रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 786, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय॑ रामचरितसिंहावलोकन ७७५ ने अयोध्या ले जाकर स्वर्गारोहण से पूर्व उसे समुद्र को अर्पित कर दिया था। कृष्णावतार के समय सागर ने उसे पुरुषोत्तमक्षेत्र में स्थापित किया था। पद्मपुराण में वामनमूर्ति के सम्बन्ध में कहा गया है कि राम ने उसें विभीषण से प्राप्त कर के कान्यकुब्ज में स्थापित किया था। उपर्युक्त कथाओं को भी काल्पनिक मानने में कोई तर्क नहीं है। वराहमूत्ति तथा वासुदेवप्रतिमा को एक ही मानना आवश्यक नहीं है। दोनों को स्वतन्त्र दो घटनाएँ हीं समझना चाहिये। वामनमूर्ति की घटना भी तीसरी स्वतन्त्र ही है। अनु० ७८१ में बुल्के कहते हैं कि “आदिरामायण के वक्ता वाल्मीकि ही हैं, किन्तु प्रचलित बालकाण्ड कें प्रथम सर्ग के अनुसार नारद वाल्मीकि को राम-कथा का संक्षिप्त वर्णन सुनाते हैं। इसी के आधार पर वाल्मीकि नें रामायण की रचना की है।" परन्तु बुल्के की प्रथम उक्ति में कोई प्रमाण नहीं है। परम्परा के अनुसारें ही सभी भारतीय विद्याएँ प्रचलित होती हैं। वाल्मीकिरामायण के प्रथम सर्ग में इसका प्रमाण भी है। यदि इस प्रत्यक्ष उल्लेख पर अविश्वास करें तभी बुल्के की बातों में विश्वास किया जा सकता है, पर आर्ष वचन में अविश्वास का कोई कारण ही नहीं है। बुल्के की अविश्वसनीयता तो निराधार एवं प्रमाणविरुद्ध होने से भी सिद्ध ही है। रामोपाख्यान में मार्कण्डेय ने भी युधिष्ठिर के प्रति परम्परा से ही रामकथावर्णन किया था। वाल्मीकिरामायण के अनुसार वाल्मीकि ने उसे कुश-लव को प्रदान किया। बुद्ध भले ही जातकों के वक्ता हों, परन्तु भारतीय परम्परा में तो संस्कृत तथा प्राकृत सर्वत्र परम्परा से ही आदृत है। रामचरितमानस में भी परम्परा का ही आदर किया गया है। अनु० ७८२ में बुल्के कहते हैं कि “जैनी रामकथाओं का आधार प्रचलित वाल्मीकिरामायण ही है। किन्तु जैन कवियों ने ब्राह्मण-रामकथा को अपनाकर उसमें बहुत से परिवर्तन किये हैं। इसी से अन्य रामकथाओं में परिवर्तन आये हैं।" बुल्के की पहली बात तो ठीक है, पर दूसरी ठीक नहीं, क्योंकि पुराणों की कुछ रामकथाओं के भेद कल्पभेद पर ही निर्भर हैं। बुल्के के अनुसार “सीता-स्वयंवर के अवसर पर अन्य राजाओं की उपस्थिति, राम द्वारा धनुर्भङ्ग, कैकेयी का पश्चात्ताप, लङ्का में विभीषण से हनुमान् की भेंट, लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा के पुत्र का वध, युद्ध के पूर्व राक्षस-राक्षसियों के संभोग शृङ्गार का वर्णन, रामसेना से कुश और लव का युद्ध वर्णन, वसुदेवहिण्डि में सीता का रावण-पुत्री के रूप में उल्लेख एवं सीतात्याग के प्रसङ्ग में रावण-चित्र का उल्लेख विकास है।” परन्तु यह सब भी असङ्गत है, कारण कि नृसिंहपुराण (अ० ४७), भागवतपुराण (९।१०), अध्यात्मरामायण (१।६।२४) आदि में सीता-स्वयंवर में अन्य राजाओं की उपस्थिति में राम धनुष चढ़ाते हैं। नृसिंहपुराण आदि को पउमचरियं से अर्वाचीन मानना बुद्धि का विपर्यास ही है। पद्मपुराण (पातालखण्ड अ० ११२) में भी सीता-स्वयंवर के आयोजन का उल्लेख है। उसमें भी सब राजाओं के समक्ष राम धनुष तोड़ते हैं। शिव से अजगव धनुष मिला था। उसे अन्य कोई राजा उठा नहीं सका। रामचरितमानस आदि ने पुराणों का ही अनुसरण किया है, पउमचरियं का नहीं। इसी तरह कैकेयी का पश्चात्ताप भी धर्मखण्ड (अ० ३८) और तत्त्वसंग्रहरामायण (अ० २।११) से सिद्ध है। अयोध्यावासियों का दुःख देखकर वह द्रवित होती है और राम की आराधना करके क्षमा भी माँगती है। अध्यात्मरामायण में भी यह चर्चा है। इसी तरह आनन्दरामायण (१।९।२४) में लङ्का में हनुमान् और विभीषण की भेंट का वर्णन है। अध्यात्मरामायण (१।७।४१) में शूर्पणखा का पुत्र साम्ब ब्रह्मा से दिव्य खड्ग प्राप्त करता है। उसी खड्ग द्वारा वह लक्ष्मण द्वारा मारा जाता है। इसका भी आधार पउमचरियं नहीं है। आनन्दरामायण (६।८) तथा जैमिनीयाश्वमेध (अ० २९।३६) के अनुसार लव राम के यज्ञाश्व को बाँधते हैं। सैनिकों को परास्त करते हैं। शत्रुघ्न द्वारा लव पराजित होते हैं एवं कुश द्वारा शत्रुघ्न भी पराजित होते हैं। पद्मपुराण (पातालखण्ड अ० ६०-६४) में भी यह वृत्तान्त है।