भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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६८२ रामायणमीमांसा विंश सन्धि, विग्रह के अवसर में दूरदर्शी, मन्त्रसंवरण में समर्थ, सूक्ष्मबुद्धिसम्पन्न, नीतिशास्त्र के विशेषज्ञ तथा प्रियवादी थे— "मन्त्रसंवरणे शक्ताः शक्ताः सूक्ष्मासु बुद्धिषु । नीतिशास्त्रविशेषज्ञाः सततं प्रियवादिनः ॥" (वा० रा० १।७।१९) हे राघव, नीतिशास्त्रों में मन्त्रणा को ही राजाओं के विजय का मूल माना गया है । शुक्र तथा कौटिल्य ने भी मन्त्रियों की आवश्यकता पर बल दिया है । दे० शुक्रनीति (२।८१) तथा कौटिल्य अर्थशास्त्र (१।३) । कुशलप्रश्न के ब्याज से भरत को उपदेश करते हुए राम ने कहा था— "मन्त्रो विजयमूलं हि राज्ञां भवति राघव ।" (वा० रा० २।१००।१६) हे राघव, तुम किसी गूढ़ विषय पर अकेले ही तो विचार नहीं करते अथवा बहुत लोगों के साथ बैठकर तो गुप्त मन्त्रणा नहीं करते, तुम्हारी निश्चित मन्त्रणा फूटकर शत्रुओं तक तो नहीं फैल जाती एवं तुम्हारे सब कार्य पूरे होने के समीप पहुँचने के पहले तो लोग नहीं जान जाते ? (वा० रा० २।१००।१३-२०) । वहीं कहा गया है कि एक भी मन्त्री शूर, चतुर, नीतिज्ञ हो तो वह राजा या राजकुमार को महती श्री प्राप्त करा सकता है— "एकोऽप्यमात्यो मेधावी शूरो दक्षो विचक्षणः । राजानं राजपुत्रं वा प्रापयेन्महतीं श्रियम् ॥" (वा० रा० २।१००।२४) सहस्र एवं दश हजार मूर्खो की भी सहायता संकटकाल में अकिञ्चित्कर होती है । मीठी बात करनेवाले पुरुष सुलभ होते हैं पर अप्रिय पथ्य के वक्ता दुर्लभ होते हैं ( वा० रा० ६।१६।२१) । नन्दिनी धेनु चराने के प्रसङ्ग से दिलीप के वन में पहुँचते ही बिना वर्षा के ही दावाग्नि प्रशान्त हो गयी, जङ्गल में फलों, फूलों की भरमार हो गयी एवं प्रबल सत्त्व दुर्बलों को बाधित करना भूल गये । राम के सागर पार कर कटक में आने से— "सब तरु फलेउ रामु हित लागी । ऋतु अनरितुहिं कालगति त्यागी ॥" (रा० मा० ६।४।३) "शशाम वृष्ट्यापि बिना दवाग्निरासीद्विशेषा फलपुष्पवृद्धिः । ऊनं सत्त्वेष्वधिको बबाधे तस्मिन् वनं गोप्तरि गाहमाने ॥" (रघुवं० २।१४) इसलिए रामराज्य में दण्ड यतियों के ही हाथ में दिखता था । भेद गतिभेद, ताल, मूर्च्छना आदि के रूप में नर्तक-नृत्य-समाज में ही परिलक्षित होता था । मन के विजय में ही विजय शब्द सुनायी पड़ता था— "दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज । जीतहु मनहिं सुनिअ अस रामचंद्र के राज ॥" (रा० मा० ७।२२) रामराज्य में अभीष्ट वस्तु का अभाव नहीं था । काननों में फलों-फूलों की भरमार थी । मनुष्यों की कौन कहे चूहा-बिल्ली, बाघ-बकरी, हाथी-सिंह साथ-साथ क्रीडा करते थे । वृक्ष और लताएं इच्छानुसार मधु प्रदान करती थीं । गायें इच्छानुसार दूध देती थीं । चन्द्रमा अपनी अमृत रश्मि से मही को आप्यायित करते थे । सूर्य आवश्यकता के अनुसार ही ताप पहुँचाते थे । बादल मनचाही वर्षा देते थे— "फूलहिं फलहिं सदा तरु कानन । रहहिं एक सँग गज पंचानन ॥ लता विटप माँगे मधु चवहीं । मन भावतो धेनु पय स्रवहीं ॥" (रा० मा० ७।२२।१,३) "विधु महि पूर मयूखन्हि, रवि तप जेतनहिं काज । माँगे बारिद देहिं जल, रामचंद्र के राज।" (रा० मा० ७।२३)