रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 784, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंसीता-स्वयंवर के विकास, सीता-जन्मकथा के बाहुल्य, मायासीता का हरण, वाली और सुग्रीव की जन्मकथा, सौदास, शम्बूकवध, रावणचरित, हनुमान् के जन्म की कथा, सीता त्याग, कुश-लवचरित आदि अनेक विषय ऐसे हैं जिनके अभाव में राम की कथा अधूरी ही रह जाती है। परन्तु बुल्के इन सभी विषयों को विकास, परिवर्धन आदि के नाम से मिथ्या कल्पना एवं अप्रमाण कहते हैं। हमने उक्त विषयों का यथास्थान उपपादन करके बुल्के के तर्कों का खण्डन कर दिया है। “प्रामाणिक काण्डों की सुव्यवस्थित कथावस्तु पर वाल्मीकि की प्रतिभा की गहरी छाप है” इत्यादि बुल्के का कथन मायाजालमात्र है। सुन्दरकाण्ड के उत्तमोत्तम वर्णन, जिनको कोई भी भारतीय विद्वान् महत्त्वपूर्ण मानेगा, उनमें बुल्के को वाल्मीकि की प्रतिभा की छाप दिखायी नहीं देती। वे उसे धड़ल्ले से प्रक्षेप कह देते हैं। जब आदि- रामायण नाम की कोई सर्वसम्मत वस्तु है ही नहीं, तब “अतिशयोक्ति का अभाव, सन्तुलन तथा स्वाभाविकता उसके विशेष गुण हैं” यह भी कैसे सिद्ध होगा ? प्रचलित रामायण ही वाल्मीकि की कृति है। उसी के आधार पर उनकी विशेषता कही जा सकती है। उससे अतिरिक्त वाल्मीकि का परिचय एवं उनकी कृति का ज्ञान बुल्के को किस तरह हुआ इसे तो वही जान सकते हैं । यदि प्रचलित रामायण से अतिरिक्त वाल्मीकि की कोई सर्वसम्मत कृति उपलब्ध होती, तभी उसे कसौटी मानकर उसके आधार पर प्रचलित रामायण में काट-छांट की कल्पना कथंचित् सङ्गत कही जा सकती थी। परन्तु खपुष्पतुल्य अप्रामाणिक कसौटी से प्रत्यक्ष विद्यमान रामायण के मुख्य विषयों का अपलाप करना सर्वथा निष्प्रमाण ही है। वाल्मीकिरामायण से यह तो स्पष्ट ही है कि राम और उनका चरित्र वैदिक संस्कृति से प्रभावित है। वेद का प्रामाण्य और आदर रामायण में स्पष्टतः परिलक्षित होते हैं। अर्थवाद वेदों में भी विद्यमान है— “अनङ्गुलिरवयत् अमूर्धा प्रत्यमुञ्चत अन्धो मणिमविन्दत ।” तब रामायण में अर्थवाद क्यों न होगा ? इसके अतिरिक्त हनुमान् का समुद्रलङ्घन यदि अतिशयोक्ति है तब उसका वर्णन भी आपकी तथाकथित आदिरामायण में नहीं होना चाहिये। यदि किसी बड़े लङ्घन को ही समुद्र- लङ्घन कहना है तब तो आदि कवि की कृति को मिथ्या ही कहना है। यदि समुद्रलङ्घन हनुमान् के लिए सम्भव है तब हिमालय-यात्रा भी असम्भव एवं असङ्गत क्यों कही जाय ? और यदि यह सब संभव है तब तो हनुमान् द्वारा फल समझ कर सूर्य को पकड़ने के लिए छलाँग लगाना, इन्द्र के द्वारा वज्र से आहत होकर भी न मरना और ब्रह्मा, इन्द्र यदि देवताओं द्वारा विविध वरदान पाना भी अतिशयोक्ति क्यों ? और उसका आदिरामायण में अभाव क्यों ? काव्यों में अद्भुत रस भी एक आदरणीय रस है। यदि अलौकिक घटनाओं का बाहुल्य है तो उसका वर्णन दूषण नहीं भूषण ही है। अतएव दशरथ-यज्ञ, ‘भूमिजा सीता की कथा तथा राम-विश्वामित्र-संवाद का अपलाप सिर्फ अलौकिकता के कारण नहीं किया जा सकता । यही स्थिति वाली और सुग्रीव की जन्मकथा, सीता के भूमि-प्रवेश आदि के सम्बन्ध में भी है। जिन्हें भारतीय वेदों, महाभारत, रामायण तथा पुराणों का परिचय है और उनके प्रामाण्य और अप्रामाण्य के विवेचन की बुद्धि है और जो ईश्वर की शक्ति से अनन्त ब्रह्माण्डों के निर्माण में विश्वास रखते हैं, उनकी दृष्टि में रामजन्म के समय अलौकिक घटनाओं का होना, राम का अपना स्वरूप दिखाना आदि सब कुछ सङ्गत ही है। इसी तरह अवतारवाद एवं राम की भक्ति को भी विकास मानना निराधार है। वाल्मीकिरामायण से ही सिद्ध है कि राम विष्णु या परब्रह्म हैं तब तो वे मुक्तिदाता हैं ही। इसमें वैसा चित्रण करना भावुकता या मिथ्या कल्पना नहीं है। इसी तरह शापों और वरों की भी कोई कल्पना नहीं कर ली गयी, किन्तु सर्वज्ञकल्प महर्षियों ने ऋतम्भरा प्रज्ञा से हस्तगत आमल के तुल्य सभी विषयों का अपरोक्ष साक्षात्कार कर के ही वैसा लिखा