भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 792

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ७१५

सारा विश्व व्याप्त है। उसी गीता में यह भी उल्लेख है जब-जब धर्मग्लानि, अधर्म का अभ्युत्थान होता है तब-तब धर्मसंस्थापनार्थ, साधुपरित्राणार्थ, दुष्टदमनार्थ भगवान् अवतार धारण करते हैं । किन्तु विभूति-वर्णन के प्रसंग में जैसे वृष्णियों में वासुदेव को कहा है वैसे ही राम को शस्त्रधारियों में भगवान् का रूप कहा गया है । वाल्मीकिरामायण के अनुसार कृष्ण भी राम के ही रूप में कहे गये हैं । "कृष्णश्चैव बृहद्वलः" ( युद्धकाण्ड ) । ७८९वें अनु० में बुल्के कहते हैं "भागवतों के इष्टदेव वासुदेव कृष्ण सम्भवतः तीसरी शती ई० पूर्व० विष्णु के अवतार माने जाने लगे थे । जिससे अवतारवाद की भावना को बहुत प्रोत्साहन मिला । दूसरी ओर लोक- प्रियता के साथ-साथ राम का महत्त्व भी बढ़ने लगा था । उनके वर्णन में अलौकिकता आ गयी । इस प्रवृत्ति की स्वाभाविक परिणति यह हुई कि कृष्ण की भाँति राम भी पहली शती ई० पूर्व विष्णु के अवताररूप में स्वीकृत होने लगे । फलस्वरूप प्रचलित रामायण के कई स्थलों में रामावतारविषयक प्रक्षिप्त सामग्री का समावेश हो गया है।" किन्तु उनका यह सब कथन निराधार, निस्सार, निष्प्रमाण तथा प्रमाणविरुद्ध है । महाभारत के कालनिर्णयप्रसंग में यह दिखलाया गया है कि ई० पूर्व दो हजार वर्ष से पहले ही महाभारत का निर्माण हो चुका था । भगवद्गीता तो महाभारत के संग्राम के समय ही प्रकट हो चुकी थी, महाभारत-संग्राम ईसा से तीन हजार वर्ष से भी पूर्व हुआ था, उस गीता में कृष्ण का अवतार होना और ईश्वरत्व अत्यन्त प्रसिद्ध है । अतः ई० पूर्व तीसरी शती से कृष्ण को अवतार माने जाने लगा यह कथन निस्सार ही है। इतना ही नहीं इसी ग्रन्थ के पूर्व के प्रसंगों में अनादि वेदों में ही अवतारवाद भी प्रमाणित है। वाल्मीकिरामायण तो महाभारत से लाखों वर्ष प्राचीन है। महाभारतान्तर्गत विष्णु- सहस्रनाम में राम का विष्णुनामों में उल्लेख किया गया है । अतः 'कृष्ण या राम का अवतारत्व किसी विकास की परिणति हैं' यह बुल्के का दिमागी फितूर ही है, अतएव रामायण की अवतारविषयक सामग्री को प्रक्षिप्त कहने का दुस्साहस करना अनभिज्ञता ही है। बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड में पौराणिक गाथाएँ नहीं हैं। वे रामायणीय गाथाएँ ही हैं। जिनका कि संवादरूप में आना बिल्कुल स्वाभाविक है। ऋष्यशृंग तथा विश्वामित्र का वृत्तान्त, शम्बूकवध, रामाश्वमेध आदि प्रसंग स्वाभाविक हैं । राम विष्णु के अवतार थे ही न कि माने जाने लगे । बुल्के कहते हैं, "रामकथा के द्वितीय विकास का सोपान है रामकथा का आदर्श क्षत्रिय राम का चरित्र- मात्र न रहकर विष्णु की अवतार-लीला के रूप में परिणत हो जाना । बौद्ध और जैन साहित्य को छोड़कर रामकथा का सर्वत्र यही रूप स्वीकृत हुआ है ।" बुल्के का उक्त कथन भी दुरभिसंधिमूलक ही है, कारण राम का अनादिकाल से ही विष्णु अवतार के साथ-साथ व्यावहारिक रूप मर्यादापुरुषोत्तम ही रहा है। उस दृष्टि से राम अब भी आदर्श क्षत्रिय ही हैं। जैन साहित्य में भी राम को विष्णुरूप माना गया है । वासुदेव, प्रतिवासुदेव, बलभद्र आदि उनके अनुसार भी सदा ही होते रहते हैं । हिन्दोनेशिया आदि की रामकथाओं में भी राम को विष्णु का अवतार माना गया है । बौद्धों के साहित्य में बुद्ध को ही प्राचीन काल में रामरूप में आविर्भूत माना गया है। बुद्ध-भक्ति से बढ़- कर बौद्धमत में कोई भक्ति नहीं । बुल्के का यह कहना भी गलत है, "इस द्वितीय सोपान में जनसाधारण की धार्मिक चेतना में न तो राम के लिए कोई विशेष स्थान था और न रामभक्ति का आविर्भाव हुआ था। एक ओर उस समय के धार्मिक साहित्य में रामकथा का स्थान अपेक्षाकृत गौण था दूसरी ओर तत्कालीन ललितसाहित्य में उसकी व्यापकता, लोक- प्रियता अद्वितीय है ।" क्योंकि वाल्मीकिरामायण तथा विविध अन्य रामायणों तथा पुराणों से यह भली भाँति विदित है । ललितसाहित्य से भी अधिक राम एवं रामभक्ति को धार्मिक साहित्य में स्थान प्राप्त था । आज जैसे जनता की बुद्धि एवं जिह्वा पर रामनाम का बाहुल्य है वैसे ही तब भी हनुमान् भक्तों एवं ज्ञानियों में अग्रगण्य थे । श्रीमद्भागवत