रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६७१ शुक्रनीति के अनुसार राजा क्रोध तथा लोभ से विवर्जित होकर धर्मशास्त्र के अनुसार न्यायाधीश, मन्त्री, एवं पुरोहित की सम्मति से शासन करता था । "धर्मशास्त्रानुसारेण क्रोधलोभविवर्जितः । सप्राड्विवाकः सामात्यः सब्राह्मणपुरोहितः ॥" ( शु० नी० ४।५।१२ ) राजा की सभा में सभी जाति के मुख्य लोग सभ्य होते थे— "सभ्याः सर्वासु जातिषु ।" ( शु० नी० ) "जातिजानपदान् धर्मान् श्रेणीधर्मांश्च धर्मवित् । समीक्ष्य कुलधर्मांश्च स्वधर्मं प्रतिपादयेत् ॥" ( मनु० ८।४१ ) के अनुसार राम जातिधर्म, देशधर्म, श्रेणीधर्म तथा कुलधर्मों को यथावत् जानते एवं उनका पालन करते थे । भारतीय नीति एवं राजधर्म में राजा का आचरण ही आदर्श राज्य का आधार होता है । राजा चाहे व्यक्ति हो चाहे दल, वह अपने व्यवहार से समाज का उन्नायक होता है । अतएव राम ने अपने आचरण द्वारा प्रजा तथा समाज को आदर्शरूप में ढाला था । यद्यपि वैयक्तिक आचरण का निजी जीवन से ही सम्बन्ध होता है, परन्तु वस्तुतः राम का वैयक्तिक जीवन भी समाज के लिए ही था । जैसी गर्भिणी स्त्री का निजी व्यवहार भी गर्भस्थ शिशु के हित की दृष्टि से होता है । तभी वे लोकाराधन के लिए वैयक्तिक स्नेह, दया, सौख्य तथा जानकी तक को त्यागने को तैयार थे । यज्ञ आदि के प्रसङ्ग से राम निरन्तर दान तथा त्याग में ही लगे रहे । जहाँ आज देने में संकोच है तो चारों तरफ से लेने का ही संघर्ष है । पर राम के समय राम के आदर्शानुसार सब में देने की ही होड़ थी । लेने का संघर्ष सर्वथा समाप्त था । संग्रह-वृत्ति में ही संघर्ष होता है । तुलसीदासजी के अनुसार प्रजा के सुभाग से ही भानु जैसा भूपति होता है । भानु धरती से कब कितना रस खींचता है यह किसी को नहीं मालूम पड़ता है, पर भानुजनित मेघ से रसमय जल बरसते देखकर सभी हर्षित होते हैं— "तुलसी प्रजासुभाग ते भूप भानु सो होय । बरसत हरषत लोग सब करखत लखै न कोय ॥" कालिदास के अनुसार 'सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रविः' हजारों गुना अधिक करके देने के लिए जैसे सूर्य पृथ्वी से अप्रत्यक्ष रसादान करता है वैसे ही राजा हजारों गुना अधिक देने के लिए प्रजा से सीमित अप्रत्यक्ष कर ग्रहण करता है । भारतीय नीति एवं रामराज्त में अलग से कोई विधान नहीं था । विधि या संविधान वेद ही हैं । आर्ष धर्मग्रन्थ एवं नीतिग्रन्थ उनकी व्याख्या थे । तुलसी के अनुसार—"श्रुतिपथ पालक धर्मधुरन्धर ।" ( रा० मा० ७।२३।१ ) राम ने अनादि श्रुतिसिद्ध धर्म के सर्वमान्य रूप को, उसका पालन करके, व्यवहार की वस्तु बनाया । तभी तो भरत कहते हैं— "चाहिय धर्मशील नरनाहू ।" ( रा० मा० २।१७७।१ ) जब शासक ही विधायक बन जाता है तब निरङ्कुशता ही फैलती है । आजकल भी कार्यपालिका और विधायिका एवं न्यायपालिका को पृथक्-पृथक् रखने का नाटक किया जाता है । राम ने विधान नहीं बनाया, किन्तु आदर्श आचरण उपस्थित किया । तुलसी के राम ने राजधर्म का सर्वस्व यही कहा था— "मुखिआ मुखु सो चाहिअइ खान पान कहूँ एक । पालइ पोसइ सकल अंग तुलसी सहित विवेक ॥" ( रा० मा० २।३१४ )