रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय रामचरितसिंहावलोकन ७२१ बुल्के कहते हैं "रामभक्ति के प्रादुर्भाव से रामकथा का समस्त वातावरण बदल दिया गया । तथा विभिन्न पात्रों की उग्रता तथा कुटिलता रामभक्ति में लीन कर दी गयी । दुष्ट राक्षस रावण भी पतितपावन राम के प्रभाव से पवित्र हो जाता है । इस प्रकार भारत की समस्त आदर्श भावनाएँ रामकथा में मर्यादापुरुषोत्तम राम तथा पतिव्रता सीता के चरित्रचित्रण में केन्द्रीभूत हो गयीं । फलस्वरूप रामकथा भारतीय संस्कृति के आदर्शवाद का उज्ज्वलतम प्रतीक बन गयी ।" इस सम्बन्ध में इतना ही कहना है कि रामभक्ति का यह चमत्कार स्वाभाविक है, परन्तु वह रामभक्ति वेदादि शास्त्रों से वर्णित अनादि एवं नित्य ही है । वह विकास का परिणाम नहीं है । रामकथा का वातावरण सदा से ही व्यावहारिक आदर्श मर्यादामय और पारमार्थिक भक्ति-भावनामय रहा है । भक्ति के प्रभाव से कुटिलता एवं उग्रता नष्ट होकर सरलता एवं नम्रता के रूप में परिणत होती ही है । "पायी न केहि गति पतितपावन राम भजि सुनु सठ मना ।" ( रा० मा० ७।१२९ के बाद छन्द ) रामकथा अनादिकाल से ही मर्यादापुरुषोत्तम, भक्तवत्सल, पतितपावन राम तथा अनन्तब्रह्माण्डों की ऐश्वर्य और माधुर्य की अधिष्ठात्री, पतिव्रता सीता के चरित्रचित्रण में ही पर्यवसित है । अतएव सदा से ही रामकथा भारतीय आदर्श का उज्ज्वलतम प्रतीक है और रहेगी ।