भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 750

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६७३ तथा मिश्रित पाप-पुण्यवालों की अनिश्चित गति आदि के कारण बुद्धिवादियों के मन में उक्त बातें बैठती नहीं। इसी कारण हिन्दुओं के असंख्य देवी-देवता एवं अवतारवाद उनकी समझ में नहीं आते । विकासवादियों की सहायता से पाश्चात्य विद्वान् वेद, रामायण, महाभारत, पुराण आदि तथा ईश्वरावतार आदि का छद्मपूर्वक खण्डन करते हैं। इनके अनुसार अमीबा हाइड्रा से प्राणियों की उत्पत्ति होती है। उसी से मत्स्य, सरीसृप, बहुपद, चतुष्पद, द्विपद, स्तन्यपायी जीवों का विकास होता है । इनकी दृष्टि में मनुष्य बन्दर नहीं तो बन्दर का चचेरा भाई अवश्य है । मनुष्य पहले असभ्य जङ्गली था । अब क्रमशः सभ्य हो रहा है। हिन्दुओं के पूर्व पुरुष आर्य जाति से निकले । ग्रीक, रोमन, स्लाव, नर्दिक, पारसीक सब एक जाति, एक भाषा और एक धर्म के थे । यह कल्पना एक शताब्दी के भीतर की ही है, परन्तु अब यह कल्पना विश्व के इतिहास को आधारशिला हो गयी है। आर्य, द्रविड़, ब्राह्मण, शूद्र आदि कल्पना भी इन्हीं लोगों के मस्तक का फितूर है। इनके अनुसार वेद अनादि न होकर ई० पूर्व तीन चार हजार वर्ष के आर्य कवियों के काव्यमात्र हैं । ऋग्वेद प्राचीन तथा यजुर्वेद और सामवेद अर्वाचीन हैं। अथर्ववेद और भी निम्न श्रेणी का वेद है। ब्राह्मण ग्रन्थ वेद नहीं हैं । उपनिषद् क्षत्रियों द्वारा प्रणीत ग्रन्थ हैं । ब्राह्मण यज्ञसम्बन्धी कर्मकाण्ड के आडम्बर में व्यस्त रहते थे। वे बहुदेवपूजक होने से एकेश्वरवाद की कल्पना नहीं कर सके । निर्गुण निराकार ब्रह्मवाद की कल्पना पहले नहीं थी। कई लोगों के अनुसार तो भीरु, जंगली मनुष्यों की भूत-प्रेत की कल्पना ही सभ्यता के साबुन से धुल-धुलकर देवकल्पना और वही वैज्ञानिक चमत्कृति से चमत्कृत होकर निर्विकार ब्रह्मकल्पना बन गयी । इन मतों का विस्तृत खण्डन मार्क्सवाद और रामराज्य के विकास प्रकरण में तथा वेदस्वरूप एवं उसका प्रामाण्य में किया गया है । इनके अनुसार रामायण तथा महाभारत महर्षि वाल्मीकि एवं कृष्णद्वैपायन व्यास की कृति नहीं हैं, अपितु चारण, भाट तथा काव्योपजीवी कुशीलवों द्वारा रचित गाथाएँ हैं, जो एक दूसरे के मुख से सुनकर कण्ठस्थ कर ली जाती थीं। उनका संकलन ही ये दोनों ग्रन्थ हैं । १८ पुराण गुप्त-युग के बाद के हैं। जो व्यास के नाम से लिखे गये हैं। सोलहवीं शती तक इनका विकास और परिवर्तन हुआ है। हिन्दुओं ने बौद्धों से संन्यास, मूर्तिपूजा, कथा आदि सीखी थी । जन्म द्वारा जातियां पहले नहीं थीं। क्रमशः श्रमविभाग के आधार पर जातिभेद की सृष्टि हुई है। ब्राह्मणों और क्षत्रियों का बराबर संघर्ष चलता रहता था । इस देश में प्राचीन आदिवासियों को ही दस्यु एवं क्रमेण दास संज्ञा दी गयी थी । 'चातुर्वर्ण्यसंस्कृति-मीमांसा' में इन सब बातों का खण्डन किया गया है। इन लोगों के अनुसार अवतारवाद मिथ्या है। अवतारवाद क्रमविकास का प्रतीक है। मत्स्य, कूर्म, जलचर; कूर्म, वराह जलचर और स्थलचर; नृसिंह अर्द्धनर पशु, वामन असभ्य ह्रस्वकाय जाति, परशुराम निष्ठुर, दुर्दान्त, वन्य लोग, राम कृषि का विस्तार करनेवाले, बलराम हलधर कृषिविशेषज्ञ, शिव, दुर्गा आदि असभ्य जातियों से वैदिक धर्म में लिये गये हैं। राम और कृष्ण पहले विभिन्न जातियों के नेता थे। पश्चात् क्रमशः जातीय नायक हुए, अन्त में देव मान लिये गये । इन अंशों का भी विस्तृत खण्डन उसी ग्रन्थ में देखिये । संक्षेप से यहाँ भी जगह जगह पर है ही । बेवर के अनुसार रामायण दाक्षिणात्य एवं सिंहलद्वीप स्थित आर्यसभ्यता के विकास की कहानी है । लासेन के अनुसार आर्यों की दक्षिणविजय की प्रथम चेष्टा का रूपक इसमें वर्णित है । मैकडानल एवं याकोबी रामायण को प्राचीन भारतीय उपाख्यानों पर प्रतिष्ठित मानते हैं । उनके अनुसार सीता ऋग्वेद के खेत की हल-सम्बन्धी रेखा थी । राम इन्द्र या पर्जन्य देवता थे । राम और रावण का युद्ध इन्द्र तथा वृत्र के संग्राम की कहानी है । इन्द्रजित् या इन्द्रशत्रु ऋग्वेद में वृत्र का नाम है । इन्द्र की शुनी सरमा रामायण की सीता को सान्त्वना देनेवाली सरमा राक्षसी है । वायुपुत्र हनुमान् मरुद्गण सहित इन्द्र के वैभव का स्मरण दिलाते हैं ।