रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 776, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसिंहावलोकन ६९९ हैं। उनके मतभेद का अनुचित लाभ उठाकर वे सबको अप्रामाणिक एवं विकास या प्रक्षेप सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। वस्तुतः वेद, उपनिषद्, वाल्मीकिरामायण, महाभारत और पुराणों के अनुसार ही रामचरित का निर्धारण किया जा सकता है। अन्य कथाओं को उनके अनुकूल ही लगाना चाहिये। राम सीता के सम्बन्ध में सदा ही शङ्कारहित थे। लोकापवाद निवारण एवं लोकसंग्रह की दृष्टि से ही राम ने अग्निपरीक्षा के पहले ही शङ्का की थी। अग्नि-परीक्षा के बाद तो शङ्का का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था, किन्तु स्वयं राम के द्वारा अग्नि- परीक्षा तथा सीताशुद्धि का प्रचार इतना महत्त्वपूर्ण नहीं समझा जाता, जितना एक कन्द-मूल-फलाशी, वल्कलवसनधारी तपोघन महर्षि के द्वारा उचित समझा गया। इसी लिए लोकापवाद के कारण सीता को वन में भेजना ही उचित समझा। वाल्मीकिरामायण, अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण, रघुवंश, उत्तर- रामचरित आदि में स्पष्ट देखा गया है कि राम का सीता में शुद्धप्रेम ज्यों का त्यों था, और यज्ञों में सीता की स्वर्णप्रतिमा ही यजमानपत्नी के रूप में विराजमान थी। सीता भी राम की इस स्थिति को जानती थी। रघुवंश के अनुसार उन्होंने यही कहा था कि प्राणीमात्र के प्रति कल्याण बुद्धि रखनेवाले आपका मुझपर कामचार नहीं है। यह दुःख वज्रपात मेरे ही कर्मों का फल हो सकता है— "कल्याणबुद्धेरथवा तवायं न कामचारो मयि शङ्कनीयः । ममेव जन्मान्तरपातकानां विपाकविस्फूर्जथुरप्रसह्यः ॥" आगे वह कहती हैं— "साऽहं तपः सूर्यनिविष्टदृष्टिरूर्ध्वं प्रसूतेश्चरितुं यतिष्ये । भूयो यथा ने जननान्तरेऽपि त्वमेव भर्ता न च विप्रयोगः ॥" मैं प्रसव के अनन्तर सूर्याभिमुख रहकर इसलिए तपश्चर्या करूंगी कि जिससे जन्मान्तर में भी आप ही मेरे भर्ता हों और पुनः कभी वियोग न हो। इससे विरुद्ध कल्पनाएँ देश और काल की परिस्थिति के प्रभाव से विकृति- स्वरूप ही समझनी चाहिये । उपसंहार उपसंहार में बुल्के ने पूर्व की वस्तुओं को दुहराया भर है। वे आदि कवि महर्षि वाल्मीकि की रचना का आधार उन प्रत्यक्ष अनुभवों एवं आर्ष विज्ञानों, जो वाल्मीकिरामायण में वर्णित हैं, को न मानकर रामकथाविषयक गाथाओं तथा आख्यानकाव्यों को मानते हैं, जो कि उपस्थित का परित्याग एवं अनुपस्थित की कल्पना ही है। वे कहते हैं कि "जिस दिन प्राचीन गाथासाहित्य को वाल्मीकि ने एक कथासूत्र में ग्रथित कर आदिरामायण की सृष्टि की थी, उसी दिन से रामकथा की दिग्विजय प्रारम्भ हुई थी और वह काल भी ईसा की कुछ शती पूर्व का ही है।" परन्तु वह सत्य का अपलाप ही है। वाल्मीकिरामायण से ही विदित है कि राम के राज्यकाल में ही ब्रह्मा की प्रेरणा से आर्ष ज्ञान प्राप्त कर महर्षि ने सीताचरित्र या रामायण का निर्माण किया था। सीता के पुत्र कुश एवं लव को गानविद्योपजीवी कहना भी वाल्मीकिरामायण बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड के सर्वथा विरुद्ध है। महाभारत रामोपाख्यान, हरिवंश आदि सभी प्रचलित रामायण पर ही निर्भर हैं। उनका आधार बुल्के की तथाकथित आदिरामायण प्रमाणशून्य ही है। राम का अवतार भी भावना नहीं प्रमाण- सिद्ध वस्तुस्थिति है। बौद्ध और जैन साहित्य में जैनी साधक या बोधिसत्त्व बनकर स्थान प्राप्त करना राम के लिए कोई महत्त्व की बात नहीं है। किन्तु जैनों और बौद्धों ने रामकथा की लोकप्रियता का अनुचित लाभ उठाकर कथा को विकृत ही बनाया है। वे कहते हैं कि "जैनियों के अनुसार राम, लक्ष्मण तथा रावण जैनधर्मावलम्बी ही नहीं, जैनियों ने उन्हें अपने महापुरुषों में स्थान दिया है। राम ब्राह्मण-