भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 753

६७६ रामायणमीमांसा विंश ब्रह्मा ऋक्षपति, इन्द्र वाली तथा सूर्य सुग्रीव के रूप में अवतीर्ण थे । ऋक्षपति की कन्या जाम्बवती कृष्ण की एक पट्टमहिषी थी । यद्यपि यह सब अलौकिक, अविश्वसनीय प्रतीत होगा, परन्तु शङ्कराचार्य के “तस्मात् समूल- मितिहासपुराणम्” ( ब्र० सू० १।३।३३ ) के भाष्य-वचन के अनुसार इतिहास-पुराण में विश्वास करना ही चाहिये ( देखिये देवताधिकरण ) । माता-पिता के गुण सन्तान में आते ही हैं । किसी में माता के और किसी में पिता के अधिकांश गुण आते हैं । अतः हनुमान् आदि में मातृपक्ष से वानरी आकृति और वानरी भाषा आदि गुण प्राप्त हुए तथा पितृपक्ष से देवताओं के जैसे अद्भुत तेज, पराक्रम तथा देवताओं की संस्कृत भाषा भी प्राप्त हुई । इसी प्रकार वाली आदि में देवताओं के समान ही वेदादि शास्त्रों का प्रतिभान भी हुआ । हनुमान् ने विशिष्ट ज्ञानार्थ सूर्य से अध्ययन भी किया । आज वैज्ञानिक प्राणियों एवं पौधों के जोड़-मेल से विलक्षण प्राणियों तथा पौधों की सृष्टि करते ही हैं । राक्षस असुरों में ही योनिविशेष हैं। वे उग्र, कामरूपी और कामचारी थे । शूर्पणखा तथा हिडिम्बा ने सुन्दर मानवीरूप धारण किया था । विभीषण एवं उसके मन्त्री मनुष्यवेष में ही युद्ध करते थे । राक्षस भी दीर्घायु थे । तभी रावण ने मान्धाता एवं अनरण्य के साथ युद्ध किया था । राम की ऐतिहासिकता हिन्दू जाति के धार्मिक सांस्कृतिक एवं पारिवारिक जीवन पर मर्यादापुरुषोत्तम राम का अमिट प्रभाव है । हिन्दू-परिवार में जन्म एवं विवाह के अवसरों पर रामजन्म एवं राम-विवाह सम्बन्धी गीत गाये जाते हैं । शरीर की अन्तिम यात्रा 'रामनाम सत्य है' की ध्वनि के साथ होती है । भारत के कोने-कोने में राम और उनके भक्त हनुमान् के मन्दिर हैं । लाखों व्यक्ति प्रतिदिन रामायण का पाठ करते हैं तथा अयोध्या, रामेश्वर, पञ्चवटी, चित्रकूट, आदि तीर्थों की यात्रा करते हैं । करोड़ों हिन्दुओं के ही नहीं श्याम, थाइलैण्ड आदि देशों के निवासियों के नाम भी रामायण से सम्बन्धित होते हैं । राम प्रत्येक हिन्दू के जीवन में रम रहे हैं। ईश्वर के नामों में सर्वप्रसिद्ध नाम राम ही है । भारत के बच्चे-बच्चे की जबान पर राम-नाम रहता है । काशी में जीवों को मुक्ति के लिए शिवजी राम-नाम का उपदेश करते हैं। फिर भी राम की ऐतिहासिकता पर शङ्का करना केवल मतिविभ्रम ही है। वह आधुनिक पाश्चात्य कूटनीतिज्ञों के दुष्प्रचार का परिणाम है । आधुनिक वैज्ञानिक आविष्कारों के चमत्कारों से तथा वेदादि शास्त्रों, दर्शनों एवं तर्कशास्त्रों के अनभ्यासों से भारतीय प्रभावित से हो गये हैं। आत्मज्ञानशून्य देश परकीय चाक- चिक्यों से प्रभावित होते ही हैं । वस्तुतः परम्पराप्राप्त इतिहास तथा जीवनवृत्तसम्बन्धी प्रामाणिक पुस्तकें तथा तत्कालीन या कालान्तरवर्ती पुस्तकों में तत्सम्बन्धी चर्चाएँ, उसके द्वारा लिखित पुस्तकें या तन्निर्मित मन्दिर, सेतु तथा तत्सम्बन्धी शिलालेख, ताम्रलेख या मुद्राएँ किसी के ऐतिहासिक होने में प्रमाण कही जाती हैं। इस दृष्टि से देखने पर राम की भी ऐतिहासिकता सिद्ध है। राम के जीवन की प्रमुख घटनाएँ लोकपरम्परा में अत्यन्त प्रसिद्ध हैं । भारत में उनका नाम प्रत्येक जिह्वा पर है। संसार के इतिहास में ऐसी प्रसिद्धि किसी की भी नहीं है । भारत में ही नहीं सुदूरदेशों में भी राम के चरित्रों के आधार पर अनेक लीलाएँ तथा नाटक होते हैं। चौबीस हजार श्लोकों की वाल्मीकिरामायण में उनके जीवनवृत्त का ही वर्णन है । वाल्मीकि के समान ही व्यास भी सर्वज्ञ थे। उनके महाभारत तथा पुराणों में राम व रामायण की भरपूर चर्चा है । महाभारत के अनुसार भीम जैसे महावीर हनुमान् की पूँछ नहीं उठा सके । अन्त में भीम के प्रश्न पर हनुमान् ने अपने परिचय में राम की कथा की चर्चा की ( म० भा० ३।१४७ ) । महर्षि मार्कण्डेय ने वनवास के समय युधिष्ठिर से कहा था, आपकी यह विपत्ति देखकर मुझे रामचन्द्र का स्मरण हो आया । पिता की आज्ञा से