रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 752, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६७५
“विष्णुना वसता चापि गृहे दशरथस्य च। दशग्रीवो हतश्छन्नं संयुगे भीमकर्मणा ।” ( म० भा० ३।३१५।२ ) कि बहुना महाभारत में अनेक स्थलों पर राम का चरित्र एवं राम का परब्रह्म विष्णु होना वर्णित है । हरिवंश महाभारत का ही खिल है। उसमें भी रामायण महाकाव्य की चर्चा है। “रामायणमहाकाव्यमुद्दिश्य नाटकं कृतम् । जन्म विष्णोरमेयस्य राक्षसेन्द्रवधेप्सया ॥” ( हरिवं० ९३।६ ) कालिदास ( ई० पू० १ म० श० ) ने रघुवंश में राम को विष्णु का अवतार कहा है । कौटिल्य चाणक्य ने ( ई० सन् ५४ में ) रावण-वध का उल्लेख किया है— “मानाद्रावणः परदारानप्रयच्छन् ।” ( १।६।९ ) भास ( ई० पू० ५ श० ) ये मौर्ययुग के हैं। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में उनके प्रतिज्ञायौगन्धरायण नाटक से 'नवं शरावं' श्लोक उद्धृत है । उनके यज्ञफलनाटक, प्रतिमानाटक तथा अभिषेकनाटक इन नाटकों की विषयवस्तु रामायण की है। अभिषेकनाटक ( ४।१४ ) तथा अभिषेकनाटक ( ६।२८ ) में सीता के साथ राम के मायामानुषवेष में अवतार का उल्लेख है । एतावता ई० पू० १ श० राम को विष्णु माना जाने लगा था, बुल्के आदि की ये कल्पनाएँ सर्वथा मिथ्या हैं । चरक में विष्णुसहस्रनाम का पाठ विहित है। 'विष्णुसहस्रनाम' में “रामो विरामो विरतः” आदि में राम का नाम आया है। चरक वैशम्पायन के समसामयिक हैं। आद्यशङ्कराचार्य स्वा० दयानन्द के अनुसार ई० पू० ३ शती के हैं । आधुनिक दृष्टिकोण से भी ई० ७वीं शती के हैं। किन्तु यह मत मिथ्या है। उन्होंने विष्णुसहस्रनाम- भाष्य में रामः ३९४, क्षमा ४४२, सुमुखः ४५६, कपीन्द्रः ५०१, जितामित्रः ५२४, भूषयः ६२८, शूरसेनः ७०४; धनुर्धरः ८५८ तथा क्षमिणांवरः ९१९ विष्णुनामों की रामवाचक व्याख्या की है। रामभुजङ्गप्रयात आदि अनेक स्तोत्रों में उन्होंने सीताराम की विष्णुरूप में चर्चा की है । “राम दक्षिण भारत में आर्यसभ्यता फैलाते हैं, राम-रावणयुद्ध इन्द्र-वृत्रयुद्ध का प्रतीक है, इन्द्रजित्, इन्द्र- शत्रु और वृत्र एक ही व्यक्ति के नाम हैं, देवशुनी सरमा और विभीषणपत्नी सरमा अभिन्न थीं एवं हनुमान् वर्षा के उपदेवता थे ।” ये सब बातें पाश्चात्यों की निराधार अटकलमात्र हैं । विश्व की सृष्टि भारत से ही हुई हैं । “मनुष्य इधर-उधर फैले, भारतीय हिन्दू कहीं बाहर से आये” यह कल्पना वेदादि शास्त्रों और इतिहासों से विरुद्ध है । सीता का आविर्भाव हलाग्र से होने के कारण उनका नाम सीता पड़ा, परन्तु राम का खेती से किसी विशेष सम्बन्ध की कल्पना निराधार है । बलराम का हल से सम्बन्ध है, राम का नहीं । वे दोनों एक नहीं हैं । बलराम हलधर थे, पर हल और मुसल उनके आयुध थे । वे हलधर किसान नहीं थे । राम तो धनुर्धर थे, फिर उनका कृषि से सम्बन्ध कैसा ? वे तो १४ वर्ष वनवास में रहे । कृषि करना तो दूर रहा, वे कृषि का अन्न भी ग्रहण नहीं करते थे । पाश्चात्य लोग रामायण के वानर, भालू एवं राक्षसों को असभ्य जाति के मनुष्य ही मानते हैं । रामायण से विदित होता है कि रावण को वरदान मिला था कि मनुष्य, वानर तथा भालुओं के सिवा तुम देवता, दानव, राक्षस आदि से अवध्य होगे । इसी लिए उसके नाशार्थ विष्णु मायामानुष राम के रूप में प्रकट हुए थे । देवता भी ब्रह्मा के आदेश से वानर और भालू रूप में अवतीर्ण हुए थे । वे कामरूपी, कामचारी, प्रचण्ड पराक्रमी तथा दीर्घायु थे । पवनसुत हनुमान् समुद्र लांघने में समर्थ हुए । द्वापर में गन्धमादन पर्वत पर उनका रूप देखकर भीम भी मोहग्रस्त हो गये । वे अर्जुन की ध्वजा पर बैठकर पाण्डवों की सहायता करते थे ।