रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 796, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसिंहावलोकन ७१९ "यस्मिन् धर्मविधिः साक्षात् पातिव्रत्यं तु यत्स्थितम् । भ्रातृस्नेहो महान् यत्र गुरुभक्तिस्तथैव च ॥ स्वामिसेवकयोर्यत्र नीतिमूर्तिमती किल । अधर्मकरशास्तित्वं यत्र साक्षाद् रघूद्वहात् ॥” (वा० रा० ११८, १२८) क्या ही अच्छा होता यदि बुल्के अकुटिलभाव से राम के इसी आदर्श का प्रतिपादन करते । वाल्मीकि- रामायण में भी राम को विग्रहवान् धर्म ही कहा गया है- "रामो विग्रहवान् धर्मः” । श्रीभागवत आदि में मनुष्यों को धर्मशिक्षण देकर लोकसंग्रह करना ही राम के अवतार का मुख्य प्रयोजन कहा गया है । गीता के कृष्ण भी पूर्ण ब्रह्म होते हुए भी लोकसंग्रहदृष्टि से वर्णाश्रमनानुसार कर्म करते हैं- “यदि ह्याहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।” ( गीता० ३।२३ ) “उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।” ( गीता० ३।२४ ) सीता का पातिव्रत्य, राम का आज्ञापालन, लक्ष्मण का भ्रातृप्रेम, दशरथ की सत्यसन्धता, कौशल्या का वात्सल्य आदि आदर्श लोकशिक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण हैं । अतः रामकथा में कथावस्तु भगवद्गुणवर्णन भक्ति-मुक्तिप्रद होने के साथ-साथ आदर्श जीवन का एक महान् मार्गप्रदर्शन भी है । बुल्के रामकथा को विकास, कल्पना, परिवर्तन और परिवर्धन मानते हैं । और कहते हैं उसे भारतीय प्रतिभा शताब्दियों से परिष्कृत करती चली आ रही है । परन्तु भारतीय प्रतिभा सदा तथ्य तत्त्व की पक्षपातिनी रही है । मिथ्या कल्पना की नहीं 'तत्त्वपक्षपातो हि धियां स्वभावः ।' तत्त्वपक्षपात बुद्धियों का स्वभाव होता है । बुल्के कहते हैं कि "कैकेयी की कुटिलता वाल्मीकिरामायण में स्पष्ट वर्णित है । आगे चलकर उसे निर्दोष ठहराने के लिए अनेकों उपायों का सहारा लिया गया है ।” पर यह भी गलत है, क्योंकि इन बातों का समुचित समाधान रामचरितमानस में भी है और अध्यात्म- रामायण में भी । सबसे मुख्य बात तो यह है कि रावणत्रस्त देवताओं की प्रार्थना पर ही परब्रह्म विष्णु मनुष्यरूप में अवतीर्ण हुए थे । उनकी सहायता के लिए देवता वानर और भालू रूप में अवतीर्ण हुए थे । परन्तु यदि कैकेयी वनवास का आग्रह न करती, सीताराम का वनवास न होता एवं सीता-हरण न होता तो रावणवध आदि कार्य कैसे होते ? और रामायण का आविर्भाव भी कैसे होता ? तुलसीदासजी ने कहा है- “दोस देहिं जननिहिं जड़ तेई । जिन गुरु साधुसभा नहिँ सेई ॥” (रा० मा० २।२६१।४) वालिवध को न्यायसङ्गत स्वयं वाली ने ही स्वीकार किया था। पर बुल्के उन अंशों को प्रक्षिप्त मान लेते हैं। जो अपने हठ को सिद्ध करने के लिए आर्ष प्रमाण को झुठलाना चाहता है और जिसने समाधान न मानने की प्रतिज्ञा कर रखी हो उसे कौन समझा सकता है ? तुलसीदास के अनुसार राम कहते हैं- “अनुजवधू भगिनी सुतनारी, सुन सठ ये कन्यासम चारी । इन्हहि कुदृष्टि विलोकै जोई, ताहि बधे कछु पाप न होई ॥ मूढ़ तोहि अतिसय अभिमाना, नारिसिखावन करसि न काना । मम भुजबल आश्रित तेहि जानी, मारा चाहसि अधम अभिमानी ॥” (रा० मा० ४।८।४)