भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 785

७०८ रामायणमीमांसा विंश है। "नाम पहले प्रसिद्ध होता है, कथा बाद में बनती है" यह सिद्धान्त ही गलत है। गौण नाम गुण के आधार पर होते हैं, जैसे पाककर्ता होने पर पाचक, छिदिक्रिया का कर्ता होने से ही छेत्ता आदि हो जाता है। वेदों का सयुग्वा रैक्व नाम भी गौण ही है। महर्षि का स्वाभाविक नाम रैक्व था। शकट साथ रखने के कारण बाद में उन्हें सयुग्वा कहा गया। कई स्थलों पर कोई सर्वज्ञकल्प ऋषि या देवता भविष्य के कार्यों के अनुसार पहले से ही वैसा नाम प्रसिद्ध करते हैं, परन्तु यह सर्वथा मिथ्या है कि नाम के आधार पर मिथ्या कथा की कल्पना कर ली जाती है, अतः विश्वभर में एटिमोलोजिकलेजेंटस गौण नामों के सम्बन्ध में होता है। मुख्य नामों में वैसा नहीं होता। हाँ कहीं-कहीं मुख्य नाम लुप्त हो जाते हैं। कथाओं एवं घटनाओं के नाम पर होनेवाले गौण नाम ही मुख्य नाम हो जाते हैं। वस्तुतः कथाओं एवं घटनाओं के आधार पर होनेवाले नामों को समाख्या कहा जाता है—जैसे वेदों की काठक आदि समाख्याएँ कठादि महर्षियों से किसी कल्प में प्रथम प्रवचन होने के कारण उन्हें काठक कहा जाता है। परन्तु कई समाख्याएँ निरर्थक भी होती हैं। सात पत्तोंवाले पत्र होने के कारण सप्तच्छद कहा जाता है। परन्तु अश्वकर्ण आदि समाख्याओं का अपने अवयवार्थ के साथ कोई भी सम्बन्ध नहीं है, वह निरर्थक रूढ़िमात्र है। घोड़े के कान की तुलना उसमें कुछ भी नहीं है। अश्वकर्ण शब्द वृक्षविशेष में रूढ़ है। अतएव रामावतार, रामवनवास आदि वर, शाप आदि के कारण काल्पनिक नहीं हैं, किन्तु वस्तुस्थितिमूलक ही हैं। और सब आर्ष वचनों से प्रमाणित हैं। राम, सीता, लक्ष्मी और अहल्या के सम्बन्ध की कथाएँ जो आर्ष ग्रन्थों पर आधृत हैं सभी प्रामाणिक हैं। इस सम्बन्ध में बुल्के की सभी दुष्कल्पनाएं निष्प्रमाण एवं निस्सार ही हैं। सीता शब्द लाङ्गल-पद्धति का बोधक होता हुआ भी लाङ्गलपद्धति या कृषि की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण जनकनन्दिनी में सीता शब्द का प्रयोग हुआ है। जैसे ऐश्वर्य के योग से वैदिक इन्द्र शब्द देवराज में अन्वर्थ है वैसे ही प्रकृत में भी समझना चाहिये। पद्मा लक्ष्मी का नाम है, इस आधार पर पद्मजा सीता की कल्पना कर ली गयी है बुल्के की यह कल्पना भी निस्सार है। पद्मवत् अङ्गसौष्ठव के कारण पद्मजा इव होने से गौणी वृत्ति से ही सीता में पद्मजा नाम उपपन्न है। हनुमान्, रावण, राक्षस, यक्ष, मेघनाद, इन्द्रजित्, कुश, लव, वाली, सुग्रीव, कल्माषपाद, अहल्या, वेदवती, सुर, असुर आदि नाम सकारण हैं और इन्हीं कारणों से गुणकृत गौण नाम हैं। यह नहीं कि नामों के अनुसार मिथ्या कथा गढ़ी गयी है। तीर्थमाहात्म्य दिखलाने के उद्देश्य से उनका सम्बन्ध रामकथा के प्रधान पात्रों से जोड़ा नहीं गया, किन्तु वस्तुस्थिति ही वैसी थी। राम, सीता आदि के विशेष सम्बन्धों के द्वारा उन तीर्थों का महत्त्व वर्णित हुआ है। जैसे अमुक तीर्थों के सम्बन्ध से अमुकों के अमुक दोष दूर हो गये, इसलिए तीर्थ का महत्त्व वर्णित किया जाता है। जैसे अमुक तीर्थ स्नान से किसी विशिष्ट पुरुष की मुक्ति हो जाने से उसका पिशाचमोचन नाम हो गया। अतएव रावण ने गोकर्ण में तपस्या की थी तथा महोदेव से आत्मलिङ्ग प्राप्त कर उसे गोकर्ण में पृथ्वी पर रखकर खो दिया था। "उक्त कथा कल्पनामात्र है" इस कथन में कोई दम नहीं है। अवश्य ही अर्थवादों में कई काल्पनिक आख्यान होते हैं, परन्तु यह जानना चाहिये कि अर्थवाद एक ही तरह का नहीं होता है। प्रमाणान्तर- विरुद्ध अर्थवाद ही गुणवाद होने के कारण काल्पनिक आधार पर माना जाता है। प्रमाणान्तर सिद्ध अर्थ का बोधक अर्थवाद अनुवाद कहलाता है। उसका अर्थ लोकसिद्ध वस्तुस्थिति के अनुसार होता है। प्रमाणान्तर से असिद्ध एवं प्रमाणान्तर से अविरुद्ध अर्थ का बोधक अर्थवाद भूतार्थवाद कहलाता है। उसका स्वार्थ में प्रामाण्य ही होता है। विभीषण को जगन्नाथ या रङ्गनाथ की उपासना का उपदेश विरुद्ध नहीं है। यह भेद एक ही देवता के दो नाम होने से भी सङ्गत हो जाता है। कल्पभेद से भी दोनों पक्षों की प्रामाणिकता सिद्ध होती है। वराहपुराण तथा आनन्दरामायण (७।६।४२-४५) के अनुसार रावण ने इन्द्र को पराजित कर उनके यहाँ से वराहमूति को ले जाकर लङ्का में स्थापित किया था। विभीषण ने उसे राम को प्रदान किया। राम ने उसे मथुरा में स्थापित किया। ब्रह्मपुराण के अनुसार रावण ने वासुदेव-प्रतिमा की चोरी की थी। राम