भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 791, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 791

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७१४ रामायणमीमांसा विश रामायण के कलेवर में काटछाँट कर बहुत अंशों को प्रक्षेप बना देते हैं । सिद्धान्ततः सम्प्रदायभेद से जैसे वैदिक शाखाओं में पाठभेद तात्त्विक ही हैं, सप्तशती जिसके लाखों पाठ प्रतिवर्ष होते हैं, उसमें भी पाठभेद हैं। उसी तरह वाल्मीकिरामायण में भी पाठभेद प्रामाणिक ही हैं। वे कहते हैं "प्रारम्भ में वाल्मीकिकृत आदिरामायण का कोई प्रामाणिक लिखित रूप नहीं था, वह कई शतियों तक मौखिक रूप में ही प्रचलित था। जिससे उसका पाठ स्थिर न रह सका। काव्यो- पजीवी कुशीलव अपने श्रोताओं की रुचि का ध्यान रखकर लोकप्रिय अंश बढ़ाते रहे, इस तरह आदिरामायण का कलेवर प्रक्षेपों के कारण बढ़ने लगा।" बुल्के के इस कथन से स्पष्ट है कि उनकी दृष्टि में वाल्मीकिकृत आदिरामायण का आज कोई प्रामाणिक रूप है ही नहीं, यह सब कुशीलवों की कल्पना है। इस तरह रामायण के स्वरूप पर एक ईसाई का यह कितना भीषण प्रहार है। पर उन्हें समझना चाहिये कि उनके ही तर्कों से उनकी बाइबिल भी पूर्ण अप्रामाणिक एवं कल्पनामात्र ही ठहरेगी। पर रामायण की वस्तुस्थिति उससे सर्वथा भिन्न है। वेदों एवं सप्तशती के अनुसार ही वाल्मीकि ने अपने विभिन्न शिष्यों में पाठभेद का ही उपदेश किया था। उन-उन सम्प्रदायों के वही पाठ प्रामाणिक हैं। उनके पाठों और अनुष्ठानों से अदृष्ट एवं दृष्ट फल होते हैं। जैसे वेदों का मौखिक पाठ ही महत्त्वपूर्ण माना जाता है वैसे ही वाल्मीकिरामायण का भी मौखिक पाठ ही मुख्य था। मेधाहास के कारण जैसे ग्रन्थरूप में वेदों का उल्लेख हुआ है वैसे ही रामायण का भी काव्योपजीवी कुशीलव जातिविशेष नहीं उच्च कुल के ब्राह्मण, व्यास आदि रामायण का श्रवण कराते रहे हैं। मनमानी नहीं, स्वाम्यूहित नहीं, परम्पराप्राप्त प्रामाणिक पाठ का ही पठन-पाठन होता रहा है। रामायण राम का वाङ्मय विग्रह है। उसमें एक अक्षर का भी निवेश करना कण्टक-प्रवेश है और एक अक्षर निकलना साङ्गोपाङ्ग अंग में छेदन करना है। यही धारणा मन्त्रब्राह्मणात्मक वेदों, रामायण, महाभारत तथा पुराणों के सम्बन्ध में रही है। इक्ष्वाकुवंश के कौन कुशीलव थे, उन्होंने कब, क्यों, कैसे स्फुट आख्यानकाव्य रचा तथा इसमें कौन सा आधार है और वह आधार कहाँ तक प्रामाणिक है ? इन बातों का उचित उत्तर मिले बिना बुल्के की बातें सर्वथा निस्सार ही हैं। रामायण में ही राम कौन थे ? सीता कौन थी ? उनका जन्म और विवाह कब तथा किस प्रकार हुआ ? उनकी कितनी सन्तान हुईं ? इन बातों का समाधान था। उक्त प्रश्नों के समाधानार्थ वाल्मीकिरामायण के उत्तर- काण्ड का निर्माण पीछे हुआ, यह कल्पना सर्वथा निष्प्रमाण एवं प्रमाणविरुद्ध ही है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार वाल्मीकि ही बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड के भी रचयिता हैं। बुल्के का यह कहना भी अशुद्ध है कि "रामायण (राम-अयन अर्थात् राम का पर्यटन) न रह कर वह पूर्ण रामचरितरूप में विकसित हुई।" अर्थात् उनकी दृष्टि में पहले राम का अयन ही रामायण थी। परन्तु उन्हें मालूम होना चाहिये कि राम का अयन अर्थात् निवासस्थान ही रामायण है। धात्वर्थ के अनुसार साङ्गोपाङ्ग, सच्ररित्र तथा सोपाख्यान राम का ज्ञान और प्राप्ति जिससे हो अथवा जिसमें निहित है उसी को रामायण कहते हैं। इण् गतौ या अय् गतौ धातु से अयन शब्द बनता है। ज्ञान, गमन, प्राप्ति सभी गति का अर्थ होता है। "रामस्य सोपाख्यानस्य सच्ररित्रस्य अयनं ज्ञानं प्राप्तिर्यस्माद् यस्मिन् वा तद्रामायणम् ।” बुल्के का यह कहना निष्प्रमाण है कि "उस समय तक रामायण नरकाव्य ही कहा जाता रहा है और राम आदर्श क्षत्रिय के रूप में भारतीय जनसाधारण के सामने प्रस्तुत किये गये थे। इसका आभास गीता के 'रामः शस्त्रभृतामहम्' शस्त्रधारण करनेवालों में मैं राम हूँ' में मिलता है।" क्योंकि उसी गीता में 'वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि' भी तो कहा गया है। क्या इससे यही समझना चाहिये कि वासुदेव कृष्ण भी गीता के समय तक केवल वृष्णिवंश के एक आदर्श पुरुष ही माने जाते थे ? किन्तु ऐसा समझना मूर्खजनप्रतारणमात्र ही है। क्योंकि उसी गीता में 'मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनञ्जय' कृष्ण से बढ़ कर कोई तत्त्व ही नहीं है, 'मया ततमिदं सर्वं' मुझ सर्वकारण परमात्मा से

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