रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
६८२ रामायणमीमांसा विंश सन्धि, विग्रह के अवसर में दूरदर्शी, मन्त्रसंवरण में समर्थ, सूक्ष्मबुद्धिसम्पन्न, नीतिशास्त्र के विशेषज्ञ तथा प्रियवादी थे— "मन्त्रसंवरणे शक्ताः शक्ताः सूक्ष्मासु बुद्धिषु । नीतिशास्त्रविशेषज्ञाः सततं प्रियवादिनः ॥" (वा० रा० १।७।१९) हे राघव, नीतिशास्त्रों में मन्त्रणा को ही राजाओं के विजय का मूल माना गया है । शुक्र तथा कौटिल्य ने भी मन्त्रियों की आवश्यकता पर बल दिया है । दे० शुक्रनीति (२।८१) तथा कौटिल्य अर्थशास्त्र (१।३) । कुशलप्रश्न के ब्याज से भरत को उपदेश करते हुए राम ने कहा था— "मन्त्रो विजयमूलं हि राज्ञां भवति राघव ।" (वा० रा० २।१००।१६) हे राघव, तुम किसी गूढ़ विषय पर अकेले ही तो विचार नहीं करते अथवा बहुत लोगों के साथ बैठकर तो गुप्त मन्त्रणा नहीं करते, तुम्हारी निश्चित मन्त्रणा फूटकर शत्रुओं तक तो नहीं फैल जाती एवं तुम्हारे सब कार्य पूरे होने के समीप पहुँचने के पहले तो लोग नहीं जान जाते ? (वा० रा० २।१००।१३-२०) । वहीं कहा गया है कि एक भी मन्त्री शूर, चतुर, नीतिज्ञ हो तो वह राजा या राजकुमार को महती श्री प्राप्त करा सकता है— "एकोऽप्यमात्यो मेधावी शूरो दक्षो विचक्षणः । राजानं राजपुत्रं वा प्रापयेन्महतीं श्रियम् ॥" (वा० रा० २।१००।२४) सहस्र एवं दश हजार मूर्खो की भी सहायता संकटकाल में अकिञ्चित्कर होती है । मीठी बात करनेवाले पुरुष सुलभ होते हैं पर अप्रिय पथ्य के वक्ता दुर्लभ होते हैं ( वा० रा० ६।१६।२१) । नन्दिनी धेनु चराने के प्रसङ्ग से दिलीप के वन में पहुँचते ही बिना वर्षा के ही दावाग्नि प्रशान्त हो गयी, जङ्गल में फलों, फूलों की भरमार हो गयी एवं प्रबल सत्त्व दुर्बलों को बाधित करना भूल गये । राम के सागर पार कर कटक में आने से— "सब तरु फलेउ रामु हित लागी । ऋतु अनरितुहिं कालगति त्यागी ॥" (रा० मा० ६।४।३) "शशाम वृष्ट्यापि बिना दवाग्निरासीद्विशेषा फलपुष्पवृद्धिः । ऊनं सत्त्वेष्वधिको बबाधे तस्मिन् वनं गोप्तरि गाहमाने ॥" (रघुवं० २।१४) इसलिए रामराज्य में दण्ड यतियों के ही हाथ में दिखता था । भेद गतिभेद, ताल, मूर्च्छना आदि के रूप में नर्तक-नृत्य-समाज में ही परिलक्षित होता था । मन के विजय में ही विजय शब्द सुनायी पड़ता था— "दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज । जीतहु मनहिं सुनिअ अस रामचंद्र के राज ॥" (रा० मा० ७।२२) रामराज्य में अभीष्ट वस्तु का अभाव नहीं था । काननों में फलों-फूलों की भरमार थी । मनुष्यों की कौन कहे चूहा-बिल्ली, बाघ-बकरी, हाथी-सिंह साथ-साथ क्रीडा करते थे । वृक्ष और लताएं इच्छानुसार मधु प्रदान करती थीं । गायें इच्छानुसार दूध देती थीं । चन्द्रमा अपनी अमृत रश्मि से मही को आप्यायित करते थे । सूर्य आवश्यकता के अनुसार ही ताप पहुँचाते थे । बादल मनचाही वर्षा देते थे— "फूलहिं फलहिं सदा तरु कानन । रहहिं एक सँग गज पंचानन ॥ लता विटप माँगे मधु चवहीं । मन भावतो धेनु पय स्रवहीं ॥" (रा० मा० ७।२२।१,३) "विधु महि पूर मयूखन्हि, रवि तप जेतनहिं काज । माँगे बारिद देहिं जल, रामचंद्र के राज।" (रा० मा० ७।२३)
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६८३ केवल बाह्य भौतिक शासनों एवं व्यवस्थाओं से ही संसार की सभी समस्याओं का समाधान नहीं होता है। बाह्य शासन के बल पर बाघ-बकरे एक घाट पानी नहीं पी सकते और न ही उतनेमात्र से प्राकृतिक स्वभाव में परिवर्तन ही होता है। राजा राम के पहुँचने पर गुह ने राम का पूर्ण स्वागत किया और कहा मेरा सारा राज्य आपका है। हम सभी आपकी आज्ञाओं का अनुवर्तन करेंगे। आप स्वामी की तरह शासन करें। ये भक्ष्य, भोज्य, पेय, लेह्य, शयन एवं घोड़ों की पूर्ण खाद्यसामग्री भी उपस्थित हैं— “स्वागतं ते महाभाग तवेयमखिला मही। वयं प्रेष्या भवान् स्वामी साधु राज्यं प्रशाधि नः ॥ भक्ष्यं भोज्यं च पेयं च लेह्यं चैतदुपस्थितम् । शयनानि च मुख्यानि वाजिनां खादनं च ते ॥ (वा० रा० २।५०।३९) आधुनिक दृष्टि से मित्र का ही क्यों शत्रु का भी भोजन, पान आदि ग्रहण न करना असभ्यता समझी जाती है। पर परिस्थिति के अनुसार यद्यपि राम ने निषादराज का भोजन, पान आदि कुछ भी ग्रहण नहीं किया, फिर भी अपने व्यवहार एवं स्नेह से उन्हें निहाल कर दिया। राम ने कहा आप मेरे पास पैदल ही चले आये, हम आपके परमोत्कृष्ट प्रेम से अत्यन्त प्रसन्न एवं अचित हो गये हैं। राम अपनी सुन्दर दोनों भुजाओं के पाश में गुह को निपीडित करते हुए बोले—हम कितने भाग्यशाली हैं जो स्वस्थ एवं प्रसन्न बान्धवों से युक्त आप जैसे मित्र का दर्शन कर रहे हैं। आपके मित्रों, वनों तथा राष्ट्र में कुशल तो है? आप जो कुछ भी भेंट लाये हैं वह सब मुझे स्वीकार हैं। आप स्वयं समझ लें कि मैंने तपस्वी वनचारी का व्रत धारण कर रखा है। मैं वल्कलवसन, कुश एवं अजिन धारण, कन्दमूल-फलाशन करता हूँ। अतः अन्य सब वस्तुएँ प्रत्यावर्तित कर दें। केवल घोड़ों के लिए चारा दाना ही मुझे अपेक्षित है। ये मेरे पिता के अत्यन्त प्रिय हैं, अतः इनको खिलाने पिलाने से ही मेरा पूर्ण सत्कार हो जावेगा— “गुहमेवं ब्रुवाणं तु राघवः प्रत्युवाच ह। अर्चिताश्चैव हृष्टाश्च भवता सर्वदा वयम् ॥ पद्भ्यामभिगमाच्चैव स्नेहसंदर्शनेन च। भुजाभ्यां साधुवृत्ताभ्यां पीडयन् वाक्यमब्रवीत् ॥ दिष्ट्या त्वां गुह पश्यामि ह्यरोगं सह बान्धवैः । अपि ते कुशलं राष्ट्रे मित्रेषु च वनेषु च ॥ यत् त्विदं भवता किञ्चित् प्रीत्या समुपकल्पितम् । सर्वं तदनुजानामि नहि वर्ते प्रतिग्रहे ॥ कुशचीराजिनधरं फलमूलाशनं च माम् । विद्धि प्रणिहितं धर्मे तापसं वनगोचरम् ॥ अश्वानां खादनेनाहमर्थी नान्येन केनचित् । एतावतात्र भवता भविष्यामि सुपूजितः ॥ एते हि दयिता राज्ञः पितुर्दशरथस्य मे। एतैः सुविहितैरश्वैर्भविष्याम्यहमर्चितः ॥ (वा० रा० २।५०।४०-४७) शुक और सारण रावण के मन्त्रिमण्डल के प्रभावशाली सदस्य थे। वे राम की सैन्यशक्ति की टोह लेने के लिए आये थे। दोनों गुप्त वेष में थे, पर पकड़ लिये गये। आधुनिक दृष्टि से उनका वध ही उचित था। जब वे राम के सामने लाये गये, राम ने उनसे कहा—यदि आपने हमारी सैन्य-शक्ति का पता पा लिया और सुसमाहित हम
६८४ रामायणमीमांसा विंश लोगों को भी देख लिया और अपने राजा का कार्य कर लिया है तो आप स्वेच्छा से जा सकते हैं । यदि कुछ देखना बाकी बचा है तो फिर से देख लो । विभीषण पूर्णरूप से सब कुछ तुम्हें पुनः दिखा देंगे— “यदि दृष्टं बलं सर्वं वयं वा सुसमाहिताः । यथोक्तं वा कृतं कार्यं छन्दतः प्रतिगम्यताम् ॥ अथ किञ्चिददृष्टं वा भूयस्तद् द्रष्टुमर्हथः । विभीषणो वा कार्त्स्न्येन पुनः संदर्शयिष्यति ।।” (वा० रा० ६।२५।१८,१९) राम रावण से अपनी पतिव्रता पत्नी के उद्धार के लिए एवं क्षात्र तेज की रक्षा के लिए लड़े और सानुबन्ध रावण का वध किया, परन्तु उसके हितैषी ही रहे । “अरिहुँ क अनभल कीन्ह न रामा ।” ( रा० मा० २।१८१।१ ) विजय के बाद उसकी प्रशंसा करते हुए राम ने कहा था—ये प्रचण्ड पराक्रमी थे । निश्चेष्ट होकर नहीं मरे । इनका महोत्साह अत्यन्त उन्नत था । ये निर्भीक होकर रणाङ्गण में जूझे हैं । इस प्रकार क्षात्र धर्म में व्यवस्थित होकर जो युद्ध में मरते हैं, युद्धभूमि में अपनी विजय के लिए आकांक्षा करते हुए मारे जाते हैं वे शोचनीय नहीं होते । युद्ध में सदैव किसी की विजय नहीं होती । युद्ध में वीर या तो दूसरों से मारा जाता है या दूसरों को मारता है । यह पूर्वजों से निर्दिष्ट क्षत्रियसम्मत गति है कि क्षत्रिय युद्ध में निहत होकर शोचनीय नहीं होता है— “नायं विनष्टो निश्चेष्टः समरे चण्डविक्रमः । अत्युन्नतसमुत्साहः पतितोऽयमशङ्कितः ॥ नैवं विनष्टाः शोच्यन्ते क्षत्रधर्मव्यवस्थिताः । वृद्धिमाशंसमाना ये निपतन्ति रणाजिरे ॥ नैकान्तविजयो युद्धे भूतपूर्वः कदाचन । परैर्वा हन्यते वीरः परान् वा हन्ति संयुगे ॥ इयं हि पूर्वैः संदिष्टा गतिः क्षत्रियसम्मता । क्षत्रियो निहतः संख्ये न शोच्य इति निश्चयः ॥” (वा०रा०६।१११।१४-१८) शिष्टों में सार्वभौम प्रसिद्धि है कि राम के समान बर्ताव करना चाहिये रावण जैसा नहीं। भावी राजाओं से भी राम ने धर्मसेतु की रक्षा का अनुरोध किया था— “भूयो भूयो भाविनो भूमिपाला नत्वा नत्वा याचते रामचन्द्रः । सामान्योऽयं धर्मसेतुर्नराणां काले काले पालनीयो भवद्भिः ॥” ( स्कन्द० ब्राह्मख० धर्मारण्य ३४।४ ) “आन्वीक्षिक्यात्मविद्या स्यादीक्षणात् सुखदुःखयोः । ईक्षमाणस्तया तत्त्वं हर्षशोकौ व्युदस्यति ॥” ( काम० नीति० २।३१ ) “प्रसन्नतां या न गताऽभिषेकतस्तथा न मम्लौ वनवासदुःखतः । मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य सदास्तु सा मञ्जुलमङ्गलप्रदा ॥” न वनं गन्तुकामस्य त्यजतश्च वसुन्धराम् । सर्वलोकातिगस्येव लक्ष्यते चित्तविक्रिया ॥ ( वा० रा० २।१९।३३ ) “आपद्यभग्नधैर्यंत्वं सम्पद्यनभिमानिता । यदुत्साहस्य चात्यागः तद्धि सत्पुरुषव्रतम् ॥”
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६८५ “देखन कहँ प्रभु करुनाकांदा । प्रकट भये बहु जलचर वृंदा ॥” ( रा० मा० ६।३।२ ) “यह सुधि कोल किरातन पाई । हरषे जनु नव निधि घर आई ॥” ( रा० मा० २।१३३।१ ) “देखि दखिन दिशि हय हिहिनाहीं । जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं ॥” (रा० मा० २।१४०।४) “नहिं तृन चरहिं न पियहिं जल मोचहिं लोचनबारि । ब्याकुल भये निहारि सब रघुबर बाजि निहारि ॥” ( रा० मा० २।२४। ) “काम कोटि छबि श्याम शरीरा । नील कंज वारिद गंभीरा ॥” ( रा० मा० १।१९८।१ ) “सोभा कोटि मनोज लजावन ।” ( रा० मा० १।३२६ ) “धरमधुरीन भानुकुलभानू ।” ( रा० मा० २।२५२।१ ) “बेद पुरान बसिष्ठ बखानहिं । सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं ॥” ( रा० मा० ७।२५।१ ) “जौ अनीति कछु भाषौं भाई । तो मोहि बरजहु भय बिसराई ॥ नहि अनीति नहि कछु प्रभुताई । सुनहु करहु जो तुम्हहि सुहाई ॥” (रा० मा० ७।४२।३,२) प्राण तृणाग्रलग्न जलबिन्दु के समान हैं । धर्म ही सब का सुहृत् है, अतः उसका विरोध नहीं करना चाहिये— “वाताभ्रविभ्रममिदं वसुधाधिपत्यं प्राणास्तृणाग्रजलबिन्दुसमा नराणाम् । आपातमात्रमधुरा विषयोपभोगा धर्मः परं सुहृदहो न विरोधनीयः ॥” “मातरं रक्ष कैकेयीं मा रोषं कुरु तां प्रति । मया च सीतया चैव शपतोऽसि रघुनन्दन ॥” ( वा०रा० २।११२।२७ ) “व्यसनेषु मनुष्याणां भृशं भवति दुःखितः । उत्सवेषु च सर्वेषु पितेव परिरक्षति ॥” ( वा० रा० २।२।४०,४१ ) “इदं राज्यं च सकलं जीवितं च हृदि स्थितम् । सर्वमेतद् द्विजार्थं मे सत्यमेतद् ब्रवीमि वः ॥” ( वा० रा० ७।६०।१९ ) “साक्षाद् रामाद् विनिर्वृत्तो धर्मश्चापि श्रिया सह ।” (वा० रा० २।२।२९ ) “सत्यं दानं तपस्त्यागो मित्रता शौचमार्जवम् । विद्या च गुरुशुश्रूषा ध्रुवाण्येतानि राघवे ॥” ( वा० रा० २।१८।३० ) “न तं पश्याम्यहं लोके परोक्षमपि यो नरः। स्वमित्रोऽपि निरस्तोऽपि योऽस्य दोषमुदाहरेत् ॥” ( वा० रा० २।२।१५ ) “रक्षिता स्वस्य धर्मस्य स्वजनस्य च रक्षिता ॥” ( मू० रा० १।१।१४) भारतीय परम्परा के अनुसार राजा या राजनीतिज्ञ को दण्डनीति से पहले आन्वीक्षिकी से ब्रह्मविद्या प्राप्त करनी चाहिये, जिसके प्रभाव से सुख और दुःख का तत्त्व जानकर शोक तथा मोह का अपाकरण किया जा सकता है । अपने अचिन्त्य तथा अनन्त ब्रह्मानन्दसुधासिन्धु में तृप्त रहने के कारण ही राम के राज्याभिषेक से मुखाम्बुज पर कोई प्रसन्नता नहीं हुई और वनवास-दुःख से कोई विक्रिया नहीं आयी । वसुधाधिपत्य त्यागकर वन जाते समय लोकातीत जैसी निर्विकारिता राम में परिलक्षित होती थी । आपत्ति में धैर्य-भङ्ग न हो यही तो महासत्त्व का लक्षण है । सदा प्रसन्न राम को निहारने के लिए समुद्र के जलचरवृन्द भी प्रकट होकर विभोर हो जाते हैं। वन के कोल-किरात नव निधि समझ कर राम में अनुरक्त होते हैं । राम के वियोग में रथ के घोड़े व्याकुल होकर तृण और जल लेने से विरक्त हो जाते हैं । वे छविधाम श्रीराम मर्यादा-पालनार्थ स्वयं वेद, पुराण आदि सुनते हैं
और प्रजाको धर्माचरण का नम्र मधुर उपदेश देते हैं। भरत को अपनी और श्रीसीताजी की शपथ देकर कैकेयी के प्रति सौमनस्य ही बर्तने का अनुरोध करते हैं। जनदुःख में दुःखी तथा उत्सव में पिता के समान परितुष्ट होकर सबके साथ तादात्म्य का अनुभव करते हैं। श्रीरामजी का अपना राज्य तथा सम्पूर्ण जीवित ही द्विजार्थ अर्पित है। इतना ही क्यों, सम्पूर्ण श्री वैभव के साथ साक्षात् धर्म ही श्रीरामजी से सुसम्पन्न होकर प्रकट हुआ है। सत्य, दान, तप, त्याग, मित्रता, शुचिता, विद्या, गुरु-शुश्रूषा आदि धर्म श्रीरामजी में ध्रुव रूप से सुस्थिर हैं। गुरुजन कहते हैं हम संसार में ऐसे किसी राम के सुनिरस्त अपमानित घोर शत्रु को भी नहीं देखते हैं जो परोक्ष में भी राम का दोष या द्रोह बतलाता हो। इतना ही नहीं, राम अमित्रों की भी दृष्टि एवं मन का हरण करते हैं— “अप्यमित्राणां दृष्टिश्रुतिमनोहरः ।” (म० भा० रामोपाख्यान ) सर्वलोकप्रिय राम श्रीरामजी धर्म तथा स्वजन के रक्षिता, सर्वलोकप्रिय, द्रष्टा, स्मर्त्ता, सभी लोगों के हितकारक, सहज असाधारण क्षात्रस्वभाव से अदीनात्मा, अतिदुःख, व्यसनादि परम्परा में भी अक्षुब्धस्वभाव एवं विचक्षण हैं। जैसे नदियां सदैव समुद्र की ओर जाती हैं वैसे ही राम सदैव सत्पुरुषों द्वारा सेवित होते हैं। वे आर्य, सर्वप्रियदर्शन, सर्वगुणोपेत, कौशल्यानन्दवर्धन हैं— “सर्वलोकप्रियः साधुरदीनात्मा विचक्षणः । सर्वदाभिगतः सद्भिः समुद्र इव सिन्धुभिः ॥ आर्यः सर्वसमश्चैव सदैव प्रियदर्शनः । स च सर्वगुणोपेतः कौशल्यानन्दवर्धनः ॥” (वा० रा० १।१।१५-१७ ) राम गंभीरता में समुद्र जैसे, धैर्य में हिमवान् जैसे, वीर्य (पराक्रम) में विष्णु जैसे तथा चन्द्रमा के समान प्रियदर्शन हैं। क्रोध में कालाग्नि के तुल्य, क्षमा में पृथिवी के तुल्य, त्याग में कुबेर के तुल्य एवं सत्य में धर्म के तुल्य हैं। वनगमन तथा अखण्ड भूमण्डल के राज्य का त्याग करने में सर्वलोकातीत जीवन्मुक्त जैसे उनके चित्त में कोई विक्रिया परिलक्षित नहीं होती— “न चास्य महतीं लक्ष्मीं राज्यनाशोऽपकर्षति । लोककान्तस्य कान्तत्वाच्छीतरश्मेरिव क्षयः ॥ न वनं गन्तुकामस्य त्यजतश्च वसुन्धराम् । सर्वलोकातिगस्येव लक्ष्यते चित्तविक्रिया ॥” (वा० रा० २।१९।३२, ३३ ) राम के समुचित रूपसंनिवेश, लक्ष्मी (शोभा), सौकुमार्य, सुवेषता आदि गुणों को विस्मित होकर वनवासी देखने लगे— “रूपसंहननं लक्ष्मीं सौकुमार्यं सुवेषताम् । ददृशुर्विस्मिताकारा रामस्य वनवासिनः ॥” ( वा० रा० ३।१।१३ ) रामचरितमानस के अनुसार राम की देह चिदानन्दमय है— “चिदानन्दमय देह तुम्हारी ।” ( रा० मा० ३।१।१३ ) तुलसीदास ने बड़ी बुद्धिमानी से राम की शोभा का वर्णन किया है। देवताओं का सौन्दर्य तो प्रसिद्ध है। फिर ब्रह्मा, विष्णु और शिव के सौन्दर्य का तो कहना ही क्या है ? पर सखियां कहती हैं—विष्णु में चार भुजा और
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६८७ ब्रह्मा में चार मुख होने और विकटवेष शिवजी के पाँच मुख होने से वे राम के समान कहाँ हो सकते हैं ? फिर और कौन तनुधारी देव उनके समान हो सकता है— "विष्णु चारि भुज विधि मुख चारी । विकटभेष मुख पंच पुरारी । अपर देव अस को जग माहीं । यह छवि सखि पटतरिये जाहीं ॥” ( रा० म० १।२१९।४ ) वे राम के एक-एक अङ्ग पर कोटि-कोटि शत कामों को निछावर करती हैं। वाल्मीकिरामायण के अनुसार तो राम सूर्य के सूर्य, अग्नि के अग्नि, प्रभु के भी प्रभु, श्री-शोभा के भी शोभा, कीर्ति के कीर्ति तथा क्षमा के क्षमा हैं— “सूर्यस्यापि भवेत् सूर्यो ह्यग्नेरग्निः प्रभोः प्रभुः । श्रियाः श्रीश्च भवेदग्रया कीर्त्याः कीर्तिः क्षमा-क्षमा ॥” ( वा० रा० २।४४।१५ ) श्रीभागवत के अनुसार अलङ्कारों से भगवान् के अङ्ग अलङ्कृत नहीं होते हैं, अपितु भगवान् के अङ्गों से ही अलङ्कार अलङ्कृत होते हैं--"भूषणभूषणाङ्गम्" वाल्मीकिरामायण के अनुसार अपार सौन्दर्यसिन्धु राम के स्वरूप से कोई भी अपने मन एवं चक्षु को लौटा ही नहीं सकता था । राम के सामने से पधार जाने पर भी उनका मङ्गलमय रूप मन एवं नेत्रों में जगमगाता रहता था-- “नहि तस्मान्मनः कश्चिचक्षुषी वा नरोत्तमात् । नरः शक्नोत्यवाक्रष्टुमपक्रान्तेऽपि राघवे ॥” ( वा० रा० २।१७।१३ ) जिसने राम को न देखा और राम ने जिसे नहीं देखा वे दोनों सब लोकों में निन्दित हैं । इतना ही नहीं उसकी अन्तरात्मा भी उसको धिक्कारती है-- “यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामो न पश्यति । निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हति ॥” ( वा० रा० २।१७।१४ ) वे कहती हैं, सखि ऐसा कौन तनधारी है जो इस रूप पर मोहित न हो जाय । इसी लिए शङ्कर को १५ नेत्रों से राम के अनुपम रूप-सौन्दर्य का रसास्वादन करने के कारण १५ नेत्र अतिप्रिय लगे— “संकर राम रूप अनुरागे । नयन पंचदस अतिप्रिय लागे ॥” (रा० मा० १।३१६।१) ब्रह्मा ८ नेत्रों से राम के माधुर्य का आस्वादन करते हुए शिव से कम अपने ८ ही नेत्र जानकर पछताने लगे । रमासहित रमापति भी रामरूप देखकर मोहित हो गये-- “हरि हित सहित राम जब जोहे । रमा समेत रमापति मोहे ॥” (रा० मा० १।३१६।२) बारह नेत्रों से राम के सौन्दर्य का रसास्वादन करके कार्तिकेय प्रसन्न हो रहे थे और इन्द्र सहस्र नेत्रों से भगवान् का रूप देखकर अपने को धन्य-धन्य मान रहे थे । जनकादि जैसे ज्ञान-विज्ञान सम्पन्न भी रामसौन्दर्य पर मोहित हो गये— “सहज विराग रूप मन मोरा । थकित होत जिमि चंद चकोरा ॥ इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा । बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा ॥” (रा० मा० १।२१५।२,३) कि बहुना जिसने स्वप्न में भी एक बार भी राम-मुख-माधुर्य का अनुभव कर लिया है। वह ब्रह्मसुख को भी नहीं गिनता । सूर्यनारायण ने कोटि-कोटि किरणों से राम के रूप-सौन्दर्य को निहारते-निहारते मास भर अवध में बिता दिया ।
६८८ रामायणमीमांसा विंश “मासदिवस कर दिवस भा मरम न जाना कोइ । रथ समेत रबि थाकेउ निसा कवन बिधि होइ ॥ ( रा० मा० १।१९५) "सोइ सुख लवलेस जिन सपनेहु बारेक लहेउ । ते नहिं गनहिं खगेस ब्रह्मसुखहि सज्जन सुमति ॥” ( रा० मा० ७।८८ ) सनकादि भी भगवान् की अनुपम छवि देखकर विह्वल हो जाते हैं । “मुनि रघुपतिछबि अतुल बिलोकी । भये मगन मन सके न रोकी ।।" ( रा० मा० ७।३२।१ ) ज्ञानी भक्त सात्त्विक लोग ही नहीं खरदूषण जैसे क्रूरप्रकृति के लोग भी राम की शोभा देखकर मोहित होकर कहने लगते हैं— “जद्यपि भगिनी कीन्ह कुरूपा । बध लायक नहिं पुरुष अनूपा ।।" ( रा० मा० ३।१८।३ ) उनसे भी अधिक तीक्ष्ण विषवाली सर्पिणी एवं वृश्चिक आदि भी रामरूप देखकर अपनी सहज तामसी तीक्ष्णता को त्यागकर प्रेमपरिप्लुत हो जाते हैं— "जिनहिं निरखि मग सांपिनि बीछी । तजहिं सहज बिष तामस तीछी ॥ ( रा० मा० २।२६०।४ ) फिर जिनकी निधि वही हैं उनके लोचन रामरूप पर क्यों न ललचा उठें ? "देखि रूप लोचन ललचाने । हरषे जनु निज निधि पहिचाने ॥” ( रा० मा० १।२३१।२ ) "लाजहिं तनु शोभा निरखि कोटि-कोटि सत काम ।” ( रा० मा० १।१४६ ) श्रीभागवत के अनुसार भगवान् की चपला लक्ष्मी भगवान् के पादारविन्द का माधुर्यामृतरसास्वादन करने गयी । रसास्वादन करने में उसे शोभासिन्धु की थाह नहीं मिली । उसे उत्तरोत्तर क्षणों में पूर्व-पूर्व क्षण की शोभा से कोटि-कोटि गुणित अधिक शोभा अनुभूत होने लगी । अतः चला लक्ष्मी श्रीभगवान् के पादारविन्द को पाकर अचला हो गयी । अनन्तकाल तक अनुभव करने पर भी उत्तरोत्तर कोटि-कोटि गुणित शोभा की अनुभूति बढ़ती ही गयी— “चलापि यच्छ्रीर्न जहाति कर्हिचित् ।” ( भाग० ११।२।३३ ) और तो और स्वयं भी सर्वज्ञशिरोमणि मणिमय स्तम्भों में प्रतिफलित निजप्रतिबिम्ब को निहारकर प्रेमोद्रेक में स्वयं भी नाच उठे— “रूपरासि छबि अजिर बिहारी । नाचहिं निज प्रतिबिम्ब निहारी ॥” ( रा० मा० ७।७६।४ ) वेद, उपनिषद्, महाभारत तथा अनेक रामायणों में रामचरित्र का वर्णन है । अग्निपुराण में २ से १२ और २४० से २६० अध्यायों में राम द्वारा राजनीति का वर्णन है । आदिपुराण, कल्किपुराण तथा कालिकापुराण के ६२ वें अध्याय में विस्तृत रामकथा है। कूर्मपुराण, गरुड़पुराण तथा नरसिंहपुराण में रामकथा है । पद्मपुराण में अनेक बार सविस्तर रामकथा वर्णित है । इसी में रामाश्वमेध ७० अध्यायों में वर्णित है । बृहन्नारदीयपुराण, बृहद्धर्म- पुराण, ब्रह्मपुराण, ब्रह्माण्डपुराण, भविष्यपुराण, श्रीमद्भागवत, देवीपुराण तथा महाभागवत में भी रामकथा है । मार्कण्डेयपुराण, लिङ्गपुराण, वामनपुराण, वायुपुराण, वाराहपुराण, विष्णुपुराण, शिवपुराण, स्कन्दपुराण तथा हरिवंशपुराण में रामकथा वर्णित है । हनुमत्संहिता, शिवसंहिता, लोमशसंहिता, बृहद्ब्रह्मसंहिता, महाशम्भुसंहिता, अगस्त्यसंहिता, वाल्मीकिसंहिता, शुकसंहिता, वसिष्ठसंहिता, सदाशिवसंहिता, हिरण्यगर्भसंहिता, महासदाशिवसंहिता, ब्रह्मसंहिता, पुराणसंहिता, बृहत्सदाशिवसंहिता, सनत्कुमारसंहिता आदि महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों में राम की उपासनाओं का वर्णन है ।
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६८९ अनादि काल से वाराणसी में मरनेवालों को शिवजी रामनाम का उपदेश करते हैं— “पेयं पेयं श्रवणपुटके रामनामाभिरामं ध्येयं ध्येयं मनसि सततं तारकं ब्रह्मरूपम् । जल्पन् जल्पन् प्रकृतिविकृतौ प्राणिनां कर्णमूले वीथ्यां वीथ्यामटति जटिलः कोऽपि काशीनिवासी ।।” ( काशीरहस्य ) भक्तवर प्रह्लाद भी रामनाम का महत्त्व मानते हैं— “रामनाम जपतां कुतो भयं सर्वतापशमनैकभेषजम् । पश्य तात मम गात्रसन्निधौ पावकोऽपि सलिलायतेऽधुना ।।” ( नृ० पु० ) प्रह्लाद कहते हैं राम-नाम जपनेवालों को भय कहाँ ? क्योंकि राम-नाम सब तापों की निवृत्ति का एकमात्र औषध है । हे तात ! देखिये मेरे शरीर के निकट आग भी जल के समान ठण्डी प्रतीत होती है । भक्तगण उन्हीं का आश्रयण करते हैं— “अपराधसहस्रभाजनं पतितं भीमभवार्णवोदरे । अगतिं शरणागतं हरे कृपया केवलमात्मसात्कुरु ।।” नाथ, मैं सहस्रों अपराधों का भाजन हूँ, अतएव भयङ्कर भवार्णव में पड़ा हूँ । मेरा कोई सहारा नहीं है, मैं आपकी शरण में आया हूँ । हे हरे ! आप मुझे अपना लेने की कृपा करें । “न धर्मनिष्ठोऽस्मि न चात्मवेदी न भक्तिमांस्त्वच्चरणारविन्दे । अकिञ्चनोऽनन्यगतिः शरण्यं त्वत्पादमूलं शरणं प्रपद्ये ।।” न मैं धर्मनिष्ठ हूँ, न आत्मवेदी हूँ और न ही आपके चरणों में भक्तिमान् हूँ । अकिञ्चन एवं अनन्यगति मैं आपके शरणागतरक्षणपरायण चरणों की शरण में प्रपन्न हूँ । स्कन्दयामल तन्त्र के निर्वाणखण्ड में रुद्रवाक्य है— “रेफोऽग्निरहमेवोक्तो विष्णुः सोमो म उच्यते । आवयोर्मध्यगो ब्रह्मा रविराकार उच्यते ।।” राम-नाम का रेफ ( र ) अग्नि का वाचक है, वह अग्नि मैं ही हूँ । रामनाम का 'म' सोमात्मक 'विष्णु का वाचक है, दोनों के मध्य में रहनेवाले आकार का अर्थ ब्रह्मा है । वही आदित्य भी है । इस तरह प्रणव के समान ही रामनाम भी ब्रह्मविष्णुरुद्रात्मक है । “चिन्मयेऽस्मिन् महाविष्णो जाते दाशरथौ हरौ । रघोः कुलेऽखिलं राति राजते यो महीस्थितः ।। स राम इति लोकेषु विद्वद्भिः प्रकटीकृतः ।” ( रा० पू० ता० १।२ ) रघुकुल में महाविष्णु के दाशरथि राम के रूप में प्रकट होने पर जो अखिल अभीष्ट देते हैं और भूमि में स्थित होकर देदीप्यमान हैं, उनका नाम राम पड़ा । “रमन्ते योगिनो यस्मिन्नित्यानन्दे चिदात्मनि । इति रामपदेनैतत्परं ब्रह्माभिधीयते !!” ( रा० उ० ता० १।६ )
६९० रामायणमीमांसा विंश योगी जिस नित्य चिदानन्द आत्मा में रमण करते हैं वही राम हैं अथवा जो ज्ञानादि लक्ष्मी प्रदान करते हैं वही राम हैं। “रां ज्ञानादिलक्ष्मीम् अमति ददातीति रामः, ज्ञानादीनां प्राप्तिर्यस्मात्स रामः ।” विविध ऐश्वर्यों, धनों, लक्ष्मी आदि की जिससे प्राप्ति होती है, वही राम है। “यथैव वटबीजस्थः प्राकृतश्च महान् द्रुमः। तथैव रामबीजस्थं जगदेतच्चराचरम्॥ रेफारूढमूर्तयः स्युः शक्तयस्तिस्र एव च।” जैसे महान् वटवृक्ष वटबीज में रहता है, वैसे ही यह चराचर प्राकृत महान् जगत् राम के बीज 'रां' मन्त्र में रहता है। तीनों उत्पादिनी, पालिनी तथा संहारिणी शक्तियाँ रेफसमन्वित हैं। “राम एव परं ब्रह्म राम एव परं तपः। राम एव परं तत्त्वं श्रीरामो ब्रह्म तारकम्॥” (रा० उ० ता० १।६ ) राम ही परम ब्रह्म हैं, राम ही परम तप हैं, राम ही परम तत्त्व हैं एवं राम ही तारक ब्रह्म हैं। “कांस्यघण्टानिनादस्तु यथालीयति शान्तये। ॐकारस्तु तथा योज्यः शान्तये सर्वमिच्छता॥ यस्मिन् विलीयते शब्दस्तद् ब्रह्म परिगीयते।” कांस्य घण्टा का नाद जैसे क्रमेण लीन हो जाता है उसी तरह प्रणव के उच्चारण में अ, उ और म के समाप्त होने पर अनुस्वार ध्वनि नाद से शान्ति की अनुभूति होती है। वही की वही स्थिति राम में होती है। “राशब्दो विश्ववचनो मश्चापीश्वरवाचकः। विश्वानामीश्वरो यो हि तेन रामः प्रकीर्तितः ॥” रा शब्द विश्व का वाचक है और म ईश्वर का वाचक है तथा विश्वों का ईश्वर ही राम है। “रा चेति लक्ष्मीवचनो मश्चापीश्वरवाचकः। लक्ष्मीपति गतिं रामं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥” इसी तरह 'रा' लक्ष्मी का वाचक है और 'म' ईश्वर का वाचक है। लक्ष्मी का ईश्वर ही राम है। “तरुणादित्यसंकाशं चतुर्वर्गप्रदायकम्। पञ्चदेवमयं वर्णं पञ्चप्राणमयं तदा॥ त्रिशक्तिसहितं रामं त्रिबिन्दुसहितं सदा। आत्मादितत्त्वसंयुक्तं हृदिस्थं प्रणमाम्यहम् ॥” (कामधेनुतन्त्र ) तरुण आदित्य के समान 'रा' और 'म' वर्ण चतुर्वर्गप्रद एवं पञ्चदेवमय तथा पञ्चप्राणमय हैं। रामनाम की महिमा से निर्गुण एवं सगुण रामब्रह्म का प्राकट्य होता है। “कदा पुनः शङ्खरथाङ्गकल्पकध्वजारविन्दाङ्कुशवज्रलाञ्छनम्। त्रिविक्रम त्वच्चरणाम्बुजद्वयं मदीयमूर्धानमलङ्करिष्यति ॥”(आलवन्दारस्तोत्र ३४) श्रीयामुनाचार्य कहते हैं- शङ्ख, चक्र, ध्वज, कमल, अङ्कुश और वज्र के चिह्नों से अङ्कित आपके चरणारविन्द कब मेरे मस्तक को अलङ्कृत करेंगे? अन्य भक्तों के अनुसार भगवच्चरणारविन्द में आकाश, गोष्पद, स्वस्तिक, जम्बूफल, कलश, सुधासरोवर, अर्धचन्द्र, षट्कोण, मीनबिन्दु, ऊर्ध्वरेखा आदि के भी चिह्न हैं।
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६२१ “अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या। तस्यां हिरण्मयः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः ॥” ( अथर्वसं० १०।२।३१ ) आठ आवरणोंवाली तथा नव द्वारवाली देवताओं की पुरी अयोध्या है। उसमें हिरण्मय ज्योतिर्मय स्वर्ग कोश है। वह ज्योति के द्वारा आवृत है। “अयोध्या नगरी नित्या सच्चिदानन्दरूपिणी । यस्यांशांशेन वैकुण्ठो गोलोकादिः प्रतिष्ठितः ॥” ( व० सं० ) वसिष्ठसंहिता के अनुसार अयोध्या नगरी सच्चिदानन्दरूपिणी है। वैकुण्ठ, गोलोकादि सब उसी के अंश हैं। “तस्मिन् हिरण्मये कोशे त्र्यरे त्रिप्रतिष्ठिते तस्मिन् । यद् यक्षमात्मन्वत् तद् वै ब्रह्मविदो विदुः ॥” ( अथर्वसं० १०।२।३२ ) उस प्रकाशमय तीन अरों, तीन गुणों या सत्, चित् और आनन्द पर आधृत हिरण्मय कोश में आत्मतुल्य परमपूज्य राम ब्रह्म स्थित हैं। “प्रभ्राजमानां हरिणीं यशसा सम्परीवृताम् । पुरं हिरण्मयीं ब्रह्माविवेशापराजिताम् ॥” ( अथर्वसं० १०।२।३ ) अत्यन्त देदीप्यमान मन को हरण करनेवाली यश से परिवृत अपराजिता सर्वथा अजेय उस हिरण्मयी अयोध्या पुरी में ब्रह्म राम सम्यक् विराजमान हैं। वाल्मीकिरामायण में उसी प्रेमपरिप्लुत अयोध्या पुरी का वर्णन है। “तत्समाकुलसंभ्रान्तं मत्तसंकुपितद्विपम् । हयशिक्षितनिर्घोषं पुरमासीन्महास्वनम् ॥” ( वा० रा० २।४०।१९ ) राम के वियोग से वह पुर ही व्याकुल एवं संभ्रान्त हो गया। मत्त गज भी राम के वियोग की सम्भावना से कुपित हो गये। घोड़ों के हिनहिनाने एवं उनके भूषणों के निःस्वनों से सारा नगर कोलाहलपूर्ण हो गया। पुरवासी कहते हैं— “अनुगन्तुमशक्तास्त्वां मूलैरुद्धतवेगिनः । उन्नता वायुवेगेन विक्रोशन्तीव पादपाः ॥” ( वा० रा० २।४५।३० ) अपनी जड़ों के कारण वेगहीन पादप तुम्हारा अनुगमन करने में असमर्थ हैं। वायुवेग से स्वनवान् ये उन्नत पादप आप से लौटने के लिए चीत्कार कर रहे हैं। “लीनपुष्करपत्राश्च नद्यश्च कलुषोदकाः । संतप्तपद्माः पद्मिन्यो लीनमीनविहङ्गमाः ॥” ( वा० रा० २।५९।७ ) नदियों के जल मलिन हो गये हैं एवं उनके कमलों के पत्ते निलीनप्राय हो गये हैं (सूख गये हैं)। नदियों, सरोवरों के कमल एवं कमलिनियां संतप्त हो गयी हैं। उनके मीन एवं विहंगमगण लुप्त हो गये हैं। “मम त्वश्वा निवृत्तस्य न प्रावर्तन्त वर्त्मनि । उष्णमश्रु विमुञ्चन्तो रामे संप्रस्थिते वनम् ॥
६९२ रामायणमीमांसा विंश
विषये ते महाराज महाव्यसनकर्शिताः । अपि वृक्षाः परिम्लानाः सपुष्पाङ्कुरकोरकाः ॥ उपतप्तोदका नद्यः पल्वलानि सरांसि च । परिशुष्कपलाशानि वनान्युपवनानि च ॥ न च सर्पन्ति सत्त्वानि व्याला न प्रसरन्ति च । रामशोकाभिभूतं तन्निष्कूजमिव तद्वनम् ॥ जलजानि च पुष्पाणि माल्यानि स्थलजानि च । न विभान्त्यल्पगन्धीनि फलानि च यथापुरम् ॥ अत्रोद्यानानि शून्यानि प्रलीनविहगानि च । न चाभिरामानारामान् पश्यामि मनुजर्षभ ॥” (वा०रा० २।५९।२, ३–६, ८, ९)
सुमन्त्र ने कहा—राम के वन को प्रस्थित होने पर मैं जब लौटा रथ के घोड़े उष्ण आँसू गिराते हुए मार्ग पर चलने को प्रवृत्त नहीं हुए । महाराज, महाव्यसन से दुःखित आपके देश के वृक्ष पुष्पों, पल्लवों, अङ्कुरों तथा पुष्पमुकुलों के साथ परिम्लान (कुम्हलाये हुए) हो गये हैं। नदियों, सरोवरों तथा छोटे सरोवरों के जल तप्त एवं शुष्क हो गये हैं । वनों एवं उपवनों के पत्ते सूख गये हैं। कोई प्राणी आहार के लिए भी गमनागमन नहीं कर रहे हैं । व्याल भी प्रसर्पण नहीं कर रहे हैं। सारा वन रामशोक से अभिभूत होकर निःशब्द सा हो रहा है। जल और स्थल के सभी पुष्प पहले के समान सौन्दर्य तथा सौगन्ध्य से युक्त नहीं हैं। सारे उद्यान विहंगादिहीन हो शून्य से प्रतीत होते हैं । आराम और क्रीडोद्यान भी अभिरामताशून्य हो रहे हैं। इस तरह अचेतन वृक्ष और लताएँ भी रामप्रेम से व्याप्त हैं ।
जो कहते हैं कि भले पुष्करनाभ के अनेक एक से एक अच्छे अवतार हैं तो भी लताओं में प्रेम प्रदान करनेवाला कृष्ण से अन्य कौन है ? “सन्त्ववतारा बहवः पुष्करनाभस्य सर्वतो भद्राः । कृष्णादन्यः को वा लतास्वपि प्रेमदो भवति ॥”
उन्हें उपर्युक्त वाल्मीकिरामायण के श्लोकों का अध्ययन करना चाहिये । इस तरह राम, उनका मङ्गल- मय धाम तथा मङ्गलमय नाम एवं राम की मङ्गलमयी कथा सभी स्वप्रकाश ब्रह्मरूप ही हैं और प्रत्येक के परम कल्याण के स्रोत हैं ।
रघुवंश के अनुसार कुश ने अयोध्या का जीर्णोद्धार किया था । “ऋषभं प्राप्य राजानं निवासमुपयास्यति ।” (वा० रा० ७।१११।२०) के अनुसार पूर्णरूप से वह जननिवास स्थान ऋषभ राजा के काल में ही हो सकी थी । सन्ध्याकरनन्दिकृत रामचरित (सर्ग ४) में वर्णित है कि कुश का कुमुद्वती के साथ विवाह हुआ था । आनन्दरामायण में भी कुश के अनेक विवाहों का वर्णन है । राम के २००० पौत्रों तथा २४ पौत्रियों का उल्लेख है । सेरीराम के अनुसार लव ने इन्द्र- जित् की पुत्री, इसके बाद विभीषण की पुत्री से विवाह कर के लङ्का का राज्य स्वीकार किया था । परन्तु यह सब रामायणविरुद्ध होने से चिन्त्य है । राम ने लङ्का का राज्य विभीषण को दिया था । रामपुत्र उसे स्वीकार करते यह कथमपि सम्भव नहीं ।
रावण ब्राह्मण था । उसके कुल की कन्या से विवाह क्षत्रिय कुल के लिए दोषावह ही था ।
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६९३ कुश और लव की जन्म-कथा राम द्वारा परित्यक्त किये जाने के बाद सीता ने वाल्मीकि के आश्रम में यमल पुत्रों को जन्म दिया। वाल्मीकिरामायण (७।६६।३-९) के अनुसार कुशों के अग्रभाग से अग्रज का निर्मार्जन करने का तथा अनुज का कुशों के लव (अधोभाग) से मार्जन करने का आदेश महर्षि वाल्मीकि ने दिया था। अतः क्रम से दोनों का नाम कुश और लवपड़ा था— 'यस्तयोः पूर्वजो जातः स कुशैर्मन्त्रसत्कृतैः । निर्मार्जनीयस्तु तदा कुश इत्यस्य नाम तत् ॥ यश्चावरो भवेत्ताभ्यां लवेन सुसमाहितः । निर्मर्जनीयो वृद्धाभिर्लवेति च स नामतः ॥' (वा० रा० ७।६६।७,८) इससे भी स्पष्ट है कि गानोपजीवी कुशीलव की यहाँ चर्चा नहीं है। यहाँ कुश और लव नाम के दो राजकुमार हैं और वे सीतापुत्र हैं। अतः बुल्के की यह कल्पना निरर्थक है कि कुशीलव गानविद्योपजीवी थे। भवभूति के अनुसार लक्ष्मण के चले जाने पर सीता को वन में प्रसव-पीड़ा होती है। उससे निराश होकर वे आत्महत्या के विचार से गङ्गा में कूद पड़ती हैं। जल में ही उनके दो पुत्र होते हैं। पृथिवी तथा गङ्गा देवियाँ सीता को दो पुत्रों के साथ रसातल ले जाती हैं। बाद में कुछ बड़े होने पर गङ्गा दोनों पुत्रों को शिक्षा देने के लिए वाल्मीकि महर्षि को सौंप देती हैं। इसके अनुसार कुश और लव अपने माता-पिता के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे । अन्तिम अङ्क में वाल्मीकि की आज्ञा से सीता प्रकट होकर राम के साथ अयोध्या लोटती हैं। कुन्दमाला के अनुसार राम कुश और लव से उनके माता-पिता के सम्बन्ध में प्रश्न करते हैं। तो वे अपनी माता वनदेवी को बताते हैं। परन्तु पिता के सम्बन्ध में कुश ने कहा कि मैं नहीं जानता। लव ने कहा मैं जानता हूँ। मेरे पिता का नाम निरनुक्रोश है, क्योंकि एक दिन माँ ने क्रुद्ध होकर कहा था "निरनुक्रोशतनयौ"। यह सुनकर राम के नेत्रों में अश्रु आ गये। यह कथा कल्पान्तर की हो सकती है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार तो वाल्मीकि के आश्रम में ही कुश और लव का जन्म हुआ था एवं वेदादि की शिक्षा भी उन्हें वहीं मिली थी। कथासरित्सागर तथा तिब्बती रामायण के अनुसार सीता ने एक ही पुत्र को जन्म दिया था। उसका नाम लव था। सीता लव को लेकर नदी में स्नान करने गयी। वाल्मीकि ने कुटी में आकर सोचा कि कोई हिंस्र पशु बालक को उठा ले गया, इसलिए उन्होंने तपोबल द्वारा कुश से एक बालक की सृष्टि की। लौटने पर सीता ने उसे पुत्रवत् ग्रहण किया। इस प्रकार सीता के कुश और लव दो पुत्र हुए। काश्मीरीरामायण (९।११८३-९३) के अनुसार दशरथ स्वप्न में पुत्र के लिए राम से अनुरोध करते हैं। राम वसिष्ठ की सम्मति से अश्वमेधयज्ञ करते हैं। फलस्वरूप सीता गर्भवती होती है। यह भी कल्पान्तरीय कथा है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार तो अश्वमेधयज्ञ में ही कुश और लव ने रामायण का गान किया था। किसी कथा के अनुसार सीता कुश को वाल्मीकि की रक्षा में छोड़ कर जाती है, किन्तु मार्ग में वानरियों का उपदेश सुनकर लौट आती हैं। वाल्मीकि नया पुत्र बनाकर देते हैं। आनन्दरामायण के अनुसार भी एक वानरी पाँच पुत्रों को ढोती है। इसपर सीता लौटकर वाल्मीकि को बिना बताये पुत्र को ले जाती हैं। रामकियेन में वानरियों से सीता के मिलने का वृत्तान्त है। सीता वानरियों को बच्चों के साथ कूदती देख कर बच्चों की समुचित सुरक्षा न करने के कारण उनकी भर्त्सना करती हैं। वानरियों ने उत्तर दिया कि तुम तो अपना पुत्र ध्यानमग्न ऋषि के पास छोड़ कर आयी। तुम हमसे भी अधिक असावधान हो। यह सुनकर सीता अपने पुत्र को लेने के लिए लौट पड़ती है। अन्य वृत्तान्त के अनुसार सुग्रीव-सेना के वानर वन में सीता की सेवा करते हैं। वानर उनके पुत्र को टहलाने ले जाते थे। किसी दिन सीता नदी तट पर सो गयी। इतने में एक वानरी उनके पुत्र
६९४ रामायणमीमांसा विंश को टहलाने ले गयी । बाद में सीता दुःख से द्रवित हो गयी । इस पर वाल्मीकि ने एक बालक की सृष्टि की । सिंहली रामकथा के अनुसार वाल्मीकि ने सीता-पुत्र न देखकर एक कमल से दूसरा बालक बनाया । ऐसी अन्य भी अनेक कल्पनाएँ हैं जो वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध होने के कारण कल्पान्तरीय कही जा सकती हैं । वाल्मीकिरामायण में अश्वमेध की यज्ञभूमि में लव और कुश रामायण का गान करते हैं । वहीं राम अपने पुत्रों का परिचय पाते हैं । बहुत सी राम-कथाओं में कुश और लव राम की सेना से भी युद्ध करते हैं । युद्ध का मुख्य कारण यह है कि कुश और लव ने रामाश्वमेध के घोड़े को बाँध लिया था । पउमचरियं (पर्व ९७-१००) के अनुसार लवण तथा अंकुश (लव तथा कुश) - अपनी माता के साथ पुण्डरीकपुर के राजा वज्रजङ्घ के यहाँ रहते हैं एवं सिद्धार्थ से शिक्षा पाते हैं। उनके यहाँ विवाह एवं दिग्विजय के बाद नारद आकर उनकी माता के त्याग की घटना का समाचार सुनाते हैं । इसपर लवण और अंकुश राम तथा लक्ष्मण से प्रतिशोध लेने के लिए सेना लेकर अयोध्या पर आक्रमण कर देते हैं । लवण राम से एवं अंकुश लक्ष्मण से युद्ध करते हैं । युद्ध के अनिश्चित होने पर नारद आकर राम और लक्ष्मण को लवण तथा अंकुश के जन्म का रहस्य बतलाते हैं । इसपर राम अपने पुत्रों से मिल कर उनको पास ही रखते हैं । बाद में सीता की अग्नि-परीक्षा होती है ( पर्व १०२) । हनुमान् पुत्रों का पक्ष लेकर राम के विरुद्ध युद्ध करते हैं । कथासरित्सागर ( ५१) के अनुसार कुश और लव शिवलिङ्ग से खेल खेलते हैं । प्रायश्चित्त के लिए वाल्मीकि लव को कुबेर के सरोवर से स्वर्णकमल तथा वाटिका में मन्दार लाकर शिवपूजन का आदेश करते हैं । लक्ष्मण उस समय राम के पुरुषमेध के लिए शुभलक्षणसम्पन्न पुरुष खोज रहे थे । उन्होंने लव को बन्दी बना लिया । इसपर वाल्मीकि कुश को अयोध्या भेजते हैं । वाल्मीकि के दिव्य अस्त्रों से कुश ने लक्ष्मण और राम को पराजित किया । बाद में राम पुत्रों का परिचय प्राप्त करते हैं और सीता को बुला भेजते हैं । आनन्दरामायण ( जन्मकाण्ड ६।८ ) के अनुसार वाल्मीकि के आश्रम में अपने पुत्रों के साथ रहनेवाली सीता नौ दिन का संयोगकरण व्रत करना चाहती हैं । इसके लिए अयोध्या के सरोवर के स्वर्णकमलों की आवश्यकता पड़ती है । पञ्चवर्षीय लव छिप कर ले आता है । आठवें दिन चौदह पहरे- दारों को परास्त कर उनसे कहता है कि मैं वाल्मीकि के आदेशानुसार यह कमल ले जा रहा हूँ । नवें दिन १००० रक्षकों को पराजित करता है । सीता व्रत पूरा करती है । बाद में शिष्यों सहित वाल्मीकि को रामाश्वमेध का निमन्त्रण आता है । वाल्मीकि सीता तथा शिष्यों सहित आकर सरयूतीर पर ठहरते हैं । इतने में वहाँ यज्ञाश्व पहुँचता है । लव उसे बाँध लेता है तथा राम की समस्त सेना को पराजित करता है । लक्ष्मण लव को पराजित करते हैं । कुश आकर लक्ष्मण को पराजित करता है । फिर देर तक राम कुश का युद्ध होता है । युद्ध में किसी की जीत नहीं होती । राम ने कुश और लव के सम्बन्ध में वाल्मीकि से प्रश्न किया । महर्षि ने कहा—कल इसका रहस्य ज्ञात होगा । दूसरे दिन कुश और लव रामायण का गान कर अपना परिचय देते हैं । पश्चात् सीता को बुलाया जाता है । सतीत्व का साक्ष्य देने के पश्चात् वह राम तथा पुत्रों के साथ अयोध्या में रहने लगती है । भावार्थरामायण ( ७।६६,६७ ) में भी यही वृत्तान्त है । बुल्के की कालकल्पना भारतीय संस्कृतिविरोधी पाश्चात्यों की कल्पना पर ही आधारित है, अतः विश्वसनीय नहीं है । बृहत्कथा तो भवभूति से प्राचीन है ही । उत्तररामचरित अङ्क ५,६ में लव का पहले यज्ञाश्व की रक्षा करनेवाली राम की सेना तथा अन्त में लक्ष्मण-पुत्र चन्द्रकेतु से युद्ध होता है । राम पहुँच कर तथा दोनों का युद्ध रोक कर परिचय प्राप्त करते हैं । अन्त में सीता को ग्रहण करते हैं । रामाश्वमेध के अनुसार लव का भरतपुत्र पुष्कल से युद्ध होता है । जैमिनीयाश्वमेध ( अध्याय २९-३६ ) के अनुसार लव यज्ञाश्व को बाँधकर सैनिकों का वध कर शत्रुघ्न से पराजित होते हैं । कुश शत्रुघ्न को पराजित करते हैं । बाद में कुश और लव दोनों ही लक्ष्मण, हनुमान् तथा भरत पर विजय प्राप्त करते हैं एवं राम को आहत करते हैं । अन्त में वाल्मीकि राम की समस्त सेना को अमृत जल से पुनर्जीवित करते हैं ।
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६९५ पद्मपुराण (पातालखण्ड अ० ६०-६४) में राम, लक्ष्मण तथा भरत युद्ध में नहीं आते। सीता अपने सतीत्व के प्रभाव से राम-सेना को जीवित करती है। पौराणिक आख्यानों के आधार पर भी काव्य और नाटकों की कथाएँ समझनी चाहिये। अतः पौराणिक आख्यान सुतरां काव्य और नाटकों से अति प्राचीन हैं। रामकेर्ति के अनुसार सीतापुत्रों ने वाल्मीकि से धनुर्विद्या की शिक्षा पायी थी। किसी दिन अपने बाणों से उन्होंने एक विशाल वृक्ष को नष्ट कर दिया। जिससे अयोध्या में भूकम्प हुआ। ज्योतिषियों ने कहा यह एक महान् राजा की धनुर्विद्या का परिणाम है। उस राजा का पता लगाने के लिए एक अश्व छोड़ा गया। हनुमान्, भरत, और शत्रुघ्न ने उसका अनुसरण किया। सीतापुत्रों ने अश्व को बाँध लिया। हनुमान् को हराकर उनके हाथ बाँध दिये और उनके शरीर पर लिख दिया कि इसका स्वामी इसे खोलेगा। शत्रुघ्न आदि के असफल होने पर अयोध्या जाकर राम की शरण लेनी पड़ी। बाद में हनुमान् सीता के पुत्र को बन्दी बना कर अयोध्या ले जाते हैं। लक्ष्मण अपनी माता से एक मायामय अँगूठी पाकर अपने भाई को छुड़ाने अयोध्या गये। अयोध्या पहुँच कर जब लक्ष्मण ने छद्मवेशी रमा की सहायता से उस अँगूठी को राम के पास पहुँचा दिया। अँगूठी के प्रभाव से उसके बन्धन टूट गये। यहाँ राम और लक्ष्मण के बाणों ने पुष्पमाला बनकर अपने को राम के प्रति अर्पित किया। तब राम ने यह कहकर ब्रह्मास्त्र चलाया कि यदि ये पराये हैं तो ब्रह्मास्त्र इन्हें नष्ट कर दे। यदि ये सम्बन्धी हैं तो मिष्ठान्न के रूप में बदल जावे। ब्रह्मास्त्र मिष्ठान्न बन गया। इस प्रकार उनको सम्बन्धी जानकर तथा लक्ष्मण से सीतातयाग की वास्तविक कथा सुनकर राम ने सीता के पास जाकर क्षमा याचना की। परन्तु सीता ने अयोध्या लौटना स्वीकार नहीं किया, किन्तु बालकों को राम के पास भेज दिया। सेरीराम के अनुसार सीता के पुत्रों ने मृगया खेलते समय एक हरिण का वध किया जिसे राम ने पहले ही आहत किया था। लक्ष्मण उसका पीछा करते हुए बालकों के पास पहुँचे। हरिण को लेकर झगड़ा हुआ, बालक लक्ष्मण को बाँध कर कलि के पास पहुँचाते हैं। राम लक्ष्मण की खोज करते हुए महरीसि कलि के पास पहुँचे और पुत्रों का परिचय प्राप्त किया। ऐसी ही और भी कई प्रकार की कथाएँ प्रचलित हैं। जो कथा वाल्मीकिरामायण से जितनी दूर हुई उसमें उतनी ही विकृति आ गयी। बुल्के का ७५२ वें अनु० में यह कहना सर्वथा असत्य है कि आदिरामायण राम के अभिषेक तथा उनके ऐश्वर्यशाली राज्य के संक्षिप्त वर्णन पर समाप्त होता था। राम द्वारा रावण की पराजय तथा सीता की पुनःप्राप्ति राम-कथाओं का वर्ण्य विषय था। क्योंकि संक्षिप्त वर्णन का सविस्तर वर्णन एवं उत्तर की घटनाओं तथा पुत्रों का जन्म तथा अन्त में राम का परमधाम गमन आदि अत्यावश्यक विषयों को छोड़कर इतने बड़े और महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ की समाप्ति सम्भव नहीं थी। तथाकथित आदिरामायण सर्वथा अप्रामाणिक है, क्योंकि संसार में आजतक कहीं उसका नामनिशान तक नहीं है। गुणभद्र के उत्तरपुराण के अनुसार प्रतिनारायण रावण के मर जाने पर बलदेव जैन दीक्षा लेते हैं। लक्ष्मण की मृत्यु के बाद राम विरक्त होकर दीक्षा लेकर मोक्ष प्राप्त करते हैं। सीता भी आर्यका बन अच्युत स्वर्ग प्राप्त करती हैं। वस्तुतः ये सब चण्ड खाने की गप्पें है। क्योंकि जैनी केवल रामकथा की लोकप्रियता का लाभ उठाकर जैन- दीक्षा का प्रचारमात्र करते हैं। उनकी कथा का वस्तुस्थिति से कोई सम्बन्ध नहीं है। बुल्के उक्त कथाओं को सुखान्त कथा की संज्ञा देते हैं। पर यह भी चिन्त्य है, क्योंकि कल्पभेद से उत्तरकाण्ड की कथा में सुखान्त कथा का निर्वहण है ही। देशी और विदेशी अनेक कथाओं में राम तथा सीता दोनों पुत्रों के साथ अयोध्या में पुनः सुखपूर्वक निवास करते हैं। वाल्मीकिरामायण के उत्तरकाण्ड की कथा दुःखान्त है। लोकापवाद के कारण राम अपनी निर्दोष पत्नी को त्याग देते हैं। अश्वमेध के अवसर पर पुत्रों को देखकर सीता को बुला भेजते हैं। वाल्मीकि सीता के साथ सभा
६९६ रामायणमीमांसा विंश में पहुँच कर सीता के सतीत्व का साक्ष्य देते हैं। राम जनता को विश्वास दिलाने के उद्देश्य से सीता से अनुरोध करते हैं। सीता अपने सतीत्व का प्रमाण देती हुई कहती हैं—यदि मैं राघव से अन्य पुरुष का मन से भी चिन्तन नहीं करती हूँ तो माधवी देवी मुझे विवरस्थान प्रदान करे। "याऽहं राघवादन्यं मनसाऽपि न चिन्तये । तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्हति ॥" पृथ्वी एक दिव्य सिंहासन पर बैठी हुई भूमि से प्रकट होती है और सीता को अपने अङ्क में लेकर भूमि में पुनः प्रवेश करती है। राम विलाप करते हैं। पृथ्वी से सीता को लौटाने का अनुरोध करते हैं। अन्त में देवगणों के साथ ब्रह्मा आकर राम को उनके परम विष्णुरूप का स्मरण दिलाते हुए सान्त्वना देते हैं और परमधाम में सीता समागम की बात कहते हैं— “राम राम न सन्तापं कर्तुमर्हसि सुव्रत । स्मर त्वं पूर्व्वकं भावं स्मर त्वं जन्म वैष्णवम् ॥” ( वा० रा० ७।९७।१४ ) सीता का भूमि-प्रवेश उत्तरकाण्ड निर्वहण का प्रथम सोपान है। द्वितीय सोपान लक्ष्मणत्याग पर समाप्त होता है। सीता के अन्तर्धान होने के पश्चात् कौशल्या, सुमित्रा तथा कैकेयी का वैकुण्ठवास होता है। लक्ष्मण के पुत्रों की राज्य-व्यवस्था के लिए अनेक विजय-यात्राएँ होती हैं। लक्ष्मण-त्याग इस प्रकार वर्णित हैँ—काल तपस्वी के वेष में आकर एकान्त में ही बात करना चाहते हैं। राम से प्रतिज्ञा कराते हैं कि जो कोई हम दोनों को बात करते देखे व सुने वह राम द्वारा मारा जाय— “यः शृणोति निरीक्षेद् वा स वध्यो भविता तव ।” ( वा० रा० ७।९८।१३ ) राम लक्ष्मण को द्वार पर खड़े रहने का आदेश देते हैं, एकान्त पाकर काल राम को ब्रह्मा का सन्देश देते हैं कि रामावतार का समय समाप्त हो रहा है। इतने में दुर्वासा लक्ष्मण के पास पहुँच कर तुरन्त राम से मिलने का अनुरोध करते हैं। लक्ष्मण ने बड़ी नम्रता से कहा जो आज्ञा है, मैं पूर्ण करूँगा। राघव कार्यव्यग्र हैं, कुछ क्षण प्रतीक्षा कीजिये। मुनि ने क्रुद्ध होकर कहा, अभी जाकर राम से मेरा आना कहो अन्यथा तुम्हारे देश को, तुमको, राघव को, भरत को और तुम लोगों की सन्तानों को शाप दूँगा। लक्ष्मण-वंशनाश की अपेक्षा अपना ही मरण श्रेष्ठ समझ कर राम के पास अन्दर जाते हैं— “एकस्य मरणं मेऽस्तु माऽभूत् सर्वविनाशनम् ।” ( १०३।१२ ) ( १०५।९ ) बाद में राम अपनी प्रतिज्ञा के वशीभूत होकर लक्ष्मण का परित्याग करते हैं— “विसर्जये त्वां सौमित्रे मा भूद् धर्मविपर्ययः । त्यागो वधो वा विहितः साधूनां ह्युभयं समम् ॥” ( १०७।१३ ) इसपर लक्ष्मण सरयू के तट पर जाकर श्वासरोधकर समाधिस्थ हो गये। फिर सशरीर अपने दिव्य शेषरूप में प्रकट हो गये। इन्द्रादि देवता विष्णु का चतुर्थांश पाकर प्रसन्न होकर लक्ष्मण की पूजा करते हैं (सर्ग १०३ तथा १०६)। लक्ष्मण के वियोग के कारण दुःखी होकर राम ने भरत को राज्य सौंप कर वन जाने की इच्छा प्रकट की। किन्तु भरत ने तथा अयोध्या की प्रजा ने राम के साथ जाने की अनुमति ले ली। तब राम ने पुत्रों को कुशावती तथा श्रावस्ती में राजसिंहासन पर बैठा कर शत्रुघ्न को बुला भेजा। अयोध्या के दूतों से यह जान कर कि राम, भरत एवं प्रजा के साथ परम धाम जाने की तैयारियाँ कर रहे हैं। शत्रुघ्न ने अपने पुत्रों को राज्य देकर अयोध्या के लिए प्रस्थान किया। राम ने शत्रुघ्न को भी साथ चलने की अनुमति प्रदान कर दी। इतने
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६९७ में सुग्रीव, विभीषण तथा सभी वानर, ऋक्ष आदि आ पहुँचे और सभी राम के साथ जाने को उत्सुक थे। राम ने सब को अपने साथ जाने को कहा, किन्तु विभीषण, हनुमान्, जाम्बवान्, मयन्द और द्विविद को कलियुग के अन्त तक रहने का आदेश दिया। दूसरे दिन प्रातः राम सब के साथ सरयूतीर पहुँचे। ब्रह्मा ने प्रकट होकर राम से निवेदन किया कि आप अपने भाइयों सहित विष्णुरूप में प्रवेश करें। राम ब्रह्मा का अनुरोध स्वीकार कर साक्षात् विष्णुरूप में प्रकट हो गये। ब्रह्मा ने रामस्वरूप विष्णु के आज्ञानुसार सब के लिए सन्तानक या साकेत लोक प्राप्त कराया। सबने सरयू के जल का स्पर्श कर अनायास देहत्याग कर साकेत धाम को गमन किया। ब्रह्मा ने यह भी कहा कि पशु-पक्षी आदि जो प्राणी आपका स्मरण करते हुए प्राणत्याग करेंगे सब साकेत लोक में प्रवेश करेंगे। वह सन्तानकलोक ब्रह्मलोक के अत्यन्त अव्यवहित है। सुग्रीवादि जो विशिष्ट देवांश थे वे अपने-अपने अंशों में पहुँच गये। अन्त में स्थावर और जङ्गम सभी सरयू-जल का स्पर्श कर परम धाम को पहुँच गये। ऐसा ही कथानिर्वहण अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण, रघुवंश आदि में पाया जाता है। भागवतपुराण के अनुसार सीता अपने पुत्रों को वाल्मीकि मुनि के हाथ में सौंप कर राम का ध्यान करती हुई भूमि में प्रवेश करती है। राम यह समाचार सुनकर बहुत दुःखी हुए। अन्य कई कथाओं में सीता के भूमि-प्रवेश को भिन्न-भिन्न रूप दिया गया है। पउमचरियं के अनुसार भी सीता ने अग्नि-परीक्षा से अपने सतीत्व को प्रमाणित किया था। जब राम ने सीता से अयोध्या में रहने का अनुरोध किया तो उन्होंने बाल कटाकर जैन दीक्षा ले ली। क्षुद्र स्वार्थी जैन लोग दीक्षा देने की धुन में सब कथाओं को मनमानी ढंग से विकृत करते हैं। पर्व १०२ में कहा गया है कि रत्नचूल, मणिचूल नामक देवताओं ने राम और लक्ष्मण के प्रेम की परीक्षा लेने के उद्देश्य से लक्ष्मण को राम की मृत्यु का मिथ्या समाचार सुना दिया, जिससे तत्काल लक्ष्मण का देहावसान हो गया। राम के पुत्र लवण और अंकुश लक्ष्मण की मृत्यु से विरक्त होकर तप करने चले गये। राम लक्ष्मण की अन्त्येष्टि करके लवण-पुत्र अङ्करुह को राज्य सौंप कर तपस्वी के रूप में भ्रमण करने लगे। उनके अनुसार राम सब प्रलोभनों को ठुकराकर कैवल्य ज्ञान प्राप्त कर १७००० वर्ष जीवित रह कर निर्वाण प्राप्त करते हैं। जिनके नाम से संसार को निर्वाण मिलता है, निरीश्वरवादी जैन उन राम के लिए तपस्या द्वारा निर्वाणप्राप्ति की बात करते हैं। इनके द्वारा कल्पित नाम भी इनकी बातों को मिथ्या सिद्ध करते हैं, क्योंकि आज तक ये नाम व्यवहार में आये ही नहीं। ब्रह्मपुराण (अध्याय १५४) के अनुसार अङ्गद और हनुमान् राम के अश्वमेध के अवसर पर अयोध्या पहुँच कर सीता-त्याग का वृत्तान्त सुनकर गोदावरी की ओर प्रस्थान करते हैं। इसपर राम सीता का स्मरण करते हुए अयोध्यावासियों के साथ गोदावरी के तट पर तपस्या करने जाते हैं। बुल्के कहते हैं कि यह पउमचरियं का प्रभाव है। परन्तु यह असङ्गत है, क्योंकि वैदिक पुराण जैन कथाओं से अत्यन्त प्राचीन हैं, यह कहा जा चुका है। ब्रह्मपुराण भी व्यासदेव की ही उक्ति है। सुखान्त कथा उत्तररामचरित के अनुसार राम अपने पुत्रों तथा सीता के साथ अयोध्या लौट आते हैं। क्षेमेन्द्रकृत बृहत्कथामञ्जरी के अनुसार राम वाल्मीकि द्वारा उक्त अपने पुत्र कुश और लव को एवं विशुद्धा दयिता पत्नी को अयोध्या लाये-- "पुत्रौ कुशलवाभिख्यो उक्तौ वाल्मीकिना स्वयम् । तौ प्राप्य रामो दयितां विशुद्धा मानिनाय ताम् ॥” कुन्दमाला के अनुसार भी पृथिवी स्वयं प्रकट हो सीता के सतीत्व का साक्ष्य देकर लुप्त हो जाती है। तत्पश्चात् राम सीता तथा पुत्रों के साथ अयोध्या लौटते हैं। आनन्दरामायण के अनुसार राम धनुष पर बाण रख
६९८ रामायणमीमांसा विंश कर सृष्टि का संहार करना आरम्भ करते हैं तब पृथिवी भयभीत होकर सीता को लोटा देती है। पूर्णकाण्ड के अनुसार सोमवंशी राजाओं के आक्रमण तथा सन्धि के पश्चात् हस्तिनापुर में ब्रह्मा ने राम से वैकुण्ठ पधारने का आग्रह किया। राम ने स्वीकार किया। राम ने एक विशाल सेना के साथ कुश को राजधानी में भेज दिया। मन्थरा तथा धोबी को स्वर्ग जाने की अनुमति नहीं मिली। विभीषण, जाम्बवान् तथा हनुमान् को पृथिवी पर रहने का आदेश मिला। राम विष्णु के रूप में व्यक्त हो गये, सीता लक्ष्मी, लक्ष्मण शेष भगवान् तथा भरत और शत्रुघ्न शङ्ख और चक्र के रूप में परिणत हो गये। वानर देवताओं के शरीर में और अयोध्यावासी अपना शरीर त्यागकर दिव्य देह-धारियों के रूप में सुशोभित होने लगे। कथासरित्सागर (१।१।११२), जैमिनीयाश्वमेध (अ० ३६), पद्मपुराण (पातालखण्ड अ० ६७), रामचन्द्रिका (प्रकाश २६), रामलिङ्गामृत आदि के अनुसार कुश और लव युद्ध के बाद सीता राम से मिल कर उनके साथ अयोध्या लौट जाती हैं। तिब्बतीरामायण के अनुसार हनुमान् अन्य वानरों के साथ अयोध्या आने का निमन्त्रण पाकर राम से मिलते हैं। सीता त्याग का वृत्तान्त सुनकर वह वर्णन करते हैं कि किस परिस्थिति में उन्होंने सीता को लङ्का में देखा था। हनुमान् का प्रमाण स्वीकार करके राम सीता को बुला भेजते हैं। जिसपर सीता पुत्रों के साथ लौटती हैं। सेरीराम में सीता की शपथ क्रिया के फलस्वरूप किकवी देवी तथा सब जानवरों को १२ वर्ष तक गूँगा देखकर राम को विश्वास हुआ कि सीता निर्दोष है। अतः वे सीता को अयोध्या लाने के लिए महरीसी कलि के यहाँ चले आये। उन्होंने राम का अभिप्राय जानकर राम और सीता के १४ दिवसीय विवाहोत्सव का आयोजन किया। जिसके अन्त में सीता अपने पुत्रों के साथ राम की राजधानी लौटीं। वहाँ किकवी देवी ने क्षमा याचना की। उससे उसका तथा सब जानवरों का गूँगापन दूर हो गया। पुत्रों के विवाह के बाद राम किसी तपस्वी के पास अयोध्या में तपस्वी जीवन बिताने लगे। चालीस वर्ष तक तपश्चर्या कर के राम परम धाम गये। सेरतकाण्ड में भी सीता-त्याग के बाद सीता और राम का सम्मिलन वर्णित है। लव को उत्तराधिकारी बना कर राम ने सीता, लक्ष्मण और विभीषण के साथ तपोमय जीवन बिताया। अन्त में वानर देवभाव में तथा सीता और राम लक्ष्मी तथा विष्णु के रूप में प्रकट हो गये। रघुनाथ महन्त के अद्भुत रामायण के अनुसार पातालप्रवेश के बाद सीता को अपने पुत्रों को देखने की इच्छा होती है। उन्होंने वासुकि को उन्हें लाने भेजा। वासुकि ब्राह्मण के वेष में बालकों को अस्त्र- विद्या सिखाने का बहाना बना कर उनको सीता के पास ले गये। राम ने उन्हें वापस लाने के लिए हनुमान् को भेजा। हनुमान् स्त्रीरूप धारण कर पाताल में प्रविष्ट होकर रत्नमञ्जरी नामक सीता की सखी कहकर सीता के पास जाने लगे। सीता ने नागों को आदेश दिया कि इस स्त्री को पकड़ लाओ। तब हनुमान् वानररूप से सबको परास्त करते हैं। तदनन्तर उन्होंने सीता से मिलकर लव और कुश को राम के पास ले जाने का निवेदन किया। सीता सहमत हुईं। वे स्वयं सिंहासन पर विराजमान होकर राम के समक्ष भूमि से प्रकट हुईं। राम के हाथों लव और कुश का समर्पण कर सीता यह प्रतिज्ञा कर अन्तर्धान होती है कि प्रतिदिन नित्य क्रिया के पश्चात् आपकी सेवा में उपस्थित हुआ करूँगी। रामकेति एवं रामकियेन के अनुसार लव-कुश-युद्ध के बाद सीता ने दोनों पुत्रों को सौंप दिया। अयोध्या लौटाने का राम का अनुरोध स्वीकार नहीं किया। जब राम ने अपनी मृत्यु का समाचार भिजवाया तब सीता लौट कर राम के शरीर के सामने विलाप करने लगी। तब राम परदे की ओट से प्रकट होकर सान्त्वना देने लगे। तब वे क्रुद्ध होकर नागराज विषण की शरण लेकर पृथ्वी में प्रवेश कर गयीं। हनुमान् ने भी पाताल जाकर सीता से लौटने का अनुरोध किया। सीता ने अस्वीकार कर दिया। अन्त में राम के राक्षस-वध कार्य से सन्तुष्ट हो इन्द्र ने देवताओं की सभा में ईश्वर से राम के विरह का वर्णन किया। ईश्वर ने राम और सीता दोनों को कैलास बुला कर समझाया। राम ने सीता से क्षमा माँगी। अन्त में सीता ईश्वर का अनुरोध मान कर अपने पति के साथ अयोध्या लौट गयीं। इस तरह अनेक कथाएँ बुल्के ने उद्धृत कर रामकथा में अराजकता फैलाने का प्रयत्न किया
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६९९ हैं। उनके मतभेद का अनुचित लाभ उठाकर वे सबको अप्रामाणिक एवं विकास या प्रक्षेप सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। वस्तुतः वेद, उपनिषद्, वाल्मीकिरामायण, महाभारत और पुराणों के अनुसार ही रामचरित का निर्धारण किया जा सकता है। अन्य कथाओं को उनके अनुकूल ही लगाना चाहिये। राम सीता के सम्बन्ध में सदा ही शङ्कारहित थे। लोकापवाद निवारण एवं लोकसंग्रह की दृष्टि से ही राम ने अग्निपरीक्षा के पहले ही शङ्का की थी। अग्नि-परीक्षा के बाद तो शङ्का का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था, किन्तु स्वयं राम के द्वारा अग्नि- परीक्षा तथा सीताशुद्धि का प्रचार इतना महत्त्वपूर्ण नहीं समझा जाता, जितना एक कन्द-मूल-फलाशी, वल्कलवसनधारी तपोघन महर्षि के द्वारा उचित समझा गया। इसी लिए लोकापवाद के कारण सीता को वन में भेजना ही उचित समझा। वाल्मीकिरामायण, अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण, रघुवंश, उत्तर- रामचरित आदि में स्पष्ट देखा गया है कि राम का सीता में शुद्धप्रेम ज्यों का त्यों था, और यज्ञों में सीता की स्वर्णप्रतिमा ही यजमानपत्नी के रूप में विराजमान थी। सीता भी राम की इस स्थिति को जानती थी। रघुवंश के अनुसार उन्होंने यही कहा था कि प्राणीमात्र के प्रति कल्याण बुद्धि रखनेवाले आपका मुझपर कामचार नहीं है। यह दुःख वज्रपात मेरे ही कर्मों का फल हो सकता है— "कल्याणबुद्धेरथवा तवायं न कामचारो मयि शङ्कनीयः । ममेव जन्मान्तरपातकानां विपाकविस्फूर्जथुरप्रसह्यः ॥" आगे वह कहती हैं— "साऽहं तपः सूर्यनिविष्टदृष्टिरूर्ध्वं प्रसूतेश्चरितुं यतिष्ये । भूयो यथा ने जननान्तरेऽपि त्वमेव भर्ता न च विप्रयोगः ॥" मैं प्रसव के अनन्तर सूर्याभिमुख रहकर इसलिए तपश्चर्या करूंगी कि जिससे जन्मान्तर में भी आप ही मेरे भर्ता हों और पुनः कभी वियोग न हो। इससे विरुद्ध कल्पनाएँ देश और काल की परिस्थिति के प्रभाव से विकृति- स्वरूप ही समझनी चाहिये । उपसंहार उपसंहार में बुल्के ने पूर्व की वस्तुओं को दुहराया भर है। वे आदि कवि महर्षि वाल्मीकि की रचना का आधार उन प्रत्यक्ष अनुभवों एवं आर्ष विज्ञानों, जो वाल्मीकिरामायण में वर्णित हैं, को न मानकर रामकथाविषयक गाथाओं तथा आख्यानकाव्यों को मानते हैं, जो कि उपस्थित का परित्याग एवं अनुपस्थित की कल्पना ही है। वे कहते हैं कि "जिस दिन प्राचीन गाथासाहित्य को वाल्मीकि ने एक कथासूत्र में ग्रथित कर आदिरामायण की सृष्टि की थी, उसी दिन से रामकथा की दिग्विजय प्रारम्भ हुई थी और वह काल भी ईसा की कुछ शती पूर्व का ही है।" परन्तु वह सत्य का अपलाप ही है। वाल्मीकिरामायण से ही विदित है कि राम के राज्यकाल में ही ब्रह्मा की प्रेरणा से आर्ष ज्ञान प्राप्त कर महर्षि ने सीताचरित्र या रामायण का निर्माण किया था। सीता के पुत्र कुश एवं लव को गानविद्योपजीवी कहना भी वाल्मीकिरामायण बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड के सर्वथा विरुद्ध है। महाभारत रामोपाख्यान, हरिवंश आदि सभी प्रचलित रामायण पर ही निर्भर हैं। उनका आधार बुल्के की तथाकथित आदिरामायण प्रमाणशून्य ही है। राम का अवतार भी भावना नहीं प्रमाण- सिद्ध वस्तुस्थिति है। बौद्ध और जैन साहित्य में जैनी साधक या बोधिसत्त्व बनकर स्थान प्राप्त करना राम के लिए कोई महत्त्व की बात नहीं है। किन्तु जैनों और बौद्धों ने रामकथा की लोकप्रियता का अनुचित लाभ उठाकर कथा को विकृत ही बनाया है। वे कहते हैं कि "जैनियों के अनुसार राम, लक्ष्मण तथा रावण जैनधर्मावलम्बी ही नहीं, जैनियों ने उन्हें अपने महापुरुषों में स्थान दिया है। राम ब्राह्मण-
७०० रामायणमीमांसा विंश धर्म में विष्णु के अवतार, बौद्धों में बोधिसत्त्व, तथा जैनधर्म में आठवें बलदेव माने गये हैं । संस्कृतसाहित्य, संस्कृत-ललितसाहित्य की प्रत्येक शाखा में, भारतीय भाषाओं एवं निकटवर्ती देशों के साहित्यों में राम- कथा एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्तकर सकी। इस विस्तृत रामकथासाहित्य से रामकथा की व्यापकता और लोकप्रियता का अनुमान किया जा सकता है।" किन्तु राम के स्वाभाविक अनन्त गुणों एवं महिमा का यह अनिवार्य प्रभाव था। जैसे विरोधी भी किसी न किसी रूप में ईश्वर से प्रभावित होते हैं, उसी तरह राम के आदर्श एवं चरित्रों के विरोधी लोग भी रामकथा से असंस्पृष्ट नहीं रह सके । अनु० ७६० वें में वे कहते हैं कि "संस्कृत-धार्मिकसाहित्य में रामकथा का व्यापक प्रभाव कम था, क्योंकि एक तो वैदिक साहित्य के निर्माणकाल में रामकथा प्रचलित नहीं थी, दूसरे रामभक्ति की उत्पत्ति से पूर्व जनसाधारण के धार्मिक जीवन में रामकथा के लिए व्यापक स्थान नहीं था। वैदिक साहित्य में रामकथा का नितान्त अभाव था । हरिवंश तथा प्राचीनतम पुराणों में अवतारों के साथ राम का नाम भी लिया गया है। इनकी संक्षिप्त कथा आदिरामायण पर समाश्रित थी । बाद के महापुराणों तथा उपपुराणों में रामकथाविषयक सामग्री बढ़ने लगी । विशेष कर स्कन्दपुराण, पद्मपुराण तथा महाभागवत देवीपुराणों में रामभक्ति पल्लवित होने के पश्चात् असंख्य साम्प्रदायिक रामायणसंहिताएँ प्रचलित हुईं, जिनमें अध्यात्मरामायण, अद्भुतरामायण, आनन्दरामायण, तत्त्वसंग्रह आदि उल्लेख्य हैं।" इससे स्पष्ट ही है कि बुल्के अपनी काट-छांट से यह सिद्ध करना चाहते हैं कि रामायण ई० दो तीन शताब्दी पूर्व लिखी गयी । उसमें भी राम को विष्णु या ब्रह्म नहीं माना गया था। वेदों के समय रामकथा नहीं थी। रामभक्ति एवं रामकथा अर्वाचीन ही हैं। रामभक्ति के प्रभाव से ही विविध रामायणों में परिवर्तन, परिवर्धन, विकास और प्रक्षेप हुए हैं। इस तरह वे छलछद्म से रामकथा के प्रशंसक बनकर भी वस्तुतः उसका एवं उसके नायक राम का अपकर्ष ही वर्णन करते हैं। पर वस्तुस्थिति ठीक इसके विपरीत है। वेद तथा उपनिषदें अनादि हैं। उनके उपबृंहणभूत रामायण, महाभारत, पुराण भी अनादि हैं। उनका समय-समय पर ऋषियों द्वारा आविर्भावमात्र होता है। उनके अनुसार राम अनन्त ब्रह्माण्डों के नायक परब्रह्म हैं। उनकी भक्ति अनादि है। वैदिक साहित्य में भी रामकथा पर्याप्तमात्रा में है ही। रामायण उसी का उपबृंहणमात्र है। यह सब मेरे लिखे तत्तत् प्रकरणों से सिद्ध है। वे रघुवंश, रावणवध, भट्टिकाव्य, महावीरचरित, जानकीहरण, कुन्दमाला, अनर्घराघव, बालरामायण, महानाटक आदि तथा रामसम्बन्धी श्लेषकाव्य, विलोमकाव्य, चित्रकाव्य तथा शृंगारिक खण्डकाव्यों से संस्कृतसाहित्य में राम- कथा का विकास मानते हैं । आधुनिक भारतीय भाषाओं के साहित्य में भी रामकथा की व्यापकता अद्वितीय है। किन्तु इन सब भाषाओं का सर्वप्रथम महाकाव्य प्रायः कोई रामायण ही है तथा बाद की बहुत सी रचनाओं की कथावस्तु भी रामकथा से सम्बन्ध रखती है। इसके अतिरिक्त इन सब भाषाओं का सबसे लोकप्रिय काव्यग्रन्थ प्रायः कोई रामायण ही है। उनमें तमिलरामायण, द्विपदरामायण, तोरवेरामायण, असमियारामायण, कृत्तिवासरामायण, रामचरितमानस, बलरामदासरामायण, भावार्थरामायण आदि काव्य हैं। परन्तु बुल्के उनके प्रतिपाद्य सिद्धान्तों को महत्त्व नहीं देते। उन सिद्धान्तों एवं प्रतिपाद्य अंशों को भक्तभावना का विलास एवं विकासमात्र मानकर सन्तोष कर लेते हैं। वे अपने को तुलसीदास का विशेष भक्त कहते हैं, किन्तु तुलसी के परब्रह्म राम को वे उनकी भावनामात्र मानते हैं। वे भारतीय साहित्य में रामकथा की व्यापकता की अपेक्षा विदेश में उसको लोकप्रियता को आश्चर्यजनक मानते हैं। उनमें बौद्ध अनामकं जातकं, दशरथकथानं और उनके चीनी भाषानुवाद, तिब्बती, खोतानी आदि रामायण भी हैं। हिन्दोनेशिया की सेरीराम, सेरतकाण्ड, रामकेति, रामकियेन आदि प्रमुख हैं। बुल्के यह भी मानते हैं कि रामकथा की इस व्यापकता एवं लोकप्रियता का श्रेय वाल्मीकिकृत रामायण को ही है। विश्वसाहित्य के इतिहास में शायद ही किसी ऐसे कवि का प्रादुर्भाव हुआ हो जिसने भारत के आदि कवि के समान इतने व्यापक रूप
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ७०१ से परवर्ती साहित्य को प्रभावित किया हो । बुल्के का यह कथन तभी महत्त्वपूर्ण होता यदि वे वाल्मीकिरामायण के भारत एवं भारतीय टीकाकारों द्वारा स्वीकृत रूप को मानते और तदनुसार ही राम की नररूपता के साथ नारायण- रूपता भी समझ पाते । अतः पाश्चात्य ईसाई कूटनीतिज्ञों की प्रशंसा निस्सार तथा अविश्वसनीय ही होती है। जैसे कि मैक्समूलर ने एक जगह वेदों को मानव जाति की सर्वप्रथम भाषा कहकर प्रशंसा की है। अन्यत्र यह भी कह दिया है कि आज हम जिस परिस्थिति में रह रहे हैं उसमें वेदमन्त्र जैसे ऊलजलूल वस्तुओं को मँडराते रहने का कोई अधिकार नहीं है। वे कहते कि प्रस्तुत सिंहावलोकन सामग्री से स्पष्ट है कि रामकथा न केवल भारतीय वरन् एशियाई संस्कृति का महत्त्वपूर्ण तत्त्व बन गयी है। वस्तुतः तोड़-मरोड़ एवं विविध विकृतियाँ रामकथा में अगर न लायी गयी होतीं तो वह सम्पूर्ण विश्व एवं मानवता की संस्कृति का सर्वस्व होता। अब भी अविकृत वाल्मीकिरामायण महाकाव्य सम्पूर्ण संसार के सन्मुख सर्वाङ्गीण सर्वतोमुखी, सर्वतोभद्र अभ्युदय एवं निःश्रेयस का मार्ग और आदर्श उपस्थापित करता है। ७६५ वें अनु० में विभिन्न रामकथाओं की मौलिक एकता की चर्चा करते हुए वे डा० वेबर, डा० याकोबी, दिनेशचन्द्र आदि के मतों की आंशिक समालोचना भी करते हैं। बेचारे वेबर तो फिर भी सीताहरण, रावण आदि का मूल रूप वैदिक साहित्य में ही मानते हैं, परन्तु बुल्के वैसा नहीं मानते हैं। बुल्के यह भी कहते हैं कि "उनकी दृष्टि में दूसरे भाग की घटनाओं का मूल रूप वैदिक साहित्य में सुरक्षित है, इसके लिए कोई प्रमाण नहीं दिया गया। इस भाग की प्रधान कथावस्तु "स्त्रीहरण और उसके लिए युद्ध" असाधारणतया अलौकिक नहीं कही जा सकती। अतः राम के निर्वासन की भाँति सीताहरण तथा रावण-वध अर्थात् रामकथा की समस्त आधिकारिक कथावस्तु का ऐतिहासिक आधार मानना अधिक स्वाभाविक प्रतीत होता है। अतः रामकथा के दो अथवा तीन स्वतन्त्र भागों की कल्पना का कहीं भी समीचीन आधार नहीं मिलता, अतः रामकथाविषयक आख्यानकाव्य एक ही मूल स्रोत रह जाता है। अर्थात् एक ऐतिहासिक घटनासम्बन्धी प्राचीन आख्यानकाव्य के आधार पर वाल्मीकि ने रामायण की रचना की।" परन्तु समुद्र पार के रहनेवाले तथा भारतीय परम्परा से सर्वथा अनभिज्ञ बुल्के को जानना चाहिये कि उनकी इस कल्पना से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण स्वयं रामायण के अविभाज्य अङ्ग बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड हैं, जिनमें रामायण का मूलस्रोत वेद, उपनिषद् तथा ब्रह्मा का वरदान, महर्षि वाल्मीकि की समाधिजा ऋतम्भरा प्रज्ञा तथा आर्षज्ञान द्वारा सम्पूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं का प्रत्यक्ष दर्शन रामायण का मूल स्रोत है। वेद का उपबृंहण करने के लिए ही महर्षि ने अपने शिष्य सीतापुत्रों को वाल्मीकिरामायण महाकाव्य पढ़ाया था। पुराणों द्वारा भी इसी की पुष्टि होती है। पुराण तो स्पष्ट ही कहते हैं-वेदवेद्य परमात्मा जब दशरथनन्दन राम के रूप में प्रकट हुए तब साक्षात् वेद भी रामायण के रूप में महर्षि प्राचेतस के मुख से अवतीर्ण हुए- 'वेदवेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे । वेदः प्राचेतसादासीत् साक्षाद्रामायणात्मना ॥” लौकिक घटनाओं द्वारा भी अलौकिक तत्त्व का सम्बन्ध रहता है। लौकिक वाक्, त्वक् और चक्षु द्वारा भी सात्त्विकी, राजसी, वैदिकी तथा लौकिकी प्रवृत्तियों के संघर्ष से भी देवासुर-संघर्ष परिलक्षित होता है। यह छान्दोग्य तथा बृहदारण्यक उपनिषदों की प्राणविद्या से स्पष्ट है। लौकिक भोजन में भी प्राणाग्निहोत्र का विधान है। उसी तरह राम और रावण एवं कौरव और पाण्डव संघर्ष द्वारा देवासुर-संग्राम बोधित होता है, पर वह गौणरूप से ही। उस स्थिति में कृषि की अधिष्ठात्री सीता तथा पर्जन्य एवं इन्द्र के अधिष्ठाता देवता राम एवं वृत्र का प्रतिनिधि रावण सरलता से समझा जा सकता है। वृत्र या रावण द्वारा परिम्लान कृषिदेवता सीता का संत्राण इन्द्र राम द्वारा होना स्वाभाविक है। आन्तर देवासुर-संघर्ष ही कभी बाह्य राम-रावण के संघर्ष तथा कौरव-पाण्डव के संघर्ष का रूप धारण