रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअर्थात् पिता जैसे पुत्र के, सखा सखाके तथा प्रिय प्रिया के अपराध को क्षमा करता है वैसे ही आप मेरे अपराधों को क्षमा करना । इसी आधार पर रासलीला आदि की उपासना चलती है। इसी दृष्टि से ईश्वर होने के कारण कृष्ण के समान ही राम की रासलीला का भी वर्णन वस्तुस्थिति के अनुसार है। अनुकरणमात्र नहीं है। इतना ही क्यों ? शृङ्गाररस का आविर्भाव जब सामान्य स्त्री-पुरुषों में भी होता है तो यह कैसे कहा जा सकता है कि राम में शृङ्गार स्वाभाविक न होकर कृष्ण का अनुकरणमात्र है। शृङ्गार-चेष्टाएँ सर्वत्र स्वाभाविक होती हैं। शिव-शक्ति की शृङ्गारिक चेष्टाएँ अत्यन्त प्राचीन काल से वर्णित हैं। उन्हें किसी का अनुकरण कहना हास्यास्पद ही है। इसी प्रकार बुल्के का यह भी कहना गलत है कि "रामकथा के बहुत से पात्रों का कृष्णचरित के पात्रों से सम्बन्ध स्थापित कर लिया गया है। राम तथा कृष्ण की अभिन्नता के अतिरिक्त सीता और सुभद्रा तथा लक्ष्मण और बलभद्र की भी अभिन्नता का प्रतिपादन किया गया है। सीता के सम्बन्ध में माना गया है कि वह कृष्ण की पत्नी रुक्मिणी बनकर दस पुत्र एवं एक पुत्री उत्पन्न करेगी (आ० रा० ७।११।१३८) । मन्थरा और पूतना, शूर्पणखा और कुब्जा, वाली और भील, अयोध्या का धोबी और कंस का धोबी, जाम्बवान् और जाम्बवती के पिता का तत्त्वसंग्रहरामायण (७।१५) में एवं वानर तथा गोपों का आनन्दरामायण (१।५।४२) में अभेद माना गया है। राम ने दण्डकवासी (कामातुर) ऋषियों को आश्वासन दिया था कि वे कृष्णावतार में गोपियाँ बनेंगे पद्मपुराण (उत्तरखण्ड २७२।१६६,१६७), गर्गसंहिता (गोलोकखण्ड अ० ४; माधुर्यखण्ड अ० २), कृष्णोपनिषद् तथा भक्तिरसामृतसिन्धु (पूर्वभाग २।८४) गर्गसंहिता (गोलोकखण्ड अ० ४ तथा माधुर्यखण्ड अ० ३-७) के अनुसार राम ने मिथिला, कोशल और अयोध्या की स्त्रियों को गोपियाँ अथवा कृष्ण की पत्नियां बन जाने का आश्वासन दिया। देवकन्याएँ, कामपीड़ित स्त्रियां (७।४।४५-४७), १६००० क्षत्रिय एवं वैश्य कन्याएँ (राज्यकाण्ड सर्ग १२ ), यमुना (७।१२।११७), ब्राह्मणों को सोलह (४।७।२६) अथवा १०० स्वर्णमूर्तियाँ प्रदान करने के फलस्वरूप राम को कृष्णावतार में १६००० पत्नियां मिलेंगी। गर्गसंहिता (माधुर्यखण्ड अ० ८) के अनुसार रामाश्वमेध की स्वर्णसीताएँ भी गोपियों के रूप में प्रकट हुई हैं।" बुल्के की दृष्टि से उक्त बातें कल्पनामात्र हैं, वस्तुस्थिति नहीं हैं। परन्तु यह अर्धजरतीन्याय बुल्के का समझ में नहीं आता। बुल्के को जानना चाहिये कि वे ईसाई-सिद्धान्त की किसी पुस्तक की आलोचना नहीं कर रहे हैं जिसमें पुनर्जन्म होता ही नहीं, किन्तु रामायण आदि भारतीय ग्रन्थों पर विचार कर रहे हैं जिनमें पुनर्जन्म की व्यवस्था है। आप वाल्मीकिरामायण या महाभारत, श्रीभागवत, गर्गसंहिता आदि का प्रामाण्य मानने से ही राम और कृष्ण का अस्तित्व समझ सकते हैं। अन्य किसी प्रामाणिक इतिहास के आधार पर राम आदि का व्यक्तित्व नहीं सिद्ध होता। ऐसी स्थिति में यदि उक्त ग्रन्थों का प्रामाण्य है तो उनके अनुसार राम और कृष्ण की परब्रह्मरूपता, सर्वशक्तिमत्ता, सर्वज्ञता, अलौकिकता आदि सिद्ध होती हैं तथा उक्त ग्रन्थों के अनुसार राम-कृष्ण, सीता-रुक्मिणी आदि की अभिन्नता सिद्ध हो है । यदि उक्त ग्रन्थों का प्रामाण्य मान्य नहीं है तो केवल अटकल से उनमें किसी अंश का प्रामाण्य मानना और अंशान्तरों का अप्रामाण्य मानना युक्तिशून्य ही है। विषसंपृक्त मधुराश्न भी त्याज्य होता है। उसी प्रकार अप्रमाण ग्रन्थों से किसी वस्तु की सिद्धि का प्रयास व्यर्थ है। और फिर इसी तरह ईसाइयों के बाइबिल में बाइबिल की हिब्रूभाषावाली प्राचीन प्रति तथा अर्वाचीन न्यू टेस्टामेण्ट में अनेक वर्गों के मतभेद हैं। फिर अर्धजरतीन्याय से उसमें भी काम लिया जायेगा। साथ ही अनेक अंग्रेजों ने भी इंग्लिश इतिहासकारों की अप्रामाणिकता की चर्चा की है। जिसका कि 'भारत में अंग्रेजी राज' पुस्तक में स्पष्ट उल्लेख है। भारतीय दृष्टिकोण से तो वेद अनादि तथा अपौरुषेय होने से स्वतःप्रमाण हैं। तन्मूलक रामायण, महाभारत, पुराण आदि अत्यन्त प्रमाण हैं। उनके अनुसार राम और कृष्ण की अभिन्नता सिद्ध ही है। हरिवंश आदि में एक विष्णु का ही राम और कृष्ण आदि रूपों में आविर्भाव माना गया है। कृष्णोपनिषद् वेद ही