भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 780

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ७०३ के आधार पर अनादिता अपौरुषेयता है वैसे ही ब्राह्मणभाग में भी साम्प्रदायिकता अनादि अविच्छिन्न आचार्य-पारम्पर्य के कारण अपौरुषेय अनादि होने से स्वतः प्रामाण्य मान्य है। अतएव उस प्रामाणिक साहित्य में रामकथाओं का मूलस्रोत शतकोटिश्लोकात्मक रामायण ही है। विभिन्न अवतारों के कारण कथाओं में मौलिक भेद भी इसी तरह उपपन्न हो जाता है। परन्तु बुल्के इसे न मानने में हेतु देते हुए कहते हैं—"एक ओर इसी प्रकार की रामकथाओं के अस्तित्व के बहिरङ्ग प्रमाण नहीं दिये जा सकते और दूसरी ओर अन्तरङ्ग प्रमाण नहीं मिलते।" परन्तु उनके दोनों हेतु स्वयं में निष्प्रमाण हैं, क्योंकि अतीत घटनाओं में प्रमाण प्रामाणिक उल्लेख ही हो सकता है। प्रामाणिक उल्लेख पुराणों तथा रामायणों में मिलता ही है। विभिन्न गाथाओं या आख्यानकाव्यों का तो स्वरूप ही उपलब्ध नहीं है, फिर उनमें अन्तरङ्ग तथा बहिरङ्ग प्रमाण का तो प्रश्न ही नहीं उठता। क्योंकि जिसका स्वरूप ही सिद्ध नहीं होता उसका किसी भी हेतु से त्राण नहीं होता— "न तस्य हेतुभिस्त्राणमुत्पतन्नेव यो हतः।" दार्शनिकों का मत है कि हेतुओं से उसकी रक्षा नहीं हो सकती जो उत्पन्न होते ही मर जाता है। फलतः वाल्मीकिरामायण, आनन्दरामायण तथा पुराणों आदि के अनुसार भी शतकोटिप्रविस्तर रामायण ही सब रामकथाओं का मूलस्रोत है। उस मूल के भी मूलस्रोत वेद तथा उपनिषद ही हैं। बुल्के की रामकथा में रामकथा-साहित्य की विभिन्नताओं का जो तुलनात्मक अध्ययन किया गया है वह स्वयं अशुद्ध, असङ्गत और अपूर्ण है, यह दिखाया जा चुका है। परन्तु आज शतकोटिप्रविस्तर रामायण प्रमाणसिद्ध होने पर भी सम्पूर्ण रूप से वैसे ही उपलब्ध नहीं है जैसे ११३१ वेदों की शाखाएँ होने पर भी उपलब्ध नहीं हैं। फलतः शतकोटिप्रविस्तर रामायण आज उपलब्ध नहीं है, किन्तु उसका सारभूत चतुर्विंशत्साहस्री संहिता वाल्मीकि- रामायण विद्यमान है। प्रायः अधिकांश भारतीय एवं अभारतीय रामकथाओं का आधार वही है। फिर भी अध्यात्मरामायण, अद्भुतरामायण, आनन्दरामायण, वसिष्ठरामायण तथा पुराणों, संहिताओं तथा विभिन्न रामायणों को जिनका वाल्मीकिरामायण से समन्वय नहीं हो सकता तथा जिनमें मौलिक भेद हैं उन सब रामायणों को शतकोटि प्रविस्तर रामायण का ही अंश मानना उचित है। बुल्के की दृष्टि है कि उन सबको विकास, परिवर्धन, परिवर्तन या मिथ्या कल्पना ही समझना चाहिए। किन्तु उनकी दृष्टि में प्रचलित रामायण भी प्रामाणिक नहीं है। वाल्मीकिरामायण के बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड सर्वथा नवीन हैं तथा शेष काण्डों में भी पर्याप्त प्रक्षेप हैं। उनकी तथाकथित आदि- रामायण भी उन गाथाओं आख्यान काव्यों पर निर्भर है जिनका अस्तित्व ही न तो उपलब्ध है और न प्रमाणसिद्ध ही है। ऐसी स्थिति में उनके अनुसार प्रसिद्ध एवं उपस्थित का अपलाप, प्रामाणिक वेद, उपनिषद्, शतकोटिप्रविस्तर रामायण, वर्तमान वाल्मीकिरामायण तथा अन्य रामायणसंहिताओं और पुराणों की रामायणों का अप्रामाण्यापादन और अप्रसिद्ध की कल्पना तथा उसका प्रामाण्यापादन आदि अनेक दोष आते हैं। ७६८ वें अनु० में वे कहते हैं कि "रामायण के प्रामाणिक काण्डों (अर्थात् अयोध्या से लेकर युद्धकाण्ड तक पाँच काण्डों) के कथानक पर आदि कवि की छाप इतनी स्पष्ट है तथा इसमें आधिकारिक कथावस्तु की गति इस प्रकार अबाधरूप से आगे बढ़ती है कि बाद की रामकथाओं में इन काण्डों का कम विकास हुआ है।" इससे स्पष्ट ही है कि बुल्के बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड को प्रामाणिक नही मानते तथा अवशिष्ट पाँच काण्डों में भी जिन्हें वे प्रामाणिक मानते हैं, उनमें भी परिवर्धन, विकास या प्रक्षेप मानते हैं। फलतः इन काण्डों में राम, सीता आदि की ब्रह्मरूपता, लक्ष्मीरूपता और हनुमान् आदि की दिव्यता देवरूपता आदि का जो वर्णन है उसे वे प्रक्षिप्त या विकास का परिणाम मान लेते हैं। इसी तरह बुल्के अर्वाचीन साहित्यों में मायासीता के हरण को महत्वपूर्ण परिवर्तन मानते हैं। और उसका आधार उनकी दृष्टि में आदर्शवाद और भक्तिभावना ही है। अतएव वे कहते हैं कि माया-सीता के इस