भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 777

७०० रामायणमीमांसा विंश धर्म में विष्णु के अवतार, बौद्धों में बोधिसत्त्व, तथा जैनधर्म में आठवें बलदेव माने गये हैं । संस्कृतसाहित्य, संस्कृत-ललितसाहित्य की प्रत्येक शाखा में, भारतीय भाषाओं एवं निकटवर्ती देशों के साहित्यों में राम- कथा एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्तकर सकी। इस विस्तृत रामकथासाहित्य से रामकथा की व्यापकता और लोकप्रियता का अनुमान किया जा सकता है।" किन्तु राम के स्वाभाविक अनन्त गुणों एवं महिमा का यह अनिवार्य प्रभाव था। जैसे विरोधी भी किसी न किसी रूप में ईश्वर से प्रभावित होते हैं, उसी तरह राम के आदर्श एवं चरित्रों के विरोधी लोग भी रामकथा से असंस्पृष्ट नहीं रह सके । अनु० ७६० वें में वे कहते हैं कि "संस्कृत-धार्मिकसाहित्य में रामकथा का व्यापक प्रभाव कम था, क्योंकि एक तो वैदिक साहित्य के निर्माणकाल में रामकथा प्रचलित नहीं थी, दूसरे रामभक्ति की उत्पत्ति से पूर्व जनसाधारण के धार्मिक जीवन में रामकथा के लिए व्यापक स्थान नहीं था। वैदिक साहित्य में रामकथा का नितान्त अभाव था । हरिवंश तथा प्राचीनतम पुराणों में अवतारों के साथ राम का नाम भी लिया गया है। इनकी संक्षिप्त कथा आदिरामायण पर समाश्रित थी । बाद के महापुराणों तथा उपपुराणों में रामकथाविषयक सामग्री बढ़ने लगी । विशेष कर स्कन्दपुराण, पद्मपुराण तथा महाभागवत देवीपुराणों में रामभक्ति पल्लवित होने के पश्चात् असंख्य साम्प्रदायिक रामायणसंहिताएँ प्रचलित हुईं, जिनमें अध्यात्मरामायण, अद्भुतरामायण, आनन्दरामायण, तत्त्वसंग्रह आदि उल्लेख्य हैं।" इससे स्पष्ट ही है कि बुल्के अपनी काट-छांट से यह सिद्ध करना चाहते हैं कि रामायण ई० दो तीन शताब्दी पूर्व लिखी गयी । उसमें भी राम को विष्णु या ब्रह्म नहीं माना गया था। वेदों के समय रामकथा नहीं थी। रामभक्ति एवं रामकथा अर्वाचीन ही हैं। रामभक्ति के प्रभाव से ही विविध रामायणों में परिवर्तन, परिवर्धन, विकास और प्रक्षेप हुए हैं। इस तरह वे छलछद्म से रामकथा के प्रशंसक बनकर भी वस्तुतः उसका एवं उसके नायक राम का अपकर्ष ही वर्णन करते हैं। पर वस्तुस्थिति ठीक इसके विपरीत है। वेद तथा उपनिषदें अनादि हैं। उनके उपबृंहणभूत रामायण, महाभारत, पुराण भी अनादि हैं। उनका समय-समय पर ऋषियों द्वारा आविर्भावमात्र होता है। उनके अनुसार राम अनन्त ब्रह्माण्डों के नायक परब्रह्म हैं। उनकी भक्ति अनादि है। वैदिक साहित्य में भी रामकथा पर्याप्तमात्रा में है ही। रामायण उसी का उपबृंहणमात्र है। यह सब मेरे लिखे तत्तत् प्रकरणों से सिद्ध है। वे रघुवंश, रावणवध, भट्टिकाव्य, महावीरचरित, जानकीहरण, कुन्दमाला, अनर्घराघव, बालरामायण, महानाटक आदि तथा रामसम्बन्धी श्लेषकाव्य, विलोमकाव्य, चित्रकाव्य तथा शृंगारिक खण्डकाव्यों से संस्कृतसाहित्य में राम- कथा का विकास मानते हैं । आधुनिक भारतीय भाषाओं के साहित्य में भी रामकथा की व्यापकता अद्वितीय है। किन्तु इन सब भाषाओं का सर्वप्रथम महाकाव्य प्रायः कोई रामायण ही है तथा बाद की बहुत सी रचनाओं की कथावस्तु भी रामकथा से सम्बन्ध रखती है। इसके अतिरिक्त इन सब भाषाओं का सबसे लोकप्रिय काव्यग्रन्थ प्रायः कोई रामायण ही है। उनमें तमिलरामायण, द्विपदरामायण, तोरवेरामायण, असमियारामायण, कृत्तिवासरामायण, रामचरितमानस, बलरामदासरामायण, भावार्थरामायण आदि काव्य हैं। परन्तु बुल्के उनके प्रतिपाद्य सिद्धान्तों को महत्त्व नहीं देते। उन सिद्धान्तों एवं प्रतिपाद्य अंशों को भक्तभावना का विलास एवं विकासमात्र मानकर सन्तोष कर लेते हैं। वे अपने को तुलसीदास का विशेष भक्त कहते हैं, किन्तु तुलसी के परब्रह्म राम को वे उनकी भावनामात्र मानते हैं। वे भारतीय साहित्य में रामकथा की व्यापकता की अपेक्षा विदेश में उसको लोकप्रियता को आश्चर्यजनक मानते हैं। उनमें बौद्ध अनामकं जातकं, दशरथकथानं और उनके चीनी भाषानुवाद, तिब्बती, खोतानी आदि रामायण भी हैं। हिन्दोनेशिया की सेरीराम, सेरतकाण्ड, रामकेति, रामकियेन आदि प्रमुख हैं। बुल्के यह भी मानते हैं कि रामकथा की इस व्यापकता एवं लोकप्रियता का श्रेय वाल्मीकिकृत रामायण को ही है। विश्वसाहित्य के इतिहास में शायद ही किसी ऐसे कवि का प्रादुर्भाव हुआ हो जिसने भारत के आदि कवि के समान इतने व्यापक रूप