रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६८१ भौतिक समानता में भी आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक तापों की निवृत्ति नहीं होती । त्रितापनिवृत्ति धर्म-ब्रह्मनिष्ठा से सम्भव है । कर्मनिष्ठा से ही ब्रह्मनिष्ठा होती है । उससे भौतिक प्रपञ्च ही बाधित हो जाता है । तभी रामराज्य में भौतिक आदि ताप किसी को नहीं व्यापते थे । “दैहिक दैविक भौतिक तापा । रामराज्य नहिं काहुहि व्यापा ॥” ( रा० मा० ७।२०।१ ) उच्च धर्म-ब्रह्मनिष्ठा का ही परिणाम था कि किसी की अपमृत्यु नहीं होती थी । किसी को कोई पीड़ा नहीं होती थी । सब सुन्दर एवं नीरोग होते थे । कोई दुखी, दरिद्र एवं दीन नहीं होता था । कोई मूर्ख एवं दुर्लक्षण- वाला नहीं होता था— “अलप मृत्यु नहिं कवनेउ पीरा । सब सुन्दर सब निरुजसरीरा ॥ नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना । नहिं कोउ अबुध न लच्छनहीना ॥” ( रा० मा० ७।२०।३ ) धार्मिक आध्यात्मिक अभ्युत्थान के बिना केवल भौतिक समानता एवं सौविध्य से यह सम्भव नहीं था । जहाँ राजा त्यागी, उदार तथा आदर्शचरित्रवाला होता है वहाँ प्रजा भी वैसी बन जाती है । यह स्वाभाविक बात है कि श्रद्धेय बड़े लोग जैसा आचरण करते हैं जनता भी वैसे ही आचरणवाली हो जाती है । तभी रामराज्य की जनता भी उदार, परोपकारी विप्रचरणरत थी । राम के समान ही सब एकनारीव्रत थे । नारियाँ भी मन, वचन और कर्म से पतिहितैषिणी थीं— “सब उदार सब पर उपकारी । विप्रचरन सेवक नर नारी ॥ एकनारिव्रत रत सब झारी । ते मन वच क्रम पतिहितकारी ॥” ( रा० मा० ७।२१।४ ) सत्ययुग में राज्य, राजा एवं विधान के बिना ही धर्म के प्रभाव से प्रजा के लोग परस्पर एक दूसरे का रक्षण करते थे । सब एक दूसरे के रक्षक, पोषक एवं हितचिन्तक होते थे । कोई किसी का शोषक तथा भक्षक था ही नहीं, किन्तु रामराज्य में विधान, न्यायालय और कार्यपालिकाएं थीं, परन्तु कोई अपराधी, अपराध तथा कोई समस्या नहीं थी, क्योंकि सब उदार तथा सब परोपकारी थे, अतः विधानकृत बाध्यता का प्रश्न ही नहीं था । वाल्मीकिरामायण के अनुसार श्रीराम का मन्त्रिमण्डल था । जिसमें विनयशील, सलज्ज, कार्यकुशल, जितेन्द्रिय, शस्त्र- शास्त्रकुशल, सुदृढ़, पराक्रमी, यशस्वी तथा सावधान एवं राजाज्ञानुसार कार्य करनेवाले तेजस्वी, क्षमावान्, कीर्त्तिमान्, स्मितपूर्वाभिभाषी धृष्ट, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल तथा सुमन्त्र ये आठ मन्त्री थे । वसिष्ठ, वामदेव, सुयज्ञ, जाबालि, कश्यप, गौतम, मार्कण्डेय तथा कात्यायन इन आठ महर्षियों का परामर्श सर्वोपरि होता था । राम के मन्त्री काम, क्रोध तथा स्वार्थवृत्ति और मिथ्यावादी नहीं थे । स्वराष्ट्र तथा परराष्ट्र के अतीत के ज्ञाता, वर्त्त- मान के अनुभविता तथा अनागत के अनुमाता थे । स्वराष्ट्र एवं परराष्ट्र का इतिवृत्त जानने से अतीत का ज्ञान होता है । वृत्तपत्रों एवं गुप्तचरों द्वारा स्वराष्ट्र और परराष्ट्र की वर्तमान स्थिति ज्ञात होती है । अतीत तथा वर्तमान के अनुसार ही भविष्य का अनुमान लगाया जा सकता है । आत्मदोष जानने एवं प्रजा के गुप्त भावों को जानने में भी गुप्तचरों का उपयोग होता है । राम की ओर से ऐसे गुप्तचर क्रियाशील रहते थे । राम के मन्त्री पूर्ण परीक्षित थे । वे अन्याय- शील अपने पुत्रों को भी दण्डित करने में हिचकते नहीं थे तथा निरपराध शत्रु को भी दण्डित नहीं करते थे । वे उत्साह- वान्, शूर, राजनीतिज्ञ, सत्पुरुषों के रक्षक, न्यायोचित ढंग से राजकोशपूरक तथा यथोचित दण्ड के विधानज्ञ थे । ८६