रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६७७ धनुष हाथ में लेकर घूमते हुए उन्हें ऋष्यमूक पर्वत पर मैंने देखा था। उन्होंने यह नहीं कहा कि मैंने केवल सुना है ( म० भा० ३।२५।६-९ ) । गीता के कृष्ण कहते हैं कि शस्त्रधारियों में मैं राम हूँ । शङ्कराचार्य की रामपद की व्याख्या में दाशरथि राम कहा गया है। लगभग सभी पुराणों तथा काव्यों में श्रीमद्भागवत भागवतों का परमा- दरणीय ग्रन्थ है। प्रतिवर्ष जिसके हजारों सप्ताह होते हैं, उसमें भी रामायण एवं राम की चर्चा है । श्रीराम की नीति “न रामसदृशो राजा पृथिव्यां नीतिमानभूत् । सुभृत्यता तु यन्नीत्या वानरैरपि स्वीकृता ।।” ( शु० नी० ४।६।१०।७८ ) शुक्रनीति के अनुसार राम सदृश कोई भी नीतिमान् नहीं हुआ । उनकी नीतिमत्ता से ही वानरों तथा भालुओं ने भी उनकी सुभृत्यता स्वीकार की थी । “यान्ति न्यायप्रवृत्तस्य तिर्यञ्चोऽपि सहायताम् । अपन्थानं तु गच्छन्तं सोदरोऽपि विमुञ्चति ॥” श्रीराम जैसे न्यायनिष्ठ के प्रभाव से वानर और भालु भी राम के साथी हो गये और दुर्मार्गनिष्ठता के कारण ही रावण का भाई भी साथ छोड़कर उससे पृथक् हो गया । “ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं विरक्षति ॥” ( अथ० सं० ११।५।१७ ) ब्रह्मचर्य एवं तपस्या से राजा राष्ट्र की रक्षा करता है। इसके उदाहरण श्रीराम हैं। “न हि तद्भविता राष्ट्रं यत्र रामो न भूपतिः । तद् वनं भविता राष्ट्रं यत्र रामा निवत्स्यति ॥ ( वा० रा० २।३७।२९ ) जहाँ राम राजा नहीं वह देश राष्ट्र नहीं है, जहाँ राम निवास करेंगे वह वन भी राष्ट्र होगा । भगवान् के भक्त उनका मङ्गलाशासन करते हैं— “मङ्गलं कोसलेन्द्राय महनीयगुणात्मने । चक्रवर्तितनूजाय सार्वभौमाय मङ्गलम् ॥” भगवान् मङ्गलों के भी मङ्गल हैं। ब्राह्मण, गौ, अग्नि, हिरण्य, सर्पि, जल तथा राजा गरुड़पुराण ( ३०५।७४, ७५ ) के अनुसार मङ्गल हैं तथा सिंह, साँड, हाथी, कलश, व्यजन, वैजयन्ती, भेरी एवं दीप भी मङ्गल हैं। दधि, दूर्वा आदि मङ्गलों के भी मङ्गल, देवताओं के दैवत, जो परन्तप एवं परमतेज हैं उन महनीय- गुणागार चक्रवत्तित्सुत सार्वभौम कोसलेन्द्र के लिए मङ्गलाशासन करना महत्त्वपूर्ण है। राम से बढ़कर सन्मार्गस्थित संसार में कोई है ही नहीं— “नहि रामात् परो लोके विद्यते सत्पथे स्थितः ।” ( वा० रा० २।४४।२६ ) श्रीराम धर्मज्ञ, सत्यसन्ध, प्रजाहितनिरत, यशस्वी, ज्ञानसम्पन्न, सर्वपोषक, रिपुसूदन, सर्वजीवलोक के रक्षक, तत्तद्वर्णाश्रममर्यादाओं का पालन करके धर्मका पालन करनेवाले, अपने यज्ञ, अध्ययन, दान आदि एवं युद्धादि रूप धर्म का सादर अनुष्ठान करनेवाले तथा स्वभक्त जनों के अवश्यम्भावी अनिष्टों को भी मिटाकर मोक्ष प्रदान कर रक्षण करनेवाले हैं । रघुवंश, भट्टिकाव्य आदि सैकड़ों काव्यों तथा नाटकों में राम की चर्चा है । अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण, अगस्त्यसंहिता आदि संहिताओं में राम की चर्चा है ही । ऐसे बहुचर्चित राम को अनैतिहासिक कहना अनभिज्ञता का ही परिचय देना है। भागवत आदि पुराणों के अनुसार रामसेतु एवं रामेश्वर की स्थापना