भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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७२० रामायणमीमांसा विश अन्त में वाली कहता है— "सुनहु राम स्वामी सन, चल न चातुरी मोरि । प्रभु अजहुँ मैं पातकी, अन्तकाल गति तोरि ॥” ( रा० मा० ४।९ ) वाल्मीकिरामायण में भी राम ने कहा— “भ्रातुर्वर्तसि भार्यायां त्यक्त्वा धर्मं सनातनम् । अस्य त्वं धरमानस्य सुग्रीवस्य महात्मनः ॥ रुमायां वर्तसे कामात् स्नुषायां पापकर्मकृत् ।” (वा० रा० ४।१८।१८,१९) “राजभिर्धृतदण्डाश्च कृत्वा पापानि मानवाः । निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा ॥ शासनाद् वापि मोक्षाद् वा स्तेनः पापात्प्रमुच्यते । राजा त्वशासन् पापस्य तदवाप्नोति किल्बिषम् ॥” (वा० रा० ४।१८।३१,३२) अपराधी को दण्ड देना आवश्यक है । अपराधी से युद्ध करने का कोई प्रसङ्ग नहीं होता । निगृहीत अशस्त्र अपराधी को आज भी प्राणदण्ड दिया ही जाता है । मृगयाधर्म में भी सावधान, असावधान, युद्ध करता हुआ या न करता हुआ भी मृग मारा जा सकता है । उसमें कोई दोष नहीं है । “अयुद्धयन् प्रतियुद्ध्यन् वा यस्माच्छाखामृगो ह्यसि । ( वा० रा० ४।१८।४१ ) एतावता अदृष्ट होकर मारना भी पाप नहीं, क्योंकि दण्डार्थ वध में दर्शन अपेक्षित नहीं है । वाली सन्ध्यो- पासनादि करता था और शास्त्रज्ञ था, इस दृष्टि से पूर्वोक्त समाधान है । यदि केवल शाखामृगमात्र है तो भी प्रच्छन्नवध में कोई दोष नहीं है, क्योंकि तृणच्छन्न श्वभ्रादि के निर्माण द्वारा विश्वस्त स्वपालित मृगों से युद्धादि करते हुए भी मृगों को राजर्षि लोग क्षत्रिय-स्वभावात् मृगया में मारते हैं । इन कार्यों में कोई बड़ा दोष नहीं होता । किन्तु प्राणायामादि से अपनेय स्वल्प ही दोष होता है। तुमने सुग्रीव के जीते हुए उसकी भार्या रुमा को सनातन धर्म छोड़कर भार्या बना लिया है । राजा का कर्तव्य है, तुम्हें दण्ड दे, दण्ड से शुद्ध होकर अपराधी स्वर्ग का भागी होता है । राजा दण्ड दे या छोड़ दे अपराधी शुद्ध हो जाता है । परन्तु दण्ड न देनेवाला राजा उस पाप का भागी होता है । राम का वचन सुनकर भगवान् में मिथ्या दोषारोपण से वाली व्यथित हुआ और धर्म का तत्त्व जानकर उसने राम के प्रति दोष का अनुसन्धान नहीं किया— “एवमुक्तस्तु रामेण वाली प्रव्यथितो भृशम् । न दोषं राघवे दध्यौ धर्मेऽधिगतनिश्चयः ।।” ( वा० रा० ४।१८।४५ ) इस तरह वाली स्वयं राम को निर्दोष समझकर उनके प्रति किये गये दोषारोपण के कारण अत्यन्त प्रव्यथित होता है और राम में दोष का ध्यान ( चिन्तन ) भी नहीं करता । फिर भी बुल्के, भदन्त कौसल्यायन आदि हठात् राम को दोषी मानते हैं और इन समाधानों तथा वाली के सन्तुष्टि आदि के बोधक वचनों को क्षेपक कहने का दुःसाहस करते हैं, जिसे सुस्त गवाह चुस्त वाग्मी कहावत ही कहा जा सकता है । परन्तु यह सर्ग परम्परा प्राप्त है और टीकाकारों द्वारा व्याख्यात है, अतः इसे प्रक्षेप कहना सर्वथा असङ्गत है । नाटकों में रोचकता तथा रसाभिव्यक्ति के लिए ही राम से वाली का द्वन्द्वयुद्ध वर्णित है ।