भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 757, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 757

६८० रामायणमीमांसा विंश प्रजा के विभिन्न वर्गों का उनकी स्थिति, क्षमता तथा संस्कार के अनुसार पालन-पोषण करना राजा का कर्तव्य है । परन्तु विवेक के साथ । मुख द्वारा भक्षित अन्न रसरूप से हस्त, पाद, नेत्र, श्रोत्र, हृदय, मन, बुद्धि आदि सबको प्रभावित करता है । परन्तु सबकी योग्यता एवं आवश्यकता एक नहीं है। सबको एक लाठी से हांकना विवेक नहीं है। हाथी को मनभर चींटी को कनभर की कहावत प्रसिद्ध ही है। धर्मनियन्त्रित विवेकी राजा ही विभिन्न परि- स्थितियों, व्यक्तियों एवं श्रेणियों के साथ यथोचित कुशलताके साथ व्यवहार कर सकता है। भारतीय राजा उतना शासक नहीं होता था, जितना प्रजा को हित का परामर्शदाता । शास्त्र की दृष्टि से राजा परमेश्वर का अंश होता है । छत्र, चँवर, सिंहासन आदि उसके विशिष्ट पद के अनुरूप आवश्यक हैं। फिर भी उनके अभिमान में अपने को प्रजा से अलग-बिलग समझ लेने में राजा प्रजा की पिता-पुत्र की सी आत्मीयता लुप्त हो जाती है। श्रीराम प्रजा को आत्मीयता दृष्टि से उपदेश करते हैं, राजा के रुआब में नहीं— “जो अनीति कछु भाषौं भाई । तौ मोहि बरजहु भय बिसराई ॥” ( रा० मा० ७।४२।३ ) यहाँ 'राजा करे सो न्याय' को कोई स्थान नहीं है। ऐसा राजा प्रजा के हृदयसिंहासन का अधीश्वर होता है। कहा जा सकता है कि ऐसा राजतन्त्र प्रजातन्त्र पर ही आदृत होता है। जनता को निर्भीकता के साथ राजा के व्यक्तिगत जीवन की भी समालोचना करने की स्वतन्त्रता होती थी। तभी राम ने सीतानिन्दक का भी कल्याण ही किया । किसी की जुबान पर ताला नहीं था। वह राजा दण्ड के बल पर किसी का मुंह बन्द नहीं करता था, किन्तु आचरण बदल कर ही प्रजा का अनुरागभाजन होता था । ऐसा विनयी, सच्छास्त्र तथा सत्पुरुष सेवी राजा का शास्त्रसम्मत सरल जीवन ही संसार का मार्गदर्शक होता है। तभी रामराज्य में सब सुखी थे। सभी शोकरहित थे— “हरषित भये गये सब सोका ।” ( रा० मा० ७।१९।४ ) सबका वैर-विग्रह मिट गया । विषमता मिट गयी । महारानी वैदेही के शरीर में केवल माङ्गल्यसूत्र ही भूषण रह गया । यज्ञ के प्रसङ्ग से राम ने सर्वस्व दान दे दिया । राजा के आचरण का प्रभाव जनता पर पड़ता ही है। संग्रह या विषमता ही द्वेष का कारण बनती है। विषमता मिटने पर वैरनिवृत्ति स्वाभाविक ही है। फिर भी अध्यात्मनिष्ठा तथा स्वधर्मानुष्ठान आवश्यक होता है। उसके बिना सहज सन्तोष नहीं होता है। इसी लिए रामराज्य में सब अपने वर्णाश्रम-धर्म के अनुसार वेदमार्ग पर ही चलते हुए शोक और मोह से रहित तथा सुखी थे। राम ने— "आब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामाराष्ट्रे राजन्यः शूर ईषव्योतिव्याधी महारथो जायतां दोग्ध्री धेनुर्वोढानड्वानाशुः सप्तिः पुरन्ध्रियोंषा जिष्णू रथेष्ठाः सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जयतां निकामे निकामे नः पर्जन्योभिवर्षतु फलवत्यो न ओधयः पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम् ।” ( शु० यजु० २२ ) के अनुसार अपने राष्ट्र को बनाया था, जिसमें वसिष्ठादि जैसे ब्रह्मवर्चसी ब्राह्मण थे । राम, लक्ष्मण, भरत जैसे शूरवीर राजन्य थे । उस राष्ट्र में पर्याप्त दूध देनेवाली गायें और महान् भार वहन करनेवाले बैल उत्पन्न होते थे । तीव्रगामी घोड़े एवं साध्वी-सती पुरन्ध्रियां होती थीं । राष्ट्र के रथी विजेता होते थे । राष्ट्र के यजमान सभा में बैठने योग्य सभ्य युवक उत्पन्न करनेवाले होते थे । राष्ट्र में समय-समय पर वृष्टि होती थी । औषधियाँ फलदायिनी परिपाक को प्राप्त होती थीं। राष्ट्र के योग एवं क्षेम ( अप्राप्त की प्राप्ति एवं प्राप्त की रक्षा ) की पूर्ण व्यवस्था थी । राम गौओं और ब्राह्मणों के रक्षणार्थ तथा देश के हितार्थ अप्रमेय गुरु के अनुसार सदा ही महत्कर्म की साधना में उद्यत रहे-- 'गोब्राह्मणहितार्थाय देशस्य च हिताय वै । तव चैवाप्रमेयस्य वचनं कर्तुमुद्यतः ॥” ( वा० रा० १।२६।५ )