भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 793

७१६ रामायणमीमांसा विंश आदि में भी उनका महत्त्व प्रख्यात है। धर्मराज युधिष्ठिर मार्कण्डेय से रामकथा का श्रवण करते थे। सनकादि भी राम के भक्त थे। यह उपनिषदों से भली भाँति विदित है। इन सब साहित्यों को अप्रमाण कहने से ही बुल्के की निराधार कल्पना को अवकाश मिल सकता था। परन्तु भारतीय जनता सदा ही वेदों, रामायण तथा पुराणों का आदर करती है और प्रामाण्य मानती है। प्रमाणपद्धतिपराङ्मुख पाश्चात्य एवं उनके अनुयायी कुछ भारतीय ही ऐसी दुष्कल्पनाओं में विश्वास रखते हैं। अतएव बुल्के का यह कथन भी असत्य है कि "अवतारवाद के कारण कथावस्तु में अलौकिकता अवश्य धीरे-धीरे बढ़ने लगी, फिर भी रामकथा का मुख्य दृष्टिकोण धार्मिक न होकर शताब्दियों तक साहित्यिक ही रहा, यह संस्कृत-ललितसाहित्य के स्वर्णकाल में महाकाव्यों तथा नाटकों से स्पष्ट है। राम-भक्ति के आविर्भाव के पूर्व रामकथा का यह साहित्यिक रूप विदेशों में फैल गया और उसपर बाद में रामभक्ति का प्रभाव नहीं पड़ा। इसी लिए सभी विदेशी रामकथा-साहित्य में रामभक्ति का अभाव है।" क्योंकि कहा जा चुका है कि राम के मर्यादापुरुषोत्तम और परब्रह्म दोनों रूप भारतीय साहित्य में साथ-साथ रहे हैं। श्रीमद्भागवत आदि में जहाँ राम का परब्रह्मरूप सुस्पष्ट है वहाँ भी उनके मर्त्यावतार का उद्देश्य मर्त्यशिक्षण ही रहा है— "मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं रक्षोवधायैव न केवलं विभोः ।" तुलसीदास ने भी कहा है— “राम देखि सुनि चरित तुम्हारे । जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे ॥" (रा० मा० २।१२५।४ ) सेरीराम, रामकियेन आदि में राम को विष्णु का अवतार माना ही गया है। अतः बुल्के का यह कहना सफेद झूठ ही है कि विदेशी रामकथाओं में रामभक्ति का अभाव है। सुतरां विष्णुभक्ति, रामभक्ति एक ही ठहरती है। लक्ष्मण, हनुमान्, जाम्बवान् आदि भी राम की भक्ति करते ही थे । बुल्के की ऐसी सैकड़ों दुष्कल्पनाओं का एक ही उत्तर है कि वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत तथा पुराणों के सम्बन्ध में बुल्के का कालनिर्धारण अत्यन्त अशुद्ध है। उनका काल अनादि तथा लाखों वर्ष प्राचीन है। तभी से रामभक्ति और राम का महत्त्व आज से सहस्रों गुणा अधिक माना जाता रहा है। आस्तिक जनता रामायणकथा, राममन्त्र तथा रामनाम को जीवन-सर्वस्व मानती रही है। शतकोटिप्रविस्तर रामायण का सार जान कर महेश्वर रामनाम का ही जप करते रहे हैं। "रामायण सतकोटि महँ, लिय महेस जिय जानि ।" (तुलसी) याज्ञिकपद्धतियों में अनादिकाल से यज्ञ, याग आदि के अन्त में भगवान् का द्वादश बार नामस्मरण का सम्प्रदाय रहा है। “यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु । न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम् ॥” राम अनन्तकोटि ब्रह्माण्डों के नायक परमात्मा हैं। वैदिकधर्म ही उनका धर्म है। उन्होंने अवतार लेकर कोई नया धर्म नहीं चलाया। अतः जो भी श्रौत या स्मार्त धर्मकर्म का अनुष्ठान करते हैं उसे ही परमात्मा के अर्पण करते हैं। परमात्मा निर्गुण और सगुण दोनों ही हैं। अतः "स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ।" के अनुसार आस्तिक स्वानुष्ठित धर्मकर्म को नारायणार्पणमस्तु, रामार्पणमस्तु, श्रीकृष्णार्पणमस्तु, शिवार्पणमस्तु कहकर समर्पण करते रहे। मन्त्र, नामजप, ध्यान आदि भी राम, कृष्ण, शिव, विष्णु आदि के अनादिकाल से चलते ही रहे हैं। इसी तरह राम की शृङ्गारिक कथा की बात है। अनेक प्रकार की भक्तियों में मधुरभक्ति भी अन्यतम है। पाञ्चरात्र आदि आगमों में उसका प्रमुख स्थान है। विष्णु, शिव, राम, कृष्ण सभी की भक्तियों में न्यूनाधिकरूप में शृङ्गारिक भक्ति का उल्लेख है। वेदों में भी उसका उल्लेख है ही।