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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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है। उनके अनुसार दण्डकवासियों को गोपाङ्गनाओं के रूप में प्रादुर्भाव का वरदान मिला है। पुनर्जन्मवाद में सर्व- साधारण के भी अनेक जन्म मान्य हैं। फिर स्वेच्छया नरतनु धारण करनेवाले विष्णु के राम और कृष्णरूप में आवि- र्भाव होने में सन्देह का प्रश्न ही नहीं है। ईसा आप लोगों के अनुसार ईश्वर नहीं ईश्वर का पुत्र है। जब उसमें अनेक चमत्कार सम्भव हैं तो साक्षात् ईश्वर में, अलौकिक चमत्कार होने में कोई असङ्गति है ही नहीं। विकास का सिंहावलोकन करते हुए वे फिर अपनी अनर्गल निर्मूल कल्पनाओं को दुहराते हुए कहते हैं— "इक्ष्वाकु-वंश के सूतों द्वारा जिस रामकथासम्बन्धी आख्यानकाव्य की सृष्टि प्रारम्भ हुई थी वह चौथी शती ईसवी पू० के अन्ततक पर्याप्तमात्रा में प्रचलित हो चुका था। वाल्मीकि ने उस स्फुट काव्य के आधार पर रामकथाविषयक एक विस्तृत काव्य की रचना की। इस वाल्मीकिकृत आदिरामायण में अयोध्याकाण्ड से युद्धकाण्ड तक की कथावस्तु का उल्लेख था,” बुल्के की यह कल्पना सर्वथा निराधार एवं अप्रमाण ही नहीं वाल्मीकिरामायण से विरुद्ध भी है। यह पीछे के प्रकरणों से सिद्ध है। बुल्के को यह बतलाना चाहिये कि राम का आविर्भाव कब हुआ और उनमें क्या प्रमाण है ? आधुनिक इतिहास तो छह हजार के भीतर ही ऐतिहासिक एवं प्रागैतिहासिक काल का अन्तर्भाव मानता है। परन्तु भारतीय इतिहास पुराणों के अनुसार २४ वें त्रेता में राम का आविर्भाव हुआ था। जो कि लाखों वर्ष पुरानी बात है। फिर इतनी पुरानी बात का इतने दिनों बाद किन लोगों ने किन प्रमाणों से स्फुट आख्यानकाव्य लिखे ? इसमें बुल्के या किसी अन्य के पास प्रमाण है ? फिर क्या लाखों वर्ष पहले कोई ऋषि, महर्षि, विद्वान् कवि नहीं था जिससे कि उस समय रामायणकाव्य का निर्माण न हो सका। यदि था तो कोई कारण नहीं कि वाल्मीकिरामायण बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड के अनुसार राम के समकाल के महान् कवि वाल्मीकि द्वारा रामायण का निर्माण न माना जाय। फिर इस प्रमाणसिद्ध तत्त्व को छोड़कर निराधार निष्प्रमाण स्फुट आख्यान काव्यों का निर्माण ४ शती ईसवी पूर्व के अन्त तक मानना सर्वथा असङ्गत ही है। यदि वाल्मीकि के पहले आख्यान काव्य हो तो उन्हें आदि कवि क्योंकर कहा जा सकता ? बुल्के कहते हैं बौद्ध अभिधर्ममहाविभाषा के अनुसार आदिरामायण का विस्तार केवल १२ हजार श्लोकों का था, परन्तु यह भी विडम्बना ही है कि वैदिकों के रामायण ग्रन्थ के परिमाण का निर्णय स्वयं रामायण तथा महाभारत, पुराण आदि से न कर के वैदिकधर्मविरोधी बौद्ध ग्रन्थों के आधार पर करना। बुल्के बौद्ध ग्रन्थों को इसी लिए प्रमाण मान लेते हैं, क्योंकि वे उनकी कल्पना के अनुकूल हैं। अथवा वैदिकधर्मविद्वेष के कारण ही वे वैदिक रामायण आदि को प्रमाण न मानकर बौद्ध अभिधर्ममहाविभाषा का सहारा पकड़ते हैं। इसे पक्षपात छोड़कर और क्या कहा जा सकता है ? जब कि अभिधर्ममहाविभाषा मूल उपलब्ध भी नहीं। बुल्के के अनुसार चीनी अनुवाद में ही वह सुरक्षित है। इसके अतिरिक्त वे स्वयं कहते हैं ये श्लोक दो विषयों से सम्बन्ध रखते हैं। रावण द्वारा सीता का हरण और राम द्वारा सीता की पुनः प्राप्ति तथा (अयोध्या में) प्रत्यागमन (रामकथा अनु० ७९)। किन्तु उनके इस कथन में कोई दम नहीं है, क्योंकि इसके अनुसार तो अयोध्याकाण्ड भी रामायण से बहिर्भूत ही मानना पड़ेगा। वाल्मीकिरामायण के अनुसार वाल्मीकिरामायण ग्रन्थ २४००० श्लोकों का ही सिद्ध है। अन्तरङ्ग प्रमाण की अपेक्षा बहिरङ्ग असिद्ध ही होता है। रामायण, पुराण आदि रामायण के स्वरूप के निर्णय के अन्तरङ्ग प्रमाण हैं। अभिधर्म- महाविभाषा का चीनी अनुवाद अत्यन्त बहिरङ्ग है। उस सम्बन्ध में भी यह जानना चाहिए कि रामायण का कोई ऐसा भाग उस ग्रन्थ की चर्चा का विषय है जिसमें केवल सीताहरण और सीता-प्राप्ति का उल्लेख रहा हो। वाल्मीकिरामायण के दाक्षिणात्य, गौड़ीय तथा पश्चिमोत्तरीय तीनों पाठ पूर्णतया ठीक हैं, परन्तु बुल्के की दृष्टि से परस्पर विरुद्ध होने से सुन्दोपसुन्दन्याय से स्वयं अप्रमाण ठहरेंगे। इस पाठभेद का दुरुपयोग करके बुल्के ९०