भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 787

७१० रामायणमीमांसा विश प्रायः वैदिक लोग प्राचीन रामायणों, पुराणों तथा वाल्मीकिरामायण, महाभारत आदि से ही रामचरित्र का वर्णन करते हैं । उनके विश्वास के अनुसार जैसे श्वचर्म-दृति (कुप्पी) में निक्षिप्त कपिला-क्षीर भी अग्राह्य होता है उसी तरह अवैदिक मुखों से निःसृत अहिंसा, सत्य तथा रामचरित्र आदि भी अग्राह्य ही हैं। इसी दृष्टि से रामचरितमानस में स्पष्टरूप से कहा गया है कि—नाना पुराण, निगम, आगम तथा तदनुसारी सन्तों के आधार पर ही रामचरितमानस की रचना हुई है। जैन, बौद्ध आदि ग्रन्थ उसके आधार नहीं हैं । “नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद् रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि ।” अनु० ७८३ में बुल्के का यह कहना गलत है कि “वाल्मीकिरामायण के युद्धकाण्ड में जो शिवप्रतिष्ठा का निर्देश है वह केवल आल्मीकिरामायण दाक्षिणात्य पाठ में मिलता है, इसलिए प्रक्षिप्त है ।” क्योंकि आपका हेतु असिद्ध है । राम के विष्णु या परब्रह्म होने की बात तो तीनों पाठों में मिलती है तो भी आप उसे प्रक्षिप्त मानते हैं । यदि शिवप्रतिष्ठा की बात भी तीनों पाठों में मिलती तो भी आप उसे प्रक्षिप्त ही कह सकते थे । उत्तरकाण्ड की रावण सम्बन्धी शिवभक्ति को भी प्रक्षिप्त कहना ईसाइयत का उन्माद ही है। यह आवश्यक नहीं कि शिवभक्त होने पर ब्रह्मा वरदान नहीं दे सकते । महाभारत में कृष्ण द्वारा शिव की भक्ति का वर्णन है। अन्यत्र वहीं कृष्ण की शक्तिभक्ति का भी वर्णन है । शिव का हनुमान् रूप से अवतरित होना प्रमाणसिद्ध है । यह किसी प्रभाव से कल्पना नहीं है । प्रायः अनेक राम- कथाओं में राम की शिवभक्ति का उल्लेख है, उन सबको भ्रान्त या मिथ्या कल्पना मानना बुल्के का दुस्साहस ही है। उनकी ही कल्पना अगर बाइबिल के सम्बन्ध में जोड़ ली जाय तो फिर सारी बाइबिल एक मिथ्या कल्पना की पिटारी ही समझी जायेगी । पुराणों में ही नहीं, ऐतिहासिक दृष्टि से भी रामेश्वरम् का महान् शैव संस्थान राम की ही कृति है । वस्तुतः बुल्के की तथाकथित रामकथा शैव, वैष्णवों तथा रामभक्तों सभी के लिए चुनौती है । उन्होंने भी मैक्समूलर के समान ही यह ग्रन्थ लिखकर ईसाइयों को हिन्दूधर्म के खण्डन की सामग्री प्रस्तुत की है । जिसका कि मैंने पूर्णरूप से खण्डन करके आस्तिकों को सावधान किया है । शिवमहापुराण, पद्मपुराण आदि वैदिकों की दृष्टि में परम प्रमाण हैं । अतः शिव के आज्ञानुसार विष्णु का अवतार ग्रहण करना, पद्मपुराण के अनुसार राम का शिव से उनकी भक्ति मांगना आदि पूर्ण सङ्गत हैं। अतएव आनन्दरामायण आदि ग्रन्थों में राम तथा शिव की अभिन्नता का प्रतिपादन किया गया है । रामचरितमानस में भी स्पष्टरूप से कहा गया है— “शिवपद कमल जिनहिं रति नाहीं । रामहि ते सपनेहु न सुहाहीं ॥” इसी प्रकार शक्ति-प्रभाव के सम्बन्ध की बुल्के की कल्पना निर्मूल है। बृहद्धर्मपुराण, कालिकापुराण आदि भी प्रमाण ही हैं । अतएव कालिकापुराण (अ० ६२) में राम की विजय के लिए ब्रह्मा द्वारा देवी की पूजा का वर्णन है । देवीभागवत के अनुसार वर्षाकालीन देवी की पूजा का वर्णन है । कृष्णकथा का प्रभाव भी पुराणादि अविश्वास का ही भाव समझना चाहिये । बुल्के कहते हैं कि रामकथा के विकास में दो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तत्त्व ( अवतारवाद एवं भक्ति ) आ गये हैं । जिनके कारण कथा का समस्त वातारण ही धीरे-धीरे बदलता गया । कृष्णावतार तथा कृष्णभक्ति के अनुकरण पर ही इन दोनों तत्त्वों का रामकथा में प्रवेश हुआ ।” किन्तु बुल्के का सोचने का तरीका ही गलत है, और उनकी सभी बातें लगभग अन्योन्याश्रयादि दोषों से परिपूर्ण हैं । यदि उनकी कल्पना प्रमाणित हो जाय तभी वाल्मीकिरामायण में वर्णित राम का अवतारत्व और राम की भक्ति “प्रक्षिप्त” सिद्ध हो सकती है । साथ ही वे यह भी समझ नहीं पाते हैं कि इतिहास और पुराणों द्वारा वेदार्थ का उपबृंहण होता है । अतएव वे वैदिक साहित्य का सूत्रपात मानते हुए विष्णु-प्राधान्य को नहीं समझ