भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 795

छायामात्र सीता के हरण तथा मायासीता के त्याग का भी समाधान किया जा चुका है । “प्रमाणवन्त्यदृष्टानि कल्प्यानि सुबहून्यपि" के अनुसार रावण के दोनों रूप स्पष्ट हैं। रावण का बाह्य रूप यही है कि उसने कामबुद्धि से सीता का हरण किया था, परन्तु आन्तर रूप यह भी है कि मुक्ति की कामना से उसने राम से वैरभाव अपनाया था । “क्रोधोऽपि देवस्य वरेण तुल्यः ।” ( वा० रा० दा० पाठ प्रक्षेप २।२२ ) अर्थात् देव का भगवान् विष्णु का क्रोध भी वर के तुल्य ही मुक्ति प्रदान करता है । जिन तुलसीदास का गुणगान करते हुए बुल्के भारतीय जनता के विश्वास के भाजन बनना चाहते हैं । उन्होंने भी रावण की ऐसी ही आन्तररूप भावना व्यक्त की थी— “जो जगदीश लीन्ह अवतारा, सुररञ्जन भञ्जन महिभारा । तौ मैं जाई वैर हठि करिहौं, प्रभु शर ते भवसागर तरिहौं ।।” बुल्के की तृतीय सोपान की कल्पना भी पिष्टपेषणमात्र है । राम विष्णु हैं, इतने से भक्तवत्सल हैं ही, अतः न केवल भक्तवत्सल राम का ही अपितु विष्णु का चरित्रवर्णन गुणकीर्तन ही है । अन्त में बुल्के समस्त भारतीयों एवं भारतीय धर्म एवं संस्कृति को अज्ञानपूर्ण, मूर्खतापूर्ण और भावुकतापूर्ण सिद्ध करने की दुरभिसन्धि से कहते हैं कि इस प्रकार रामकथा अनेकरूप धारण करते हुए शनैः शनैः सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति में व्याप्त हो गयी । अर्थात् बुल्के की दृष्टि में वस्तुस्थिति के विपरीत भावुकतावशात् मिथ्याकल्पक मानव राम को विष्णु का अंश तथा विष्णु को परब्रह्म और भक्तवत्सल राम मानने लगे । सीता को लक्ष्मी से अभिन्न और फिर मूलप्रकृति मानने लगे । पर ये सब भारतीयों के प्रामाणिक वेद, रामायण आदि प्रमाणों को झुठलाने की ही कुटिल कुचेष्टा है । वे कपटपूर्ण शब्दों में यह भी कहते जाते हैं—“उसकी ( रामकथा की ) अद्वितीय लोकप्रियता निरन्तर अक्षुण्ण ही नहीं वरन् शताब्दियों तक बढ़ती रही, क्योंकि मानवहृदय को आकर्षित करने की जो शक्ति रामकथा में विद्यमान है वह अन्यत्र दुर्लभ ही है", परन्तु ऐसा क्यों ? उसका उत्तर उनके पास नहीं है । परन्तु भारतीय दृष्टिकोण से उत्तर स्पष्ट है कि राम और कृष्ण की कथा केवल वाग्विलास या कण्ठशोषणमात्र नहीं है वह अनुपम शांति, भक्ति तथा मुक्ति देनेवाली है । इसी कारण उसकी लोकप्रियता है । श्रीभागवत में स्पष्ट उल्लेख है; शुकदेवजी कहते हैं— मैंने बड़े-बड़े यशस्वी महापुरुषों की कथा वैराग्य और विज्ञान की विवक्षा से ही कही है । उसमें परमार्थ नहीं है; किन्तु कृष्ण में अमल भक्ति चाहनेवालों को चाहिये कि जो उत्तम श्लोक भगवान् का अमङ्गलघ्न गुणानुवाद नित्य ही सन्तों में संगीयमान होता है, उसे ही सुनें— “कथा इमास्ते कथिता महीयसां विताय लोकेषु यशः परेयुषाम् । वैराग्यविज्ञानविवक्षया विभो वचोविभूतिर्न तु पारमार्थ्यम् ।। यस्तूत्तमश्लोकगुणानुवादः संगीयतेऽभीक्ष्णममङ्गलघ्नः । तमेव नित्यं शृणुयादभीक्ष्णं कृष्णेऽमलां भक्तिमभीप्समानः ।।”(भाग० १२।३।१४,१५) भारतीय साहित्य में वर्णित रामकथा का आदर्श ठीक यही है कि रामचरित स्वच्छ मनोवृत्ति प्रदान करता है । जैमिनीयाश्वमेध ( ३६।४४ ) “सर्वे धर्माः समुद्दिष्टाः वर्णाश्रमविभागतः ।” बृहद्धर्मपुराण ( २६।९ ), मम्मट का भी यह कहना ठीक ही है कि रामादि के समान ही वर्तना चाहिए रावणादि के समान नहीं— “रामादिवद् वर्तितव्यं न रावणादिवत्” ( काव्य प्रकाश १।२) । पद्मपुराण ( पाताल- खण्ड अ० ३६ ) के अनुसार रामचरित में पातिव्रत्य, भ्रातृस्नेह, गुरुभक्ति, स्वामिसेवा आदि का आदर्श प्रस्तुत है ।