रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 778, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसिंहावलोकन ७०१ से परवर्ती साहित्य को प्रभावित किया हो । बुल्के का यह कथन तभी महत्त्वपूर्ण होता यदि वे वाल्मीकिरामायण के भारत एवं भारतीय टीकाकारों द्वारा स्वीकृत रूप को मानते और तदनुसार ही राम की नररूपता के साथ नारायण- रूपता भी समझ पाते । अतः पाश्चात्य ईसाई कूटनीतिज्ञों की प्रशंसा निस्सार तथा अविश्वसनीय ही होती है। जैसे कि मैक्समूलर ने एक जगह वेदों को मानव जाति की सर्वप्रथम भाषा कहकर प्रशंसा की है। अन्यत्र यह भी कह दिया है कि आज हम जिस परिस्थिति में रह रहे हैं उसमें वेदमन्त्र जैसे ऊलजलूल वस्तुओं को मँडराते रहने का कोई अधिकार नहीं है। वे कहते कि प्रस्तुत सिंहावलोकन सामग्री से स्पष्ट है कि रामकथा न केवल भारतीय वरन् एशियाई संस्कृति का महत्त्वपूर्ण तत्त्व बन गयी है। वस्तुतः तोड़-मरोड़ एवं विविध विकृतियाँ रामकथा में अगर न लायी गयी होतीं तो वह सम्पूर्ण विश्व एवं मानवता की संस्कृति का सर्वस्व होता। अब भी अविकृत वाल्मीकिरामायण महाकाव्य सम्पूर्ण संसार के सन्मुख सर्वाङ्गीण सर्वतोमुखी, सर्वतोभद्र अभ्युदय एवं निःश्रेयस का मार्ग और आदर्श उपस्थापित करता है। ७६५ वें अनु० में विभिन्न रामकथाओं की मौलिक एकता की चर्चा करते हुए वे डा० वेबर, डा० याकोबी, दिनेशचन्द्र आदि के मतों की आंशिक समालोचना भी करते हैं। बेचारे वेबर तो फिर भी सीताहरण, रावण आदि का मूल रूप वैदिक साहित्य में ही मानते हैं, परन्तु बुल्के वैसा नहीं मानते हैं। बुल्के यह भी कहते हैं कि "उनकी दृष्टि में दूसरे भाग की घटनाओं का मूल रूप वैदिक साहित्य में सुरक्षित है, इसके लिए कोई प्रमाण नहीं दिया गया। इस भाग की प्रधान कथावस्तु "स्त्रीहरण और उसके लिए युद्ध" असाधारणतया अलौकिक नहीं कही जा सकती। अतः राम के निर्वासन की भाँति सीताहरण तथा रावण-वध अर्थात् रामकथा की समस्त आधिकारिक कथावस्तु का ऐतिहासिक आधार मानना अधिक स्वाभाविक प्रतीत होता है। अतः रामकथा के दो अथवा तीन स्वतन्त्र भागों की कल्पना का कहीं भी समीचीन आधार नहीं मिलता, अतः रामकथाविषयक आख्यानकाव्य एक ही मूल स्रोत रह जाता है। अर्थात् एक ऐतिहासिक घटनासम्बन्धी प्राचीन आख्यानकाव्य के आधार पर वाल्मीकि ने रामायण की रचना की।" परन्तु समुद्र पार के रहनेवाले तथा भारतीय परम्परा से सर्वथा अनभिज्ञ बुल्के को जानना चाहिये कि उनकी इस कल्पना से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण स्वयं रामायण के अविभाज्य अङ्ग बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड हैं, जिनमें रामायण का मूलस्रोत वेद, उपनिषद् तथा ब्रह्मा का वरदान, महर्षि वाल्मीकि की समाधिजा ऋतम्भरा प्रज्ञा तथा आर्षज्ञान द्वारा सम्पूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं का प्रत्यक्ष दर्शन रामायण का मूल स्रोत है। वेद का उपबृंहण करने के लिए ही महर्षि ने अपने शिष्य सीतापुत्रों को वाल्मीकिरामायण महाकाव्य पढ़ाया था। पुराणों द्वारा भी इसी की पुष्टि होती है। पुराण तो स्पष्ट ही कहते हैं-वेदवेद्य परमात्मा जब दशरथनन्दन राम के रूप में प्रकट हुए तब साक्षात् वेद भी रामायण के रूप में महर्षि प्राचेतस के मुख से अवतीर्ण हुए- 'वेदवेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे । वेदः प्राचेतसादासीत् साक्षाद्रामायणात्मना ॥” लौकिक घटनाओं द्वारा भी अलौकिक तत्त्व का सम्बन्ध रहता है। लौकिक वाक्, त्वक् और चक्षु द्वारा भी सात्त्विकी, राजसी, वैदिकी तथा लौकिकी प्रवृत्तियों के संघर्ष से भी देवासुर-संघर्ष परिलक्षित होता है। यह छान्दोग्य तथा बृहदारण्यक उपनिषदों की प्राणविद्या से स्पष्ट है। लौकिक भोजन में भी प्राणाग्निहोत्र का विधान है। उसी तरह राम और रावण एवं कौरव और पाण्डव संघर्ष द्वारा देवासुर-संग्राम बोधित होता है, पर वह गौणरूप से ही। उस स्थिति में कृषि की अधिष्ठात्री सीता तथा पर्जन्य एवं इन्द्र के अधिष्ठाता देवता राम एवं वृत्र का प्रतिनिधि रावण सरलता से समझा जा सकता है। वृत्र या रावण द्वारा परिम्लान कृषिदेवता सीता का संत्राण इन्द्र राम द्वारा होना स्वाभाविक है। आन्तर देवासुर-संघर्ष ही कभी बाह्य राम-रावण के संघर्ष तथा कौरव-पाण्डव के संघर्ष का रूप धारण