रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६७२ रामायणमीमांसा विंश "द्विः शरं नाभिसन्धत्ते", "रामो द्विर्नाभिभाषते ।" (वा० रा० २।१८।३०) राम दो बार बाण नहीं चलाते और दो बार नहीं बोलते अर्थात् एक ही बाण से सब अभीष्टों की सिद्धि हो जाती थी। श्रीभागवत ने भी कृष्ण के सुदर्शन चक्र को राम के शर से उपमित किया है। ब्राह्मण-बालकों को लाने के लिए कृष्ण का सुदर्शन चक्र गहन अन्धकार को विदीर्ण करता ऐसे वेग से बढ़ रहा था जैसे राम के धनुष की प्रत्यञ्चा से छूटा हुआ बाण शत्रु-सेना में प्रविष्ट होता है— "तमः सुघोरं गहनं कृतं महद् विदारयद् भूरितरेण रोचिषा । मनोजवं निर्विविशे सुदर्शनं गुणच्युतो रामशरो तथा चमूः ॥" ( १०।८९।५१ ) श्रीभागवत के अनुसार एक ही बाण से राम ने रावण का वध किया था— "एवं क्षिपन् धनुषि सन्धितमुत्ससर्ज बाणं स वज्रमिव तद्धृदयं बिभेद । सोऽसृग्वमन् दशमुखैर्न्यपतद्विमानाद्धा हेति जल्पति जने सुकृतोव रिक्तः ।।" (भाग० १०।८९।५१) अर्थात् इस तरह धनुष पर सन्धान किये हुए बाण का प्रक्षेप करते हुए राम ने उस बाण से वज्रतुल्य रावण के हृदय को छिन्न-भिन्न कर डाला। वह दसों मुखों से रुधिर वमन करता हुआ वैसे ही विमान से गिर पड़ा जैसे सुकृतक्षय होने पर लोगों के हाहाकार के बीच सुकृती विमान में गिर पड़ता है । पाश्चात्यों की धारणा पाश्चात्य विद्वानों विशेषतः यहूदी, ईसाई तथा इस्लाम मतानुयायियों के लिए अवतारवाद कठिन पड़ता है, क्योंकि उनके मतानुसार पुरुष मनुष्य को छोड़कर स्त्री आदि किसी प्राणी में आत्मा नहीं होती । उनके अनुसार वृक्ष, लता आदि भी आत्मविहीन हैं । मनुष्य-जन्म केवल एक ही बार होता है। इस जीवन के कर्मों के फलस्वरूप या तो अक्षय स्वर्ग या अनन्त नरक मिलता है। सुदूर भविष्य में कभी जिब्रायल देवदूत तुरही बजायेंगे तब जितने मनुष्य हैं सबके सब कब्र से पूर्ववत् रूप धारणकर ईश्वर के सिंहासन के सामने विचारार्थ उपस्थित होंगे। पुण्यवान् ईसाई, मुसलमान आदि दायीं ओर तद्भिन्न हिन्दू आदि बायीं ओर खड़े होंगे । पुण्यवान् स्वर्ग जायेंगे। पापियों को दोजख की आग में झुलसना पड़ेगा। इसी दृष्टि से देह को कफन में लपेट कर कब्र में गाड़ने की प्रथा है। अभी स्वर्ग और दोजख दोनों के द्वार बन्द हैं या दोनों खाली पड़े हैं। इनके अनुसार स्वर्ग में देवी नहीं है। जुहोवा, गॉड या अल्लाह अकेले ही एकेश्वर हैं । रोमन कैथोलिक यद्यपि यीशु की कुमारी माता मेरी की उपासना करते हैं, परन्तु वह महामाया या मूल प्रकृति नहीं है । निर्गुण ब्रह्म या मोक्ष भी उन मतों में नहीं है ! साधारण जीव शिव तो है ही नहीं । उसका आत्मा नहीं है। जुहोवा, गॉड या अल्लाह देवदूतों की सहायता से पृथ्वी पर शासन चलाते हैं। ईसाइयों के अनुसार यीशु या ख्रीष्ट ईश्वर का पुत्र है। ईश्वर, पुत्र तथा पवित्र आत्मा ये तीनों दैवी शक्तियां हैं, जिनके ही जीव का उस मत में पुर्वजन्म नहीं होता तब फिर ईश्वर का अवतार कैसा ? ईसाइयों के अनुसार ईश्वरपुत्ररूप यीशु मानवजाति के पाप ग्रहण करने के लिए अवतीर्ण हुए हैं। मुसलमानों के अनुसार हजरत मुहम्मद एकमात्र पैगम्बर हैं। ईसाई-मत के अनुसार ई० पू० ४००४ अर्थात् आज से केवल ६ हजार वर्ष पूर्व ही जगत् की सृष्टि हुई थी। परन्तु आधुनिक वैज्ञानिकों के अनुसार कोटि-कोटि वर्षों के प्राचीन प्रस्तर उपलब्ध होते हैं। समुद्र की क्षारता के आधार पर पृथ्वी अरबों वर्ष पुरानी सिद्ध होती है। एक जन्म के कर्मों के फलस्वरूप अनन्त स्वर्ग या नरक की प्राप्ति