भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 783

वानर, भालू सभी एकत्रित थे । उस समारोह में रामायण के प्रचार तथा सीताचरित्र की शुद्धि के प्रचार का उत्तम अवसर था । रामायण की विशेषतः अयोध्याकाण्ड की घटनाओं को आँखों देखनेवाले लोगों की संख्या भी कम नहीं थी । उस बीच में रामायण की घटनाओं का गान हर दृष्टि से महत्त्वपूर्ण ही था । उसका परिणाम भी वैसा ही हुआ । सारे समाज को सीता का लोकोत्तर चरित्र और महत्त्व विदित हुआ । स्थालीपुलाकन्याय से अयोध्याकाण्ड की घटनाओं का सत्य वर्णन सुनकर जनता को रामायण के अन्य काण्डों, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड एवं सुन्दरकाण्ड की घटनाओं पर विश्वास होना स्वाभाविक ही था । फलतः सीता की अनन्य रामभक्ति, अखण्ड पातिव्रत्य तथा अप्रतिम तेज पर भी विश्वास हुआ । लोगों की समझ में आ गया कि जो सीता हनुमान् की रक्षा के लिए अग्नि को भी शीतल होने (शीतो भव हनुमतः) का आदेश दे सकती थी वह सीता अपने पातिव्रत्य के तेज से रावण को भी भस्म होने का (भस्मीभूतो भव का) शाप दे सकती थी । उसने स्पष्ट कहा भी तो था— "असन्देशात्तु रामस्य तपसश्चानुपालनात् । न त्वां कुर्मि दशग्रीव भस्म भस्मार्हतेजसा ॥" दशग्रीव, राम का सन्देश न होने तथा तपस्या के पालन के उद्देश्य से मैं अपने तेज से तुझे भस्म नहीं कर रही हूँ । बुल्के का यह कहना निस्सार है कि "वाल्मीकिकृत आदिरामायण ग्रन्थ राम के अभिषेक तथा उनके ऐश्वर्य- शाली राज्य के वर्णन पर समाप्त होता था । इस सुखान्त कथावस्तु में आगे चलकर उत्तरकाण्ड जोड़ दिया गया जिससे कि प्रचलित रामायण ग्रन्थ दुःखान्त हो गया । इसका परिणाम यह हुआ कि बाद की रामकथाओं को पुनः सुखान्त बनाने के प्रयत्न किये गये ।” परन्तु यह भी निस्सार है । सुखान्त कथावस्तु का होना उतना महत्त्वपूर्ण नहीं होता जितना कि चरित्रनायक के जन्मादि पूर्वभाग एवं पुत्र, पौत्रादि तथा साङ्गोपाङ्ग जीवन का वर्णन करना । यह भी समझना गलत है कि केवल सुखान्त बनाने की दृष्टि से ही मिथ्या कल्पना करके सीता का अयोध्या लौट आना वर्णित किया गया है । इस मिथ्या कल्पना की अपेक्षा शतकोटिप्रविस्तर रामायण एवं पुराणादि में उक्त कल्पान्तरीय चरित्रों में भेद अङ्गीकार करना उचित है । तथा च किसी कल्प में वस्तुतः सीता का पुनः राम के साथ अयोध्या प्रत्यावर्तन मानना ही उचित है । आर्ष ग्रन्थों का अप्रमाण कहने का दुस्साहस बुल्के ही कर सकते हैं । कोई आस्तिक भारतीय वैसा नहीं कर सकता । अतएव यह सही नहीं है कि "वाल्मीकिकृत रामायण के विकास तथा उसके कथानक पर विभिन्न प्रभावों के परिणामस्वरूप विस्तृत रामकथा-साहित्य में वैभिन्य आया है", क्योंकि विभिन्न प्रभावों एवं विकासों का अन्तिम अर्थ है— वस्तुस्थिति के विपरीत मिथ्या कल्पना । इसमें और अप्रामाणिक में कोई अन्तर नहीं है । ऐसे छलछद्मपूर्ण शब्दों के प्रयोग की अपेक्षा अप्रामाण्य कह देना कहीं श्रेष्ठ है । किन्तु पुराणों की दृष्टि से कल्पभेद की कथा वस्तुस्थितिमूलक है । जो पूर्वजन्म तक में विश्वास नहीं करते, यह सिद्धान्त उनके गले भले ही न उतरे, परन्तु आस्तिक भारतीय के लिए वैसा स्वीकार करने में कोई बाधा नहीं है । जनसाधारण में प्रचलित सर्वथा भिन्न कथाओं का अस्तित्व स्वीकार करने की आवश्यकता न होती यदि उनका मूल प्रमाणभूत आर्ष पुराणों में न होता । पुराणों को आधुनिक या अर्वाचीन मानना पाश्चात्यों के दुरभिसन्धि सहित दुस्संस्कारों का ही परिणाम है । अनु० ७७३ में बालकाण्ड, उत्तरकाण्ड तथा रामावतारविषयक सामग्री, कनकमृग-वृत्तान्त, सुग्रीव द्वारा वानरों के प्रेषण के समय दिग्वर्णन, लङ्कादहन, हनुमान् की हिमालय-यात्रा, अग्नि-परीक्षा, पुष्पक विमान द्वारा अयोध्या- यात्रा आदि को बुल्के प्रक्षेप कहते हैं । जो कि दुस्साहस ही है । यथास्थान उनके तत्सम्बन्धी तर्कों का खण्डन किया गया है । इसी प्रकार अहल्योद्धार विकास, अवतारवाद विकास, राम के बालचरित्र पर कृष्ण की बाललीलाओं का प्रभाव,