रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 788, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाते हैं। वेदों में शिक्षा और यज्ञोपवीत का उल्लेख है। परन्तु “वह क्या है, कहाँ धारण किया जाय ?" इसका निर्णय गृह्यसूत्रों से होता है। इसी तरह वेदों में अवतार का वर्णन तो है, परन्तु इसका विशेष ज्ञान वेदोपबृंहणभूत पुराणादि के बिना समझ में नहीं आ सकता है। अतः यह कहना निस्सार है कि "वेदों में अवतारों की विशेष पूजा का निर्देश नहीं है।" बुल्के कहते हैं कि “कृष्णावतार के कारण अवतारवाद की भावना विष्णु में ही केन्द्रीभूत होने लगी तथा जनता की धार्मिक चेतना में इसका महत्त्व बढ़ने लगा। बाद में राम भी कृष्ण की भाँति विष्णु के अवतार माने जाने लगे (अर्थात् यह सब अतात्त्विक है, कृष्णावतार का अनुकरणमात्र हैं)”। ये सब बातें वाल्मीकिरामायण में व्याप्त अवतारवाद को क्षेपक मानने पर ही निर्भर हैं। उसके क्षेपकत्व में बुल्के जैसे लोगों की निर्मूल कल्पनाओं को छोड़कर कोई भी आधार नहीं है। इस तरह यह कहना भी अशुद्ध है कि “भक्तिमार्ग को लेकर ही रामकथा विकसित तथा पल्लवित हुई है। बहुत बाद में रामभक्ति का आविर्भाव हुआ है और जिन रचनाओं में इसका प्रारम्भिक शास्त्रीय प्रतिपादन किया गया है, वे प्रायः कृष्णभक्तिविषयक भक्तिशास्त्रों, संहिताओं तथा उपनिषदों के आधार पर लिखे गये हैं। कृष्णभक्ति-संप्रदायों के अनुकरण पर ही रसिकसम्प्रदाय की उत्पत्ति हुई है।” क्योंकि वाल्मीकिरामायण, महाभारत, पुराण तथा पञ्चरात्र आदि आगमों में अति प्राचीनकाल से अवतारवाद एवं राम, कृष्ण, विष्णु तथा भगवती आदि की भक्ति वर्णित है। महाभारत के अनुसार स्वयं कृष्ण ने उपमन्यु आदि का शिष्यत्व ग्रहण कर शिव की भक्ति की थी। उपमन्यु आदि कृष्ण से भी प्राचीन शिवभक्त हैं। पुराण के अनुसार व्यास, वसिष्ठ, विश्वामित्र आदि सभी शिवभक्त थे। उपनिषद आदि में भक्ति एवं भगवान् के सगुण विग्रह का वर्णन है। अति- प्राचीन सामवेदीय केन उपनिषद् में भगवान् का सगुण और साकार यक्ष के रूप में आविर्भाव कहा गया है। बुल्के आदि पाश्चात्यों की उक्त ग्रन्थों से सम्बन्धित काल्पनिक पद्धति अशुद्ध है, यह भी दिखाया जा चुका है। महाभारत में मार्कण्डेय महर्षि ने युधिष्ठिर से रामकथा और राम का महत्त्व वर्णन किया है। वस्तुतः युग युग में रामभक्ति एवं राम के अवतार के बाद ही कृष्ण एवं कृष्ण की भक्ति का प्रादुर्भाव हुआ है। यह पाश्चात्यों की दुष्कल्पना ही है कि भारत के पश्चात् एवं महाभारत के पूर्व रामायण का निर्माण हुआ है। अतएव राम की बाललीला स्वतन्त्र है, वह कृष्ण की बाललीला का अनुकरण नहीं कही जा सकती। बहुत सी बातें समानरूप से सर्वत्र विकसित होती हैं। प्रतिवर्ष वसन्त में कोकिल-कलरव एवं आम्रपुष्पों का प्रादुर्भाव होता है। प्रायः प्रत्येक बालक उत्पन्न होकर रोता है, हँसता है, विविध क्रीड़ाएँ करता है। “यह सब राम में नहीं था" इसका बुल्के आदि के पास कोई भी प्रमाण नहीं है। बालकों का कलभाषण, कान्ता-कटाक्ष आदि के समान ही, एक प्रधान सुख है, इसी लिए उपासना-ग्रन्थों में बाललीला-विशिष्ट भगवान् की उपासनाएँ होती हैं। कृष्णचरित का प्रभाव होना कोई अनर्थ नहीं है, परन्तु बुल्के आदि का उद्देश्य तो कुछ और ही है। सनातन सिद्धान्त के अनुसार तो कृष्ण से प्रथम राम हैं और राम से पहले कृष्ण हैं, क्योंकि सभी अनादि हैं। अनेक कालों में राम, कृष्ण के अवतार होते हैं। हाँ, जिसने कृष्णसम्बन्धी साहित्य ही पहले पढ़ा है उसे रामचरित्र पर कृष्णचरित्र की छाप प्रतीत हो सकती है। उसी तरह जिसने पहले रामचरित्र ही पढ़ा है उसे कृष्णचरित्र पर भी रामचरित्र की छाप प्रतीत होती है। राम अनादि परमेश्वर हैं। विभिन्न भावनाओं से उपासक उनकी उपासना करते हैं। अनेक विद्वान् वेद के अपालासूक्त की शृङ्गार उपासनाओं का प्रभाव कृष्ण की उपासनाओं पर मानते हैं। उसके अनुसार अपाला ने इन्द्र की पतिबुद्धि से उपासना की थी। इन्द्र ने प्रकट होकर उसके मुख से सोमरस का पान किया था। कहा जाता है तभी से युवतियों के अधरोष्ठ-पान को सोमपान ही समझा जाता है। परन्तु वह विचार भी तात्त्विक नहीं है। अनादि काल से ही भक्त भगवान् की माता, पिता, पति, पुत्र आदि के भावसे उपासना करते हैं। गीता भी कहती है— “पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ।”