भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 794

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ७१७ विकासवाद जैसे मिथ्या अपसिद्धान्त में ही ऐसा माना जाता है कि "भारतीय भक्तिमार्ग का आविर्भाव वैदिक साहित्य में ही हो चुका था। वह शताब्दियों के पश्चात् भागवतधर्म में पल्लवित हो सका। भागवतों के इष्टदेव वासुदेव कृष्ण विष्णु के अवतार माने जाने लगे। जिसके फलस्वरूप भक्तिभावना उन्हीं विष्णु वासुदेव कृष्ण में केन्द्रित होकर उत्तरोत्तर विकसित होने लगी। बाद में राम भी विष्णु के अवतार माने जाने लगे। किन्तु अवतार के रूप में स्वीकृत हो जाने पर भी शताब्दियों बाद रामभक्ति का आविर्भाव हुआ," पर यह सब भी अनर्गल प्रलाप ही है। विकास नहीं भागवतधर्म वैदिक भक्तिमार्ग की व्याख्या है। वेदों में विष्णु की ही भक्ति नहीं है, शिव और शक्ति की भी भक्ति का वर्णन है। फलतः रामायण, महाभारत तथा पुराणों एवं शैव और वैष्णव आगमों में उसकी व्याख्याएँ हुई हैं। रामायण में प्रधानतया रामभक्ति, महाभारत में प्रधानतया कृष्ण तथा शिव की भक्ति का वर्णन है। पुराणों में विष्णु, शिव, शक्ति, राम और कृष्ण की भक्ति का उपबृंहण है। पुरुषसूक्त, रुद्रसूक्त, रुद्राध्याय तथा नारायण, महानारायण, रामतापनीय, रामरहस्य, गोपालतापनीय, त्रिपुरतापनीय आदि उपनिषदों में विविध भक्तियों का उल्लेख है। शङ्कर, रामानुज आदि शास्त्रप्रामाण्यवादी थे। मनमानी कल्पना नहीं करते थे। उन्हीं वेदादि शास्त्रों के अनुसार ही उन्होंने राम आदि की भक्ति का वर्णन किया था। कृष्ण एवं राम को विष्णु का अवतार मनमानी नहीं माना जाने लगा, किन्तु पूर्वोक्त शास्त्रों के अनुसार ही। ईसाइयों में जैसे ईसा को ईश्वर का पुत्र तथा कुमारीपुत्र माना जाने लगा बुल्के ने वैसी ही इधर भी कल्पना करने की भूल की है। अध्यात्मरामायण भी मनमानी कल्पना नहीं है, किन्तु पूर्वोक्त प्रमाणों पर ही वह आदृत है। वह भी ब्रह्माण्डपुराण का खिलभाग माना जाता है। युधिष्ठिर भी बड़े प्रभाव- शाली राजा थे। श्रीकृष्ण भी उनका महान् आदर करते थे तो भी उन्हें ईश्वर का अवतार नहीं माना गया, किन्तु महाभारत में तथा विष्णुपुराण में राम का महत्त्वपूर्ण सम्मान है। अतएव 'रामायण की आधिकारिक कथावस्तु सीताहरण, रावणवध को एक नया रूप दिया गया' इत्यादि कल्पना भी असत्य है। सदा सर्वदा ही वेदों, रामायणों, महाभारत तथा पुराणों की आध्यात्मिक, आधिदैविक आधिभौतिक व्याख्याएँ होती रही हैं। बुल्के कहते हैं- "वाल्मीकिरामायण, हरिवंश, विष्णुपुराण, वायुपुराण आदि के अनुसार चारों भाई विष्णु के एक-एक चतुर्थांश से समन्वित थे। भक्तिभाव के पल्लवित होने के पश्चात् राम परब्रह्म के पूर्णावतार माने जाने लगे एवं लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न क्रमशः शेष, शङ्ख तथा सुदर्शन के अवतार। प्राचीन पुराणों में सीता तथा लक्ष्मी की अभिन्नता का निर्देश नहीं मिलता। आगे चलकर लक्ष्मी सीता के रूप में अवतरित मानी गयी हैं। किन्तु रामभक्ति के प्रादुर्भाव के पश्चात् सीता परम शक्ति अथवा मूलप्रकृति स्वीकृत होने लगी।" परन्तु बुल्के की दृष्टि में प्राचीन पुराण भी कल्पना ही हैं, प्रमाण नहीं। सभी ईसा के पश्चात् बने हैं। अतः यदि उनमें सीता एवं राम को परब्रह्म या मूलप्रकृति माना भी गया होता तो भी ईसाइयत के प्रचारक बुल्के उसे कभी न मानते। हमारे यहाँ वाल्मीकिरामायण, हरिवंश, विष्णुपुराण, वायुपुराण, पद्मपुराण, स्कन्दपुराण आदि सभी पुराण व्यास द्वारा प्रादुर्भूत होते हैं, अतः वे सभी प्राचीन हैं। सभी का प्रामाण्य है। सभी का समन्वय करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है। पुराणों में विष्णु को परब्रह्मरूप ही माना गया है, अतः विष्णु का अवतार होने पर राम सुतरां परब्रह्मरूप ठहरते हैं। भरत आदि चतुर्थांश हैं, इसकी व्याख्या भी पीछे हो चुकी है। माण्डूक्योपनिषद् में विराट्, हिरण्यगर्भ, अव्याकृत, तुरीय भी चतुर्थांश हैं फिर भी विराट् आदि की अपेक्षा तुरीय की विशेषता है ही। वेदों तथा पुराणों का समन्वित अर्थ यही है कि राम परमार्थतः परब्रह्म हैं, सीता ऐश्वर्य और माधुर्य की अधिष्ठात्री महाशक्ति उनसे अभिन्न ही हैं। बुल्के आदि ने वेदों तथा रामायण आदि के सिद्धान्तों से सर्वथा अपरिचित तथा ईसाइयत प्रचार की भावना से प्रेरित होकर रामकथा के नाम पर अर्थ का अनर्थ करके पाप किया है। नास्तिकप्राय लोगों ने वस्तुस्थिति के विरुद्ध मनमानी सीता को लक्ष्मी और राम को विष्णु नहीं माना, किन्तु आस्तिकों ने वेदादि प्रमाणों के आधार पर वस्तु- स्थिति को समझकर ही वैसा स्वीकार किया है।