रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ७०३ के आधार पर अनादिता अपौरुषेयता है वैसे ही ब्राह्मणभाग में भी साम्प्रदायिकता अनादि अविच्छिन्न आचार्य-पारम्पर्य के कारण अपौरुषेय अनादि होने से स्वतः प्रामाण्य मान्य है। अतएव उस प्रामाणिक साहित्य में रामकथाओं का मूलस्रोत शतकोटिश्लोकात्मक रामायण ही है। विभिन्न अवतारों के कारण कथाओं में मौलिक भेद भी इसी तरह उपपन्न हो जाता है। परन्तु बुल्के इसे न मानने में हेतु देते हुए कहते हैं—"एक ओर इसी प्रकार की रामकथाओं के अस्तित्व के बहिरङ्ग प्रमाण नहीं दिये जा सकते और दूसरी ओर अन्तरङ्ग प्रमाण नहीं मिलते।" परन्तु उनके दोनों हेतु स्वयं में निष्प्रमाण हैं, क्योंकि अतीत घटनाओं में प्रमाण प्रामाणिक उल्लेख ही हो सकता है। प्रामाणिक उल्लेख पुराणों तथा रामायणों में मिलता ही है। विभिन्न गाथाओं या आख्यानकाव्यों का तो स्वरूप ही उपलब्ध नहीं है, फिर उनमें अन्तरङ्ग तथा बहिरङ्ग प्रमाण का तो प्रश्न ही नहीं उठता। क्योंकि जिसका स्वरूप ही सिद्ध नहीं होता उसका किसी भी हेतु से त्राण नहीं होता— "न तस्य हेतुभिस्त्राणमुत्पतन्नेव यो हतः।" दार्शनिकों का मत है कि हेतुओं से उसकी रक्षा नहीं हो सकती जो उत्पन्न होते ही मर जाता है। फलतः वाल्मीकिरामायण, आनन्दरामायण तथा पुराणों आदि के अनुसार भी शतकोटिप्रविस्तर रामायण ही सब रामकथाओं का मूलस्रोत है। उस मूल के भी मूलस्रोत वेद तथा उपनिषद ही हैं। बुल्के की रामकथा में रामकथा-साहित्य की विभिन्नताओं का जो तुलनात्मक अध्ययन किया गया है वह स्वयं अशुद्ध, असङ्गत और अपूर्ण है, यह दिखाया जा चुका है। परन्तु आज शतकोटिप्रविस्तर रामायण प्रमाणसिद्ध होने पर भी सम्पूर्ण रूप से वैसे ही उपलब्ध नहीं है जैसे ११३१ वेदों की शाखाएँ होने पर भी उपलब्ध नहीं हैं। फलतः शतकोटिप्रविस्तर रामायण आज उपलब्ध नहीं है, किन्तु उसका सारभूत चतुर्विंशत्साहस्री संहिता वाल्मीकि- रामायण विद्यमान है। प्रायः अधिकांश भारतीय एवं अभारतीय रामकथाओं का आधार वही है। फिर भी अध्यात्मरामायण, अद्भुतरामायण, आनन्दरामायण, वसिष्ठरामायण तथा पुराणों, संहिताओं तथा विभिन्न रामायणों को जिनका वाल्मीकिरामायण से समन्वय नहीं हो सकता तथा जिनमें मौलिक भेद हैं उन सब रामायणों को शतकोटि प्रविस्तर रामायण का ही अंश मानना उचित है। बुल्के की दृष्टि है कि उन सबको विकास, परिवर्धन, परिवर्तन या मिथ्या कल्पना ही समझना चाहिए। किन्तु उनकी दृष्टि में प्रचलित रामायण भी प्रामाणिक नहीं है। वाल्मीकिरामायण के बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड सर्वथा नवीन हैं तथा शेष काण्डों में भी पर्याप्त प्रक्षेप हैं। उनकी तथाकथित आदि- रामायण भी उन गाथाओं आख्यान काव्यों पर निर्भर है जिनका अस्तित्व ही न तो उपलब्ध है और न प्रमाणसिद्ध ही है। ऐसी स्थिति में उनके अनुसार प्रसिद्ध एवं उपस्थित का अपलाप, प्रामाणिक वेद, उपनिषद्, शतकोटिप्रविस्तर रामायण, वर्तमान वाल्मीकिरामायण तथा अन्य रामायणसंहिताओं और पुराणों की रामायणों का अप्रामाण्यापादन और अप्रसिद्ध की कल्पना तथा उसका प्रामाण्यापादन आदि अनेक दोष आते हैं। ७६८ वें अनु० में वे कहते हैं कि "रामायण के प्रामाणिक काण्डों (अर्थात् अयोध्या से लेकर युद्धकाण्ड तक पाँच काण्डों) के कथानक पर आदि कवि की छाप इतनी स्पष्ट है तथा इसमें आधिकारिक कथावस्तु की गति इस प्रकार अबाधरूप से आगे बढ़ती है कि बाद की रामकथाओं में इन काण्डों का कम विकास हुआ है।" इससे स्पष्ट ही है कि बुल्के बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड को प्रामाणिक नही मानते तथा अवशिष्ट पाँच काण्डों में भी जिन्हें वे प्रामाणिक मानते हैं, उनमें भी परिवर्धन, विकास या प्रक्षेप मानते हैं। फलतः इन काण्डों में राम, सीता आदि की ब्रह्मरूपता, लक्ष्मीरूपता और हनुमान् आदि की दिव्यता देवरूपता आदि का जो वर्णन है उसे वे प्रक्षिप्त या विकास का परिणाम मान लेते हैं। इसी तरह बुल्के अर्वाचीन साहित्यों में मायासीता के हरण को महत्वपूर्ण परिवर्तन मानते हैं। और उसका आधार उनकी दृष्टि में आदर्शवाद और भक्तिभावना ही है। अतएव वे कहते हैं कि माया-सीता के इस
४. चतुर्थ काण्ड: युद्ध एवं उत्तरकाण्ड: रावण-वध, सीता-अग्निपरीक्षा, रामराज्य व महाग्रन्थ उपसंहार
वृत्तान्त का क्रमिक विकास देखकर किसी स्वतन्त्र रामकथा की कल्पना नितान्त निर्मूल सिद्ध होती है । बुल्के का उक्त कथन भी निस्सार है, क्योंकि यह कहा जा चुका है कि ईश्वर के ऐश्वर्यपूर्ण और माधुर्यपूर्ण दो प्रकार के चरित्र होते हैं । प्रथम पक्ष में अलौकिकता तथा दिव्यता का वर्णन बाहुल्येन होता है । द्वितीय पक्ष में लौकिकता का प्राधान्य रहता है । प्रथम पक्ष वैधी भक्ति का विषय होता है एवं द्वितीय पक्ष रागानुगा भक्ति का विषय होता है । वाल्मीकि- रामायण में अधिकांश माधुर्यपूर्ण चरित्र का वर्णन होने से लौकिकता का ही प्राधान्य है । उपनिषदों, पुराणों, संहिताओं तथा अध्यात्म आदि रामायणों में ऐश्वर्यपूर्ण चरित्र का प्राधान्येन वर्णन है । फलतः वाल्मीकिरामायण में सामान्यतया राम को एक आदर्श पुरुष तथा सीता को एक आदर्श नारी के रूप में चित्रित किया गया है । क्वचित् क्वचित् प्रसंगानुसार उनकी ब्रह्मरूपता भी वर्णित है । परन्तु द्वितीय पक्षवाले ग्रन्थों में अलौकिक अंशों का ही प्राधान्येन वर्णन है, अतः उन ग्रन्थों में मायासीता-हरण का वर्णन ठीक ही है । इसके अतिरिक्त रावण आदि का मरण देवताओं और दानवों के द्वारा न होकर नर और वानरों द्वारा ही होता है; इसलिए भी राम, सीता, सुग्रीव, हनुमान् आदि के लौकिक रूप का ही प्राधान्येन वर्णन है । स्वतन्त्र रामकथा न होने पर भी अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग, व्यक्त तथा अव्यक्त रूप, गुण आदि का वर्णन सर्वथा सङ्गत ही है । अतीत घटनाओं एवं वस्तुस्थितियों में तर्कों एवं कल्पनाओं का मूल्य कुछ भी नहीं है, क्योंकि वे वस्तुस्थिति के विपरीत हो सकती हैं। इतिहास एवं देवता, ऋषि आदि के वचन ही मुख्य प्रमाण होते हैं। अतः मायासीता-हरण या राम और सीता की दिव्यरूपता तथा अलौकिकता को भक्तिभावना या आदर्शवाद से प्रेरित कल्पनामात्र कहकर उनको अप्रमाण मानना सर्वथा कलुषित मनोवृत्ति का परिचायक है और आर्ष वचनों का अप्रा- माण्य सिद्ध करने का साहसमात्र है । वाल्मीकिरामायण से अन्य रामकथाओं में भी अधिकांश का समन्वय ही है । सीता, कुश, लव, हनुमान् आदि के जन्म ओर सम्बन्ध की विभिन्नता को लेकर बुल्के क्रमिक विकास की पुष्टि करना चाहते हैं । परन्तु विकास या कल्पनामात्र मानकर तो तत्सम्बन्धी आर्ष प्रमाणवचनों को झुठलाना होगा । विपरीत कल्पनाओं को निस्संकोच अप्रमाण ही मानना उचित है, जैसा कि सीता के जन्म के सम्बन्ध में बुल्के भी मानते है । दशरथजातक के अनुसार राम और लक्ष्मण दशरथ के औरस पुत्र एवं सीता औरस पुत्री थीं । इस तरह सीता राम और लक्ष्मण की सहोदरी बहन थीं । बुल्के कहते हैं कि दशरथजातक की रामकथा न केवल ब्राह्मण-रामकथा का विकृत रूप है वरन् उसका रचनाकाल भी वाल्मीकिरामायण के काल से शताब्दियों बाद ही मानना चाहिये । अतः सीता का दशरथ-पुत्री होना बौद्धों की दुषकल्पनामात्र है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार सीता का अयोनिजा होना ही सिद्ध है । वेदवती-वृत्तान्त का भी उसी के साथ समन्वय दिखलाया गया है । वाल्मीकिरामायण की सामग्री से ही सीता की विभिन्न जन्मकथाओं का विकास हुआ है, यह अंशतः ठीक ही है । भूमिजा या अयोनिजा होने पर भी व्यवहारतः सीता जनकजा तो है ही । रावणात्मजा सीता का आर्ष ग्रन्थों से समर्थन नहीं होता, अतः उसे भी विकृति ही मानना उचित है । हनुमान् की कथा का भी आधार वाल्मीकिरामायण ही है । उनके सम्बन्ध में भी बुल्के की विकासकल्पना निराधार है । पुराणों के अनुसार वे शिवावतार हैं । रामायण से भी अप्रतिषिद्ध होने से वह अनुमत ही है । वे वायु- पुत्र अंजनीनन्दन हैं । शिव से हनुमान् के उत्पन्न होने की बात कल्पना नहीं है, वह पुराणादि सम्मत है । जैसे कार्तिकेय शिवपुत्र होने पर अग्नि ने रुद्रतेज को धारण किया था उसी तरह शिवतेज के वायु द्वारा अञ्जना को प्राप् होने से उनके वातात्मज एवं शिवांश होने में कोई विरोध नहीं रह जाता । सीतातयाग की कथाओं की मिथ्या कल्पना द्वारा रामायण से संगति लगाना वस्तुतः असंगत ही है । कवियों को रसाभिव्यक्ति के लिए सौष्ठव या रोचकता के अनुकूल रूपकों की कल्पनाओं में कुछ स्वातन्त्र्य अवश्य है ।
परन्तु उसका आधार इतिहास एवं पुराण होना ही चाहिये । अतः पुराणों तथा संहिताओं के अनुसार कल्पभेद के अनुसार उनकी वास्तविकता को स्वीकार कर ही समन्वय करना उचित है । यही स्थिति सीतात्याग के सम्बन्ध में भी समझनी चाहिये । सामान्यतया लोकापवाद और धोबी के अपवाद में समन्वय हो ही सकता है, फिर भी यह तय है कि धोबी जैसे कुछ इनेगिने लोग ही सीता के निन्दक थे, तो भी राम ने बहुमत का ही नहीं अल्पमत का भी सम्मान करने का उदाहरण उपस्थित किया था । अतएव बहुजनहिताय बहुजनसुखाय जैसे आधुनिक आदर्श वाक्यों की अपेक्षा अत्यधिक महत्त्वपूर्ण सर्वजनहिताय सर्वजनसुखाय के आदर्श को प्रोत्साहन दिया था । रावण-चित्र आदि की कल्पना किसी अंश में प्रामाणिक होने पर भी सर्वांश में प्रामाणिक नहीं । बाल्मीकिरामायण प्रोक्त सीता के आदर्श के विरुद्ध सभी कल्पनाएँ अप्रामाणिक ही हैं । प्रामाणिक कथाओं का ही समन्वय करना आवश्यक है । अप्रामाणिक कल्पनाओं का तो खण्डन करना ही उचित है । इसी तरह रजस्तमोमयी छाया सीता का त्याग तथा सात्त्विकी सीता का राम के वामाङ्ग में निवास भी विकास की परिणति न होकर वस्तुस्थितिमूलक ही है । और जैसा कि पीछे कहा जा चुका है—चन्द्र-चन्द्रिका, भानु-प्रभा, जल-तरङ्ग, अमृत-माधुर्य एवं आनन्द-माधुर्यसार-सर्वस्व का जैसे विप्रलम्भ हो ही नहीं सकता वैसे ही सीता राम का तो विश्लेषण असंभव ही है । किन्तु जब स्थूलरूप से दोनों विग्रहवान् होते हैं, तभी संयोग और वियोग की कथा भी उपस्थित होती है । उनमें भी छायामयी काल्पनिक या मायामयी सीता का ही त्याग होना सङ्गत है । अचिन्त्यशक्तिसमुद्भूत सच्चिदानन्दमयी सीता का त्याग असंभव ही था, अतः लोकसंग्रहार्थ मायामयी सीता का त्याग ही वास्तविक है । इस स्थिति का माधुर्यलीला में स्पष्टीकरण न होकर ऐश्वर्यलीला में ही वर्णन करना उचित था । अतः पुराणादि में उसका वर्णन है, परन्तु बुल्के उसे नवीन कल्पना बता कर सन्तोष करते हैं । इसमें वे होमर काव्य की हेलन का भी उदाहरण प्रस्तुत करते हैं, जो अत्यन्त भद्दा एवं असङ्गत है । इसी तरह कुश और लव के चरित तथा कथानिवर्हण की विभिन्नता को भी बुल्के स्वाभाविक विकास का परिणाम मानते हैं और वे समझते हैं कि कुश नाम के आधार पर कुश घास से उसकी सृष्टि की कथा उत्पन्न हुई । परन्तु यह उनकी निराधार ही दुष्कल्पना है । वेदों और शास्त्रों में अन्वर्थ नामों का बहुधा उल्लेख मिलता है । अतः बाल्मीकिरामायण में स्पष्ट उल्लिखित है कि कुश के ऊर्ध्व भाग से मार्जन करने से कुश तथा कुश के अधोभाग ( लव ) से मार्जन करने से लव ये नाम प्रसिद्ध हुए । केवल बुल्के की अटकल से उस आर्ष उल्लेख को अप्रामाणिक मानना सर्वथा असङ्गत है । आगे बुल्के कहते हैं "वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड के अनुसार कुश और लव वाल्मीकि के साथ राम के अश्वमेधयज्ञ की भूमि में पहुँच कर रामायण का गान करते हैं । इनके वहाँ पहुँचने का कारणविशेष नहीं बताया जा सकता है । बाद की रामकथाओं में कुश और लव की वीरता दिखलाने के उद्देश्य से रामाश्वमेध के पूर्व राम-सेना से इनके युद्ध का वर्णन किया गया ।" परन्तु बुल्के का उक्त कथन अत्यन्त निस्सार है । कारण कि पूर्वापर प्रसङ्ग के अनुसार "कारण" स्पष्ट ही है । प्रथम तो बाल्मीकिरामायण से ही स्पष्ट है । रामाश्वमेध में राम ने जैसे अन्य ब्रह्मर्षियों और राजर्षियों को यज्ञ में निमन्त्रित किया था, वैसे ही वाल्मीकि महर्षि को भी । महर्षि वाल्मीकि उसी यज्ञ में निमन्त्रित होकर गये थे । उनके साथ उनके आश्रमवासी सीता एवं उनके पुत्रों का जाना स्वाभाविक था । इसके अतिरिक्त सीताचरित्र रामचरित्र का निर्माण कर वेदार्थ उपबृंहण तथा जनकल्याण के साथ सीताचरित्र की विशुद्धि भी उद्देश्य था । इसी उद्देश्य से राम के सदृश परम सुन्दर सीतापुत्र कुश और लव को तन्त्रीवादन के साथ रामायण-गान कराया गया था । उनके रामायण-गान प्रचार की योग्यता की परीक्षा भी आश्रम में ली गयी थी । जिसमें वे पूर्णरूप से उत्तीर्ण हुए थे । रामाश्वमेध के प्रसंग से भारत एवं विश्व के सभी श्रेणी के राजर्षि, विविध वर्गों के प्रतिनिधि तथा देवता, राक्षस, ८९
वानर, भालू सभी एकत्रित थे । उस समारोह में रामायण के प्रचार तथा सीताचरित्र की शुद्धि के प्रचार का उत्तम अवसर था । रामायण की विशेषतः अयोध्याकाण्ड की घटनाओं को आँखों देखनेवाले लोगों की संख्या भी कम नहीं थी । उस बीच में रामायण की घटनाओं का गान हर दृष्टि से महत्त्वपूर्ण ही था । उसका परिणाम भी वैसा ही हुआ । सारे समाज को सीता का लोकोत्तर चरित्र और महत्त्व विदित हुआ । स्थालीपुलाकन्याय से अयोध्याकाण्ड की घटनाओं का सत्य वर्णन सुनकर जनता को रामायण के अन्य काण्डों, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड एवं सुन्दरकाण्ड की घटनाओं पर विश्वास होना स्वाभाविक ही था । फलतः सीता की अनन्य रामभक्ति, अखण्ड पातिव्रत्य तथा अप्रतिम तेज पर भी विश्वास हुआ । लोगों की समझ में आ गया कि जो सीता हनुमान् की रक्षा के लिए अग्नि को भी शीतल होने (शीतो भव हनुमतः) का आदेश दे सकती थी वह सीता अपने पातिव्रत्य के तेज से रावण को भी भस्म होने का (भस्मीभूतो भव का) शाप दे सकती थी । उसने स्पष्ट कहा भी तो था— "असन्देशात्तु रामस्य तपसश्चानुपालनात् । न त्वां कुर्मि दशग्रीव भस्म भस्मार्हतेजसा ॥" दशग्रीव, राम का सन्देश न होने तथा तपस्या के पालन के उद्देश्य से मैं अपने तेज से तुझे भस्म नहीं कर रही हूँ । बुल्के का यह कहना निस्सार है कि "वाल्मीकिकृत आदिरामायण ग्रन्थ राम के अभिषेक तथा उनके ऐश्वर्य- शाली राज्य के वर्णन पर समाप्त होता था । इस सुखान्त कथावस्तु में आगे चलकर उत्तरकाण्ड जोड़ दिया गया जिससे कि प्रचलित रामायण ग्रन्थ दुःखान्त हो गया । इसका परिणाम यह हुआ कि बाद की रामकथाओं को पुनः सुखान्त बनाने के प्रयत्न किये गये ।” परन्तु यह भी निस्सार है । सुखान्त कथावस्तु का होना उतना महत्त्वपूर्ण नहीं होता जितना कि चरित्रनायक के जन्मादि पूर्वभाग एवं पुत्र, पौत्रादि तथा साङ्गोपाङ्ग जीवन का वर्णन करना । यह भी समझना गलत है कि केवल सुखान्त बनाने की दृष्टि से ही मिथ्या कल्पना करके सीता का अयोध्या लौट आना वर्णित किया गया है । इस मिथ्या कल्पना की अपेक्षा शतकोटिप्रविस्तर रामायण एवं पुराणादि में उक्त कल्पान्तरीय चरित्रों में भेद अङ्गीकार करना उचित है । तथा च किसी कल्प में वस्तुतः सीता का पुनः राम के साथ अयोध्या प्रत्यावर्तन मानना ही उचित है । आर्ष ग्रन्थों का अप्रमाण कहने का दुस्साहस बुल्के ही कर सकते हैं । कोई आस्तिक भारतीय वैसा नहीं कर सकता । अतएव यह सही नहीं है कि "वाल्मीकिकृत रामायण के विकास तथा उसके कथानक पर विभिन्न प्रभावों के परिणामस्वरूप विस्तृत रामकथा-साहित्य में वैभिन्य आया है", क्योंकि विभिन्न प्रभावों एवं विकासों का अन्तिम अर्थ है— वस्तुस्थिति के विपरीत मिथ्या कल्पना । इसमें और अप्रामाणिक में कोई अन्तर नहीं है । ऐसे छलछद्मपूर्ण शब्दों के प्रयोग की अपेक्षा अप्रामाण्य कह देना कहीं श्रेष्ठ है । किन्तु पुराणों की दृष्टि से कल्पभेद की कथा वस्तुस्थितिमूलक है । जो पूर्वजन्म तक में विश्वास नहीं करते, यह सिद्धान्त उनके गले भले ही न उतरे, परन्तु आस्तिक भारतीय के लिए वैसा स्वीकार करने में कोई बाधा नहीं है । जनसाधारण में प्रचलित सर्वथा भिन्न कथाओं का अस्तित्व स्वीकार करने की आवश्यकता न होती यदि उनका मूल प्रमाणभूत आर्ष पुराणों में न होता । पुराणों को आधुनिक या अर्वाचीन मानना पाश्चात्यों के दुरभिसन्धि सहित दुस्संस्कारों का ही परिणाम है । अनु० ७७३ में बालकाण्ड, उत्तरकाण्ड तथा रामावतारविषयक सामग्री, कनकमृग-वृत्तान्त, सुग्रीव द्वारा वानरों के प्रेषण के समय दिग्वर्णन, लङ्कादहन, हनुमान् की हिमालय-यात्रा, अग्नि-परीक्षा, पुष्पक विमान द्वारा अयोध्या- यात्रा आदि को बुल्के प्रक्षेप कहते हैं । जो कि दुस्साहस ही है । यथास्थान उनके तत्सम्बन्धी तर्कों का खण्डन किया गया है । इसी प्रकार अहल्योद्धार विकास, अवतारवाद विकास, राम के बालचरित्र पर कृष्ण की बाललीलाओं का प्रभाव,
सीता-स्वयंवर के विकास, सीता-जन्मकथा के बाहुल्य, मायासीता का हरण, वाली और सुग्रीव की जन्मकथा, सौदास, शम्बूकवध, रावणचरित, हनुमान् के जन्म की कथा, सीता त्याग, कुश-लवचरित आदि अनेक विषय ऐसे हैं जिनके अभाव में राम की कथा अधूरी ही रह जाती है। परन्तु बुल्के इन सभी विषयों को विकास, परिवर्धन आदि के नाम से मिथ्या कल्पना एवं अप्रमाण कहते हैं। हमने उक्त विषयों का यथास्थान उपपादन करके बुल्के के तर्कों का खण्डन कर दिया है। “प्रामाणिक काण्डों की सुव्यवस्थित कथावस्तु पर वाल्मीकि की प्रतिभा की गहरी छाप है” इत्यादि बुल्के का कथन मायाजालमात्र है। सुन्दरकाण्ड के उत्तमोत्तम वर्णन, जिनको कोई भी भारतीय विद्वान् महत्त्वपूर्ण मानेगा, उनमें बुल्के को वाल्मीकि की प्रतिभा की छाप दिखायी नहीं देती। वे उसे धड़ल्ले से प्रक्षेप कह देते हैं। जब आदि- रामायण नाम की कोई सर्वसम्मत वस्तु है ही नहीं, तब “अतिशयोक्ति का अभाव, सन्तुलन तथा स्वाभाविकता उसके विशेष गुण हैं” यह भी कैसे सिद्ध होगा ? प्रचलित रामायण ही वाल्मीकि की कृति है। उसी के आधार पर उनकी विशेषता कही जा सकती है। उससे अतिरिक्त वाल्मीकि का परिचय एवं उनकी कृति का ज्ञान बुल्के को किस तरह हुआ इसे तो वही जान सकते हैं । यदि प्रचलित रामायण से अतिरिक्त वाल्मीकि की कोई सर्वसम्मत कृति उपलब्ध होती, तभी उसे कसौटी मानकर उसके आधार पर प्रचलित रामायण में काट-छांट की कल्पना कथंचित् सङ्गत कही जा सकती थी। परन्तु खपुष्पतुल्य अप्रामाणिक कसौटी से प्रत्यक्ष विद्यमान रामायण के मुख्य विषयों का अपलाप करना सर्वथा निष्प्रमाण ही है। वाल्मीकिरामायण से यह तो स्पष्ट ही है कि राम और उनका चरित्र वैदिक संस्कृति से प्रभावित है। वेद का प्रामाण्य और आदर रामायण में स्पष्टतः परिलक्षित होते हैं। अर्थवाद वेदों में भी विद्यमान है— “अनङ्गुलिरवयत् अमूर्धा प्रत्यमुञ्चत अन्धो मणिमविन्दत ।” तब रामायण में अर्थवाद क्यों न होगा ? इसके अतिरिक्त हनुमान् का समुद्रलङ्घन यदि अतिशयोक्ति है तब उसका वर्णन भी आपकी तथाकथित आदिरामायण में नहीं होना चाहिये। यदि किसी बड़े लङ्घन को ही समुद्र- लङ्घन कहना है तब तो आदि कवि की कृति को मिथ्या ही कहना है। यदि समुद्रलङ्घन हनुमान् के लिए सम्भव है तब हिमालय-यात्रा भी असम्भव एवं असङ्गत क्यों कही जाय ? और यदि यह सब संभव है तब तो हनुमान् द्वारा फल समझ कर सूर्य को पकड़ने के लिए छलाँग लगाना, इन्द्र के द्वारा वज्र से आहत होकर भी न मरना और ब्रह्मा, इन्द्र यदि देवताओं द्वारा विविध वरदान पाना भी अतिशयोक्ति क्यों ? और उसका आदिरामायण में अभाव क्यों ? काव्यों में अद्भुत रस भी एक आदरणीय रस है। यदि अलौकिक घटनाओं का बाहुल्य है तो उसका वर्णन दूषण नहीं भूषण ही है। अतएव दशरथ-यज्ञ, ‘भूमिजा सीता की कथा तथा राम-विश्वामित्र-संवाद का अपलाप सिर्फ अलौकिकता के कारण नहीं किया जा सकता । यही स्थिति वाली और सुग्रीव की जन्मकथा, सीता के भूमि-प्रवेश आदि के सम्बन्ध में भी है। जिन्हें भारतीय वेदों, महाभारत, रामायण तथा पुराणों का परिचय है और उनके प्रामाण्य और अप्रामाण्य के विवेचन की बुद्धि है और जो ईश्वर की शक्ति से अनन्त ब्रह्माण्डों के निर्माण में विश्वास रखते हैं, उनकी दृष्टि में रामजन्म के समय अलौकिक घटनाओं का होना, राम का अपना स्वरूप दिखाना आदि सब कुछ सङ्गत ही है। इसी तरह अवतारवाद एवं राम की भक्ति को भी विकास मानना निराधार है। वाल्मीकिरामायण से ही सिद्ध है कि राम विष्णु या परब्रह्म हैं तब तो वे मुक्तिदाता हैं ही। इसमें वैसा चित्रण करना भावुकता या मिथ्या कल्पना नहीं है। इसी तरह शापों और वरों की भी कोई कल्पना नहीं कर ली गयी, किन्तु सर्वज्ञकल्प महर्षियों ने ऋतम्भरा प्रज्ञा से हस्तगत आमल के तुल्य सभी विषयों का अपरोक्ष साक्षात्कार कर के ही वैसा लिखा
७०८ रामायणमीमांसा विंश है। "नाम पहले प्रसिद्ध होता है, कथा बाद में बनती है" यह सिद्धान्त ही गलत है। गौण नाम गुण के आधार पर होते हैं, जैसे पाककर्ता होने पर पाचक, छिदिक्रिया का कर्ता होने से ही छेत्ता आदि हो जाता है। वेदों का सयुग्वा रैक्व नाम भी गौण ही है। महर्षि का स्वाभाविक नाम रैक्व था। शकट साथ रखने के कारण बाद में उन्हें सयुग्वा कहा गया। कई स्थलों पर कोई सर्वज्ञकल्प ऋषि या देवता भविष्य के कार्यों के अनुसार पहले से ही वैसा नाम प्रसिद्ध करते हैं, परन्तु यह सर्वथा मिथ्या है कि नाम के आधार पर मिथ्या कथा की कल्पना कर ली जाती है, अतः विश्वभर में एटिमोलोजिकलेजेंटस गौण नामों के सम्बन्ध में होता है। मुख्य नामों में वैसा नहीं होता। हाँ कहीं-कहीं मुख्य नाम लुप्त हो जाते हैं। कथाओं एवं घटनाओं के नाम पर होनेवाले गौण नाम ही मुख्य नाम हो जाते हैं। वस्तुतः कथाओं एवं घटनाओं के आधार पर होनेवाले नामों को समाख्या कहा जाता है—जैसे वेदों की काठक आदि समाख्याएँ कठादि महर्षियों से किसी कल्प में प्रथम प्रवचन होने के कारण उन्हें काठक कहा जाता है। परन्तु कई समाख्याएँ निरर्थक भी होती हैं। सात पत्तोंवाले पत्र होने के कारण सप्तच्छद कहा जाता है। परन्तु अश्वकर्ण आदि समाख्याओं का अपने अवयवार्थ के साथ कोई भी सम्बन्ध नहीं है, वह निरर्थक रूढ़िमात्र है। घोड़े के कान की तुलना उसमें कुछ भी नहीं है। अश्वकर्ण शब्द वृक्षविशेष में रूढ़ है। अतएव रामावतार, रामवनवास आदि वर, शाप आदि के कारण काल्पनिक नहीं हैं, किन्तु वस्तुस्थितिमूलक ही हैं। और सब आर्ष वचनों से प्रमाणित हैं। राम, सीता, लक्ष्मी और अहल्या के सम्बन्ध की कथाएँ जो आर्ष ग्रन्थों पर आधृत हैं सभी प्रामाणिक हैं। इस सम्बन्ध में बुल्के की सभी दुष्कल्पनाएं निष्प्रमाण एवं निस्सार ही हैं। सीता शब्द लाङ्गल-पद्धति का बोधक होता हुआ भी लाङ्गलपद्धति या कृषि की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण जनकनन्दिनी में सीता शब्द का प्रयोग हुआ है। जैसे ऐश्वर्य के योग से वैदिक इन्द्र शब्द देवराज में अन्वर्थ है वैसे ही प्रकृत में भी समझना चाहिये। पद्मा लक्ष्मी का नाम है, इस आधार पर पद्मजा सीता की कल्पना कर ली गयी है बुल्के की यह कल्पना भी निस्सार है। पद्मवत् अङ्गसौष्ठव के कारण पद्मजा इव होने से गौणी वृत्ति से ही सीता में पद्मजा नाम उपपन्न है। हनुमान्, रावण, राक्षस, यक्ष, मेघनाद, इन्द्रजित्, कुश, लव, वाली, सुग्रीव, कल्माषपाद, अहल्या, वेदवती, सुर, असुर आदि नाम सकारण हैं और इन्हीं कारणों से गुणकृत गौण नाम हैं। यह नहीं कि नामों के अनुसार मिथ्या कथा गढ़ी गयी है। तीर्थमाहात्म्य दिखलाने के उद्देश्य से उनका सम्बन्ध रामकथा के प्रधान पात्रों से जोड़ा नहीं गया, किन्तु वस्तुस्थिति ही वैसी थी। राम, सीता आदि के विशेष सम्बन्धों के द्वारा उन तीर्थों का महत्त्व वर्णित हुआ है। जैसे अमुक तीर्थों के सम्बन्ध से अमुकों के अमुक दोष दूर हो गये, इसलिए तीर्थ का महत्त्व वर्णित किया जाता है। जैसे अमुक तीर्थ स्नान से किसी विशिष्ट पुरुष की मुक्ति हो जाने से उसका पिशाचमोचन नाम हो गया। अतएव रावण ने गोकर्ण में तपस्या की थी तथा महोदेव से आत्मलिङ्ग प्राप्त कर उसे गोकर्ण में पृथ्वी पर रखकर खो दिया था। "उक्त कथा कल्पनामात्र है" इस कथन में कोई दम नहीं है। अवश्य ही अर्थवादों में कई काल्पनिक आख्यान होते हैं, परन्तु यह जानना चाहिये कि अर्थवाद एक ही तरह का नहीं होता है। प्रमाणान्तर- विरुद्ध अर्थवाद ही गुणवाद होने के कारण काल्पनिक आधार पर माना जाता है। प्रमाणान्तर सिद्ध अर्थ का बोधक अर्थवाद अनुवाद कहलाता है। उसका अर्थ लोकसिद्ध वस्तुस्थिति के अनुसार होता है। प्रमाणान्तर से असिद्ध एवं प्रमाणान्तर से अविरुद्ध अर्थ का बोधक अर्थवाद भूतार्थवाद कहलाता है। उसका स्वार्थ में प्रामाण्य ही होता है। विभीषण को जगन्नाथ या रङ्गनाथ की उपासना का उपदेश विरुद्ध नहीं है। यह भेद एक ही देवता के दो नाम होने से भी सङ्गत हो जाता है। कल्पभेद से भी दोनों पक्षों की प्रामाणिकता सिद्ध होती है। वराहपुराण तथा आनन्दरामायण (७।६।४२-४५) के अनुसार रावण ने इन्द्र को पराजित कर उनके यहाँ से वराहमूति को ले जाकर लङ्का में स्थापित किया था। विभीषण ने उसे राम को प्रदान किया। राम ने उसे मथुरा में स्थापित किया। ब्रह्मपुराण के अनुसार रावण ने वासुदेव-प्रतिमा की चोरी की थी। राम
अध्याय॑ रामचरितसिंहावलोकन ७७५ ने अयोध्या ले जाकर स्वर्गारोहण से पूर्व उसे समुद्र को अर्पित कर दिया था। कृष्णावतार के समय सागर ने उसे पुरुषोत्तमक्षेत्र में स्थापित किया था। पद्मपुराण में वामनमूर्ति के सम्बन्ध में कहा गया है कि राम ने उसें विभीषण से प्राप्त कर के कान्यकुब्ज में स्थापित किया था। उपर्युक्त कथाओं को भी काल्पनिक मानने में कोई तर्क नहीं है। वराहमूत्ति तथा वासुदेवप्रतिमा को एक ही मानना आवश्यक नहीं है। दोनों को स्वतन्त्र दो घटनाएँ हीं समझना चाहिये। वामनमूर्ति की घटना भी तीसरी स्वतन्त्र ही है। अनु० ७८१ में बुल्के कहते हैं कि “आदिरामायण के वक्ता वाल्मीकि ही हैं, किन्तु प्रचलित बालकाण्ड कें प्रथम सर्ग के अनुसार नारद वाल्मीकि को राम-कथा का संक्षिप्त वर्णन सुनाते हैं। इसी के आधार पर वाल्मीकि नें रामायण की रचना की है।" परन्तु बुल्के की प्रथम उक्ति में कोई प्रमाण नहीं है। परम्परा के अनुसारें ही सभी भारतीय विद्याएँ प्रचलित होती हैं। वाल्मीकिरामायण के प्रथम सर्ग में इसका प्रमाण भी है। यदि इस प्रत्यक्ष उल्लेख पर अविश्वास करें तभी बुल्के की बातों में विश्वास किया जा सकता है, पर आर्ष वचन में अविश्वास का कोई कारण ही नहीं है। बुल्के की अविश्वसनीयता तो निराधार एवं प्रमाणविरुद्ध होने से भी सिद्ध ही है। रामोपाख्यान में मार्कण्डेय ने भी युधिष्ठिर के प्रति परम्परा से ही रामकथावर्णन किया था। वाल्मीकिरामायण के अनुसार वाल्मीकि ने उसे कुश-लव को प्रदान किया। बुद्ध भले ही जातकों के वक्ता हों, परन्तु भारतीय परम्परा में तो संस्कृत तथा प्राकृत सर्वत्र परम्परा से ही आदृत है। रामचरितमानस में भी परम्परा का ही आदर किया गया है। अनु० ७८२ में बुल्के कहते हैं कि “जैनी रामकथाओं का आधार प्रचलित वाल्मीकिरामायण ही है। किन्तु जैन कवियों ने ब्राह्मण-रामकथा को अपनाकर उसमें बहुत से परिवर्तन किये हैं। इसी से अन्य रामकथाओं में परिवर्तन आये हैं।" बुल्के की पहली बात तो ठीक है, पर दूसरी ठीक नहीं, क्योंकि पुराणों की कुछ रामकथाओं के भेद कल्पभेद पर ही निर्भर हैं। बुल्के के अनुसार “सीता-स्वयंवर के अवसर पर अन्य राजाओं की उपस्थिति, राम द्वारा धनुर्भङ्ग, कैकेयी का पश्चात्ताप, लङ्का में विभीषण से हनुमान् की भेंट, लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा के पुत्र का वध, युद्ध के पूर्व राक्षस-राक्षसियों के संभोग शृङ्गार का वर्णन, रामसेना से कुश और लव का युद्ध वर्णन, वसुदेवहिण्डि में सीता का रावण-पुत्री के रूप में उल्लेख एवं सीतात्याग के प्रसङ्ग में रावण-चित्र का उल्लेख विकास है।” परन्तु यह सब भी असङ्गत है, कारण कि नृसिंहपुराण (अ० ४७), भागवतपुराण (९।१०), अध्यात्मरामायण (१।६।२४) आदि में सीता-स्वयंवर में अन्य राजाओं की उपस्थिति में राम धनुष चढ़ाते हैं। नृसिंहपुराण आदि को पउमचरियं से अर्वाचीन मानना बुद्धि का विपर्यास ही है। पद्मपुराण (पातालखण्ड अ० ११२) में भी सीता-स्वयंवर के आयोजन का उल्लेख है। उसमें भी सब राजाओं के समक्ष राम धनुष तोड़ते हैं। शिव से अजगव धनुष मिला था। उसे अन्य कोई राजा उठा नहीं सका। रामचरितमानस आदि ने पुराणों का ही अनुसरण किया है, पउमचरियं का नहीं। इसी तरह कैकेयी का पश्चात्ताप भी धर्मखण्ड (अ० ३८) और तत्त्वसंग्रहरामायण (अ० २।११) से सिद्ध है। अयोध्यावासियों का दुःख देखकर वह द्रवित होती है और राम की आराधना करके क्षमा भी माँगती है। अध्यात्मरामायण में भी यह चर्चा है। इसी तरह आनन्दरामायण (१।९।२४) में लङ्का में हनुमान् और विभीषण की भेंट का वर्णन है। अध्यात्मरामायण (१।७।४१) में शूर्पणखा का पुत्र साम्ब ब्रह्मा से दिव्य खड्ग प्राप्त करता है। उसी खड्ग द्वारा वह लक्ष्मण द्वारा मारा जाता है। इसका भी आधार पउमचरियं नहीं है। आनन्दरामायण (६।८) तथा जैमिनीयाश्वमेध (अ० २९।३६) के अनुसार लव राम के यज्ञाश्व को बाँधते हैं। सैनिकों को परास्त करते हैं। शत्रुघ्न द्वारा लव पराजित होते हैं एवं कुश द्वारा शत्रुघ्न भी पराजित होते हैं। पद्मपुराण (पातालखण्ड अ० ६०-६४) में भी यह वृत्तान्त है।
७१० रामायणमीमांसा विश प्रायः वैदिक लोग प्राचीन रामायणों, पुराणों तथा वाल्मीकिरामायण, महाभारत आदि से ही रामचरित्र का वर्णन करते हैं । उनके विश्वास के अनुसार जैसे श्वचर्म-दृति (कुप्पी) में निक्षिप्त कपिला-क्षीर भी अग्राह्य होता है उसी तरह अवैदिक मुखों से निःसृत अहिंसा, सत्य तथा रामचरित्र आदि भी अग्राह्य ही हैं। इसी दृष्टि से रामचरितमानस में स्पष्टरूप से कहा गया है कि—नाना पुराण, निगम, आगम तथा तदनुसारी सन्तों के आधार पर ही रामचरितमानस की रचना हुई है। जैन, बौद्ध आदि ग्रन्थ उसके आधार नहीं हैं । “नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद् रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि ।” अनु० ७८३ में बुल्के का यह कहना गलत है कि “वाल्मीकिरामायण के युद्धकाण्ड में जो शिवप्रतिष्ठा का निर्देश है वह केवल आल्मीकिरामायण दाक्षिणात्य पाठ में मिलता है, इसलिए प्रक्षिप्त है ।” क्योंकि आपका हेतु असिद्ध है । राम के विष्णु या परब्रह्म होने की बात तो तीनों पाठों में मिलती है तो भी आप उसे प्रक्षिप्त मानते हैं । यदि शिवप्रतिष्ठा की बात भी तीनों पाठों में मिलती तो भी आप उसे प्रक्षिप्त ही कह सकते थे । उत्तरकाण्ड की रावण सम्बन्धी शिवभक्ति को भी प्रक्षिप्त कहना ईसाइयत का उन्माद ही है। यह आवश्यक नहीं कि शिवभक्त होने पर ब्रह्मा वरदान नहीं दे सकते । महाभारत में कृष्ण द्वारा शिव की भक्ति का वर्णन है। अन्यत्र वहीं कृष्ण की शक्तिभक्ति का भी वर्णन है । शिव का हनुमान् रूप से अवतरित होना प्रमाणसिद्ध है । यह किसी प्रभाव से कल्पना नहीं है । प्रायः अनेक राम- कथाओं में राम की शिवभक्ति का उल्लेख है, उन सबको भ्रान्त या मिथ्या कल्पना मानना बुल्के का दुस्साहस ही है। उनकी ही कल्पना अगर बाइबिल के सम्बन्ध में जोड़ ली जाय तो फिर सारी बाइबिल एक मिथ्या कल्पना की पिटारी ही समझी जायेगी । पुराणों में ही नहीं, ऐतिहासिक दृष्टि से भी रामेश्वरम् का महान् शैव संस्थान राम की ही कृति है । वस्तुतः बुल्के की तथाकथित रामकथा शैव, वैष्णवों तथा रामभक्तों सभी के लिए चुनौती है । उन्होंने भी मैक्समूलर के समान ही यह ग्रन्थ लिखकर ईसाइयों को हिन्दूधर्म के खण्डन की सामग्री प्रस्तुत की है । जिसका कि मैंने पूर्णरूप से खण्डन करके आस्तिकों को सावधान किया है । शिवमहापुराण, पद्मपुराण आदि वैदिकों की दृष्टि में परम प्रमाण हैं । अतः शिव के आज्ञानुसार विष्णु का अवतार ग्रहण करना, पद्मपुराण के अनुसार राम का शिव से उनकी भक्ति मांगना आदि पूर्ण सङ्गत हैं। अतएव आनन्दरामायण आदि ग्रन्थों में राम तथा शिव की अभिन्नता का प्रतिपादन किया गया है । रामचरितमानस में भी स्पष्टरूप से कहा गया है— “शिवपद कमल जिनहिं रति नाहीं । रामहि ते सपनेहु न सुहाहीं ॥” इसी प्रकार शक्ति-प्रभाव के सम्बन्ध की बुल्के की कल्पना निर्मूल है। बृहद्धर्मपुराण, कालिकापुराण आदि भी प्रमाण ही हैं । अतएव कालिकापुराण (अ० ६२) में राम की विजय के लिए ब्रह्मा द्वारा देवी की पूजा का वर्णन है । देवीभागवत के अनुसार वर्षाकालीन देवी की पूजा का वर्णन है । कृष्णकथा का प्रभाव भी पुराणादि अविश्वास का ही भाव समझना चाहिये । बुल्के कहते हैं कि रामकथा के विकास में दो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तत्त्व ( अवतारवाद एवं भक्ति ) आ गये हैं । जिनके कारण कथा का समस्त वातारण ही धीरे-धीरे बदलता गया । कृष्णावतार तथा कृष्णभक्ति के अनुकरण पर ही इन दोनों तत्त्वों का रामकथा में प्रवेश हुआ ।” किन्तु बुल्के का सोचने का तरीका ही गलत है, और उनकी सभी बातें लगभग अन्योन्याश्रयादि दोषों से परिपूर्ण हैं । यदि उनकी कल्पना प्रमाणित हो जाय तभी वाल्मीकिरामायण में वर्णित राम का अवतारत्व और राम की भक्ति “प्रक्षिप्त” सिद्ध हो सकती है । साथ ही वे यह भी समझ नहीं पाते हैं कि इतिहास और पुराणों द्वारा वेदार्थ का उपबृंहण होता है । अतएव वे वैदिक साहित्य का सूत्रपात मानते हुए विष्णु-प्राधान्य को नहीं समझ
पाते हैं। वेदों में शिक्षा और यज्ञोपवीत का उल्लेख है। परन्तु “वह क्या है, कहाँ धारण किया जाय ?" इसका निर्णय गृह्यसूत्रों से होता है। इसी तरह वेदों में अवतार का वर्णन तो है, परन्तु इसका विशेष ज्ञान वेदोपबृंहणभूत पुराणादि के बिना समझ में नहीं आ सकता है। अतः यह कहना निस्सार है कि "वेदों में अवतारों की विशेष पूजा का निर्देश नहीं है।" बुल्के कहते हैं कि “कृष्णावतार के कारण अवतारवाद की भावना विष्णु में ही केन्द्रीभूत होने लगी तथा जनता की धार्मिक चेतना में इसका महत्त्व बढ़ने लगा। बाद में राम भी कृष्ण की भाँति विष्णु के अवतार माने जाने लगे (अर्थात् यह सब अतात्त्विक है, कृष्णावतार का अनुकरणमात्र हैं)”। ये सब बातें वाल्मीकिरामायण में व्याप्त अवतारवाद को क्षेपक मानने पर ही निर्भर हैं। उसके क्षेपकत्व में बुल्के जैसे लोगों की निर्मूल कल्पनाओं को छोड़कर कोई भी आधार नहीं है। इस तरह यह कहना भी अशुद्ध है कि “भक्तिमार्ग को लेकर ही रामकथा विकसित तथा पल्लवित हुई है। बहुत बाद में रामभक्ति का आविर्भाव हुआ है और जिन रचनाओं में इसका प्रारम्भिक शास्त्रीय प्रतिपादन किया गया है, वे प्रायः कृष्णभक्तिविषयक भक्तिशास्त्रों, संहिताओं तथा उपनिषदों के आधार पर लिखे गये हैं। कृष्णभक्ति-संप्रदायों के अनुकरण पर ही रसिकसम्प्रदाय की उत्पत्ति हुई है।” क्योंकि वाल्मीकिरामायण, महाभारत, पुराण तथा पञ्चरात्र आदि आगमों में अति प्राचीनकाल से अवतारवाद एवं राम, कृष्ण, विष्णु तथा भगवती आदि की भक्ति वर्णित है। महाभारत के अनुसार स्वयं कृष्ण ने उपमन्यु आदि का शिष्यत्व ग्रहण कर शिव की भक्ति की थी। उपमन्यु आदि कृष्ण से भी प्राचीन शिवभक्त हैं। पुराण के अनुसार व्यास, वसिष्ठ, विश्वामित्र आदि सभी शिवभक्त थे। उपनिषद आदि में भक्ति एवं भगवान् के सगुण विग्रह का वर्णन है। अति- प्राचीन सामवेदीय केन उपनिषद् में भगवान् का सगुण और साकार यक्ष के रूप में आविर्भाव कहा गया है। बुल्के आदि पाश्चात्यों की उक्त ग्रन्थों से सम्बन्धित काल्पनिक पद्धति अशुद्ध है, यह भी दिखाया जा चुका है। महाभारत में मार्कण्डेय महर्षि ने युधिष्ठिर से रामकथा और राम का महत्त्व वर्णन किया है। वस्तुतः युग युग में रामभक्ति एवं राम के अवतार के बाद ही कृष्ण एवं कृष्ण की भक्ति का प्रादुर्भाव हुआ है। यह पाश्चात्यों की दुष्कल्पना ही है कि भारत के पश्चात् एवं महाभारत के पूर्व रामायण का निर्माण हुआ है। अतएव राम की बाललीला स्वतन्त्र है, वह कृष्ण की बाललीला का अनुकरण नहीं कही जा सकती। बहुत सी बातें समानरूप से सर्वत्र विकसित होती हैं। प्रतिवर्ष वसन्त में कोकिल-कलरव एवं आम्रपुष्पों का प्रादुर्भाव होता है। प्रायः प्रत्येक बालक उत्पन्न होकर रोता है, हँसता है, विविध क्रीड़ाएँ करता है। “यह सब राम में नहीं था" इसका बुल्के आदि के पास कोई भी प्रमाण नहीं है। बालकों का कलभाषण, कान्ता-कटाक्ष आदि के समान ही, एक प्रधान सुख है, इसी लिए उपासना-ग्रन्थों में बाललीला-विशिष्ट भगवान् की उपासनाएँ होती हैं। कृष्णचरित का प्रभाव होना कोई अनर्थ नहीं है, परन्तु बुल्के आदि का उद्देश्य तो कुछ और ही है। सनातन सिद्धान्त के अनुसार तो कृष्ण से प्रथम राम हैं और राम से पहले कृष्ण हैं, क्योंकि सभी अनादि हैं। अनेक कालों में राम, कृष्ण के अवतार होते हैं। हाँ, जिसने कृष्णसम्बन्धी साहित्य ही पहले पढ़ा है उसे रामचरित्र पर कृष्णचरित्र की छाप प्रतीत हो सकती है। उसी तरह जिसने पहले रामचरित्र ही पढ़ा है उसे कृष्णचरित्र पर भी रामचरित्र की छाप प्रतीत होती है। राम अनादि परमेश्वर हैं। विभिन्न भावनाओं से उपासक उनकी उपासना करते हैं। अनेक विद्वान् वेद के अपालासूक्त की शृङ्गार उपासनाओं का प्रभाव कृष्ण की उपासनाओं पर मानते हैं। उसके अनुसार अपाला ने इन्द्र की पतिबुद्धि से उपासना की थी। इन्द्र ने प्रकट होकर उसके मुख से सोमरस का पान किया था। कहा जाता है तभी से युवतियों के अधरोष्ठ-पान को सोमपान ही समझा जाता है। परन्तु वह विचार भी तात्त्विक नहीं है। अनादि काल से ही भक्त भगवान् की माता, पिता, पति, पुत्र आदि के भावसे उपासना करते हैं। गीता भी कहती है— “पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ।”
अर्थात् पिता जैसे पुत्र के, सखा सखाके तथा प्रिय प्रिया के अपराध को क्षमा करता है वैसे ही आप मेरे अपराधों को क्षमा करना । इसी आधार पर रासलीला आदि की उपासना चलती है। इसी दृष्टि से ईश्वर होने के कारण कृष्ण के समान ही राम की रासलीला का भी वर्णन वस्तुस्थिति के अनुसार है। अनुकरणमात्र नहीं है। इतना ही क्यों ? शृङ्गाररस का आविर्भाव जब सामान्य स्त्री-पुरुषों में भी होता है तो यह कैसे कहा जा सकता है कि राम में शृङ्गार स्वाभाविक न होकर कृष्ण का अनुकरणमात्र है। शृङ्गार-चेष्टाएँ सर्वत्र स्वाभाविक होती हैं। शिव-शक्ति की शृङ्गारिक चेष्टाएँ अत्यन्त प्राचीन काल से वर्णित हैं। उन्हें किसी का अनुकरण कहना हास्यास्पद ही है। इसी प्रकार बुल्के का यह भी कहना गलत है कि "रामकथा के बहुत से पात्रों का कृष्णचरित के पात्रों से सम्बन्ध स्थापित कर लिया गया है। राम तथा कृष्ण की अभिन्नता के अतिरिक्त सीता और सुभद्रा तथा लक्ष्मण और बलभद्र की भी अभिन्नता का प्रतिपादन किया गया है। सीता के सम्बन्ध में माना गया है कि वह कृष्ण की पत्नी रुक्मिणी बनकर दस पुत्र एवं एक पुत्री उत्पन्न करेगी (आ० रा० ७।११।१३८) । मन्थरा और पूतना, शूर्पणखा और कुब्जा, वाली और भील, अयोध्या का धोबी और कंस का धोबी, जाम्बवान् और जाम्बवती के पिता का तत्त्वसंग्रहरामायण (७।१५) में एवं वानर तथा गोपों का आनन्दरामायण (१।५।४२) में अभेद माना गया है। राम ने दण्डकवासी (कामातुर) ऋषियों को आश्वासन दिया था कि वे कृष्णावतार में गोपियाँ बनेंगे पद्मपुराण (उत्तरखण्ड २७२।१६६,१६७), गर्गसंहिता (गोलोकखण्ड अ० ४; माधुर्यखण्ड अ० २), कृष्णोपनिषद् तथा भक्तिरसामृतसिन्धु (पूर्वभाग २।८४) गर्गसंहिता (गोलोकखण्ड अ० ४ तथा माधुर्यखण्ड अ० ३-७) के अनुसार राम ने मिथिला, कोशल और अयोध्या की स्त्रियों को गोपियाँ अथवा कृष्ण की पत्नियां बन जाने का आश्वासन दिया। देवकन्याएँ, कामपीड़ित स्त्रियां (७।४।४५-४७), १६००० क्षत्रिय एवं वैश्य कन्याएँ (राज्यकाण्ड सर्ग १२ ), यमुना (७।१२।११७), ब्राह्मणों को सोलह (४।७।२६) अथवा १०० स्वर्णमूर्तियाँ प्रदान करने के फलस्वरूप राम को कृष्णावतार में १६००० पत्नियां मिलेंगी। गर्गसंहिता (माधुर्यखण्ड अ० ८) के अनुसार रामाश्वमेध की स्वर्णसीताएँ भी गोपियों के रूप में प्रकट हुई हैं।" बुल्के की दृष्टि से उक्त बातें कल्पनामात्र हैं, वस्तुस्थिति नहीं हैं। परन्तु यह अर्धजरतीन्याय बुल्के का समझ में नहीं आता। बुल्के को जानना चाहिये कि वे ईसाई-सिद्धान्त की किसी पुस्तक की आलोचना नहीं कर रहे हैं जिसमें पुनर्जन्म होता ही नहीं, किन्तु रामायण आदि भारतीय ग्रन्थों पर विचार कर रहे हैं जिनमें पुनर्जन्म की व्यवस्था है। आप वाल्मीकिरामायण या महाभारत, श्रीभागवत, गर्गसंहिता आदि का प्रामाण्य मानने से ही राम और कृष्ण का अस्तित्व समझ सकते हैं। अन्य किसी प्रामाणिक इतिहास के आधार पर राम आदि का व्यक्तित्व नहीं सिद्ध होता। ऐसी स्थिति में यदि उक्त ग्रन्थों का प्रामाण्य है तो उनके अनुसार राम और कृष्ण की परब्रह्मरूपता, सर्वशक्तिमत्ता, सर्वज्ञता, अलौकिकता आदि सिद्ध होती हैं तथा उक्त ग्रन्थों के अनुसार राम-कृष्ण, सीता-रुक्मिणी आदि की अभिन्नता सिद्ध हो है । यदि उक्त ग्रन्थों का प्रामाण्य मान्य नहीं है तो केवल अटकल से उनमें किसी अंश का प्रामाण्य मानना और अंशान्तरों का अप्रामाण्य मानना युक्तिशून्य ही है। विषसंपृक्त मधुराश्न भी त्याज्य होता है। उसी प्रकार अप्रमाण ग्रन्थों से किसी वस्तु की सिद्धि का प्रयास व्यर्थ है। और फिर इसी तरह ईसाइयों के बाइबिल में बाइबिल की हिब्रूभाषावाली प्राचीन प्रति तथा अर्वाचीन न्यू टेस्टामेण्ट में अनेक वर्गों के मतभेद हैं। फिर अर्धजरतीन्याय से उसमें भी काम लिया जायेगा। साथ ही अनेक अंग्रेजों ने भी इंग्लिश इतिहासकारों की अप्रामाणिकता की चर्चा की है। जिसका कि 'भारत में अंग्रेजी राज' पुस्तक में स्पष्ट उल्लेख है। भारतीय दृष्टिकोण से तो वेद अनादि तथा अपौरुषेय होने से स्वतःप्रमाण हैं। तन्मूलक रामायण, महाभारत, पुराण आदि अत्यन्त प्रमाण हैं। उनके अनुसार राम और कृष्ण की अभिन्नता सिद्ध ही है। हरिवंश आदि में एक विष्णु का ही राम और कृष्ण आदि रूपों में आविर्भाव माना गया है। कृष्णोपनिषद् वेद ही
है। उनके अनुसार दण्डकवासियों को गोपाङ्गनाओं के रूप में प्रादुर्भाव का वरदान मिला है। पुनर्जन्मवाद में सर्व- साधारण के भी अनेक जन्म मान्य हैं। फिर स्वेच्छया नरतनु धारण करनेवाले विष्णु के राम और कृष्णरूप में आवि- र्भाव होने में सन्देह का प्रश्न ही नहीं है। ईसा आप लोगों के अनुसार ईश्वर नहीं ईश्वर का पुत्र है। जब उसमें अनेक चमत्कार सम्भव हैं तो साक्षात् ईश्वर में, अलौकिक चमत्कार होने में कोई असङ्गति है ही नहीं। विकास का सिंहावलोकन करते हुए वे फिर अपनी अनर्गल निर्मूल कल्पनाओं को दुहराते हुए कहते हैं— "इक्ष्वाकु-वंश के सूतों द्वारा जिस रामकथासम्बन्धी आख्यानकाव्य की सृष्टि प्रारम्भ हुई थी वह चौथी शती ईसवी पू० के अन्ततक पर्याप्तमात्रा में प्रचलित हो चुका था। वाल्मीकि ने उस स्फुट काव्य के आधार पर रामकथाविषयक एक विस्तृत काव्य की रचना की। इस वाल्मीकिकृत आदिरामायण में अयोध्याकाण्ड से युद्धकाण्ड तक की कथावस्तु का उल्लेख था,” बुल्के की यह कल्पना सर्वथा निराधार एवं अप्रमाण ही नहीं वाल्मीकिरामायण से विरुद्ध भी है। यह पीछे के प्रकरणों से सिद्ध है। बुल्के को यह बतलाना चाहिये कि राम का आविर्भाव कब हुआ और उनमें क्या प्रमाण है ? आधुनिक इतिहास तो छह हजार के भीतर ही ऐतिहासिक एवं प्रागैतिहासिक काल का अन्तर्भाव मानता है। परन्तु भारतीय इतिहास पुराणों के अनुसार २४ वें त्रेता में राम का आविर्भाव हुआ था। जो कि लाखों वर्ष पुरानी बात है। फिर इतनी पुरानी बात का इतने दिनों बाद किन लोगों ने किन प्रमाणों से स्फुट आख्यानकाव्य लिखे ? इसमें बुल्के या किसी अन्य के पास प्रमाण है ? फिर क्या लाखों वर्ष पहले कोई ऋषि, महर्षि, विद्वान् कवि नहीं था जिससे कि उस समय रामायणकाव्य का निर्माण न हो सका। यदि था तो कोई कारण नहीं कि वाल्मीकिरामायण बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड के अनुसार राम के समकाल के महान् कवि वाल्मीकि द्वारा रामायण का निर्माण न माना जाय। फिर इस प्रमाणसिद्ध तत्त्व को छोड़कर निराधार निष्प्रमाण स्फुट आख्यान काव्यों का निर्माण ४ शती ईसवी पूर्व के अन्त तक मानना सर्वथा असङ्गत ही है। यदि वाल्मीकि के पहले आख्यान काव्य हो तो उन्हें आदि कवि क्योंकर कहा जा सकता ? बुल्के कहते हैं बौद्ध अभिधर्ममहाविभाषा के अनुसार आदिरामायण का विस्तार केवल १२ हजार श्लोकों का था, परन्तु यह भी विडम्बना ही है कि वैदिकों के रामायण ग्रन्थ के परिमाण का निर्णय स्वयं रामायण तथा महाभारत, पुराण आदि से न कर के वैदिकधर्मविरोधी बौद्ध ग्रन्थों के आधार पर करना। बुल्के बौद्ध ग्रन्थों को इसी लिए प्रमाण मान लेते हैं, क्योंकि वे उनकी कल्पना के अनुकूल हैं। अथवा वैदिकधर्मविद्वेष के कारण ही वे वैदिक रामायण आदि को प्रमाण न मानकर बौद्ध अभिधर्ममहाविभाषा का सहारा पकड़ते हैं। इसे पक्षपात छोड़कर और क्या कहा जा सकता है ? जब कि अभिधर्ममहाविभाषा मूल उपलब्ध भी नहीं। बुल्के के अनुसार चीनी अनुवाद में ही वह सुरक्षित है। इसके अतिरिक्त वे स्वयं कहते हैं ये श्लोक दो विषयों से सम्बन्ध रखते हैं। रावण द्वारा सीता का हरण और राम द्वारा सीता की पुनः प्राप्ति तथा (अयोध्या में) प्रत्यागमन (रामकथा अनु० ७९)। किन्तु उनके इस कथन में कोई दम नहीं है, क्योंकि इसके अनुसार तो अयोध्याकाण्ड भी रामायण से बहिर्भूत ही मानना पड़ेगा। वाल्मीकिरामायण के अनुसार वाल्मीकिरामायण ग्रन्थ २४००० श्लोकों का ही सिद्ध है। अन्तरङ्ग प्रमाण की अपेक्षा बहिरङ्ग असिद्ध ही होता है। रामायण, पुराण आदि रामायण के स्वरूप के निर्णय के अन्तरङ्ग प्रमाण हैं। अभिधर्म- महाविभाषा का चीनी अनुवाद अत्यन्त बहिरङ्ग है। उस सम्बन्ध में भी यह जानना चाहिए कि रामायण का कोई ऐसा भाग उस ग्रन्थ की चर्चा का विषय है जिसमें केवल सीताहरण और सीता-प्राप्ति का उल्लेख रहा हो। वाल्मीकिरामायण के दाक्षिणात्य, गौड़ीय तथा पश्चिमोत्तरीय तीनों पाठ पूर्णतया ठीक हैं, परन्तु बुल्के की दृष्टि से परस्पर विरुद्ध होने से सुन्दोपसुन्दन्याय से स्वयं अप्रमाण ठहरेंगे। इस पाठभेद का दुरुपयोग करके बुल्के ९०
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७१४ रामायणमीमांसा विश रामायण के कलेवर में काटछाँट कर बहुत अंशों को प्रक्षेप बना देते हैं । सिद्धान्ततः सम्प्रदायभेद से जैसे वैदिक शाखाओं में पाठभेद तात्त्विक ही हैं, सप्तशती जिसके लाखों पाठ प्रतिवर्ष होते हैं, उसमें भी पाठभेद हैं। उसी तरह वाल्मीकिरामायण में भी पाठभेद प्रामाणिक ही हैं। वे कहते हैं "प्रारम्भ में वाल्मीकिकृत आदिरामायण का कोई प्रामाणिक लिखित रूप नहीं था, वह कई शतियों तक मौखिक रूप में ही प्रचलित था। जिससे उसका पाठ स्थिर न रह सका। काव्यो- पजीवी कुशीलव अपने श्रोताओं की रुचि का ध्यान रखकर लोकप्रिय अंश बढ़ाते रहे, इस तरह आदिरामायण का कलेवर प्रक्षेपों के कारण बढ़ने लगा।" बुल्के के इस कथन से स्पष्ट है कि उनकी दृष्टि में वाल्मीकिकृत आदिरामायण का आज कोई प्रामाणिक रूप है ही नहीं, यह सब कुशीलवों की कल्पना है। इस तरह रामायण के स्वरूप पर एक ईसाई का यह कितना भीषण प्रहार है। पर उन्हें समझना चाहिये कि उनके ही तर्कों से उनकी बाइबिल भी पूर्ण अप्रामाणिक एवं कल्पनामात्र ही ठहरेगी। पर रामायण की वस्तुस्थिति उससे सर्वथा भिन्न है। वेदों एवं सप्तशती के अनुसार ही वाल्मीकि ने अपने विभिन्न शिष्यों में पाठभेद का ही उपदेश किया था। उन-उन सम्प्रदायों के वही पाठ प्रामाणिक हैं। उनके पाठों और अनुष्ठानों से अदृष्ट एवं दृष्ट फल होते हैं। जैसे वेदों का मौखिक पाठ ही महत्त्वपूर्ण माना जाता है वैसे ही वाल्मीकिरामायण का भी मौखिक पाठ ही मुख्य था। मेधाहास के कारण जैसे ग्रन्थरूप में वेदों का उल्लेख हुआ है वैसे ही रामायण का भी काव्योपजीवी कुशीलव जातिविशेष नहीं उच्च कुल के ब्राह्मण, व्यास आदि रामायण का श्रवण कराते रहे हैं। मनमानी नहीं, स्वाम्यूहित नहीं, परम्पराप्राप्त प्रामाणिक पाठ का ही पठन-पाठन होता रहा है। रामायण राम का वाङ्मय विग्रह है। उसमें एक अक्षर का भी निवेश करना कण्टक-प्रवेश है और एक अक्षर निकलना साङ्गोपाङ्ग अंग में छेदन करना है। यही धारणा मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदों, रामायण, महाभारत तथा पुराणों के सम्बन्ध में रही है। इक्ष्वाकुवंश के कौन कुशीलव थे, उन्होंने कब, क्यों, कैसे स्फुट आख्यानकाव्य रचा तथा इसमें कौन सा आधार है और वह आधार कहाँ तक प्रामाणिक है ? इन बातों का उचित उत्तर मिले बिना बुल्के की बातें सर्वथा निस्सार ही हैं। रामायण में ही राम कौन थे ? सीता कौन थी ? उनका जन्म और विवाह कब तथा किस प्रकार हुआ ? उनकी कितनी सन्तान हुईं ? इन बातों का समाधान था। उक्त प्रश्नों के समाधानार्थ वाल्मीकिरामायण के उत्तर- काण्ड का निर्माण पीछे हुआ, यह कल्पना सर्वथा निष्प्रमाण एवं प्रमाणविरुद्ध ही है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार वाल्मीकि ही बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड के भी रचयिता हैं। बुल्के का यह कहना भी अशुद्ध है कि "रामायण (राम-अयन अर्थात् राम का पर्यटन) न रह कर वह पूर्ण रामचरितरूप में विकसित हुई।" अर्थात् उनकी दृष्टि में पहले राम का अयन ही रामायण थी। परन्तु उन्हें मालूम होना चाहिये कि राम का अयन अर्थात् निवासस्थान ही रामायण है। धात्वर्थ के अनुसार साङ्गोपाङ्ग, सच्ररित्र तथा सोपाख्यान राम का ज्ञान और प्राप्ति जिससे हो अथवा जिसमें निहित है उसी को रामायण कहते हैं। इण् गतौ या अय् गतौ धातु से अयन शब्द बनता है। ज्ञान, गमन, प्राप्ति सभी गति का अर्थ होता है। "रामस्य सोपाख्यानस्य सच्ररित्रस्य अयनं ज्ञानं प्राप्तिर्यस्माद् यस्मिन् वा तद्रामायणम् ।” बुल्के का यह कहना निष्प्रमाण है कि "उस समय तक रामायण नरकाव्य ही कहा जाता रहा है और राम आदर्श क्षत्रिय के रूप में भारतीय जनसाधारण के सामने प्रस्तुत किये गये थे। इसका आभास गीता के 'रामः शस्त्रभृतामहम्' शस्त्रधारण करनेवालों में मैं राम हूँ' में मिलता है।" क्योंकि उसी गीता में 'वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि' भी तो कहा गया है। क्या इससे यही समझना चाहिये कि वासुदेव कृष्ण भी गीता के समय तक केवल वृष्णिवंश के एक आदर्श पुरुष ही माने जाते थे ? किन्तु ऐसा समझना मूर्खजनप्रतारणमात्र ही है। क्योंकि उसी गीता में 'मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनञ्जय' कृष्ण से बढ़ कर कोई तत्त्व ही नहीं है, 'मया ततमिदं सर्वं' मुझ सर्वकारण परमात्मा से
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ७१५
सारा विश्व व्याप्त है। उसी गीता में यह भी उल्लेख है जब-जब धर्मग्लानि, अधर्म का अभ्युत्थान होता है तब-तब धर्मसंस्थापनार्थ, साधुपरित्राणार्थ, दुष्टदमनार्थ भगवान् अवतार धारण करते हैं । किन्तु विभूति-वर्णन के प्रसंग में जैसे वृष्णियों में वासुदेव को कहा है वैसे ही राम को शस्त्रधारियों में भगवान् का रूप कहा गया है । वाल्मीकिरामायण के अनुसार कृष्ण भी राम के ही रूप में कहे गये हैं । "कृष्णश्चैव बृहद्वलः" ( युद्धकाण्ड ) । ७८९वें अनु० में बुल्के कहते हैं "भागवतों के इष्टदेव वासुदेव कृष्ण सम्भवतः तीसरी शती ई० पूर्व० विष्णु के अवतार माने जाने लगे थे । जिससे अवतारवाद की भावना को बहुत प्रोत्साहन मिला । दूसरी ओर लोक- प्रियता के साथ-साथ राम का महत्त्व भी बढ़ने लगा था । उनके वर्णन में अलौकिकता आ गयी । इस प्रवृत्ति की स्वाभाविक परिणति यह हुई कि कृष्ण की भाँति राम भी पहली शती ई० पूर्व विष्णु के अवताररूप में स्वीकृत होने लगे । फलस्वरूप प्रचलित रामायण के कई स्थलों में रामावतारविषयक प्रक्षिप्त सामग्री का समावेश हो गया है।" किन्तु उनका यह सब कथन निराधार, निस्सार, निष्प्रमाण तथा प्रमाणविरुद्ध है । महाभारत के कालनिर्णयप्रसंग में यह दिखलाया गया है कि ई० पूर्व दो हजार वर्ष से पहले ही महाभारत का निर्माण हो चुका था । भगवद्गीता तो महाभारत के संग्राम के समय ही प्रकट हो चुकी थी, महाभारत-संग्राम ईसा से तीन हजार वर्ष से भी पूर्व हुआ था, उस गीता में कृष्ण का अवतार होना और ईश्वरत्व अत्यन्त प्रसिद्ध है । अतः ई० पूर्व तीसरी शती से कृष्ण को अवतार माने जाने लगा यह कथन निस्सार ही है। इतना ही नहीं इसी ग्रन्थ के पूर्व के प्रसंगों में अनादि वेदों में ही अवतारवाद भी प्रमाणित है। वाल्मीकिरामायण तो महाभारत से लाखों वर्ष प्राचीन है। महाभारतान्तर्गत विष्णु- सहस्रनाम में राम का विष्णुनामों में उल्लेख किया गया है । अतः 'कृष्ण या राम का अवतारत्व किसी विकास की परिणति हैं' यह बुल्के का दिमागी फितूर ही है, अतएव रामायण की अवतारविषयक सामग्री को प्रक्षिप्त कहने का दुस्साहस करना अनभिज्ञता ही है। बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड में पौराणिक गाथाएँ नहीं हैं। वे रामायणीय गाथाएँ ही हैं। जिनका कि संवादरूप में आना बिल्कुल स्वाभाविक है। ऋष्यशृंग तथा विश्वामित्र का वृत्तान्त, शम्बूकवध, रामाश्वमेध आदि प्रसंग स्वाभाविक हैं । राम विष्णु के अवतार थे ही न कि माने जाने लगे । बुल्के कहते हैं, "रामकथा के द्वितीय विकास का सोपान है रामकथा का आदर्श क्षत्रिय राम का चरित्र- मात्र न रहकर विष्णु की अवतार-लीला के रूप में परिणत हो जाना । बौद्ध और जैन साहित्य को छोड़कर रामकथा का सर्वत्र यही रूप स्वीकृत हुआ है ।" बुल्के का उक्त कथन भी दुरभिसंधिमूलक ही है, कारण राम का अनादिकाल से ही विष्णु अवतार के साथ-साथ व्यावहारिक रूप मर्यादापुरुषोत्तम ही रहा है। उस दृष्टि से राम अब भी आदर्श क्षत्रिय ही हैं। जैन साहित्य में भी राम को विष्णुरूप माना गया है । वासुदेव, प्रतिवासुदेव, बलभद्र आदि उनके अनुसार भी सदा ही होते रहते हैं । हिन्दोनेशिया आदि की रामकथाओं में भी राम को विष्णु का अवतार माना गया है । बौद्धों के साहित्य में बुद्ध को ही प्राचीन काल में रामरूप में आविर्भूत माना गया है। बुद्ध-भक्ति से बढ़- कर बौद्धमत में कोई भक्ति नहीं । बुल्के का यह कहना भी गलत है, "इस द्वितीय सोपान में जनसाधारण की धार्मिक चेतना में न तो राम के लिए कोई विशेष स्थान था और न रामभक्ति का आविर्भाव हुआ था। एक ओर उस समय के धार्मिक साहित्य में रामकथा का स्थान अपेक्षाकृत गौण था दूसरी ओर तत्कालीन ललितसाहित्य में उसकी व्यापकता, लोक- प्रियता अद्वितीय है ।" क्योंकि वाल्मीकिरामायण तथा विविध अन्य रामायणों तथा पुराणों से यह भली भाँति विदित है । ललितसाहित्य से भी अधिक राम एवं रामभक्ति को धार्मिक साहित्य में स्थान प्राप्त था । आज जैसे जनता की बुद्धि एवं जिह्वा पर रामनाम का बाहुल्य है वैसे ही तब भी हनुमान् भक्तों एवं ज्ञानियों में अग्रगण्य थे । श्रीमद्भागवत
७१६ रामायणमीमांसा विंश आदि में भी उनका महत्त्व प्रख्यात है। धर्मराज युधिष्ठिर मार्कण्डेय से रामकथा का श्रवण करते थे। सनकादि भी राम के भक्त थे। यह उपनिषदों से भली भाँति विदित है। इन सब साहित्यों को अप्रमाण कहने से ही बुल्के की निराधार कल्पना को अवकाश मिल सकता था। परन्तु भारतीय जनता सदा ही वेदों, रामायण तथा पुराणों का आदर करती है और प्रामाण्य मानती है। प्रमाणपद्धतिपराङ्मुख पाश्चात्य एवं उनके अनुयायी कुछ भारतीय ही ऐसी दुष्कल्पनाओं में विश्वास रखते हैं। अतएव बुल्के का यह कथन भी असत्य है कि "अवतारवाद के कारण कथावस्तु में अलौकिकता अवश्य धीरे-धीरे बढ़ने लगी, फिर भी रामकथा का मुख्य दृष्टिकोण धार्मिक न होकर शताब्दियों तक साहित्यिक ही रहा, यह संस्कृत-ललितसाहित्य के स्वर्णकाल में महाकाव्यों तथा नाटकों से स्पष्ट है। राम-भक्ति के आविर्भाव के पूर्व रामकथा का यह साहित्यिक रूप विदेशों में फैल गया और उसपर बाद में रामभक्ति का प्रभाव नहीं पड़ा। इसी लिए सभी विदेशी रामकथा-साहित्य में रामभक्ति का अभाव है।" क्योंकि कहा जा चुका है कि राम के मर्यादापुरुषोत्तम और परब्रह्म दोनों रूप भारतीय साहित्य में साथ-साथ रहे हैं। श्रीमद्भागवत आदि में जहाँ राम का परब्रह्मरूप सुस्पष्ट है वहाँ भी उनके मर्त्यावतार का उद्देश्य मर्त्यशिक्षण ही रहा है— "मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं रक्षोवधायैव न केवलं विभोः ।" तुलसीदास ने भी कहा है— “राम देखि सुनि चरित तुम्हारे । जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे ॥" (रा० मा० २।१२५।४ ) सेरीराम, रामकियेन आदि में राम को विष्णु का अवतार माना ही गया है। अतः बुल्के का यह कहना सफेद झूठ ही है कि विदेशी रामकथाओं में रामभक्ति का अभाव है। सुतरां विष्णुभक्ति, रामभक्ति एक ही ठहरती है। लक्ष्मण, हनुमान्, जाम्बवान् आदि भी राम की भक्ति करते ही थे । बुल्के की ऐसी सैकड़ों दुष्कल्पनाओं का एक ही उत्तर है कि वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत तथा पुराणों के सम्बन्ध में बुल्के का कालनिर्धारण अत्यन्त अशुद्ध है। उनका काल अनादि तथा लाखों वर्ष प्राचीन है। तभी से रामभक्ति और राम का महत्त्व आज से सहस्रों गुणा अधिक माना जाता रहा है। आस्तिक जनता रामायणकथा, राममन्त्र तथा रामनाम को जीवन-सर्वस्व मानती रही है। शतकोटिप्रविस्तर रामायण का सार जान कर महेश्वर रामनाम का ही जप करते रहे हैं। "रामायण सतकोटि महँ, लिय महेस जिय जानि ।" (तुलसी) याज्ञिकपद्धतियों में अनादिकाल से यज्ञ, याग आदि के अन्त में भगवान् का द्वादश बार नामस्मरण का सम्प्रदाय रहा है। “यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु । न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम् ॥” राम अनन्तकोटि ब्रह्माण्डों के नायक परमात्मा हैं। वैदिकधर्म ही उनका धर्म है। उन्होंने अवतार लेकर कोई नया धर्म नहीं चलाया। अतः जो भी श्रौत या स्मार्त धर्मकर्म का अनुष्ठान करते हैं उसे ही परमात्मा के अर्पण करते हैं। परमात्मा निर्गुण और सगुण दोनों ही हैं। अतः "स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ।" के अनुसार आस्तिक स्वानुष्ठित धर्मकर्म को नारायणार्पणमस्तु, रामार्पणमस्तु, श्रीकृष्णार्पणमस्तु, शिवार्पणमस्तु कहकर समर्पण करते रहे। मन्त्र, नामजप, ध्यान आदि भी राम, कृष्ण, शिव, विष्णु आदि के अनादिकाल से चलते ही रहे हैं। इसी तरह राम की शृङ्गारिक कथा की बात है। अनेक प्रकार की भक्तियों में मधुरभक्ति भी अन्यतम है। पाञ्चरात्र आदि आगमों में उसका प्रमुख स्थान है। विष्णु, शिव, राम, कृष्ण सभी की भक्तियों में न्यूनाधिकरूप में शृङ्गारिक भक्ति का उल्लेख है। वेदों में भी उसका उल्लेख है ही।
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ७१७ विकासवाद जैसे मिथ्या अपसिद्धान्त में ही ऐसा माना जाता है कि "भारतीय भक्तिमार्ग का आविर्भाव वैदिक साहित्य में ही हो चुका था। वह शताब्दियों के पश्चात् भागवतधर्म में पल्लवित हो सका। भागवतों के इष्टदेव वासुदेव कृष्ण विष्णु के अवतार माने जाने लगे। जिसके फलस्वरूप भक्तिभावना उन्हीं विष्णु वासुदेव कृष्ण में केन्द्रित होकर उत्तरोत्तर विकसित होने लगी। बाद में राम भी विष्णु के अवतार माने जाने लगे। किन्तु अवतार के रूप में स्वीकृत हो जाने पर भी शताब्दियों बाद रामभक्ति का आविर्भाव हुआ," पर यह सब भी अनर्गल प्रलाप ही है। विकास नहीं भागवतधर्म वैदिक भक्तिमार्ग की व्याख्या है। वेदों में विष्णु की ही भक्ति नहीं है, शिव और शक्ति की भी भक्ति का वर्णन है। फलतः रामायण, महाभारत तथा पुराणों एवं शैव और वैष्णव आगमों में उसकी व्याख्याएँ हुई हैं। रामायण में प्रधानतया रामभक्ति, महाभारत में प्रधानतया कृष्ण तथा शिव की भक्ति का वर्णन है। पुराणों में विष्णु, शिव, शक्ति, राम और कृष्ण की भक्ति का उपबृंहण है। पुरुषसूक्त, रुद्रसूक्त, रुद्राध्याय तथा नारायण, महानारायण, रामतापनीय, रामरहस्य, गोपालतापनीय, त्रिपुरतापनीय आदि उपनिषदों में विविध भक्तियों का उल्लेख है। शङ्कर, रामानुज आदि शास्त्रप्रामाण्यवादी थे। मनमानी कल्पना नहीं करते थे। उन्हीं वेदादि शास्त्रों के अनुसार ही उन्होंने राम आदि की भक्ति का वर्णन किया था। कृष्ण एवं राम को विष्णु का अवतार मनमानी नहीं माना जाने लगा, किन्तु पूर्वोक्त शास्त्रों के अनुसार ही। ईसाइयों में जैसे ईसा को ईश्वर का पुत्र तथा कुमारीपुत्र माना जाने लगा बुल्के ने वैसी ही इधर भी कल्पना करने की भूल की है। अध्यात्मरामायण भी मनमानी कल्पना नहीं है, किन्तु पूर्वोक्त प्रमाणों पर ही वह आदृत है। वह भी ब्रह्माण्डपुराण का खिलभाग माना जाता है। युधिष्ठिर भी बड़े प्रभाव- शाली राजा थे। श्रीकृष्ण भी उनका महान् आदर करते थे तो भी उन्हें ईश्वर का अवतार नहीं माना गया, किन्तु महाभारत में तथा विष्णुपुराण में राम का महत्त्वपूर्ण सम्मान है। अतएव 'रामायण की आधिकारिक कथावस्तु सीताहरण, रावणवध को एक नया रूप दिया गया' इत्यादि कल्पना भी असत्य है। सदा सर्वदा ही वेदों, रामायणों, महाभारत तथा पुराणों की आध्यात्मिक, आधिदैविक आधिभौतिक व्याख्याएँ होती रही हैं। बुल्के कहते हैं- "वाल्मीकिरामायण, हरिवंश, विष्णुपुराण, वायुपुराण आदि के अनुसार चारों भाई विष्णु के एक-एक चतुर्थांश से समन्वित थे। भक्तिभाव के पल्लवित होने के पश्चात् राम परब्रह्म के पूर्णावतार माने जाने लगे एवं लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न क्रमशः शेष, शङ्ख तथा सुदर्शन के अवतार। प्राचीन पुराणों में सीता तथा लक्ष्मी की अभिन्नता का निर्देश नहीं मिलता। आगे चलकर लक्ष्मी सीता के रूप में अवतरित मानी गयी हैं। किन्तु रामभक्ति के प्रादुर्भाव के पश्चात् सीता परम शक्ति अथवा मूलप्रकृति स्वीकृत होने लगी।" परन्तु बुल्के की दृष्टि में प्राचीन पुराण भी कल्पना ही हैं, प्रमाण नहीं। सभी ईसा के पश्चात् बने हैं। अतः यदि उनमें सीता एवं राम को परब्रह्म या मूलप्रकृति माना भी गया होता तो भी ईसाइयत के प्रचारक बुल्के उसे कभी न मानते। हमारे यहाँ वाल्मीकिरामायण, हरिवंश, विष्णुपुराण, वायुपुराण, पद्मपुराण, स्कन्दपुराण आदि सभी पुराण व्यास द्वारा प्रादुर्भूत होते हैं, अतः वे सभी प्राचीन हैं। सभी का प्रामाण्य है। सभी का समन्वय करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है। पुराणों में विष्णु को परब्रह्मरूप ही माना गया है, अतः विष्णु का अवतार होने पर राम सुतरां परब्रह्मरूप ठहरते हैं। भरत आदि चतुर्थांश हैं, इसकी व्याख्या भी पीछे हो चुकी है। माण्डूक्योपनिषद् में विराट्, हिरण्यगर्भ, अव्याकृत, तुरीय भी चतुर्थांश हैं फिर भी विराट् आदि की अपेक्षा तुरीय की विशेषता है ही। वेदों तथा पुराणों का समन्वित अर्थ यही है कि राम परमार्थतः परब्रह्म हैं, सीता ऐश्वर्य और माधुर्य की अधिष्ठात्री महाशक्ति उनसे अभिन्न ही हैं। बुल्के आदि ने वेदों तथा रामायण आदि के सिद्धान्तों से सर्वथा अपरिचित तथा ईसाइयत प्रचार की भावना से प्रेरित होकर रामकथा के नाम पर अर्थ का अनर्थ करके पाप किया है। नास्तिकप्राय लोगों ने वस्तुस्थिति के विरुद्ध मनमानी सीता को लक्ष्मी और राम को विष्णु नहीं माना, किन्तु आस्तिकों ने वेदादि प्रमाणों के आधार पर वस्तु- स्थिति को समझकर ही वैसा स्वीकार किया है।
छायामात्र सीता के हरण तथा मायासीता के त्याग का भी समाधान किया जा चुका है । “प्रमाणवन्त्यदृष्टानि कल्प्यानि सुबहून्यपि" के अनुसार रावण के दोनों रूप स्पष्ट हैं। रावण का बाह्य रूप यही है कि उसने कामबुद्धि से सीता का हरण किया था, परन्तु आन्तर रूप यह भी है कि मुक्ति की कामना से उसने राम से वैरभाव अपनाया था । “क्रोधोऽपि देवस्य वरेण तुल्यः ।” ( वा० रा० दा० पाठ प्रक्षेप २।२२ ) अर्थात् देव का भगवान् विष्णु का क्रोध भी वर के तुल्य ही मुक्ति प्रदान करता है । जिन तुलसीदास का गुणगान करते हुए बुल्के भारतीय जनता के विश्वास के भाजन बनना चाहते हैं । उन्होंने भी रावण की ऐसी ही आन्तररूप भावना व्यक्त की थी— “जो जगदीश लीन्ह अवतारा, सुररञ्जन भञ्जन महिभारा । तौ मैं जाई वैर हठि करिहौं, प्रभु शर ते भवसागर तरिहौं ।।” बुल्के की तृतीय सोपान की कल्पना भी पिष्टपेषणमात्र है । राम विष्णु हैं, इतने से भक्तवत्सल हैं ही, अतः न केवल भक्तवत्सल राम का ही अपितु विष्णु का चरित्रवर्णन गुणकीर्तन ही है । अन्त में बुल्के समस्त भारतीयों एवं भारतीय धर्म एवं संस्कृति को अज्ञानपूर्ण, मूर्खतापूर्ण और भावुकतापूर्ण सिद्ध करने की दुरभिसन्धि से कहते हैं कि इस प्रकार रामकथा अनेकरूप धारण करते हुए शनैः शनैः सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति में व्याप्त हो गयी । अर्थात् बुल्के की दृष्टि में वस्तुस्थिति के विपरीत भावुकतावशात् मिथ्याकल्पक मानव राम को विष्णु का अंश तथा विष्णु को परब्रह्म और भक्तवत्सल राम मानने लगे । सीता को लक्ष्मी से अभिन्न और फिर मूलप्रकृति मानने लगे । पर ये सब भारतीयों के प्रामाणिक वेद, रामायण आदि प्रमाणों को झुठलाने की ही कुटिल कुचेष्टा है । वे कपटपूर्ण शब्दों में यह भी कहते जाते हैं—“उसकी ( रामकथा की ) अद्वितीय लोकप्रियता निरन्तर अक्षुण्ण ही नहीं वरन् शताब्दियों तक बढ़ती रही, क्योंकि मानवहृदय को आकर्षित करने की जो शक्ति रामकथा में विद्यमान है वह अन्यत्र दुर्लभ ही है", परन्तु ऐसा क्यों ? उसका उत्तर उनके पास नहीं है । परन्तु भारतीय दृष्टिकोण से उत्तर स्पष्ट है कि राम और कृष्ण की कथा केवल वाग्विलास या कण्ठशोषणमात्र नहीं है वह अनुपम शांति, भक्ति तथा मुक्ति देनेवाली है । इसी कारण उसकी लोकप्रियता है । श्रीभागवत में स्पष्ट उल्लेख है; शुकदेवजी कहते हैं— मैंने बड़े-बड़े यशस्वी महापुरुषों की कथा वैराग्य और विज्ञान की विवक्षा से ही कही है । उसमें परमार्थ नहीं है; किन्तु कृष्ण में अमल भक्ति चाहनेवालों को चाहिये कि जो उत्तम श्लोक भगवान् का अमङ्गलघ्न गुणानुवाद नित्य ही सन्तों में संगीयमान होता है, उसे ही सुनें— “कथा इमास्ते कथिता महीयसां विताय लोकेषु यशः परेयुषाम् । वैराग्यविज्ञानविवक्षया विभो वचोविभूतिर्न तु पारमार्थ्यम् ।। यस्तूत्तमश्लोकगुणानुवादः संगीयतेऽभीक्ष्णममङ्गलघ्नः । तमेव नित्यं शृणुयादभीक्ष्णं कृष्णेऽमलां भक्तिमभीप्समानः ।।”(भाग० १२।३।१४,१५) भारतीय साहित्य में वर्णित रामकथा का आदर्श ठीक यही है कि रामचरित स्वच्छ मनोवृत्ति प्रदान करता है । जैमिनीयाश्वमेध ( ३६।४४ ) “सर्वे धर्माः समुद्दिष्टाः वर्णाश्रमविभागतः ।” बृहद्धर्मपुराण ( २६।९ ), मम्मट का भी यह कहना ठीक ही है कि रामादि के समान ही वर्तना चाहिए रावणादि के समान नहीं— “रामादिवद् वर्तितव्यं न रावणादिवत्” ( काव्य प्रकाश १।२) । पद्मपुराण ( पाताल- खण्ड अ० ३६ ) के अनुसार रामचरित में पातिव्रत्य, भ्रातृस्नेह, गुरुभक्ति, स्वामिसेवा आदि का आदर्श प्रस्तुत है ।
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ७१९ "यस्मिन् धर्मविधिः साक्षात् पातिव्रत्यं तु यत्स्थितम् । भ्रातृस्नेहो महान् यत्र गुरुभक्तिस्तथैव च ॥ स्वामिसेवकयोर्यत्र नीतिमूर्तिमती किल । अधर्मकरशास्तित्वं यत्र साक्षाद् रघूद्वहात् ॥” (वा० रा० ११८, १२८) क्या ही अच्छा होता यदि बुल्के अकुटिलभाव से राम के इसी आदर्श का प्रतिपादन करते । वाल्मीकि- रामायण में भी राम को विग्रहवान् धर्म ही कहा गया है- "रामो विग्रहवान् धर्मः” । श्रीभागवत आदि में मनुष्यों को धर्मशिक्षण देकर लोकसंग्रह करना ही राम के अवतार का मुख्य प्रयोजन कहा गया है । गीता के कृष्ण भी पूर्ण ब्रह्म होते हुए भी लोकसंग्रहदृष्टि से वर्णाश्रमनानुसार कर्म करते हैं- “यदि ह्याहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।” ( गीता० ३।२३ ) “उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।” ( गीता० ३।२४ ) सीता का पातिव्रत्य, राम का आज्ञापालन, लक्ष्मण का भ्रातृप्रेम, दशरथ की सत्यसन्धता, कौशल्या का वात्सल्य आदि आदर्श लोकशिक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण हैं । अतः रामकथा में कथावस्तु भगवद्गुणवर्णन भक्ति-मुक्तिप्रद होने के साथ-साथ आदर्श जीवन का एक महान् मार्गप्रदर्शन भी है । बुल्के रामकथा को विकास, कल्पना, परिवर्तन और परिवर्धन मानते हैं । और कहते हैं उसे भारतीय प्रतिभा शताब्दियों से परिष्कृत करती चली आ रही है । परन्तु भारतीय प्रतिभा सदा तथ्य तत्त्व की पक्षपातिनी रही है । मिथ्या कल्पना की नहीं 'तत्त्वपक्षपातो हि धियां स्वभावः ।' तत्त्वपक्षपात बुद्धियों का स्वभाव होता है । बुल्के कहते हैं कि "कैकेयी की कुटिलता वाल्मीकिरामायण में स्पष्ट वर्णित है । आगे चलकर उसे निर्दोष ठहराने के लिए अनेकों उपायों का सहारा लिया गया है ।” पर यह भी गलत है, क्योंकि इन बातों का समुचित समाधान रामचरितमानस में भी है और अध्यात्म- रामायण में भी । सबसे मुख्य बात तो यह है कि रावणत्रस्त देवताओं की प्रार्थना पर ही परब्रह्म विष्णु मनुष्यरूप में अवतीर्ण हुए थे । उनकी सहायता के लिए देवता वानर और भालू रूप में अवतीर्ण हुए थे । परन्तु यदि कैकेयी वनवास का आग्रह न करती, सीताराम का वनवास न होता एवं सीता-हरण न होता तो रावणवध आदि कार्य कैसे होते ? और रामायण का आविर्भाव भी कैसे होता ? तुलसीदासजी ने कहा है- “दोस देहिं जननिहिं जड़ तेई । जिन गुरु साधुसभा नहिँ सेई ॥” (रा० मा० २।२६१।४) वालिवध को न्यायसङ्गत स्वयं वाली ने ही स्वीकार किया था। पर बुल्के उन अंशों को प्रक्षिप्त मान लेते हैं। जो अपने हठ को सिद्ध करने के लिए आर्ष प्रमाण को झुठलाना चाहता है और जिसने समाधान न मानने की प्रतिज्ञा कर रखी हो उसे कौन समझा सकता है ? तुलसीदास के अनुसार राम कहते हैं- “अनुजवधू भगिनी सुतनारी, सुन सठ ये कन्यासम चारी । इन्हहि कुदृष्टि विलोकै जोई, ताहि बधे कछु पाप न होई ॥ मूढ़ तोहि अतिसय अभिमाना, नारिसिखावन करसि न काना । मम भुजबल आश्रित तेहि जानी, मारा चाहसि अधम अभिमानी ॥” (रा० मा० ४।८।४)
७२० रामायणमीमांसा विश अन्त में वाली कहता है— "सुनहु राम स्वामी सन, चल न चातुरी मोरि । प्रभु अजहुँ मैं पातकी, अन्तकाल गति तोरि ॥” ( रा० मा० ४।९ ) वाल्मीकिरामायण में भी राम ने कहा— “भ्रातुर्वर्तसि भार्यायां त्यक्त्वा धर्मं सनातनम् । अस्य त्वं धरमानस्य सुग्रीवस्य महात्मनः ॥ रुमायां वर्तसे कामात् स्नुषायां पापकर्मकृत् ।” (वा० रा० ४।१८।१८,१९) “राजभिर्धृतदण्डाश्च कृत्वा पापानि मानवाः । निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥ शासनाद् वापि मोक्षाद् वा स्तेनः पापात्प्रमुच्यते । राजा त्वशासन् पापस्य तदवाप्नोति किल्बिषम् ॥” (वा० रा० ४।१८।३१,३२) अपराधी को दण्ड देना आवश्यक है । अपराधी से युद्ध करने का कोई प्रसङ्ग नहीं होता । निगृहीत अशस्त्र अपराधी को आज भी प्राणदण्ड दिया ही जाता है । मृगयाधर्म में भी सावधान, असावधान, युद्ध करता हुआ या न करता हुआ भी मृग मारा जा सकता है । उसमें कोई दोष नहीं है । “अयुद्धयन् प्रतियुद्ध्यन् वा यस्माच्छाखामृगो ह्यसि । ( वा० रा० ४।१८।४१ ) एतावता अदृष्ट होकर मारना भी पाप नहीं, क्योंकि दण्डार्थ वध में दर्शन अपेक्षित नहीं है । वाली सन्ध्यो- पासनादि करता था और शास्त्रज्ञ था, इस दृष्टि से पूर्वोक्त समाधान है । यदि केवल शाखामृगमात्र है तो भी प्रच्छन्नवध में कोई दोष नहीं है, क्योंकि तृणच्छन्न श्वभ्रादि के निर्माण द्वारा विश्वस्त स्वपालित मृगों से युद्धादि करते हुए भी मृगों को राजर्षि लोग क्षत्रिय-स्वभावात् मृगया में मारते हैं । इन कार्यों में कोई बड़ा दोष नहीं होता । किन्तु प्राणायामादि से अपनेय स्वल्प ही दोष होता है। तुमने सुग्रीव के जीते हुए उसकी भार्या रुमा को सनातन धर्म छोड़कर भार्या बना लिया है । राजा का कर्तव्य है, तुम्हें दण्ड दे, दण्ड से शुद्ध होकर अपराधी स्वर्ग का भागी होता है । राजा दण्ड दे या छोड़ दे अपराधी शुद्ध हो जाता है । परन्तु दण्ड न देनेवाला राजा उस पाप का भागी होता है । राम का वचन सुनकर भगवान् में मिथ्या दोषारोपण से वाली व्यथित हुआ और धर्म का तत्त्व जानकर उसने राम के प्रति दोष का अनुसन्धान नहीं किया— “एवमुक्तस्तु रामेण वाली प्रव्यथितो भृशम् । न दोषं राघवे दध्यौ धर्मेऽधिगतनिश्चयः ।।” ( वा० रा० ४।१८।४५ ) इस तरह वाली स्वयं राम को निर्दोष समझकर उनके प्रति किये गये दोषारोपण के कारण अत्यन्त प्रव्यथित होता है और राम में दोष का ध्यान ( चिन्तन ) भी नहीं करता । फिर भी बुल्के, भदन्त कौसल्यायन आदि हठात् राम को दोषी मानते हैं और इन समाधानों तथा वाली के सन्तुष्टि आदि के बोधक वचनों को क्षेपक कहने का दुःसाहस करते हैं, जिसे सुस्त गवाह चुस्त वाग्मी कहावत ही कहा जा सकता है । परन्तु यह सर्ग परम्परा प्राप्त है और टीकाकारों द्वारा व्याख्यात है, अतः इसे प्रक्षेप कहना सर्वथा असङ्गत है । नाटकों में रोचकता तथा रसाभिव्यक्ति के लिए ही राम से वाली का द्वन्द्वयुद्ध वर्णित है ।
अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ७२१ बुल्के कहते हैं "रामभक्ति के प्रादुर्भाव से रामकथा का समस्त वातावरण बदल दिया गया । तथा विभिन्न पात्रों की उग्रता तथा कुटिलता रामभक्ति में लीन कर दी गयी । दुष्ट राक्षस रावण भी पतितपावन राम के प्रभाव से पवित्र हो जाता है । इस प्रकार भारत की समस्त आदर्श भावनाएँ रामकथा में मर्यादापुरुषोत्तम राम तथा पतिव्रता सीता के चरित्रचित्रण में केन्द्रीभूत हो गयीं । फलस्वरूप रामकथा भारतीय संस्कृति के आदर्शवाद का उज्ज्वलतम प्रतीक बन गयी ।" इस सम्बन्ध में इतना ही कहना है कि रामभक्ति का यह चमत्कार स्वाभाविक है, परन्तु वह रामभक्ति वेदादि शास्त्रों से वर्णित अनादि एवं नित्य ही है । वह विकास का परिणाम नहीं है । रामकथा का वातावरण सदा से ही व्यावहारिक आदर्श मर्यादामय और पारमार्थिक भक्ति-भावनामय रहा है । भक्ति के प्रभाव से कुटिलता एवं उग्रता नष्ट होकर सरलता एवं नम्रता के रूप में परिणत होती ही है । "पायी न केहि गति पतितपावन राम भजि सुनु सठ मना ।" ( रा० मा० ७।१२९ के बाद छन्द ) रामकथा अनादिकाल से ही मर्यादापुरुषोत्तम, भक्तवत्सल, पतितपावन राम तथा अनन्तब्रह्माण्डों की ऐश्वर्य और माधुर्य की अधिष्ठात्री, पतिव्रता सीता के चरित्रचित्रण में ही पर्यवसित है । अतएव सदा से ही रामकथा भारतीय आदर्श का उज्ज्वलतम प्रतीक है और रहेगी ।
एकविंश अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख मर्यादापुरुषोत्तम राम तथा जगज्जननी जानकी के प्रति वनमानव द्वारा प्रयुक्त अत्यन्त अशोभन अभद्र शब्दों का उत्तर इसी प्रकार गणेशचन्द्र जोशी मन्वन्तर ने वनमानव महाकाव्य लिखकर जनकजा एवं अशोकवासिनी दो भागों में प्रकाशित किया है, जिसे राजस्थान सरकार ने उच्च माध्यमिक विद्यालयों में पाठ्यपुस्तकों में सम्मिलित किया है। जनकजाखण्ड के आपत्तिजनक अंश निम्नोक्त हैं। सम्पूर्ण पुस्तक कई प्रयत्न करने पर भी प्राप्त नहीं हुई। पृष्ठ ( १ ) सीता विद्रोहिणी थी न कि पतिपरायणा ५ ( २ ) सीता राम के साथ विवाह से असन्तुष्ट थी १८२—१८४ ( ३ ) राम प्रपंचक थे १६३ ( ४ ) बाल्मीकि और तुलसी खुशामदी थे १६६ ( ५ ) राम दासता के समर्थक थे १६८ ( ६ ) राम को आदर्श कहकर भक्त कवियों ने पाषण्ड का बाजार जोड़ा है १७१ ( ७ ) राम दशरथ के नहीं वरन् वसिष्ठ के वीर्य से उत्पन्न थे १७४ ( ८ ) राम छली थे १७७ ( ९ ) लक्ष्मण सीता के अनुगामी और द्विवर थे १७८ ( १० ) सीता स्वयं रावण के साथ गयी २०७—२०८ ( ११ ) सीता रावण के ही योग्य थी १८८ ( १२ ) सीता रावण को चाहती थी १९२—२०१ ( १३ ) सीता लक्ष्मण की प्रेमिका थी १९२ ( १४ ) सीता वन से लौटने को तैयार न थी १९७ ( १५ ) राम का वनगमन नाटकमात्र था १९५—१९६ ( १६ ) सीता लङ्का में रहने को लालायित थी १९९ ( १७ ) लक्ष्मण सीता पर आसक्त थे २०१ ( १८ ) राम स्तेनवृत्ति के थे २०७—२०८ ( १९ ) सीता जनक की नहीं किसी अन्य की जायी थी ( २० ) लक्ष्मण व रावण में सीता के प्रति प्रेम की प्रतियोगिता थी २१५ ( २१ ) सीता के तीन प्रेमी राम, रावण और लक्ष्मण २१६ ( २२ ) लव लङ्का का वंशज था २२० ( २३ ) सीता की तुलना गधी से २२२ ( २४ ) सीता रावण एवं लङ्का पर मुग्ध थी २६२—२६३