रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमैकडानल के अनुसार याकोबी की यह कल्पना ठीक मालूम पड़ती है कि हनुमान् के साथ कृषि-कार्य का कुछ सम्पर्क था और वे वर्षा के एक उपदेवता थे । इन पाश्चात्यों के अनुसार रामायणग्रन्थ अयोध्याकाण्ड से लेकर युद्ध काण्ड तक ही था। मागध और वन्दियों ने पीछे से बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड उसमें जोड़ दिये हैं। उनके अनुसार मूल काव्यखण्ड के जातीय नायक आगे जोड़े गये अंशों से जातीय नायक के रूप में परिवर्तित हो गये । वह समस्त जन-समाज के लिए नैतिक आदर्श के प्रतीक बन गये । कुछ प्रक्षिप्त अंशों को छोड़कर मूल पाँच काण्डों में मनुष्यनायक बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड में देवता के रूप में परिणतः होकर भगवान् विष्णु के साथ एकाकार हो गये । प्रो० विंटरनित्स के अनुसार असल रामायण में राम की भगवत्ता या विष्णु का अवतार होने का कोई उल्लेख नहीं था । कीथ के अनुसार रामायण दो उपाख्यानों का तालमेल है । उनमें से दूसरा है सीताहरण के कारण राम और रावण का युद्ध । यह मूलतः एर्क प्राकृतिक आख्यान है। इनमें अनेक काल्पनिक घटनाओं का समावेश है। इन्हीं आधारों पर कामिल बुल्के ने भी अनेक दुष्कल्पनाएँ की हैं । समाधान वस्तुतः वेद अनादि अपौरुषेय नित्य ग्रन्थ हैं । मन्त्र, ब्राह्मण और उपनिषद् उन्हीं के भेद हैं । रामायण, महाभारत, पुराण और आगम सब उन्हीं वेदों की व्याख्या एवं उपबृंहणमात्र हैं। पाश्चात्यों की कल्पनाएँ निर्मूल एवं दुरभिसन्धिपूर्ण हैं । वेदों और उपनिषदों में राम की कथा है । वाल्मीकिरामायण में उसी का विस्तृत विवेचन है । वाल्मीकि राम के समसामयिक त्रिकालदर्शी महर्षि थे । कृष्णद्वैपायन कृष्ण के समय विद्यमान थे। फिर भी इन महर्षियों ने समाधिजा ऋतम्भरा प्रज्ञा से सीता, राम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, हनुमान् आदि के सभी स्थूल तथा सूक्ष्म चरित्रों का साक्षात्कार कर रामायणकाव्य या आर्ष इतिहास लिखा है । रामायण के अनुसार ही बालकाण्ड से लेकर युद्धकाण्ड तक ६ काण्ड और उत्तरकाण्ड वाल्मीकिकृत रामायण है । यह महर्षियों का उद्घोष परम्पराप्राप्त, महाभारतादि ग्रन्थों से समर्थित एवं महान् भाष्य-टीकाकारों से आदृत है । उसके विरुद्ध पाश्चात्य-कल्पना निःसार हैं । अयोध्या से युद्धकाण्ड तक ५ काण्डों में भी राम की भगवत्ता का वर्णन करनेवाले सहस्रों श्लोक हैं । सबको प्रक्षिप्त कह देना हठवादिता के सिवा और कुछ नहीं है । इस तरह बाइबिल आदि ग्रन्थों की भी प्रक्षिप्तता सिद्ध होगी । “ममापि सफलं चक्षुः स्मारितश्चास्मि राघवम् । रामाभिधानं विष्णुं हि जगद्धृदयनन्दनम् ॥ सीतावक्त्रारविन्दाकं दशास्यध्वान्तभास्करम् । मानुषं गात्रसंस्पर्शं गत्वा भीम त्वया सह ॥” (म० भा० ३।१५१।६–८) हनुमान्जी भीमसेन से कहते हैं राम के दर्शन से मेरे चक्षु सफल हैं। आज पुनः मनुष्यगात्र के संस्पर्श से जगत् के हृदय को आनन्दित करनेवाले, सीतामुखपङ्कज को प्रफुल्लित करनेवाले सूर्य एवं रावणरूपी अन्धकार को मिटानेवाले भास्कर राम का स्मरण हो रहा है । ब्रह्मा ने कहा है, मेरी प्रार्थना से चतुर्भुज विष्णु अवतीर्ण हुए हैं । वे रावण-वधादि कार्य करेंगे— “तदर्थमवतीर्णोऽसौ मन्नियोगाच्चतुर्भुजः । विष्णुः प्रहरतां श्रेष्ठः स तत्कर्म करिष्यति ॥” ( म० भा० ३।२७६।५ ) धौम्य ने कहा है, भीमकर्मा विष्णु ने दशरथ के गृह में अवतीर्ण होकर मनुष्यरूप से संग्राम में रावण को मारा था—