रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभी राम के ऐतिहासिक होने में ज्वलन्त प्रमाण हैं। रामसेतु के खण्डों पर ही रामेश्वर पहुँचने का रेलवे मार्ग स्थित है। राम की जन्मकुण्डली यद्यपि पुराणों के अनुसार राम का जन्म २८ वें मन्वन्तर के २४ वें त्रेता में हुआ है फिर भी पाश्चात्यों ने अपनी अटकल से उनका जन्म ईसा पूर्व कुछ शतियों या सहस्राब्दियों में ही माना है। जोन्स नामक अंग्रेज इतिहासज्ञ राम का जन्म-काल ई० पूर्व २०२९ वर्ष मानता है। टॉड ने ई० पूर्व ११०० वर्ष राम का जन्म-समय माना है। वैन्थली ने ई० पूर्व ९५० वर्ष ही स्वीकार किया है। विल्फर्ड नामक इतिहासज्ञ ने ई० पूर्व १३६० वर्ष राम का जन्म-काल माना है। महर्षि वाल्मीकि के अनुसार दशरथ के पुत्रेष्टियज्ञ की समाप्ति के १२ मास बीतने पर चैत्र शु० ९मी पुनर्वसु नक्षत्र कर्क लग्न में तथा जब पांच ग्रह अपनी उच्च राशि में स्थित थे एवं गुरु चन्द्र के साथ थे उस समय राम का अवतार हुआ— “ततो यज्ञे समाप्ते तु ऋतूनां षट् समत्ययुः । ततश्च द्वादशे मासे चैत्रे नावमिके तिथौ ॥ नक्षत्रेऽदितिदैवत्ये स्वोच्चसंस्थेषु पञ्चसु । ग्रहेषु कर्कटे लग्ने वाक्पताविन्दुना सह ॥” (वा० रा० १।१८।८, ९ ) ज्योतिषियों के अनुसार रवि, भौम, गुरु, शुक्र और शनि ये पाँच ग्रह उच्च के थे। अर्थात् रवि मेष के, मङ्गल मकर के, गुरु कर्क के, शुक्र मीन के एवं शनि तुला के थे। स्थूल रीति से सप्तर्षिगण लगभग सहस्र वर्ष, वरुण ८४ वर्ष एवं शनि लगभग २॥ वर्ष एक राशि में रहते हैं। सूर्य एक राशि पर एक मास और गुरु एक राशि पर एक वर्ष रहते हैं। सूर्य, गुरु और शनि के विचारसे पाँचों उच्चस्थ ग्रहों की गणना करने से रामचन्द्र का जन्म- काल १,८५,०७१ वर्ष पूर्व हुआ था। इन्हीं ग्रहों के अनुसार रामराज्य की महनीयता तथा राम के लोकोत्तर बल, वैभव, प्रताप आदि अतुलनीय थे। मङ्गल उच्च गृहस्थ होने पर शुभप्रद नहीं होता, इसी लिए स्त्रीकष्ट आदि की प्राप्ति हुई। यह भी एक मत ही है। परन्तु पुराण प्रमाण के अनुसार जब चौबीसवीं त्रेता राम का काल है तब तो उसी के आधार पर विचार करना उचित है। वाल्मीकिरामायण में वर्णित ग्रहस्थिति उस समय भी रही होगी। राम की नीतिमत्ता वाल्मीकिरामायण के अनुसार राजतन्त्र होते हुए भी भारत में लोकतन्त्र था। इसी लिए महाराज दशरथ को राम को यौवराज्य देने के लिए जनस्वीकृति अपेक्षित हुई थी। इंग्लैण्ड तथा जापान में आज भी राजतन्त्र होते हुए भी जनतन्त्र हैं ही। शासन में भ्रष्टाचार तथा भाई-भतीजावाद या कुनवापरस्ती न पनपने देने के लिए राजा और प्रजा दोनों पर ही धर्म का नियन्त्रण होता था। मन्त्रों, ब्राह्मणों तथा मन्वादिधर्मशास्त्रों, शुक्र, बृहस्पति आदिनिर्मित नीतिशास्त्रों ने इसके लिए राजा को सदाचारी, जितेन्द्रिय, आन्तरिक षड्रिपूओं का विजेता तथा कामज, क्रोधज अष्टादश व्यसनों से रहित बनाने पर पूर्ण बल दिया है। श्रीदशरथ ने पृथिवी भर के समस्त प्रधान लोगों को बुलाया था— “समानािनाय मेदिन्यां प्रधानान् पृथिवीपतिः ।” ( वा० रा० २।१।४६ ) मन्त्री वही होते थे जो पौरों एवं जानपादों के विश्वासभाजन होते थे— “तस्मै मन्त्रः प्रयोक्तव्यो दण्डमाधित्सता सता । पोरजानपदा यस्मिन् विश्वासं धर्मतो गताः ॥” ( म० भा० १२।८३।४५, ४६ )