भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 748, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 748

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६७१ "बद्धाञ्जलिपुटं दीनं याचन्तं शरणागतम् । न हन्यादानृशंस्यार्थमपि शत्रुं परन्तप ॥ आर्त्तो वा यदि वा दृप्तो परेषां शरणं गतः । अरिः प्राणान् परित्यज्य रक्षितव्यः कृतात्मना ।।" (वा० रा० ६।१८।२७, २८) महर्षि वसिष्ठ, विश्वामित्र तथा अगस्त्य से राम को उत्तमोत्तम शस्त्रास्त्र प्राप्त थे। वे चाहते तो उन्हें उपयोग में लाकर अनायास ही सबका संहार कर सकते थे, किन्तु राम ने कभी भी उन शस्त्रास्त्रों का प्रयोग नहीं किया। मेघनाद छलपूर्वक ऐसे दिव्यास्त्रों का प्रयोग कर वानरों, मनुष्यों तथा राम और लक्ष्मण दोनों को परेशान करता था। एक बार लक्ष्मण ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करने की आज्ञा चाही, पर राम ने कहा एक के लिए पृथ्वी भर के अयुद्धमान, प्रच्छन्न, प्राञ्जलि, शरणागत, पलायमान, मत्त सब राक्षसों को मारना उचित नहीं है। इन्द्रजित् के मारने के लिए मैं प्रयत्न करता हूँ— "नैकस्य हेतो रक्षांसि पृथिव्यां हन्तुमर्हसि । अयुध्यमानं प्रच्छन्नं प्राञ्जलिं शरणागतम् ॥ पलायमानं मत्तं वा न हन्तुं त्वमिहार्हसि । तस्यैव तु वधे यत्नं करिष्यामि महाभुज ।।" (वा० रा० ६।८०।३८-४०) उसी आदर्श के अनुसार ब्रह्मास्त्र तथा पाशुपतास्त्र रहने पर भी अर्जुन ने भारत-युद्ध में उसका प्रयोग नहीं किया था। इसी तरह यदि आज भी परमाणु बम तथा हाइड्रोजन बम बनाया जाय तो भी कोई आपत्ति नहीं। आवश्यकता है उसके प्रयोग पर नियन्त्रण की। शक्ति का दुरुपयोग निन्य होने पर भी सदुपयोग प्रशंसनीय ही है। इतना ही क्यों राम ने तो श्रान्त, विरथ तथा निःशस्त्र रावण को भी अवसर दिया कि वह स्वस्थ, रथी और धन्वी होकर आये, तब उससे युद्ध किया जाये। तभी मारीच जैसे राक्षस ने भी राम को निर्दोष विग्रहवान् धर्म ही बतलाया था। "रामो विग्रहवान् धर्मः साधुः सत्यपराक्रमः । (वा० रा० ३।३७।१३) राम धर्म के मूर्त्तिमान् रूप हैं। साधु एवं सत्यपराक्रमी हैं। रावण-वध के बाद विभीषण ने पहले शोक व्यक्त करते हुए रावण के गुणों का वर्णन किया, परन्तु अन्त में जब उसकी अन्त्येष्टि का प्रसङ्ग आया तब उसके सीता- हरण आदि दुष्कृत्यों का स्मरण कर के अन्त्येष्टि करना उन्होंने अस्वीकार कर दिया। तब राम ने कहा— "मरणान्तानि वैराणि निवॄत्तं नः प्रयोजनम् । क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव ।।" (वा० रा० ६।११९।१००, १०१) मरने तक ही वैर रहता है। हमारा प्रयोजन सिद्ध हो चुका है। अब यह जैसा तुम्हारा भाई है वैसा ही मेरा भी है। तुम इसका दाह्ादि संस्कार करो। राम ने उसकी प्रशंसा भी की। रावण अधर्मी, असत्यवादी होने पर भी संग्राम में तेजस्वी, बलवान् तथा शूरवीर रहा है। इन्द्रादि देवता भी इसे परास्त नहीं कर सके थे। इसने अनेकों दान, यज्ञ एवं श्रेष्ठ कर्म भी किये हैं। विराध के इच्छानुसार राम ने विराध का अवटनिक्षेप ( फारसी में दफन ) कर तथा कबन्ध के इच्छानुसार उसका दाह कर उन्हें कृतार्थ किया। लङ्का जैसे वैभवशाली राष्ट्र को जीतकर भी राम ने उसके वैभव पर दृष्टि नहीं डाली। रावण के भाई विभीषण को ही लङ्का सौंप दी।