल्पना निःसार हैं । अयोध्या से युद्धकाण्ड तक ५ काण्डों में भी राम की भगवत्ता का वर्णन करनेवाले सहस्रों श्लोक हैं । सबको प्रक्षिप्त कह देना हठवादिता के सिवा और कुछ नहीं है । इस तरह बाइबिल आदि ग्रन्थों की भी प्रक्षिप्तता सिद्ध होगी । “ममापि सफलं चक्षुः स्मारितश्चास्मि राघवम् । रामाभिधानं विष्णुं हि जगद्धृदयनन्दनम् ॥ सीतावक्त्रारविन्दाकं दशास्यध्वान्तभास्करम् । मानुषं गात्रसंस्पर्शं गत्वा भीम त्वया सह ॥” (म० भा० ३।१५१।६–८) हनुमान्जी भीमसेन से कहते हैं राम के दर्शन से मेरे चक्षु सफल हैं। आज पुनः मनुष्यगात्र के संस्पर्श से जगत् के हृदय को आनन्दित करनेवाले, सीतामुखपङ्कज को प्रफुल्लित करनेवाले सूर्य एवं रावणरूपी अन्धकार को मिटानेवाले भास्कर राम का स्मरण हो रहा है । ब्रह्मा ने कहा है, मेरी प्रार्थना से चतुर्भुज विष्णु अवतीर्ण हुए हैं । वे रावण-वधादि कार्य करेंगे— “तदर्थमवतीर्णोऽसौ मन्नियोगाच्चतुर्भुजः । विष्णुः प्रहरतां श्रेष्ठः स तत्कर्म करिष्यति ॥” ( म० भा० ३।२७६।५ ) धौम्य ने कहा है, भीमकर्मा विष्णु ने दशरथ के गृह में अवतीर्ण होकर मनुष्यरूप से संग्राम में रावण को मारा था—
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६७५
“विष्णुना वसता चापि गृहे दशरथस्य च। दशग्रीवो हतश्छन्नं संयुगे भीमकर्मणा ।” ( म० भा० ३।३१५।२ ) कि बहुना महाभारत में अनेक स्थलों पर राम का चरित्र एवं राम का परब्रह्म विष्णु होना वर्णित है । हरिवंश महाभारत का ही खिल है। उसमें भी रामायण महाकाव्य की चर्चा है। “रामायणमहाकाव्यमुद्दिश्य नाटकं कृतम् । जन्म विष्णोरमेयस्य राक्षसेन्द्रवधेप्सया ॥” ( हरिवं० ९३।६ ) कालिदास ( ई० पू० १ म० श० ) ने रघुवंश में राम को विष्णु का अवतार कहा है । कौटिल्य चाणक्य ने ( ई० सन् ५४ में ) रावण-वध का उल्लेख किया है— “मानाद्रावणः परदारानप्रयच्छन् ।” ( १।६।९ ) भास ( ई० पू० ५ श० ) ये मौर्ययुग के हैं। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में उनके प्रतिज्ञायौगन्धरायण नाटक से 'नवं शरावं' श्लोक उद्धृत है । उनके यज्ञफलनाटक, प्रतिमानाटक तथा अभिषेकनाटक इन नाटकों की विषयवस्तु रामायण की है। अभिषेकनाटक ( ४।१४ ) तथा अभिषेकनाटक ( ६।२८ ) में सीता के साथ राम के मायामानुषवेष में अवतार का उल्लेख है । एतावता ई० पू० १ श० राम को विष्णु माना जाने लगा था, बुल्के आदि की ये कल्पनाएँ सर्वथा मिथ्या हैं । चरक में विष्णुसहस्रनाम का पाठ विहित है। 'विष्णुसहस्रनाम' में “रामो विरामो विरतः” आदि में राम का नाम आया है। चरक वैशम्पायन के समसामयिक हैं। आद्यशङ्कराचार्य स्वा० दयानन्द के अनुसार ई० पू० ३ शती के हैं । आधुनिक दृष्टिकोण से भी ई० ७वीं शती के हैं। किन्तु यह मत मिथ्या है। उन्होंने विष्णुसहस्रनाम- भाष्य में रामः ३९४, क्षमा ४४२, सुमुखः ४५६, कपीन्द्रः ५०१, जितामित्रः ५२४, भूषयः ६२८, शूरसेनः ७०४; धनुर्धरः ८५८ तथा क्षमिणांवरः ९१९ विष्णुनामों की रामवाचक व्याख्या की है। रामभुजङ्गप्रयात आदि अनेक स्तोत्रों में उन्होंने सीताराम की विष्णुरूप में चर्चा की है । “राम दक्षिण भारत में आर्यसभ्यता फैलाते हैं, राम-रावणयुद्ध इन्द्र-वृत्रयुद्ध का प्रतीक है, इन्द्रजित्, इन्द्र- शत्रु और वृत्र एक ही व्यक्ति के नाम हैं, देवशुनी सरमा और विभीषणपत्नी सरमा अभिन्न थीं एवं हनुमान् वर्षा के उपदेवता थे ।” ये सब बातें पाश्चात्यों की निराधार अटकलमात्र हैं । विश्व की सृष्टि भारत से ही हुई हैं । “मनुष्य इधर-उधर फैले, भारतीय हिन्दू कहीं बाहर से आये” यह कल्पना वेदादि शास्त्रों और इतिहासों से विरुद्ध है । सीता का आविर्भाव हलाग्र से होने के कारण उनका नाम सीता पड़ा, परन्तु राम का खेती से किसी विशेष सम्बन्ध की कल्पना निराधार है । बलराम का हल से सम्बन्ध है, राम का नहीं । वे दोनों एक नहीं हैं । बलराम हलधर थे, पर हल और मुसल उनके आयुध थे । वे हलधर किसान नहीं थे । राम तो धनुर्धर थे, फिर उनका कृषि से सम्बन्ध कैसा ? वे तो १४ वर्ष वनवास में रहे । कृषि करना तो दूर रहा, वे कृषि का अन्न भी ग्रहण नहीं करते थे । पाश्चात्य लोग रामायण के वानर, भालू एवं राक्षसों को असभ्य जाति के मनुष्य ही मानते हैं । रामायण से विदित होता है कि रावण को वरदान मिला था कि मनुष्य, वानर तथा भालुओं के सिवा तुम देवता, दानव, राक्षस आदि से अवध्य होगे । इसी लिए उसके नाशार्थ विष्णु मायामानुष राम के रूप में प्रकट हुए थे । देवता भी ब्रह्मा के आदेश से वानर और भालू रूप में अवतीर्ण हुए थे । वे कामरूपी, कामचारी, प्रचण्ड पराक्रमी तथा दीर्घायु थे । पवनसुत हनुमान् समुद्र लांघने में समर्थ हुए । द्वापर में गन्धमादन पर्वत पर उनका रूप देखकर भीम भी मोहग्रस्त हो गये । वे अर्जुन की ध्वजा पर बैठकर पाण्डवों की सहायता करते थे ।
६७६ रामायणमीमांसा विंश ब्रह्मा ऋक्षपति, इन्द्र वाली तथा सूर्य सुग्रीव के रूप में अवतीर्ण थे । ऋक्षपति की कन्या जाम्बवती कृष्ण की एक पट्टमहिषी थी । यद्यपि यह सब अलौकिक, अविश्वसनीय प्रतीत होगा, परन्तु शङ्कराचार्य के “तस्मात् समूल- मितिहासपुराणम्” ( ब्र० सू० १।३।३३ ) के भाष्य-वचन के अनुसार इतिहास-पुराण में विश्वास करना ही चाहिये ( देखिये देवताधिकरण ) । माता-पिता के गुण सन्तान में आते ही हैं । किसी में माता के और किसी में पिता के अधिकांश गुण आते हैं । अतः हनुमान् आदि में मातृपक्ष से वानरी आकृति और वानरी भाषा आदि गुण प्राप्त हुए तथा पितृपक्ष से देवताओं के जैसे अद्भुत तेज, पराक्रम तथा देवताओं की संस्कृत भाषा भी प्राप्त हुई । इसी प्रकार वाली आदि में देवताओं के समान ही वेदादि शास्त्रों का प्रतिभान भी हुआ । हनुमान् ने विशिष्ट ज्ञानार्थ सूर्य से अध्ययन भी किया । आज वैज्ञानिक प्राणियों एवं पौधों के जोड़-मेल से विलक्षण प्राणियों तथा पौधों की सृष्टि करते ही हैं । राक्षस असुरों में ही योनिविशेष हैं। वे उग्र, कामरूपी और कामचारी थे । शूर्पणखा तथा हिडिम्बा ने सुन्दर मानवीरूप धारण किया था । विभीषण एवं उसके मन्त्री मनुष्यवेष में ही युद्ध करते थे । राक्षस भी दीर्घायु थे । तभी रावण ने मान्धाता एवं अनरण्य के साथ युद्ध किया था । राम की ऐतिहासिकता हिन्दू जाति के धार्मिक सांस्कृतिक एवं पारिवारिक जीवन पर मर्यादापुरुषोत्तम राम का अमिट प्रभाव है । हिन्दू-परिवार में जन्म एवं विवाह के अवसरों पर रामजन्म एवं राम-विवाह सम्बन्धी गीत गाये जाते हैं । शरीर की अन्तिम यात्रा 'रामनाम सत्य है' की ध्वनि के साथ होती है । भारत के कोने-कोने में राम और उनके भक्त हनुमान् के मन्दिर हैं । लाखों व्यक्ति प्रतिदिन रामायण का पाठ करते हैं तथा अयोध्या, रामेश्वर, पञ्चवटी, चित्रकूट, आदि तीर्थों की यात्रा करते हैं । करोड़ों हिन्दुओं के ही नहीं श्याम, थाइलैण्ड आदि देशों के निवासियों के नाम भी रामायण से सम्बन्धित होते हैं । राम प्रत्येक हिन्दू के जीवन में रम रहे हैं। ईश्वर के नामों में सर्वप्रसिद्ध नाम राम ही है । भारत के बच्चे-बच्चे की जबान पर राम-नाम रहता है । काशी में जीवों को मुक्ति के लिए शिवजी राम-नाम का उपदेश करते हैं। फिर भी राम की ऐतिहासिकता पर शङ्का करना केवल मतिविभ्रम ही है। वह आधुनिक पाश्चात्य कूटनीतिज्ञों के दुष्प्रचार का परिणाम है । आधुनिक वैज्ञानिक आविष्कारों के चमत्कारों से तथा वेदादि शास्त्रों, दर्शनों एवं तर्कशास्त्रों के अनभ्यासों से भारतीय प्रभावित से हो गये हैं। आत्मज्ञानशून्य देश परकीय चाक- चिक्यों से प्रभावित होते ही हैं । वस्तुतः परम्पराप्राप्त इतिहास तथा जीवनवृत्तसम्बन्धी प्रामाणिक पुस्तकें तथा तत्कालीन या कालान्तरवर्ती पुस्तकों में तत्सम्बन्धी चर्चाएँ, उसके द्वारा लिखित पुस्तकें या तन्निर्मित मन्दिर, सेतु तथा तत्सम्बन्धी शिलालेख, ताम्रलेख या मुद्राएँ किसी के ऐतिहासिक होने में प्रमाण कही जाती हैं। इस दृष्टि से देखने पर राम की भी ऐतिहासिकता सिद्ध है। राम के जीवन की प्रमुख घटनाएँ लोकपरम्परा में अत्यन्त प्रसिद्ध हैं । भारत में उनका नाम प्रत्येक जिह्वा पर है। संसार के इतिहास में ऐसी प्रसिद्धि किसी की भी नहीं है । भारत में ही नहीं सुदूरदेशों में भी राम के चरित्रों के आधार पर अनेक लीलाएँ तथा नाटक होते हैं। चौबीस हजार श्लोकों की वाल्मीकिरामायण में उनके जीवनवृत्त का ही वर्णन है । वाल्मीकि के समान ही व्यास भी सर्वज्ञ थे। उनके महाभारत तथा पुराणों में राम व रामायण की भरपूर चर्चा है । महाभारत के अनुसार भीम जैसे महावीर हनुमान् की पूँछ नहीं उठा सके । अन्त में भीम के प्रश्न पर हनुमान् ने अपने परिचय में राम की कथा की चर्चा की ( म० भा० ३।१४७ ) । महर्षि मार्कण्डेय ने वनवास के समय युधिष्ठिर से कहा था, आपकी यह विपत्ति देखकर मुझे रामचन्द्र का स्मरण हो आया । पिता की आज्ञा से
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६७७ धनुष हाथ में लेकर घूमते हुए उन्हें ऋष्यमूक पर्वत पर मैंने देखा था। उन्होंने यह नहीं कहा कि मैंने केवल सुना है ( म० भा० ३।२५।६-९ ) । गीता के कृष्ण कहते हैं कि शस्त्रधारियों में मैं राम हूँ । शङ्कराचार्य की रामपद की व्याख्या में दाशरथि राम कहा गया है। लगभग सभी पुराणों तथा काव्यों में श्रीमद्भागवत भागवतों का परमा- दरणीय ग्रन्थ है। प्रतिवर्ष जिसके हजारों सप्ताह होते हैं, उसमें भी रामायण एवं राम की चर्चा है । श्रीराम की नीति “न रामसदृशो राजा पृथिव्यां नीतिमानभूत् । सुभृत्यता तु यन्नीत्या वानरैरपि स्वीकृता ।।” ( शु० नी० ४।६।१०।७८ ) शुक्रनीति के अनुसार राम सदृश कोई भी नीतिमान् नहीं हुआ । उनकी नीतिमत्ता से ही वानरों तथा भालुओं ने भी उनकी सुभृत्यता स्वीकार की थी । “यान्ति न्यायप्रवृत्तस्य तिर्यञ्चोऽपि सहायताम् । अपन्थानं तु गच्छन्तं सोदरोऽपि विमुञ्चति ॥” श्रीराम जैसे न्यायनिष्ठ के प्रभाव से वानर और भालु भी राम के साथी हो गये और दुर्मार्गनिष्ठता के कारण ही रावण का भाई भी साथ छोड़कर उससे पृथक् हो गया । “ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं विरक्षति ॥” ( अथ० सं० ११।५।१७ ) ब्रह्मचर्य एवं तपस्या से राजा राष्ट्र की रक्षा करता है। इसके उदाहरण श्रीराम हैं। “न हि तद्भविता राष्ट्रं यत्र रामो न भूपतिः । तद् वनं भविता राष्ट्रं यत्र रामा निवत्स्यति ॥ ( वा० रा० २।३७।२९ ) जहाँ राम राजा नहीं वह देश राष्ट्र नहीं है, जहाँ राम निवास करेंगे वह वन भी राष्ट्र होगा । भगवान् के भक्त उनका मङ्गलाशासन करते हैं— “मङ्गलं कोसलेन्द्राय महनीयगुणात्मने । चक्रवर्तितनूजाय सार्वभौमाय मङ्गलम् ॥” भगवान् मङ्गलों के भी मङ्गल हैं। ब्राह्मण, गौ, अग्नि, हिरण्य, सर्पि, जल तथा राजा गरुड़पुराण ( ३०५।७४, ७५ ) के अनुसार मङ्गल हैं तथा सिंह, साँड, हाथी, कलश, व्यजन, वैजयन्ती, भेरी एवं दीप भी मङ्गल हैं। दधि, दूर्वा आदि मङ्गलों के भी मङ्गल, देवताओं के दैवत, जो परन्तप एवं परमतेज हैं उन महनीय- गुणागार चक्रवत्तित्सुत सार्वभौम कोसलेन्द्र के लिए मङ्गलाशासन करना महत्त्वपूर्ण है। राम से बढ़कर सन्मार्गस्थित संसार में कोई है ही नहीं— “नहि रामात् परो लोके विद्यते सत्पथे स्थितः ।” ( वा० रा० २।४४।२६ ) श्रीराम धर्मज्ञ, सत्यसन्ध, प्रजाहितनिरत, यशस्वी, ज्ञानसम्पन्न, सर्वपोषक, रिपुसूदन, सर्वजीवलोक के रक्षक, तत्तद्वर्णाश्रममर्यादाओं का पालन करके धर्मका पालन करनेवाले, अपने यज्ञ, अध्ययन, दान आदि एवं युद्धादि रूप धर्म का सादर अनुष्ठान करनेवाले तथा स्वभक्त जनों के अवश्यम्भावी अनिष्टों को भी मिटाकर मोक्ष प्रदान कर रक्षण करनेवाले हैं । रघुवंश, भट्टिकाव्य आदि सैकड़ों काव्यों तथा नाटकों में राम की चर्चा है । अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण, अगस्त्यसंहिता आदि संहिताओं में राम की चर्चा है ही । ऐसे बहुचर्चित राम को अनैतिहासिक कहना अनभिज्ञता का ही परिचय देना है। भागवत आदि पुराणों के अनुसार रामसेतु एवं रामेश्वर की स्थापना
भी राम के ऐतिहासिक होने में ज्वलन्त प्रमाण हैं। रामसेतु के खण्डों पर ही रामेश्वर पहुँचने का रेलवे मार्ग स्थित है। राम की जन्मकुण्डली यद्यपि पुराणों के अनुसार राम का जन्म २८ वें मन्वन्तर के २४ वें त्रेता में हुआ है फिर भी पाश्चात्यों ने अपनी अटकल से उनका जन्म ईसा पूर्व कुछ शतियों या सहस्राब्दियों में ही माना है। जोन्स नामक अंग्रेज इतिहासज्ञ राम का जन्म-काल ई० पूर्व २०२९ वर्ष मानता है। टॉड ने ई० पूर्व ११०० वर्ष राम का जन्म-समय माना है। वैन्थली ने ई० पूर्व ९५० वर्ष ही स्वीकार किया है। विल्फर्ड नामक इतिहासज्ञ ने ई० पूर्व १३६० वर्ष राम का जन्म-काल माना है। महर्षि वाल्मीकि के अनुसार दशरथ के पुत्रेष्टियज्ञ की समाप्ति के १२ मास बीतने पर चैत्र शु० ९मी पुनर्वसु नक्षत्र कर्क लग्न में तथा जब पांच ग्रह अपनी उच्च राशि में स्थित थे एवं गुरु चन्द्र के साथ थे उस समय राम का अवतार हुआ— “ततो यज्ञे समाप्ते तु ऋतूनां षट् समत्ययुः । ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नावमिके तिथौ ॥ नक्षत्रेऽदितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पञ्चसु । ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह ॥” (वा० रा० १।१८।८, ९ ) ज्योतिषियों के अनुसार रवि, भौम, गुरु, शुक्र और शनि ये पाँच ग्रह उच्च के थे। अर्थात् रवि मेष के, मङ्गल मकर के, गुरु कर्क के, शुक्र मीन के एवं शनि तुला के थे। स्थूल रीति से सप्तर्षिगण लगभग सहस्र वर्ष, वरुण ८४ वर्ष एवं शनि लगभग २॥ वर्ष एक राशि में रहते हैं। सूर्य एक राशि पर एक मास और गुरु एक राशि पर एक वर्ष रहते हैं। सूर्य, गुरु और शनि के विचारसे पाँचों उच्चस्थ ग्रहों की गणना करने से रामचन्द्र का जन्म- काल १,८५,०७१ वर्ष पूर्व हुआ था। इन्हीं ग्रहों के अनुसार रामराज्य की महनीयता तथा राम के लोकोत्तर बल, वैभव, प्रताप आदि अतुलनीय थे। मङ्गल उच्च गृहस्थ होने पर शुभप्रद नहीं होता, इसी लिए स्त्रीकष्ट आदि की प्राप्ति हुई। यह भी एक मत ही है। परन्तु पुराण प्रमाण के अनुसार जब चौबीसवीं त्रेता राम का काल है तब तो उसी के आधार पर विचार करना उचित है। वाल्मीकिरामायण में वर्णित ग्रहस्थिति उस समय भी रही होगी। राम की नीतिमत्ता वाल्मीकिरामायण के अनुसार राजतन्त्र होते हुए भी भारत में लोकतन्त्र था। इसी लिए महाराज दशरथ को राम को यौवराज्य देने के लिए जनस्वीकृति अपेक्षित हुई थी। इंग्लैण्ड तथा जापान में आज भी राजतन्त्र होते हुए भी जनतन्त्र हैं ही। शासन में भ्रष्टाचार तथा भाई-भतीजावाद या कुनवापरस्ती न पनपने देने के लिए राजा और प्रजा दोनों पर ही धर्म का नियन्त्रण होता था। मन्त्रों, ब्राह्मणों तथा मन्वादिधर्मशास्त्रों, शुक्र, बृहस्पति आदिनिर्मित नीतिशास्त्रों ने इसके लिए राजा को सदाचारी, जितेन्द्रिय, आन्तरिक षड्रिपूओं का विजेता तथा कामज, क्रोधज अष्टादश व्यसनों से रहित बनाने पर पूर्ण बल दिया है। श्रीदशरथ ने पृथिवी भर के समस्त प्रधान लोगों को बुलाया था— “समानािनाय मेदिन्यां प्रधानान् पृथिवीपतिः ।” ( वा० रा० २।१।४६ ) मन्त्री वही होते थे जो पौरों एवं जानपादों के विश्वासभाजन होते थे— “तस्मै मन्त्रः प्रयोक्तव्यो दण्डमाधित्सता सता । पोरजानपदा यस्मिन् विश्वासं धर्मतो गताः ॥” ( म० भा० १२।८३।४५, ४६ )
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६७१ शुक्रनीति के अनुसार राजा क्रोध तथा लोभ से विवर्जित होकर धर्मशास्त्र के अनुसार न्यायाधीश, मन्त्री, एवं पुरोहित की सम्मति से शासन करता था । "धर्मशास्त्रानुसारेण क्रोधलोभविवर्जितः । सप्राड्विवाकः सामात्यः सब्राह्मणपुरोहितः ॥" ( शु० नी० ४।५।१२ ) राजा की सभा में सभी जाति के मुख्य लोग सभ्य होते थे— "सभ्याः सर्वासु जातिषु ।" ( शु० नी० ) "जातिजानपदान् धर्मान् श्रेणीधर्मांश्च धर्मवित् । समीक्ष्य कुलधर्मांश्च स्वधर्मं प्रतिपादयेत् ॥" ( मनु० ८।४१ ) के अनुसार राम जातिधर्म, देशधर्म, श्रेणीधर्म तथा कुलधर्मों को यथावत् जानते एवं उनका पालन करते थे । भारतीय नीति एवं राजधर्म में राजा का आचरण ही आदर्श राज्य का आधार होता है । राजा चाहे व्यक्ति हो चाहे दल, वह अपने व्यवहार से समाज का उन्नायक होता है । अतएव राम ने अपने आचरण द्वारा प्रजा तथा समाज को आदर्शरूप में ढाला था । यद्यपि वैयक्तिक आचरण का निजी जीवन से ही सम्बन्ध होता है, परन्तु वस्तुतः राम का वैयक्तिक जीवन भी समाज के लिए ही था । जैसी गर्भिणी स्त्री का निजी व्यवहार भी गर्भस्थ शिशु के हित की दृष्टि से होता है । तभी वे लोकाराधन के लिए वैयक्तिक स्नेह, दया, सौख्य तथा जानकी तक को त्यागने को तैयार थे । यज्ञ आदि के प्रसङ्ग से राम निरन्तर दान तथा त्याग में ही लगे रहे । जहाँ आज देने में संकोच है तो चारों तरफ से लेने का ही संघर्ष है । पर राम के समय राम के आदर्शानुसार सब में देने की ही होड़ थी । लेने का संघर्ष सर्वथा समाप्त था । संग्रह-वृत्ति में ही संघर्ष होता है । तुलसीदासजी के अनुसार प्रजा के सुभाग से ही भानु जैसा भूपति होता है । भानु धरती से कब कितना रस खींचता है यह किसी को नहीं मालूम पड़ता है, पर भानुजनित मेघ से रसमय जल बरसते देखकर सभी हर्षित होते हैं— "तुलसी प्रजासुभाग ते भूप भानु सो होय । बरसत हरषत लोग सब करखत लखै न कोय ॥" कालिदास के अनुसार 'सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रविः' हजारों गुना अधिक करके देने के लिए जैसे सूर्य पृथ्वी से अप्रत्यक्ष रसादान करता है वैसे ही राजा हजारों गुना अधिक देने के लिए प्रजा से सीमित अप्रत्यक्ष कर ग्रहण करता है । भारतीय नीति एवं रामराज्त में अलग से कोई विधान नहीं था । विधि या संविधान वेद ही हैं । आर्ष धर्मग्रन्थ एवं नीतिग्रन्थ उनकी व्याख्या थे । तुलसी के अनुसार—"श्रुतिपथ पालक धर्मधुरन्धर ।" ( रा० मा० ७।२३।१ ) राम ने अनादि श्रुतिसिद्ध धर्म के सर्वमान्य रूप को, उसका पालन करके, व्यवहार की वस्तु बनाया । तभी तो भरत कहते हैं— "चाहिय धर्मशील नरनाहू ।" ( रा० मा० २।१७७।१ ) जब शासक ही विधायक बन जाता है तब निरङ्कुशता ही फैलती है । आजकल भी कार्यपालिका और विधायिका एवं न्यायपालिका को पृथक्-पृथक् रखने का नाटक किया जाता है । राम ने विधान नहीं बनाया, किन्तु आदर्श आचरण उपस्थित किया । तुलसी के राम ने राजधर्म का सर्वस्व यही कहा था— "मुखिआ मुखु सो चाहिअइ खान पान कहूँ एक । पालइ पोसइ सकल अंग तुलसी सहित विवेक ॥" ( रा० मा० २।३१४ )
६८० रामायणमीमांसा विंश प्रजा के विभिन्न वर्गों का उनकी स्थिति, क्षमता तथा संस्कार के अनुसार पालन-पोषण करना राजा का कर्तव्य है । परन्तु विवेक के साथ । मुख द्वारा भक्षित अन्न रसरूप से हस्त, पाद, नेत्र, श्रोत्र, हृदय, मन, बुद्धि आदि सबको प्रभावित करता है । परन्तु सबकी योग्यता एवं आवश्यकता एक नहीं है। सबको एक लाठी से हांकना विवेक नहीं है। हाथी को मनभर चींटी को कनभर की कहावत प्रसिद्ध ही है। धर्मनियन्त्रित विवेकी राजा ही विभिन्न परि- स्थितियों, व्यक्तियों एवं श्रेणियों के साथ यथोचित कुशलताके साथ व्यवहार कर सकता है। भारतीय राजा उतना शासक नहीं होता था, जितना प्रजा को हित का परामर्शदाता । शास्त्र की दृष्टि से राजा परमेश्वर का अंश होता है । छत्र, चँवर, सिंहासन आदि उसके विशिष्ट पद के अनुरूप आवश्यक हैं। फिर भी उनके अभिमान में अपने को प्रजा से अलग-बिलग समझ लेने में राजा प्रजा की पिता-पुत्र की सी आत्मीयता लुप्त हो जाती है। श्रीराम प्रजा को आत्मीयता दृष्टि से उपदेश करते हैं, राजा के रुआब में नहीं— “जो अनीति कछु भाषौं भाई । तौ मोहि बरजहु भय बिसराई ॥” ( रा० मा० ७।४२।३ ) यहाँ 'राजा करे सो न्याय' को कोई स्थान नहीं है। ऐसा राजा प्रजा के हृदयसिंहासन का अधीश्वर होता है। कहा जा सकता है कि ऐसा राजतन्त्र प्रजातन्त्र पर ही आदृत होता है। जनता को निर्भीकता के साथ राजा के व्यक्तिगत जीवन की भी समालोचना करने की स्वतन्त्रता होती थी। तभी राम ने सीतानिन्दक का भी कल्याण ही किया । किसी की जुबान पर ताला नहीं था। वह राजा दण्ड के बल पर किसी का मुंह बन्द नहीं करता था, किन्तु आचरण बदल कर ही प्रजा का अनुरागभाजन होता था । ऐसा विनयी, सच्छास्त्र तथा सत्पुरुष सेवी राजा का शास्त्रसम्मत सरल जीवन ही संसार का मार्गदर्शक होता है। तभी रामराज्य में सब सुखी थे। सभी शोकरहित थे— “हरषित भये गये सब सोका ।” ( रा० मा० ७।१९।४ ) सबका वैर-विग्रह मिट गया । विषमता मिट गयी । महारानी वैदेही के शरीर में केवल माङ्गल्यसूत्र ही भूषण रह गया । यज्ञ के प्रसङ्ग से राम ने सर्वस्व दान दे दिया । राजा के आचरण का प्रभाव जनता पर पड़ता ही है। संग्रह या विषमता ही द्वेष का कारण बनती है। विषमता मिटने पर वैरनिवृत्ति स्वाभाविक ही है। फिर भी अध्यात्मनिष्ठा तथा स्वधर्मानुष्ठान आवश्यक होता है। उसके बिना सहज सन्तोष नहीं होता है। इसी लिए रामराज्य में सब अपने वर्णाश्रम-धर्म के अनुसार वेदमार्ग पर ही चलते हुए शोक और मोह से रहित तथा सुखी थे। राम ने— "आब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामाराष्ट्रे राजन्यः शूर ईषव्योतिव्याधी महारथो जायतां दोग्ध्री धेनुर्वोढानड्वानाशुः सप्तिः पुरन्ध्रियोंषा जिष्णू रथेष्ठाः सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जयतां निकामे निकामे नः पर्जन्योभिवर्षतु फलवत्यो न ओधयः पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम् ।” ( शु० यजु० २२ ) के अनुसार अपने राष्ट्र को बनाया था, जिसमें वसिष्ठादि जैसे ब्रह्मवर्चसी ब्राह्मण थे । राम, लक्ष्मण, भरत जैसे शूरवीर राजन्य थे । उस राष्ट्र में पर्याप्त दूध देनेवाली गायें और महान् भार वहन करनेवाले बैल उत्पन्न होते थे । तीव्रगामी घोड़े एवं साध्वी-सती पुरन्ध्रियां होती थीं । राष्ट्र के रथी विजेता होते थे । राष्ट्र के यजमान सभा में बैठने योग्य सभ्य युवक उत्पन्न करनेवाले होते थे । राष्ट्र में समय-समय पर वृष्टि होती थी । औषधियाँ फलदायिनी परिपाक को प्राप्त होती थीं। राष्ट्र के योग एवं क्षेम ( अप्राप्त की प्राप्ति एवं प्राप्त की रक्षा ) की पूर्ण व्यवस्था थी । राम गौओं और ब्राह्मणों के रक्षणार्थ तथा देश के हितार्थ अप्रमेय गुरु के अनुसार सदा ही महत्कर्म की साधना में उद्यत रहे-- 'गोब्राह्मणहितार्थाय देशस्य च हिताय वै । तव चैवाप्रमेयस्य वचनं कर्तुमुद्यतः ॥” ( वा० रा० १।२६।५ )
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६८१ भौतिक समानता में भी आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक तापों की निवृत्ति नहीं होती । त्रितापनिवृत्ति धर्म-ब्रह्मनिष्ठा से सम्भव है । कर्मनिष्ठा से ही ब्रह्मनिष्ठा होती है । उससे भौतिक प्रपञ्च ही बाधित हो जाता है । तभी रामराज्य में भौतिक आदि ताप किसी को नहीं व्यापते थे । “दैहिक दैविक भौतिक तापा । रामराज्य नहिं काहुहि व्यापा ॥” ( रा० मा० ७।२०।१ ) उच्च धर्म-ब्रह्मनिष्ठा का ही परिणाम था कि किसी की अपमृत्यु नहीं होती थी । किसी को कोई पीड़ा नहीं होती थी । सब सुन्दर एवं नीरोग होते थे । कोई दुखी, दरिद्र एवं दीन नहीं होता था । कोई मूर्ख एवं दुर्लक्षण- वाला नहीं होता था— “अलप मृत्यु नहिं कवनेउ पीरा । सब सुन्दर सब निरुजसरीरा ॥ नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना । नहिं कोउ अबुध न लच्छनहीना ॥” ( रा० मा० ७।२०।३ ) धार्मिक आध्यात्मिक अभ्युत्थान के बिना केवल भौतिक समानता एवं सौविध्य से यह सम्भव नहीं था । जहाँ राजा त्यागी, उदार तथा आदर्शचरित्रवाला होता है वहाँ प्रजा भी वैसी बन जाती है । यह स्वाभाविक बात है कि श्रद्धेय बड़े लोग जैसा आचरण करते हैं जनता भी वैसे ही आचरणवाली हो जाती है । तभी रामराज्य की जनता भी उदार, परोपकारी विप्रचरणरत थी । राम के समान ही सब एकनारीव्रत थे । नारियाँ भी मन, वचन और कर्म से पतिहितैषिणी थीं— “सब उदार सब पर उपकारी । विप्रचरन सेवक नर नारी ॥ एकनारिव्रत रत सब झारी । ते मन वच क्रम पतिहितकारी ॥” ( रा० मा० ७।२१।४ ) सत्ययुग में राज्य, राजा एवं विधान के बिना ही धर्म के प्रभाव से प्रजा के लोग परस्पर एक दूसरे का रक्षण करते थे । सब एक दूसरे के रक्षक, पोषक एवं हितचिन्तक होते थे । कोई किसी का शोषक तथा भक्षक था ही नहीं, किन्तु रामराज्य में विधान, न्यायालय और कार्यपालिकाएं थीं, परन्तु कोई अपराधी, अपराध तथा कोई समस्या नहीं थी, क्योंकि सब उदार तथा सब परोपकारी थे, अतः विधानकृत बाध्यता का प्रश्न ही नहीं था । वाल्मीकिरामायण के अनुसार श्रीराम का मन्त्रिमण्डल था । जिसमें विनयशील, सलज्ज, कार्यकुशल, जितेन्द्रिय, शस्त्र- शास्त्रकुशल, सुदृढ़, पराक्रमी, यशस्वी तथा सावधान एवं राजाज्ञानुसार कार्य करनेवाले तेजस्वी, क्षमावान्, कीर्त्तिमान्, स्मितपूर्वाभिभाषी धृष्ट, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल तथा सुमन्त्र ये आठ मन्त्री थे । वसिष्ठ, वामदेव, सुयज्ञ, जाबालि, कश्यप, गौतम, मार्कण्डेय तथा कात्यायन इन आठ महर्षियों का परामर्श सर्वोपरि होता था । राम के मन्त्री काम, क्रोध तथा स्वार्थवृत्ति और मिथ्यावादी नहीं थे । स्वराष्ट्र तथा परराष्ट्र के अतीत के ज्ञाता, वर्त्त- मान के अनुभविता तथा अनागत के अनुमाता थे । स्वराष्ट्र एवं परराष्ट्र का इतिवृत्त जानने से अतीत का ज्ञान होता है । वृत्तपत्रों एवं गुप्तचरों द्वारा स्वराष्ट्र और परराष्ट्र की वर्तमान स्थिति ज्ञात होती है । अतीत तथा वर्तमान के अनुसार ही भविष्य का अनुमान लगाया जा सकता है । आत्मदोष जानने एवं प्रजा के गुप्त भावों को जानने में भी गुप्तचरों का उपयोग होता है । राम की ओर से ऐसे गुप्तचर क्रियाशील रहते थे । राम के मन्त्री पूर्ण परीक्षित थे । वे अन्याय- शील अपने पुत्रों को भी दण्डित करने में हिचकते नहीं थे तथा निरपराध शत्रु को भी दण्डित नहीं करते थे । वे उत्साह- वान्, शूर, राजनीतिज्ञ, सत्पुरुषों के रक्षक, न्यायोचित ढंग से राजकोशपूरक तथा यथोचित दण्ड के विधानज्ञ थे । ८६
६८२ रामायणमीमांसा विंश सन्धि, विग्रह के अवसर में दूरदर्शी, मन्त्रसंवरण में समर्थ, सूक्ष्मबुद्धिसम्पन्न, नीतिशास्त्र के विशेषज्ञ तथा प्रियवादी थे— "मन्त्रसंवरणे शक्ताः शक्ताः सूक्ष्मासु बुद्धिषु । नीतिशास्त्रविशेषज्ञाः सततं प्रियवादिनः ॥" (वा० रा० १।७।१९) हे राघव, नीतिशास्त्रों में मन्त्रणा को ही राजाओं के विजय का मूल माना गया है । शुक्र तथा कौटिल्य ने भी मन्त्रियों की आवश्यकता पर बल दिया है । दे० शुक्रनीति (२।८१) तथा कौटिल्य अर्थशास्त्र (१।३) । कुशलप्रश्न के ब्याज से भरत को उपदेश करते हुए राम ने कहा था— "मन्त्रो विजयमूलं हि राज्ञां भवति राघव ।" (वा० रा० २।१००।१६) हे राघव, तुम किसी गूढ़ विषय पर अकेले ही तो विचार नहीं करते अथवा बहुत लोगों के साथ बैठकर तो गुप्त मन्त्रणा नहीं करते, तुम्हारी निश्चित मन्त्रणा फूटकर शत्रुओं तक तो नहीं फैल जाती एवं तुम्हारे सब कार्य पूरे होने के समीप पहुँचने के पहले तो लोग नहीं जान जाते ? (वा० रा० २।१००।१३-२०) । वहीं कहा गया है कि एक भी मन्त्री शूर, चतुर, नीतिज्ञ हो तो वह राजा या राजकुमार को महती श्री प्राप्त करा सकता है— "एकोऽप्यमात्यो मेधावी शूरो दक्षो विचक्षणः । राजानं राजपुत्रं वा प्रापयेन्महतीं श्रियम् ॥" (वा० रा० २।१००।२४) सहस्र एवं दश हजार मूर्खो की भी सहायता संकटकाल में अकिञ्चित्कर होती है । मीठी बात करनेवाले पुरुष सुलभ होते हैं पर अप्रिय पथ्य के वक्ता दुर्लभ होते हैं ( वा० रा० ६।१६।२१) । नन्दिनी धेनु चराने के प्रसङ्ग से दिलीप के वन में पहुँचते ही बिना वर्षा के ही दावाग्नि प्रशान्त हो गयी, जङ्गल में फलों, फूलों की भरमार हो गयी एवं प्रबल सत्त्व दुर्बलों को बाधित करना भूल गये । राम के सागर पार कर कटक में आने से— "सब तरु फलेउ रामु हित लागी । ऋतु अनरितुहिं कालगति त्यागी ॥" (रा० मा० ६।४।३) "शशाम वृष्ट्यापि बिना दवाग्निरासीद्विशेषा फलपुष्पवृद्धिः । ऊनं सत्त्वेष्वधिको बबाधे तस्मिन् वनं गोप्तरि गाहमाने ॥" (रघुवं० २।१४) इसलिए रामराज्य में दण्ड यतियों के ही हाथ में दिखता था । भेद गतिभेद, ताल, मूर्च्छना आदि के रूप में नर्तक-नृत्य-समाज में ही परिलक्षित होता था । मन के विजय में ही विजय शब्द सुनायी पड़ता था— "दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज । जीतहु मनहिं सुनिअ अस रामचंद्र के राज ॥" (रा० मा० ७।२२) रामराज्य में अभीष्ट वस्तु का अभाव नहीं था । काननों में फलों-फूलों की भरमार थी । मनुष्यों की कौन कहे चूहा-बिल्ली, बाघ-बकरी, हाथी-सिंह साथ-साथ क्रीडा करते थे । वृक्ष और लताएं इच्छानुसार मधु प्रदान करती थीं । गायें इच्छानुसार दूध देती थीं । चन्द्रमा अपनी अमृत रश्मि से मही को आप्यायित करते थे । सूर्य आवश्यकता के अनुसार ही ताप पहुँचाते थे । बादल मनचाही वर्षा देते थे— "फूलहिं फलहिं सदा तरु कानन । रहहिं एक सँग गज पंचानन ॥ लता विटप माँगे मधु चवहीं । मन भावतो धेनु पय स्रवहीं ॥" (रा० मा० ७।२२।१,३) "विधु महि पूर मयूखन्हि, रवि तप जेतनहिं काज । माँगे बारिद देहिं जल, रामचंद्र के राज।" (रा० मा० ७।२३)
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६८३ केवल बाह्य भौतिक शासनों एवं व्यवस्थाओं से ही संसार की सभी समस्याओं का समाधान नहीं होता है। बाह्य शासन के बल पर बाघ-बकरे एक घाट पानी नहीं पी सकते और न ही उतनेमात्र से प्राकृतिक स्वभाव में परिवर्तन ही होता है। राजा राम के पहुँचने पर गुह ने राम का पूर्ण स्वागत किया और कहा मेरा सारा राज्य आपका है। हम सभी आपकी आज्ञाओं का अनुवर्तन करेंगे। आप स्वामी की तरह शासन करें। ये भक्ष्य, भोज्य, पेय, लेह्य, शयन एवं घोड़ों की पूर्ण खाद्यसामग्री भी उपस्थित हैं— “स्वागतं ते महाभाग तवेयमखिला मही। वयं प्रेष्या भवान् स्वामी साधु राज्यं प्रशाधि नः ॥ भक्ष्यं भोज्यं च पेयं च लेह्यं चैतदुपस्थितम् । शयनानि च मुख्यानि वाजिनां खादनं च ते ॥ (वा० रा० २।५०।३९) आधुनिक दृष्टि से मित्र का ही क्यों शत्रु का भी भोजन, पान आदि ग्रहण न करना असभ्यता समझी जाती है। पर परिस्थिति के अनुसार यद्यपि राम ने निषादराज का भोजन, पान आदि कुछ भी ग्रहण नहीं किया, फिर भी अपने व्यवहार एवं स्नेह से उन्हें निहाल कर दिया। राम ने कहा आप मेरे पास पैदल ही चले आये, हम आपके परमोत्कृष्ट प्रेम से अत्यन्त प्रसन्न एवं अचित हो गये हैं। राम अपनी सुन्दर दोनों भुजाओं के पाश में गुह को निपीडित करते हुए बोले—हम कितने भाग्यशाली हैं जो स्वस्थ एवं प्रसन्न बान्धवों से युक्त आप जैसे मित्र का दर्शन कर रहे हैं। आपके मित्रों, वनों तथा राष्ट्र में कुशल तो है? आप जो कुछ भी भेंट लाये हैं वह सब मुझे स्वीकार हैं। आप स्वयं समझ लें कि मैंने तपस्वी वनचारी का व्रत धारण कर रखा है। मैं वल्कलवसन, कुश एवं अजिन धारण, कन्दमूल-फलाशन करता हूँ। अतः अन्य सब वस्तुएँ प्रत्यावर्तित कर दें। केवल घोड़ों के लिए चारा दाना ही मुझे अपेक्षित है। ये मेरे पिता के अत्यन्त प्रिय हैं, अतः इनको खिलाने पिलाने से ही मेरा पूर्ण सत्कार हो जावेगा— “गुहमेवं ब्रुवाणं तु राघवः प्रत्युवाच ह। अर्चिताश्चैव हृष्टाश्च भवता सर्वदा वयम् ॥ पद्भ्यामभिगमाच्चैव स्नेहसंदर्शनेन च। भुजाभ्यां साधुवृत्ताभ्यां पीडयन् वाक्यमब्रवीत् ॥ दिष्ट्या त्वां गुह पश्यामि ह्यरोगं सह बान्धवैः । अपि ते कुशलं राष्ट्रे मित्रेषु च वनेषु च ॥ यत् त्विदं भवता किञ्चित् प्रीत्या समुपकल्पितम् । सर्वं तदनुजानामि नहि वर्ते प्रतिग्रहे ॥ कुशचीराजिनधरं फलमूलाशनं च माम् । विद्धि प्रणिहितं धर्मे तापसं वनगोचरम् ॥ अश्वानां खादनेनाहमर्थी नान्येन केनचित् । एतावतात्र भवता भविष्यामि सुपूजितः ॥ एते हि दयिता राज्ञः पितुर्दशरथस्य मे। एतैः सुविहितैरश्वैर्भविष्याम्यहमर्चितः ॥ (वा० रा० २।५०।४०-४७) शुक और सारण रावण के मन्त्रिमण्डल के प्रभावशाली सदस्य थे। वे राम की सैन्यशक्ति की टोह लेने के लिए आये थे। दोनों गुप्त वेष में थे, पर पकड़ लिये गये। आधुनिक दृष्टि से उनका वध ही उचित था। जब वे राम के सामने लाये गये, राम ने उनसे कहा—यदि आपने हमारी सैन्य-शक्ति का पता पा लिया और सुसमाहित हम
६८४ रामायणमीमांसा विंश लोगों को भी देख लिया और अपने राजा का कार्य कर लिया है तो आप स्वेच्छा से जा सकते हैं । यदि कुछ देखना बाकी बचा है तो फिर से देख लो । विभीषण पूर्णरूप से सब कुछ तुम्हें पुनः दिखा देंगे— “यदि दृष्टं बलं सर्वं वयं वा सुसमाहिताः । यथोक्तं वा कृतं कार्यं छन्दतः प्रतिगम्यताम् ॥ अथ किञ्चिददृष्टं वा भूयस्तद् द्रष्टुमर्हथः । विभीषणो वा कार्त्स्न्येन पुनः संदर्शयिष्यति ।।” (वा० रा० ६।२५।१८,१९) राम रावण से अपनी पतिव्रता पत्नी के उद्धार के लिए एवं क्षात्र तेज की रक्षा के लिए लड़े और सानुबन्ध रावण का वध किया, परन्तु उसके हितैषी ही रहे । “अरिहुँ क अनभल कीन्ह न रामा ।” ( रा० मा० २।१८१।१ ) विजय के बाद उसकी प्रशंसा करते हुए राम ने कहा था—ये प्रचण्ड पराक्रमी थे । निश्चेष्ट होकर नहीं मरे । इनका महोत्साह अत्यन्त उन्नत था । ये निर्भीक होकर रणाङ्गण में जूझे हैं । इस प्रकार क्षात्र धर्म में व्यवस्थित होकर जो युद्ध में मरते हैं, युद्धभूमि में अपनी विजय के लिए आकांक्षा करते हुए मारे जाते हैं वे शोचनीय नहीं होते । युद्ध में सदैव किसी की विजय नहीं होती । युद्ध में वीर या तो दूसरों से मारा जाता है या दूसरों को मारता है । यह पूर्वजों से निर्दिष्ट क्षत्रियसम्मत गति है कि क्षत्रिय युद्ध में निहत होकर शोचनीय नहीं होता है— “नायं विनष्टो निश्चेष्टः समरे चण्डविक्रमः । अत्युन्नतसमुत्साहः पतितोऽयमशङ्कितः ॥ नैवं विनष्टाः शोच्यन्ते क्षत्रधर्मव्यवस्थिताः । वृद्धिमाशंसमाना ये निपतन्ति रणाजिरे ॥ नैकान्तविजयो युद्धे भूतपूर्वः कदाचन । परैर्वा हन्यते वीरः परान् वा हन्ति संयुगे ॥ इयं हि पूर्वैः संदिष्टा गतिः क्षत्रियसम्मता । क्षत्रियो निहतः संख्ये न शोच्य इति निश्चयः ॥” (वा०रा०६।१११।१४-१८) शिष्टों में सार्वभौम प्रसिद्धि है कि राम के समान बर्ताव करना चाहिये रावण जैसा नहीं। भावी राजाओं से भी राम ने धर्मसेतु की रक्षा का अनुरोध किया था— “भूयो भूयो भाविनो भूमिपाला नत्वा नत्वा याचते रामचन्द्रः । सामान्योऽयं धर्मसेतुर्नराणां काले काले पालनीयो भवद्भिः ॥” ( स्कन्द० ब्राह्मख० धर्मारण्य ३४।४ ) “आन्वीक्षिक्यात्मविद्या स्यादीक्षणात् सुखदुःखयोः । ईक्षमाणस्तया तत्त्वं हर्षशोकौ व्युदस्यति ॥” ( काम० नीति० २।३१ ) “प्रसन्नतां या न गताऽभिषेकतस्तथा न मम्लौ वनवासदुःखतः । मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य सदास्तु सा मञ्जुलमङ्गलप्रदा ॥” न वनं गन्तुकामस्य त्यजतश्च वसुन्धराम् । सर्वलोकातिगस्येव लक्ष्यते चित्तविक्रिया ॥ ( वा० रा० २।१९।३३ ) “आपद्यभग्नधैर्यंत्वं सम्पद्यनभिमानिता । यदुत्साहस्य चात्यागः तद्धि सत्पुरुषव्रतम् ॥”
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६८५ “देखन कहँ प्रभु करुनाकांदा । प्रकट भये बहु जलचर वृंदा ॥” ( रा० मा० ६।३।२ ) “यह सुधि कोल किरातन पाई । हरषे जनु नव निधि घर आई ॥” ( रा० मा० २।१३३।१ ) “देखि दखिन दिशि हय हिहिनाहीं । जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं ॥” (रा० मा० २।१४०।४) “नहिं तृन चरहिं न पियहिं जल मोचहिं लोचनबारि । ब्याकुल भये निहारि सब रघुबर बाजि निहारि ॥” ( रा० मा० २।२४। ) “काम कोटि छबि श्याम शरीरा । नील कंज वारिद गंभीरा ॥” ( रा० मा० १।१९८।१ ) “सोभा कोटि मनोज लजावन ।” ( रा० मा० १।३२६ ) “धरमधुरीन भानुकुलभानू ।” ( रा० मा० २।२५२।१ ) “बेद पुरान बसिष्ठ बखानहिं । सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं ॥” ( रा० मा० ७।२५।१ ) “जौ अनीति कछु भाषौं भाई । तो मोहि बरजहु भय बिसराई ॥ नहि अनीति नहि कछु प्रभुताई । सुनहु करहु जो तुम्हहि सुहाई ॥” (रा० मा० ७।४२।३,२) प्राण तृणाग्रलग्न जलबिन्दु के समान हैं । धर्म ही सब का सुहृत् है, अतः उसका विरोध नहीं करना चाहिये— “वाताभ्रविभ्रममिदं वसुधाधिपत्यं प्राणास्तृणाग्रजलबिन्दुसमा नराणाम् । आपातमात्रमधुरा विषयोपभोगा धर्मः परं सुहृदहो न विरोधनीयः ॥” “मातरं रक्ष कैकेयीं मा रोषं कुरु तां प्रति । मया च सीतया चैव शपतोऽसि रघुनन्दन ॥” ( वा०रा० २।११२।२७ ) “व्यसनेषु मनुष्याणां भृशं भवति दुःखितः । उत्सवेषु च सर्वेषु पितेव परिरक्षति ॥” ( वा० रा० २।२।४०,४१ ) “इदं राज्यं च सकलं जीवितं च हृदि स्थितम् । सर्वमेतद् द्विजार्थं मे सत्यमेतद् ब्रवीमि वः ॥” ( वा० रा० ७।६०।१९ ) “साक्षाद् रामाद् विनिर्वृत्तो धर्मश्चापि श्रिया सह ।” (वा० रा० २।२।२९ ) “सत्यं दानं तपस्त्यागो मित्रता शौचमार्जवम् । विद्या च गुरुशुश्रूषा ध्रुवाण्येतानि राघवे ॥” ( वा० रा० २।१८।३० ) “न तं पश्याम्यहं लोके परोक्षमपि यो नरः। स्वमित्रोऽपि निरस्तोऽपि योऽस्य दोषमुदाहरेत् ॥” ( वा० रा० २।२।१५ ) “रक्षिता स्वस्य धर्मस्य स्वजनस्य च रक्षिता ॥” ( मू० रा० १।१।१४) भारतीय परम्परा के अनुसार राजा या राजनीतिज्ञ को दण्डनीति से पहले आन्वीक्षिकी से ब्रह्मविद्या प्राप्त करनी चाहिये, जिसके प्रभाव से सुख और दुःख का तत्त्व जानकर शोक तथा मोह का अपाकरण किया जा सकता है । अपने अचिन्त्य तथा अनन्त ब्रह्मानन्दसुधासिन्धु में तृप्त रहने के कारण ही राम के राज्याभिषेक से मुखाम्बुज पर कोई प्रसन्नता नहीं हुई और वनवास-दुःख से कोई विक्रिया नहीं आयी । वसुधाधिपत्य त्यागकर वन जाते समय लोकातीत जैसी निर्विकारिता राम में परिलक्षित होती थी । आपत्ति में धैर्य-भङ्ग न हो यही तो महासत्त्व का लक्षण है । सदा प्रसन्न राम को निहारने के लिए समुद्र के जलचरवृन्द भी प्रकट होकर विभोर हो जाते हैं। वन के कोल-किरात नव निधि समझ कर राम में अनुरक्त होते हैं । राम के वियोग में रथ के घोड़े व्याकुल होकर तृण और जल लेने से विरक्त हो जाते हैं । वे छविधाम श्रीराम मर्यादा-पालनार्थ स्वयं वेद, पुराण आदि सुनते हैं
और प्रजाको धर्माचरण का नम्र मधुर उपदेश देते हैं। भरत को अपनी और श्रीसीताजी की शपथ देकर कैकेयी के प्रति सौमनस्य ही बर्तने का अनुरोध करते हैं। जनदुःख में दुःखी तथा उत्सव में पिता के समान परितुष्ट होकर सबके साथ तादात्म्य का अनुभव करते हैं। श्रीरामजी का अपना राज्य तथा सम्पूर्ण जीवित ही द्विजार्थ अर्पित है। इतना ही क्यों, सम्पूर्ण श्री वैभव के साथ साक्षात् धर्म ही श्रीरामजी से सुसम्पन्न होकर प्रकट हुआ है। सत्य, दान, तप, त्याग, मित्रता, शुचिता, विद्या, गुरु-शुश्रूषा आदि धर्म श्रीरामजी में ध्रुव रूप से सुस्थिर हैं। गुरुजन कहते हैं हम संसार में ऐसे किसी राम के सुनिरस्त अपमानित घोर शत्रु को भी नहीं देखते हैं जो परोक्ष में भी राम का दोष या द्रोह बतलाता हो। इतना ही नहीं, राम अमित्रों की भी दृष्टि एवं मन का हरण करते हैं— “अप्यमित्राणां दृष्टिश्रुतिमनोहरः ।” (म० भा० रामोपाख्यान ) सर्वलोकप्रिय राम श्रीरामजी धर्म तथा स्वजन के रक्षिता, सर्वलोकप्रिय, द्रष्टा, स्मर्त्ता, सभी लोगों के हितकारक, सहज असाधारण क्षात्रस्वभाव से अदीनात्मा, अतिदुःख, व्यसनादि परम्परा में भी अक्षुब्धस्वभाव एवं विचक्षण हैं। जैसे नदियां सदैव समुद्र की ओर जाती हैं वैसे ही राम सदैव सत्पुरुषों द्वारा सेवित होते हैं। वे आर्य, सर्वप्रियदर्शन, सर्वगुणोपेत, कौशल्यानन्दवर्धन हैं— “सर्वलोकप्रियः साधुरदीनात्मा विचक्षणः । सर्वदाभिगतः सद्भिः समुद्र इव सिन्धुभिः ॥ आर्यः सर्वसमश्चैव सदैव प्रियदर्शनः । स च सर्वगुणोपेतः कौशल्यानन्दवर्धनः ॥” (वा० रा० १।१।१५-१७ ) राम गंभीरता में समुद्र जैसे, धैर्य में हिमवान् जैसे, वीर्य (पराक्रम) में विष्णु जैसे तथा चन्द्रमा के समान प्रियदर्शन हैं। क्रोध में कालाग्नि के तुल्य, क्षमा में पृथिवी के तुल्य, त्याग में कुबेर के तुल्य एवं सत्य में धर्म के तुल्य हैं। वनगमन तथा अखण्ड भूमण्डल के राज्य का त्याग करने में सर्वलोकातीत जीवन्मुक्त जैसे उनके चित्त में कोई विक्रिया परिलक्षित नहीं होती— “न चास्य महतीं लक्ष्मीं राज्यनाशोऽपकर्षति । लोककान्तस्य कान्तत्वाच्छीतरश्मेरिव क्षयः ॥ न वनं गन्तुकामस्य त्यजतश्च वसुन्धराम् । सर्वलोकातिगस्येव लक्ष्यते चित्तविक्रिया ॥” (वा० रा० २।१९।३२, ३३ ) राम के समुचित रूपसंनिवेश, लक्ष्मी (शोभा), सौकुमार्य, सुवेषता आदि गुणों को विस्मित होकर वनवासी देखने लगे— “रूपसंहननं लक्ष्मीं सौकुमार्यं सुवेषताम् । ददृशुर्विस्मिताकारा रामस्य वनवासिनः ॥” ( वा० रा० ३।१।१३ ) रामचरितमानस के अनुसार राम की देह चिदानन्दमय है— “चिदानन्दमय देह तुम्हारी ।” ( रा० मा० ३।१।१३ ) तुलसीदास ने बड़ी बुद्धिमानी से राम की शोभा का वर्णन किया है। देवताओं का सौन्दर्य तो प्रसिद्ध है। फिर ब्रह्मा, विष्णु और शिव के सौन्दर्य का तो कहना ही क्या है ? पर सखियां कहती हैं—विष्णु में चार भुजा और