भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 747

माता-पिता की आज्ञा के पालन के प्रसङ्ग में श्रीराम ने अखण्ड भूमण्डल के राज्य को तृणवत् त्यागकर सहर्ष वनवास स्वीकार किया । बड़े आदरणीय कुलपूज्य महर्षि जाबालि से भी जब राम को लौटाने की दृष्टि से ही उनके द्वारा कही गयी वेदशास्त्रविरुद्ध माता-पिता के श्राद्ध, तर्पण, यज्ञ, होम तथा परलोक के अपलाप से युक्त नास्तिकता की बातें सुनीं तो राम क्षुब्ध हो उठे और उनके कथन का युक्तियुक्त खण्डन करके यहाँ तक कह दिया कि इस प्रकार की बुद्धि से व्यवहार करनेवाले तथा धर्म-मार्ग से हटे हुए आप जैसे नास्तिक को मेरे पिता ने याजक बनाया था मैं उनके उस कार्य की निन्दा करता हूँ— “निन्दाम्यहं कर्म कृतं पितुस्तद् यस्त्वामगृह्णाद्विषमस्थबुद्धिम् । बुद्ध्यानयैवंविधया चरन्तं सुनास्तिकं धर्मपथादपेतम् ॥” (वा० रा० २।१०९।३३ ) अपने प्रिय लक्ष्मण ने भी जब कैकेयी की उचित निन्दा की तो राम ने स्पष्ट कह दिया—तात, मेरी मध्यमा अम्बा कैकेयी की निन्दा मत करो, भरत की ही चर्चा करो— “न तेऽम्बा मध्यमा तात गर्हितव्या कदाचन ।” ( वा० रा ३।१६।३९ ) यद्यपि वाली ने राम का कोई अपराध नहीं किया था तो भी सुग्रीव का अपराध करने से ही राम ने उसे अपना ही अपराधी माना और उसके वध की प्रतिज्ञा कर ली । वाली के वध के अनेक हेतुओं में राम ने उसका भी उल्लेख किया है— “प्रतिज्ञा च मया दत्ता तदा वानरसन्निधौ । प्रतिज्ञा च कथं शक्या मद्विधेनानवेक्षितुम् ॥” ( वा० रा० ४।१८।२६ ) “धनुर्वेदविदां श्रेष्ठो लोकेऽतिरथसम्मतः । अभियाता प्रहर्ता च सेनानयविशारदः ॥ अप्रधृष्यश्च संग्रामे क्रुद्धैरपि सुरासुरैः । अनसूयो जितक्रोधो न दृप्तो न च मत्सरी ॥” (वा० रा० २।१।२९,३०) राम धनुर्वेदविदों में सर्वश्रेष्ठ थे एवं अतिरथियों में भी उनकी धाक थी । वे शत्रु-सेना पर आक्रमण और प्रहार करने में दक्ष और सैन्यसंचालन में विशेष निपुण थे । संग्राम में क्रुद्ध देवता एवं दानव भी उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकते थे । इतने पर भी वे दूसरों की असूया नहीं करते थे और न ही क्रुद्ध होते थे । घमण्ड एवं परोत्कर्ष की असहिष्णुता उनमें नहीं थी । फिर भी उनकी युद्धकुशलता और दृढ़ प्रहार शत्रुओं पर अपना इतना गहरा प्रभाव डालते थे कि वे सदा आतंकित रहते थे । तभी तो मारीच राम से इतना प्रभावित था कि वह रत्न, रथ आदि शब्दों के रकार को सुनकर राम समझकर भयभीत हो जाता था— “रकारादीनि नामानि रामत्रस्तस्य रावण । रत्नानि च रथांश्चैव वित्रासं जनयन्ति मे ॥” (वा० रा० ३।३९।१८) रावण के गुप्तचर भी यह अनुभव करते हैं कि राम के कुपित होने पर उन्हें कोई वश में नहीं कर सकता । वे सम्पूर्ण लोकों का संहार करके नये सिरे से प्रजासृष्टि करने में समर्थ हैं । सब देवगण एवं असुर मिलकर भी उनका वध नहीं कर सकते । राम के अनुसार शत्रु भी यदि शरण में आये एवं हाथ जोड़ कर दया की याचना करे तो आनृ- शंस्य की दृष्टि से कभी भी उसपर प्रहार नहीं करना चाहिये । आर्त्त हो या दृप्त हो यदि वह शत्रु के शरण आया हो तो शत्रु को अपने प्राणों का त्याग कर भी उसकी रक्षा ही करनी चाहिये—