भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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कर लेता है । मन्त्ररामायण के विवरण में वेदमन्त्रों द्वारा अनेक रामचरित वर्णित हैं । उपनिषदों में और व्यक्तरूप से रामचरित का वर्णन है । इस तरह अलौकिक तथा नित्य होने पर भी रामकथा लौकिक एवं ऐतिहासिक हो जाती है । ऐसे प्रामाणिक स्रोत को छोड़कर अप्रामाणिक अनुपलब्ध काल्पनिक गाथाओं एवं आख्यानों को रामायण का स्रोत मानना सर्वथा असङ्गत ही है । बौद्ध-त्रिपिटक की गाथाएँ तथा महाभारत वनपर्व तथा द्रोणपर्व की अत्यन्त संक्षिप्त रामकथाएँ भी वाल्मीकिरामायण पर ही निर्भर हैं, क्योंकि विस्तृत कथा से ही आवश्यकतानुसार संक्षेप किया जा सकता है । वेदों एवं उपनिषदों में बड़ी से बड़ी कथाओं का भी सूत्ररूप में वर्णन होता है । अतः उन्हें भी आख्यानकाव्यों पर आदृत मानना उचित है । वस्तुस्थिति तो यह है कि जैसे आज अनेक आख्यान वाल्मीकिरामायण पर ही निर्भर हैं वैसे ही पाली, चीन, बौद्ध रामकथाएँ भी वाल्मीकिरामायण का ही विकृत रूप हैं । अतएव बुल्के यह ठीक ही कहते हैं कि उनका मूल स्रोत ब्राह्मण-रामकथा ही है । चाहे गद्य हो चाहे संक्षिप्त हो उनका आधार अप्रामाणिक अनुपलब्ध आख्यान नहीं हैं । जैसे महाभारत का संक्षिप्त रामोपाख्यान रामायण पर निर्भर है वैसे ही अतिसंक्षिप्त पूर्वोक्त चीनी और पाली कथाएँ तथा द्रोणपर्व और शान्तिपर्व की अतिसंक्षिप्त कथाएँ भी रामायण पर निर्भर हैं। यह मानना उचित है । बुल्के कहते हैं कि जैन रामकथा में न केवल मिथ्या ब्राह्मण-रामकथा का उल्लेख है वरन् इनके कथानक के निरीक्षण से स्पष्ट है कि जैन कवि वाल्मीकिरामायण से भली-भाँति परिचित थे तथा उन्होंने उसकी कथावस्तु के प्रसङ्गों को जानबूझकर बदलकर एक नया रूप दिया है । इस सम्बन्ध में हम बुल्के से सर्वथा सहमत हैं । वज्रमुख की कन्या लङ्का देवी का वृत्तान्त, नल तथा नील द्वारा समुद्र, सेतु तथा सुबेल राजाओं की पराजय, द्रोणमेघ की कन्या विशल्या के स्नानजल से लक्ष्मण की चिकित्सा करने का प्रसङ्ग इसके उदाहरण समझे जा सकते हैं । अन्य संस्कृत तथा भारतीय भाषाओं के साहित्यों तथा विदेशी रामकथा-साहित्य का मूल स्रोत वाल्मीकिरामायण की रामकथा ही है । यह भी बुल्के का कहना ठीक ही है । इस अत्यन्त विस्तृत भारतीय तथा विदेशी रामकथा-साहित्य में कहीं परस्पर विरोधी बातें मिलती हैं । इस विरोध का साम्प्रदायिक साहित्य में समन्वय है ही । विभिन्न कल्पों में कोटि-कोटि रामावतार हुए हैं । इन असंख्य अवतारों के कारण रामचरित में विभिन्नता आ गयी है । परन्तु बुल्के इसे साम्प्रदायिक मत मानते हैं । लेकिन यह संगत नहीं है । बुल्के राम को ईश्वर नहीं मानते, न ही उन्हें ईश्वर का अवतार मानते हैं । इसी लिए उन्हें यह साम्प्रदायिक प्रतीत होता है । परन्तु वाल्मीकिरामायण में राम की ब्रह्मरूपता, युद्धकाण्ड जैसे सर्वसम्मत प्रामाणिक काण्ड में भी, स्वीकृत है । तभी आनन्दरामायण का यह कहना सम्मत हुआ है कि — “पुनः पुनः कल्पभेदाज्जाताः श्रीराघवस्य च । अवताराः कोटिशोऽत्र तेषु भेदः क्वचित् क्वचित् ॥” ( पूर्णकाण्ड ७।२९ ) तुलसीदास भी यही कहते हैं— “कलप भेद हरिचरित सुहाये । भाँति अनेक मुनीसन गाये ॥” मत्स्यपुराण ( ५३।१० ), अद्भुतरामायण ( सर्ग १ ), आनन्दरामायण ( यात्राकाण्ड सर्ग २; राज्य- काण्ड सर्ग १ ), पद्मपुराण ( ४।१।२४ ) आदि में वाल्मीकिकृत एक शतकोटिप्रविस्तर रामायण का उल्लेख है, जिसके विभाजन से ही विभिन्न रामायणों का आविर्भाव है । सम्प्रदाय शब्द का अर्थ है—किसी विद्या का, कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड तथा अवान्तर किसी विषय का अनादि अविच्छिन्न पारम्पर्य । यहाँ सम्प्रदाय शब्द का अनुचित या संकीर्ण दलबन्दी या फिरकापरस्ती अर्थ नहीं है, जैसा कि आजकल समझा जाता है । उसी अविच्छिन्न आचार्य-पारम्पर्य रूप सम्प्रदाय के बल पर वेद की अपौरुषेयता तथा अनादिता स्थित है । उसी आधार पर मन्त्र के तुल्य ही ब्राह्मणभाग का भी अविच्छिन्न पारम्पर्य है-‘तुल्यं साम्प्रदायिकम्’ ( जै० सू० ) में कहा गया है कि जैसे मन्त्रों में साम्प्रदायिकता