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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

अध्याय रामचरितसिंहावलोकन ७२१ बुल्के कहते हैं "रामभक्ति के प्रादुर्भाव से रामकथा का समस्त वातावरण बदल दिया गया । तथा विभिन्न पात्रों की उग्रता तथा कुटिलता रामभक्ति में लीन कर दी गयी । दुष्ट राक्षस रावण भी पतितपावन राम के प्रभाव से पवित्र हो जाता है । इस प्रकार भारत की समस्त आदर्श भावनाएँ रामकथा में मर्यादापुरुषोत्तम राम तथा पतिव्रता सीता के चरित्रचित्रण में केन्द्रीभूत हो गयीं । फलस्वरूप रामकथा भारतीय संस्कृति के आदर्शवाद का उज्ज्वलतम प्रतीक बन गयी ।" इस सम्बन्ध में इतना ही कहना है कि रामभक्ति का यह चमत्कार स्वाभाविक है, परन्तु वह रामभक्ति वेदादि शास्त्रों से वर्णित अनादि एवं नित्य ही है । वह विकास का परिणाम नहीं है । रामकथा का वातावरण सदा से ही व्यावहारिक आदर्श मर्यादामय और पारमार्थिक भक्ति-भावनामय रहा है । भक्ति के प्रभाव से कुटिलता एवं उग्रता नष्ट होकर सरलता एवं नम्रता के रूप में परिणत होती ही है । "पायी न केहि गति पतितपावन राम भजि सुनु सठ मना ।" ( रा० मा० ७।१२९ के बाद छन्द ) रामकथा अनादिकाल से ही मर्यादापुरुषोत्तम, भक्तवत्सल, पतितपावन राम तथा अनन्तब्रह्माण्डों की ऐश्वर्य और माधुर्य की अधिष्ठात्री, पतिव्रता सीता के चरित्रचित्रण में ही पर्यवसित है । अतएव सदा से ही रामकथा भारतीय आदर्श का उज्ज्वलतम प्रतीक है और रहेगी ।

एकविंश अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख मर्यादापुरुषोत्तम राम तथा जगज्जननी जानकी के प्रति वनमानव द्वारा प्रयुक्त अत्यन्त अशोभन अभद्र शब्दों का उत्तर इसी प्रकार गणेशचन्द्र जोशी मन्वन्तर ने वनमानव महाकाव्य लिखकर जनकजा एवं अशोकवासिनी दो भागों में प्रकाशित किया है, जिसे राजस्थान सरकार ने उच्च माध्यमिक विद्यालयों में पाठ्यपुस्तकों में सम्मिलित किया है। जनकजाखण्ड के आपत्तिजनक अंश निम्नोक्त हैं। सम्पूर्ण पुस्तक कई प्रयत्न करने पर भी प्राप्त नहीं हुई। पृष्ठ ( १ ) सीता विद्रोहिणी थी न कि पतिपरायणा ५ ( २ ) सीता राम के साथ विवाह से असन्तुष्ट थी १८२—१८४ ( ३ ) राम प्रपंचक थे १६३ ( ४ ) बाल्मीकि और तुलसी खुशामदी थे १६६ ( ५ ) राम दासता के समर्थक थे १६८ ( ६ ) राम को आदर्श कहकर भक्त कवियों ने पाषण्ड का बाजार जोड़ा है १७१ ( ७ ) राम दशरथ के नहीं वरन् वसिष्ठ के वीर्य से उत्पन्न थे १७४ ( ८ ) राम छली थे १७७ ( ९ ) लक्ष्मण सीता के अनुगामी और द्विवर थे १७८ ( १० ) सीता स्वयं रावण के साथ गयी २०७—२०८ ( ११ ) सीता रावण के ही योग्य थी १८८ ( १२ ) सीता रावण को चाहती थी १९२—२०१ ( १३ ) सीता लक्ष्मण की प्रेमिका थी १९२ ( १४ ) सीता वन से लौटने को तैयार न थी १९७ ( १५ ) राम का वनगमन नाटकमात्र था १९५—१९६ ( १६ ) सीता लङ्का में रहने को लालायित थी १९९ ( १७ ) लक्ष्मण सीता पर आसक्त थे २०१ ( १८ ) राम स्तेनवृत्ति के थे २०७—२०८ ( १९ ) सीता जनक की नहीं किसी अन्य की जायी थी ( २० ) लक्ष्मण व रावण में सीता के प्रति प्रेम की प्रतियोगिता थी २१५ ( २१ ) सीता के तीन प्रेमी राम, रावण और लक्ष्मण २१६ ( २२ ) लव लङ्का का वंशज था २२० ( २३ ) सीता की तुलना गधी से २२२ ( २४ ) सीता रावण एवं लङ्का पर मुग्ध थी २६२—२६३

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७२३ ( २५ ) सीता ने राम को नहीं रावण को चाहा २६७–२८५ ( २६ ) सीता ने विवश होकर राम को वरा २७१–२७२ ( २७ ) सीता को एक पुरुष से बँधना पसन्द नहीं था २७२–२७८ ( २८ ) सीता की माँ निर्धन राम को पुत्री देने से दुःखी २८२ ( २९ ) सीता किसी की सगी न थी १४२ ( ३० ) ऋषि लोग गोमांस खाते थे १४२ ( ३१ ) ब्रह्म-भोज में ब्राह्मण मनुष्य-शव खाते थे १३६ अशोकवासिनी द्वितीय खण्ड में ( १ ) भरत की माँ ऋषि से सहवास करने वन में गयी १५ ( २ ) सीता निषादराज के साथ जाने को तय्यार थी ३१ ( ३ ) सीता हिस्टीरिया से पीड़ित थी ४२ ( ४ ) सीता का स्वर्णप्रेम ४६ — ५३ ( ५ ) राम नपुंसक थे ५६ ( ६ ) सीता लङ्का जाने को उत्सुक थी ५६ — ५७ ( ७ ) लक्ष्मण सीता पर आसक्त थे ५६ — ५७ ( ८ ) राम रिश्वत के द्वार खोल गये ९८ ( ९ ) हनुमान् बलात्कार से उत्पन्न १३६ ( १० ) हनुमान् ठेट बन्दर ( ११ ) लंका में अनेक राक्षसियों से रमण किया अनेक जारज पुत्र उत्पन्न किये । ( १२ ) सीता का रावणप्रेम व रामवियोग का नाटक । हर नर नारी दुराचारिणी । उक्त कथन — “मुखमस्तीति वक्तव्यं दशहस्ता हरीतकी ।” न्याय के अनुसार निष्प्रमाण प्रलाप ही कहा जायगा । राम सीता कब हुए और क्या प्रमाण हैं । इस विषय में प्रत्यक्ष और अनुमान की प्रवृत्ति नहीं होती, क्योंकि प्रत्यक्ष से विद्यमान का ही बोध होता है और अनुमान भी लिङ्गलिङ्गिभाव, गम्यगमक, व्याप्यव्यापक सम्बन्धग्रह से ही होता है । यद्यपि आध्यात्मिक एवं आधिदैविक रूप से राम और राम की लीलाएँ आज भी विद्यमान हैं । पर बहिर्मुखों के लिए उनका अनुभव असम्भव ही है । ऐतिहासिकरूप से राम आधुनिक इतिहास के अविषय ही हैं । वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत तथा पुराणों, तन्त्रों और आगमों से ही राम, सीता, लक्ष्मण, रावण एवं उनके चरित्रों का बोध हो सकता है । इन सद्ग्रन्थों से सीता, राम, लक्ष्मण का अत्यन्त पवित्र श्रौतस्मार्त धर्मों के अनुसार ही चरित्र है । वनमानव काव्याभास के द्वारा वर्णित दोष वेदादिप्रमाणों से सिद्ध नहीं हैं। निराधार एवं निष्प्रमाण ही कुछ कहना है तो कोई भी वनमानव एवं उसके लेखक को ही महापातकी, दुराचारी, वर्णसङ्कर, प्रतिलोम अन्त्यावसायी, षण्ढ, अभक्ष्यभक्षी, अपेयपायी आदि कुछ भी कह सकता है। वाल्मीकिरामायण, रघुवंश आदि काव्यों के द्वारा तो श्रीराम मर्यादापुरुषोत्तम, महान् योद्धा, पराक्रमी, परब्रह्म परमेश्वर विष्णु के अवतार हैं, लक्ष्मी अनन्त ब्रह्माण्डों की जननी ऐश्वर्य-माधुर्य की अधिष्ठात्री सीता हैं । शेष कारण ब्रह्म अनन्त शेष हैं । पतिपरायणा सीता को विरोहिणी लिखना लेखक की मूर्खता ही है । जल तथा तरङ्ग, चन्द्र-चन्द्रिका, भानु और प्रभा, अमृत और मधुरिमा के समान

सीता और राम दोनों अभिन्न थे । उनमें असन्तोष का प्रश्न ही कहाँ ? राम प्रपञ्च के निर्माता होते हुए भी अधिष्ठानरूप से प्रपञ्चातीत ही थे। वाल्मीकि और तुलसी ही क्यों सभी ब्रह्मविद्वरिष्ठ ऋषि, मुनि आदि आस्तिक राम के प्रशंसक थे और हैं। श्रीराम 'दासोऽहं' के 'द' का अपहरण करके अधिकारियों में सोऽहं की भावना जगाते हैं। राम को आदर्श मानकर उनका अनुसरण करने से ही पाखण्ड का अन्त हो सकता है। राम सम्पूर्ण विश्व के माता, पिता एवं गुरु होते हुए भी अवतारवाद के सिद्धान्तानुसार दशरथनन्दन, कौशल्यानन्दवर्धन तथा वसिष्ठ के प्रिय शिष्य थे। राम छली नहीं, कूटमयी माया के पति और छल-छद्म के भेदक थे। लक्ष्मण सीता के अनुगत देवर 'रामं दशरथं विद्धि मां विद्धि जनकात्मजाम् ।' के अनुसार राम को पिता एवं सीता को माता मानते थे। सीता रावण के विनाश के लिए रावण के साथ गयी भी हो तो भी कोई बाधा नहीं है। जगज्जननी विश्वकल्याणकारिणी सीता रावण का भी हित चाहती थी। तभी उन्होंने रावण के प्रति राम के अनन्त प्रभाव एवं तेज का वर्णन किया था। सीता लक्ष्मण की माता के तुल्य हितकारिणी थी। सीता सर्वकारण शक्ति होने से वन में, रण में सर्वत्र ही हैं और होंगी। सर्वव्यापी राम का वनगमन नाटक ही तो है। सीता सर्वत्र ही हैं। फिर लङ्का में ही क्यों ? सर्वहितैषिणी हैं फिर लक्ष्मण की भी हितैषिणी होना युक्त ही है। राम का नाम दुर्वृत्तियों का विनाशक तथा सद्वृत्तियों का विधायक है। सीता सर्वकारण शक्ति अयोनिजा ही हैं। जगज्जननी सीता में सबकी स्वाभाविकी भक्ति युक्त है। भक्ति में उत्कर्ष सब को ही अभीष्ट है। सीता के निन्दक को गर्दभियों में भी स्थान दुष्प्राप्य है। रावण तथा लङ्का दोनों सीता-द्रोह के कारण नष्ट हो गये। लङ्का-निवास के कारण सीता की निन्दा करनेवाला अभिशप्त रजक ही था। सीता रामचन्द्र की चन्द्रिका ही हैं। सीता परम पुरुष राम की अनन्या हैं। सीता और राम के अखण्ड दिव्य दाम्पत्य से विश्वमङ्गल हुआ। सीता असङ्ग चिद्रूपिणी होने पर भी सर्वाभ्युदयरूपिणी भी थी। ऋषियों एवं ब्राह्मणों पर अभक्ष्य भक्षण का दोषारोपण करनेवाला विड्वराह ही हो सकता है। भरत की माता कैकेयी के कारण ही रामायण बन सकती थी। कोल, भिल्ल, निषाद आदि सबके कल्याणार्थ ही सीता और राम का वनवास था। सीता और राम का ध्यान करने से सब रोगों की निवृत्ति तथा स्वर्णिम भगवत्प्रेम प्राप्त होता है। रामचरित सुनकर कापुरुषों में भी शौर्य जाग्रत् होता है। सर्वव्यापी, सर्वद्रष्टा राम के दर्शनमात्र से सब दोष दूर होते हैं। हनुमान् केसरी के क्षेत्र अञ्जना के गर्भ से उत्पन्न वातात्मज थे। हर नारी को दुराचारिणी कहनेवाला स्वयं को ही जारज सिद्ध करता है। वनमानव का लेखक श्रुति, स्मृति और पुराण के प्रमाण बिना सीता के विरुद्ध अनर्गल प्रलाप करनेवाला कुदानव ही है। उसने कलुषित मनो- वृत्तियों के कारण राम के उपासकों, पूजकों, तथा भक्तों को ठेस पहुँचायी है।

रामचरित्र के सम्बन्ध में वर्तमान इतिहास का चञ्चु-प्रवेश नहीं हो सकता

इस देश में रामायण की घटनाओं की प्रामाणिकता के विषय में निरर्थक विवाद उपस्थित कर अपने को अधिक लोकप्रिय बनाने का प्रयास चल रहा है। कुछ दिन पहले भारतीय संस्कृति के मूल मन्त्र मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम की लीला के बदले रावणलीला मनाने का अभियान भी चला था। भारतीय बौद्धिक वर्ग ही ने इस प्रश्न का बौद्धिक स्तर पर उत्तर दिया और वह अभियान बन्द करना पड़ा। अब पुनः डाक्टर सांकलिया एवं उनके जैसे कुछ नवीन पुरातत्त्वविदों ने रामायण की कतिपय घटनाओं तथा विशिष्ट स्थानों की प्रामाणिकता तथा उनके सम्बन्ध में नये सूत्रों के अन्वेषण के बाद विवाद उठाया है। डाक्टर सांकलिया ने वाल्मीकीय रामायण को पूर्ण प्रामाणिक ग्रन्थ माना है। वे उसे महाकाव्य मानते हैं। परन्तु उसमें वर्णित सेतुबन्धन, हनुमान् द्वारा समुद्र पार गमन, अंगूठी का प्रसङ्ग, लङ्का की स्थिति तथा कुछ ऐसी ही घटनाओं को वे अप्रामाणिक तथा काल्पनिक मानते हैं। इस सम्बन्ध में उनके तर्क अत्यन्त आधारहीन तथा परस्परविरोधी ज्ञात होते हैं।

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७२५ यह नियम है कि जिन वस्तुओं का भाव जिस प्रमाण से सिद्ध होता है उनका अभाव भी उसी प्रमाण से विदित होता है। जिस प्रकार भूतल में घट का भाव आलोकादि सहकारी सहकृत मन-संयुक्त निर्दोष नेत्र से ही विदित होता है, उसी प्रकार घटाभाव भी उसी प्रमाण से विदित होता है। यह स्पष्ट है कि जिसके भाव का ज्ञान कर्णेन्द्रिय से होता है, उसके अभाव का ज्ञान नेत्रेन्द्रिय से नहीं हो सकता। शब्द का ज्ञान कर्णेन्द्रिय से होता है, शब्दाभाव के ज्ञान के लिए भी कर्णेन्द्रिय की ही आवश्यकता होती है किसी अन्य प्रमाण की नहीं। प्रकृत में राम, सीता, लक्ष्मण, अयोध्या, लङ्का आदि का ज्ञान आधुनिक प्रत्यक्ष, अनुमान तथा आधुनिक इतिहास से नहीं हो सकता। रामायण एवं पुराणों के अनुसार राम का प्रादुर्भाव करोड़ों वर्ष पूर्व चौबीसवें त्रेता में हुआ है। आधुनिक ऐतिहासिक युग एवं प्रागैतिहासिक काल की सम्पूर्ण अवधि विद्वानों ने छह हजार वर्ष के भीतर ही मानी है। ऐसी स्थिति में राम के चरित्रों के सम्बन्ध में वर्तमान इतिहास का चक्षु-प्रवेश हो ही नहीं सकता। उस सम्बन्ध में सम्पूर्ण जानकारी अब वाल्मीकीय रामायण से ही प्राप्त हो सकती है। वाल्मीकिरामायण का अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि रामायण का निर्माण कुछ संवाददाताओं या टेलीप्रिन्टरों से भेजे गये समाचारों के आधार पर नहीं हुआ। उसका निर्माण महर्षि वाल्मीकि ने समाधिजनित ऋतम्भरा प्रज्ञा के द्वारा अतीत, अनागत, वर्तमान, स्थूल, सूक्ष्म, सन्निकृष्ट तथा विप्रकृष्ट सभी वस्तुओं का साक्षात्कार कर के राम, लक्ष्मण, सीता आदि के हसित, भाषित, इङ्गित, चेष्टित आदि सभी व्यापारों का पूर्णरूप से साक्षात्कार किया। महर्षि वाल्मीकि अलौकिक मुनि थे। वे लौकिक गति और दिव्य गति द्वारा भी सब जगह आ जाकर सब वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त कर सकते थे। अतः सेतुबन्धन और समुद्र आदि के सम्बन्ध में रामायण के वर्णन की उपेक्षा नहीं की जा सकती। इनके विषय में वाल्मीकिरामायण ही सबसे बड़ा प्रमाण माना जायेगा। सेतुबन्धन कल्पना नहीं रामायण में वर्णित रामेश्वर की स्थापना वर्तमान इतिहास से भी प्रमाणित होती है। सहस्राब्दियों से भारत के कोने-कोने से लोग रामेश्वर का दर्शन करने जाते हैं। गङ्गोत्री से जल लेकर अतिप्राचीन काल से धर्मप्राण जनता वहाँ चढ़ाने जाती है। धर्मशास्त्र की मान्यता के अनुसार सेतुबन्ध रामेश्वर के दर्शन से ब्रह्महत्याओं के पाप दूर होते हैं। पुराणों में इन बातों का विशद वर्णन है। कूर्मपुराण पूर्वभाग के इक्कीसवें अध्याय में आये इन श्लोकों से रामेश्वर की महत्ता तथा प्राचीनता स्पष्ट होती है— “यत्त्वया स्थापितं लिङ्गं द्रक्ष्यन्तीह द्विजातयः। महापातकसंयुक्तास्तेषां पापं विनश्यतु ॥ ४९ ॥ अन्यानि चैव पापानि स्नातस्यात्र महोदधौ । दर्शनादेव लिङ्गस्य नाशं यान्ति न संशयः ॥ ५० ॥ यावत्स्थास्यन्ति गिरयो यावदेषा च मेदिनी। यावत्सेतुश्च तावच्च स्थास्याम्यत्र तिरोहितः ॥ ५१ ॥ इसी प्रकार के अन्य वचन स्कन्दपुराण तथा अन्यान्य पुराणों में भी मिलते हैं। इन वचनों तथा मान्य ग्रन्थों के प्रमाणों के अतिरिक्त रामेश्वर नाम ही रामेश्वर की मूर्ति और मन्दिर का भगवान् राम के साथ असाधारण सम्बन्ध स्थापित करता है, अतः सेतुबन्ध रामेश्वर की घटना वाल्मीकिरामायण द्वारा वर्णित रामेश्वर से भिन्न वस्तु नहीं हो सकती। सेतुनिर्माण की घटना मात्र कल्पना नहीं है। वाल्मीकिरामायण में सेतुनिर्माण की प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन किया गया है। उसका प्रारम्भ, समाप्ति और नाप-जोख सबपर इस रामायण में प्रकाश डाला गया है। वाल्मी-

७२६ रामायणमीमांसा एकविंश किरामायण के युद्धकाण्ड के २२ वें सर्ग के ५० से ७२ वें श्लोक तक प्रतिदिन कितना निर्माण हुआ, कितने दिनों में सेतु बनकर तैयार हुआ इसका ब्योरेवार वर्णन किया गया है। पूर्ण सेतु का निर्माण पाँच दिनों में हुआ था। प्रथम दिन १४ योजन, दूसरे दिन २०, तीसरे दिन २१, चौथे दिन २२ एवं पांचवे दिन २३ योजन के अनुपात से पांच दिनों में पूर्ण सेतु बन कर तैयार हुआ था। उसकी लम्बाई १०० योजन तथा चौड़ाई १० योजन थी। आधुनिक युग में विभिन्न देशों में निर्मित अत्यन्त विशाल सेतुओं की उपस्थिति उक्त सेतुबन्धन की घटना को वास्तविक मानने को बाध्य करती है। समुद्र-वर्णन तथा दक्षिण भारत की स्थिति वाल्मीकिरामायण में समुद्र, समुद्र की लहरें, जलजन्तुओं, रत्नों, तटीय वस्तुओं, चन्द्रमा के कारण आने- वाले समुद्री ज्वारभाटों तथा समुद्र से सम्बद्ध अन्यान्य वस्तुओं का जितना सजीव वर्णन किया गया है, उसका जीवन्त वर्णन किसी भी ऐसे व्यक्ति के द्वारा सम्भव नहीं है जिसने कभी समुद्र देखा ही न हो। उदाहरण के लिए सुन्दरकाण्ड के प्रथम सर्ग में हनुमान्‌जी द्वारा समुद्र-गमन के समय का वर्णन प्रस्तुत है— “यं यं देशं समुद्रस्य जगाम स महाकपिः। स तु तस्याङ्गवेगेन सोन्माद इव लक्ष्यते॥६६॥ सागरस्योर्मिजालानाभुरसा शैलवर्ष्मणा। अभिनंस्तु महावेगः पुप्लुवे स महाकपिः॥६७॥ मेरुमन्दरसंकाशानुद्वमन् (?) स महार्णवे। अत्यक्रामन्महावेगस्तरङ्गान् गणयन्निव ॥ ७० ॥ तिमिन्नक्रझषाः कूर्मा दृश्यन्ते विवृतास्तदा। वस्त्रापकर्षणेनेव शरीराणि शरीरिणाम् ॥७२॥ वाल्मीकिरामायण जैसे प्रामाणिक ग्रन्थ में वर्णित वस्तु के विषय में 'अमुक वस्तु अमुक स्थान पर ही रही होगी' की कल्पना निःसार है। उस रामायण में वर्णित वस्तुओं, घटनाओं एवं स्थानों के विषय में तो निश्चितता है, परन्तु आधुनिक लोगों द्वारा तथाकथित अन्वेषणों के विषय में तो अनिश्चय की स्थिति बनी ही हुई है। ऐसी स्थिति में निश्चित प्रमाण को छोड़कर अप्रामाणिक की ओर दौड़ना अन्धकारयुक्त मकान में वस्तुओं को खोजने के लिए प्रयास करने के समान है। महर्षि वाल्मीकि ने भगवान् राम के समुद्र तक पहुँचने के विभिन्न मार्गों का विशद वर्णन किया है। आज भी उन्हीं मार्गों से दक्षिण भारत की तीर्थयात्रा होती है। किष्किन्धा में वाली को मारकर राम ने चौमासा किया था। वह किष्किन्धा दक्षिण भारत में आज भी किष्किन्धा नाम से ही प्रसिद्ध है। वाल्मीकिरामायण में वर्णित किष्किन्धा की स्थिति को छोड़कर बिना किसी प्रमाण के बेलारी या अन्य किसी स्थान पर उस स्थान की कल्पना करना वास्तविकता को अस्वीकार करना है। नासिक, पञ्चवटी आदि स्थानों के विषय में भी शङ्काएँ उठायी गयी हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि नासिक का सम्बन्ध रामायण की महत्त्वपूर्ण घटना शूर्पणखा के नासिका-छेदन से है। पञ्चवटी भी वहीं है। रामायण से भी दोनों स्थानों का पास पास होना प्रमाणित होता है। आधुनिक काल में भी पञ्चवटी और नासिक एक ही स्थान पर हैं। इन स्थानों का वाल्मीकिरामायण के वर्णन से साहचर्य सम्बन्ध प्रतीत होता है। महाकवि ने रामायण में लगभग दो सौ साठ स्थानों का वर्णन किया है। इनमें से अधिकांश स्थान आज भी दक्षिण भारत में ही हैं। गोदावरी, कृष्णा, वरदा आदि नदियां, आन्ध्र, चोल, पाण्ड्य, केरल आदि स्थान दक्षिण भारत में ज्यों के त्यों विद्यमान हैं।

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७२७ समुद्रसम्बन्धी पर्वतों का वर्णन भी स्वाभाविक ढंग से हुआ है। वे पर्वत आज भी विभिन्न नामों से विभिन्न रूपों में अवस्थित हैं। वाल्मीकिरामायण में लङ्का जाते समय हनुमान् का महेन्द्र पर्वत किष्किन्धाकाण्ड (सर्ग- ६७ श्लोक ३९) तथा लौटते समय अरिष्ट पर्वत (सुन्दरकाण्ड सर्ग ५६ श्लोक २६) पर चढ़ना बताया गया है। इसी तरह सुबेल, सह्य, मलय इत्यादि पर्वतों का भी वर्णन किया गया है। इन सब वाल्मीकिरामायण में वर्णित एवं आधुनिक जगत् में प्रसिद्ध वस्तुओं एवं स्थानों में वाल्मीकिरामायण में वर्णित अर्थ ही प्रमाणित होता है। अतः यह कहना तथ्यों से विपरीत है कि महर्षि वाल्मीकि को दक्षिण भारत की भौगोलिक स्थिति एवं उसके रीति- रिवाजों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। जहाँ तक दक्षिण में शव गाड़ने की प्रथा का प्रश्न है, आधुनिक इतिहास के आधार पर उसे प्रामाणिक नहीं माना जा सकता। आधुनिक इतिहास मात्र ६ हजार वर्ष पुराना है, जब कि वाल्मीकिरामायण में वर्णित वाली के शव-दाह की घटना करोड़ों वर्ष पुरानी घटित घटना है। रामायण की संस्कृति सर्वथा वैदिक संस्कृति है। राम, रावण, वाली इत्यादि वैदिक संस्कृति के व्यक्ति थे। हनुमान्जी भारतीय संस्कृति के अध्येता थे। वैदिक संस्कृति में 'भस्मान्तं शरीरम्' इत्यादि वेदमन्त्र के अनुसार प्राधान्येन शवदाह का ही समर्थन किया गया है। अतः वाली एवं रावण के शव-दाह का आदेश देना वैदिक संस्कृति के अनुसार सर्वथा उपयुक्त था। शव को गाड़ने की कल्पना कथञ्चित् हो तो वह मध्यकाल की बात हो सकती है। इसको दक्षिण भारत का शाश्वतिक धर्म नहीं माना जा सकता। उत्तर भारत में भी साधु-सन्यासी, सन्त, महात्मा इत्यादि को जलाया नहीं जाता, उनकी समाधि बनती है। छोटे एवं असंस्कृत बालकों के शव के साथ भी यही होता है। कहीं कहीं प्लेग इत्यादि की बीमारी में मरे वयस्क पुरुषों के शव को भी गाड़ा ही जाता है, उन्हें जलाया नहीं जाता है। हमारे यहाँ शवों के सम्बन्ध में सर्वत्र दहन, खनन एवं प्लावन की परम्परा है। अतः इनमें से किसी मुस्लिमबहुल प्रदेश में कब्रों को देखकर यह निर्विवाद निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि यहाँ केवल कब्र ही बनती रही हैं, उसी प्रकार किसी स्थान विशेष पर शव गाड़ने की प्रक्रिया को लेकर यह नहीं कहा जा सकता कि वहाँ पर सदा शव गाड़े ही जाते रहे हैं। यह बात तात्कालिक ऐतिहा- सिक हो सकती है पर शाश्वतिक ऐतिहासिक नहीं है। जहाँ तक वाल्मीकिरामायण वर्णित स्थानों का प्रश्न है वह अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण है। वानरराज सुग्रीव ने बन्दरों द्वारा सीता के अन्वेषण के लिए जिन स्थानों का वर्णन किया है वे अत्यन्त सजीव हैं तथा किसी भी अन्वेषण करनेवाले के लिए महत्त्वपूर्ण सामग्री सिद्ध हो सकते हैं। प्रारम्भ में जो-जो घटनाएँ जिन-जिन स्थानों पर घटित हुई थीं, लङ्का-विजय के पश्चात् लौटते समय भगवान् राम ने भगवती सीता से उन सभी स्थानों तथा घटनाओं का वर्णन किया है— “अत्र पूर्वं महादेवः प्रसादमकरोद् विभुः। एतन्तु दृश्यते तीर्थं सागरस्य महात्मनः॥ २०॥ सेतुबन्ध इति ख्यातं त्रैलोक्येन च पूजितम्। एतत्पवित्रं परमं महापातकनाशनम् ॥ २१ ॥” “एष सेतुर्मया बद्धः सागरे लवणाणर्वे ॥ १६ ॥” "कैलासशिखराकारे त्रिकूटशिखरे स्थितम्। लङ्कामीक्षस्व वैदेहि निर्मितां विश्वकर्मणा ॥ ३ ॥” “यत्र त्वं राक्षसेन्द्रेण रावणेन हृता बलात्। एषा गोदावरी रम्या प्रसन्नसलिला शुभा ॥४५॥” (वा० रा० ६। सर्ग १२३)

इसी तरह हिरण्यनाम पर्वत १८, किष्किन्धा २२, ऋष्यमूक ३८, पम्पा ४०, पर्णशाला आश्रम ४२-४४, शबरीमिलन स्थल ४१, अगस्त्य एवं शरभङ्ग मुनियों के आश्रम ४६, चित्रकूट ४९, भरद्वाज आश्रम ५१, शृंगवेरपुर ५२ इत्यादि स्थानों का वर्णन भगवान् राम ने किया है। इस प्रकार स्पष्ट है कि वाल्मीकिरामायण वर्णित स्थान पूर्ण प्रामाणिक हैं। अभी भी उन स्थानों की उपस्थिति तथा तीर्थ की दृष्टि से उनके महत्त्व पर किसी भी मान्य विद्वान् ने अपना मतभेद नहीं व्यक्त किया है। डाक्टर सांकलिया ने वाल्मीकिरामायण को पूर्ण प्रामाणिक ग्रन्थ माना है। फिर उसी ग्रन्थ के किसी अंश को क्यों अप्रामाणिक माना जाय यह तर्क की दृष्टि से समझ में नहीं आता। ऐसा करना किसी मुर्गी के आधे अङ्ग को पकाकर खा जाने तथा आधे अंग को अण्डा देने के लिए रख छोड़ने की घटना के समान है।

लंका की स्थिति

ऊपर यह स्पष्ट किया जा चुका है कि रामायण में वर्णित स्थानों के लिए वाल्मीकिरामायण ही सबसे बड़ा प्रामाणिक ग्रन्थ है। इस रामायण के अनुसार लङ्का समुद्र तट से सौ योजन दूर थी। इन लोगों द्वारा अभी तो पूर्वी मध्यप्रदेश, दक्षिणी बिहार, पश्चिमी बंगाल एवं छोटा नागपुर के आस-पास लङ्का की स्थिति का निर्धारण करना है। उसके लिए अभी कोई प्रमाण भी नहीं है। आज भी लङ्का नाम से ही जब प्रसिद्ध द्वीप है तब फिर 'लवका' को 'लङ्का' कहा होगा, यह कहने की आवश्यकता ही क्या है? यह नहीं कहा जा सकता कि लङ्का नाम की कोई चीज नहीं थी। वर्तमान श्रीलङ्का भी हमारे मत में रावण की लङ्का नहीं है। इस लङ्का का दूसरा नाम सिलोन भी है। सिंहल के ग्रन्थों में इस सिंहलद्वीप को रावण की लङ्का से विभिन्न बतलाया गया है। भारतीय पौराणिक भूगोल के अनुसार आज की श्रीलङ्का महाभारत का सिंहलद्वीप ही है। वास्तविकता यह है कि वाल्मीकिरामायण में वर्णित रावण की लङ्का सर्वसाधारण के लिए आज लुप्त हो गयी है। वहाँ दीर्घजीवी लोग रहते हैं। वे सामान्य व्यक्तियों द्वारा नहीं देखे जा सकते। आधुनिक भूगोलवेत्ता भी यह मानते हैं कि सहस्राब्दियों में भूगोल में पर्याप्त परिवर्तन हो जाया करता है। यह मान्यता बहुसम्मत है कि जहाँ आज हिमालय है वहाँ पहले समुद्र था। स्वयं डाक्टर सांकलिया ने यह माना है कि कुछ टीले ऐसे रहे होंगे जो इस समय आस्ट्रेलिया की ओर बढ़ गये होंगे। अतः रावण की लङ्का आध्यात्मिक एवं भौगोलिक दोनों कारणों से ही लुप्त हो गयी है। लङ्का को मध्य प्रदेश अथवा इधर-उधर खोजना एक व्यर्थ का प्रयास है। वाल्मीकिरामायण की कतिपय घटनाओं को अप्रामाणिक मानने के लिए कुछ भी ठोस तर्क प्रस्तुत नहीं किये गये हैं।

जहाँ तक रावण की जाति एवं संस्कृति का सम्बन्ध है, वाल्मीकिरामायण के अनुसार वह वैदिक संस्कृति में दीक्षित कर्मनिष्ठ ब्राह्मण था। वह परम तपस्वी पुलस्त्य का पौत्र तथा विश्रवा मुनि का पुत्र था। आज भी भारत में पुलस्त्य गोत्र प्रचलित है। इन प्रमाणों के रहते हुए भी उसे दूसरी जाति का व्यक्ति मानने की निराधार कल्पना करना सर्वथा अनुचित है।

यह सही है कि वाल्मीकिरामायण की कथाएँ युगों से गायी जाती रही हैं। ऐसी स्थिति में यदि उन कथाओं में प्रमाणविरुद्ध अंश आ जाय तो उसमें कुछ कल्पना का अंश आ सकता है। पर इन कथाओं में ऐसी कोई प्रमाणविरुद्ध बातें नहीं पायी गयी हैं। इसके विपरीत युगों से प्रचलित इन कथाओं में आश्चर्यजनक रूप से एकरूपता बनी हुई है। यह तथ्य वाल्मीकिरामायण की प्रामाणिकता के लिए सबसे बड़ा आधार है।

हमारे यहाँ वेदों की आचार्य-परम्परा मानी जाती है। गुरु-शिष्य-सम्प्रदाय-परम्परा से जैसे वेदों की रक्षा होती रही है, वैसे ही गुरु-शिष्यों की परम्परा से ही रामायण तथा पुराणों की भी रक्षा होती रही है। इसलिए

रामचरितसम्बन्धी लेख ७२९ रामायण में यदि कोई नयी चीज प्रविष्ट हुई तो उसे रामायण का प्रसिद्ध अंश न मानकर क्षेपक की संज्ञा दे दी गयी। वाल्मीकिरामायण के टीकाकारों ने तत्तत् क्षेपकों को न मानने का हेतु यही आधार बताया कि 'यहाँ सम्प्रदाय-प्राप्त व्याख्या नहीं है, अतः क्षेपक प्रमाण नहीं माने जा सकते। इसी सम्प्रदाय विशेष के कारण ही वाल्मीकिरामायण के मौलिक रूप की रक्षा होती रही है। अतः यह कहना ठीक नहीं है कि "वाल्मीकिरामायण की कथाओं में कालान्तर में व्यापक काटछांट की गयी।" रामायण में महाभारत की चर्चा नहीं है। इधर काव्यों में तथा कालिदास अश्वघोष प्रभृति कवियों ने भी रामायण की चर्चा की है। बौद्ध जातकों तथा जैन पउमचरियं में रामायण का वर्णन है। इनके आधार पर ही रामकथाओं के भिन्न रूप बने भी हैं। अनेक विदेशी विद्वानों ने भी रामकथा के सम्बन्ध में वाल्मीकिरामायण को ही सर्वाधिक प्राचीन एवं प्रामाणिक ग्रन्थ माना है। भारतीय संस्कृति का सन्देशवाहक यह महान् ग्रन्थ रामकथासागर में युगों से भारतीयों को गोता लगवाकर आज भी प्रत्येक भारतीय को उसमें गोता लगवाकर उनके जीवन को मानवता के उदात्त आदर्शों के अनुसार जीने की पवित्र प्रेरणा दे रहा है। ऐसे प्रामाणिक ग्रंथ को छोड़कर निराधार कल्पना के सहारे नयी खोजों का दावा करना बौद्धिकस्तर से नीचे उतरने की बात है। आधुनिक लोग वाल्मीकिरामायण के अयोध्या, अरण्य, किष्किन्धा, सुन्दर एवं लङ्का इन पाँच ही काण्डों को प्रामाणिक मानते हैं, जो सर्वथा अनुचित है। वैसे तो वाल्मीकिरामायण में प्रारम्भ से लेकर अन्त तक सर्वत्र ही राम को विष्णु का अवतार माना गया है। अतः राम को गुप्तकाल में विष्णु का अवतार कहा गया, यह बात पूर्णतया गलत है। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि वाल्मीकिरामायण की सभी घटनाएँ पूर्ण प्रामाणिक हैं। भारतीय संस्कृति, परम्परा तथा धार्मिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों के मूल रहस्य इसी ग्रन्थ में सुरक्षित हैं। मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम को आधुनिक इतिहास की सीमा में नहीं बाँधा जा सकता। किसी मान्य ग्रन्थ के कुछ अंशों को प्रामाणिक तथा कुछ को अपनी आधारहीन बातों को सिद्ध न कर सकने की दशा में अप्रामाणिक मानने की दुराग्रही दृष्टि का परित्याग करना इस समय अत्यावश्यक है। सभी लोगों को धार्मिक तथा आध्यात्मिक ग्रन्थों की बातों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करने के प्रयास से अपने को दूर रखने का प्रयास करना चाहिये। धार्मिक ग्रन्थों के विषय में ऐसी बातों से तनाव एवं विवाद का वातावरण पैदा हो जाता है। हमें ऐसा कोई भी कार्य नहीं करना है जिससे इस समय देश में कोई दूसरी समस्या उपस्थित हो। रामायण की घटनाओं के विषय में धर्माचार्यों का निर्णय ही एकमात्र दिशानिर्देशक होना चाहिये। इस सम्बन्ध में हम सदैव आवश्यक विचार- विनिमय के लिए तत्पर हैं। निगमागमसार मानस का प्रत्येक पद पापराशिनाशी एवं अकाट्य गोस्वामी तुलसीदासजी ने अपने रामचरितमानस में वेद, उपनिषद्, वाल्मीकिरामायण, महाभारत, पुराणों तथा आगमों, तन्त्रों एवं संहिताओं, धर्मशास्त्रों के अनुसार उत्कृष्ट कोटि के विचारों से परिपूर्ण श्रीराम के चरित्र को उपस्थापित किया है और बड़ी निर्भीकता से शास्त्रीय सिद्धान्त प्रस्तुत किये हैं। जीव यद्यपि सर्वेश्वर सर्वशक्तिमान् प्रभु का निर्मल निष्कलङ्क पवित्र अंश ही है— "ईस्वर अंस जीव अविनासी। चेतन अमल सहज सुखरासी ।।" (रा० मा० ७।११६।१) तथापि मायापराधीन होने के कारण और अविद्या, काम-कर्मों से उसकी ज्ञान-विज्ञान की परिधि बहुत सीमित हो जाती है। सच्छास्त्रों एवं सद्गुरुओं की कृपा से ही धर्म-ब्रह्म का प्रबोध होता है। अतः सभी ९२

७२० रामायणमीमांसा एकविंश आस्तिक सम्प्रदायों ने वेदादि-शास्त्रों के प्रामाण्य का सर्वोत्कृष्ट महत्त्व माना है। वेदादि-शास्त्रों का ही परमसार श्रीरामचरितमानस है। शास्त्रों का अमुक अंश ही आदरणीय है, अमुक नहीं, यह आस्तिकता नहीं है। वेदादि- शास्त्रों के महातात्पर्य का विषय 'परब्रह्म' रामचरितमानस के 'राम' हैं। उनका परम-पवित्र चरित्र ही रामचरित- मानस का वर्णनीय विषय है। राम के सम्बन्ध से ही रावण का भी चरित्र वर्णनीय कोटि में आता है; तभी तो- “चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् । एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥” के अनुसार शतकोटिप्रविस्तर रामायण का एक-एक अक्षर महापातकों को नष्ट करने की सामर्थ्य रखता है। फलतः रावण के चरित्र का वर्णन भी रामचरित्र का अङ्ग होने के नाते ही पापनाशन में सक्षम है, अतएव अनुष्ठान में सबका पाठ होता है। श्रीवाल्मीकिरामायण के सभी श्लोक संपुटितरूप से अनुष्ठान में पठनीय होते हैं। वेदों का प्रत्येक अक्षर सार्थक एवं सप्रयोजन है; यह उत्कृष्ट मीमांसापद्धति से सिद्ध है। ठीक वैसे ही रामचरितमानस का प्रत्येक अक्षर सार्थक एवं सप्रयोजन है। उसके किसी एक वाक्य को भी निरर्थक या गौण नहीं मानना चाहिये। वेदादि-शास्त्रों को भगवान् का वाङ्मय विग्रह माना जाता है। महाभारत तथा श्रीभागवत के सम्बन्ध में भी ऋषियों की वैसी ही धारणा है। भगवान् के वाङ्मय शरीर वेद, रामायण, भारत, भागवत में कोई नयी वस्तु डाल देना, वैसा ही अनिष्ट होगा, जैसे भगवान् के उपास्य विग्रह में कांटा चुभाना । उसमें से कुछ अंशों को प्रक्षिप्त कहकर निकाल देना भी वैसा ही अनिष्ट होगा, जैसे भगवान् के विग्रह से किसी अङ्गोपाङ्ग को पृथक् कर देना । ठीक उसी तरह रामचरितमानस भी भगवान् श्रीराम का विग्रह है, अतः उसमें नये अंश का सन्निवेश एवं विद्यमान अंशों का बहिष्कारण भी पूर्वोक्त नीति से अनुचित होगा। रामचरितमानस का नियमित अनुष्ठान होता है। वह आज का पवित्र धर्म-ग्रन्थ है। अतः उसके किसी अंश को उपेक्षणीय या अपरिपक्व विचार की परिणति नहीं कहा जा सकता है। श्रद्धा और अन्धविश्वास में यही अन्तर होता है कि वेदादि-शास्त्रों एवं तदनुसारी गुरुओं के वचन में विश्वास श्रद्धा है। अप्रामाणिक वस्तुओं में विश्वास अन्ध श्रद्धा है। यह ठीक है कि किसी एक प्रसङ्ग या कुछ पंक्तियों के आधार पर ही मानस का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता, किन्तु सम्पूर्ण मानस के उपक्रम, उपसंहार की एकरूपता, अभ्यास, फल, अपूर्वता, अर्थवाद और उपपत्ति का विचारकर उसका निष्कर्ष निकाला जा सकता है, तो भी उन कुछ पंक्तियों का भी समन्वय करना पड़ेगा। उन्हें उपेक्षणीय नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह भी मानस का अङ्ग ही है। उसका भी अनुष्ठान होता है। पर यदि ऐसा न हो सका तो अवश्य ही उन कुछ अंशों एवं पंक्तियों का दुरुपयोग होगा । मानस वेद, रामायण, महाभारत, पुराण तथा धर्मशास्त्रों के समन्वयात्मक अध्ययन का ही परिणाम नहीं, किन्तु सम्प्रदायपरम्पराप्राप्त सुनिश्चित परिपक्व सिद्धान्त में परिनिष्ठित, प्रामाणिक अधिकृत साक्षात् भगवान् शङ्कर और हनुमान्जी महाराज का प्रसादस्वरूप है- “सपनेहु साचेहु मोहि पर जो हर गौरि पसाउ । तौ फुर होउ जो कहउँ सब भाषाभनिति प्रभाउ ॥” ( रा० मा० १।१५) अतः उसके आधार पर द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि सिद्धान्तों का विश्लेषण भी अनुचित नहीं, किं बहुना धर्मनीति, राजनीति तथा व्यवहारों के औचित्य अनौचित्य का विश्लेषण भी अनुचित नहीं। “ढोल गँवार सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी ॥” ( रा० मा० ५।५८।३ ) वस्तुतः उक्त पंक्ति भी निरर्थक नहीं, वह भी तुलसी-साहित्य की उपेक्षणीय वस्तु नहीं है। वह बटलोई के किसी कोने के कच्चे चावल के एक कण के समान नहीं है। यदि बटलोई के सब चावल पके हैं, तो एक चावल

के कच्चे रहने का प्रश्न ही नहीं उठता है। प्रकृत पंक्ति का स्पष्ट अर्थ यही था कि गँवार समुद्र से भगवान् राम ने नम्रतापूर्वक लङ्का जाने का मार्ग माँगा था, पर समुद्र पर उसका कोई असर नहीं पड़ा। जब राम ने धनुष उठाकर शर-सन्धान किया, तब वह विनम्र होकर सामने आया और काम की बात करने लगा। अतः ऐसे स्थलों पर विनम्रता व्यर्थ होती है। वहाँ शर-सन्धान ही लाभदायक होता है। उस प्रसङ्ग में समुद्र ने ही गँवार आदि की बात कही, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि सभी गँवारों, ढोलों, पशुओं तथा नारियों को ताड़ना देते रहना चाहिये। ढोल को निरर्थक कौन ताड़ता है—जहाँ दूसरे वाद्यों से स्वर मिलाना होता है वहीं हथौड़ी से ठोंक-ठोंक कर ढोल, तबला या मृदङ्ग का स्वर मिलाया जाता है। निरर्थक कोई भी ढोल को नहीं ठोंकता है। पशु का भी कोई सदा ताड़न नहीं करता है, किन्तु जब बैल को हल में या गाड़ी में चलाना होता है तब शिक्षा के लिये उसकी ताड़ना भी अपेक्षित होती है। इतना ही क्यों ? भारतीय परम्परा में तो उपाध्याय (अध्यापक) अपने छात्रों को भी चपेटिका प्रदान करता है। वह भी उसके हित के ही लिए, अहित के लिए नहीं। उसका प्रमाद तथा असावधानी मिटाने के लिए। इसी तरह कभी नारी की भी ताड़ना अपेक्षित होती है। बृहदारण्यक उपनिषद् में उल्लेख है कि स्त्री को भूषण-वसन देकर प्रसन्न कर के काम लेना चाहिये। यदि कभी उससे अनुकूल न हो तो उसे ताड़न कर के भी अनुकूल बनाना चाहिये— “सा चेदस्मै न दद्यात् काममेनामवक्रीणीयात् सा चेदस्मै नैव दद्यात् काममेनां यष्ट्या वा पाणिना वोपहत्यातिक्रामेदिन्द्रियेण ते यशसा यश आदद इत्ययशा एव भवति ।” (बृ० उ० ६।४।७) अतः पति परिस्थिति विशेष में ताड़न कर सकता है, वैसा ताड़न स्त्री को अभीष्ट होता है। वह उसे बुरा नहीं मानती। किसी ने तो यह भी कहा है कि जो पति कभी ताड़न नहीं करता, स्त्री उससे सन्तुष्ट नहीं होती है। ताड़न और प्यार दोनों अपेक्षित हैं : “कबहुँ न हँसि कर कर गह्यो कबहुँ न रिसि कर केस। का कन्ता के घर रहे का भयो गये विदेस ॥” जो पति कभी प्यार नहीं करता और कभी क्रोध नहीं करता, वह स्त्री की दृष्टि में उपयुक्त पति होने का अधिकारी ही नहीं है। शास्त्रों की दृष्टि से बालकों का ताड़न विदित है— “लालयेत् पञ्च वर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत्। प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत् ॥” प्रथम पाँच वर्ष तक बालक का लालन करना चाहिये और दस वर्ष तक ताड़न करके उसे शिक्षित करना चाहिये। सोलहवें वर्ष से पुत्र के साथ मित्र का सा व्यवहार करना चाहिये। इसी प्रकार शास्त्रानुसार स्त्रियों का विवाह ही उपनयन है— “वैवाहिको विधिः स्त्रीणामौपनायनिकः स्मृतः। पतिसेवा गुरौ वासः गृहार्थोऽग्निपरिक्रिया ॥” (मनु० २।६७) पति-कुलवास ही उनका गुरुकुलवास है। पतिसेवा ही गुरुशुश्रूषा है। शास्त्रानुसार रजोदर्शन के प्रथम ही उपनयनकाल में ही यह सब होना चाहिये। वह बाल्यावस्था ही होती है। उनका शिक्षण पति के द्वारा ही होता है। अतः जैसे माता-पिता तथा गुरु बालक का, सुशिक्षा के लिए ही, ताड़न करते हैं। उसी तरह पति भी सुशिक्षा के लिए स्त्री का ताड़न करता है। जैसे कोई बालकों का भी निरर्थक ताड़न नहीं करता, उसी तरह स्त्री का भी ताड़न निरर्थक नहीं। किन्तु शिक्षा की दृष्टि से आवश्यक होने पर ही उनका ताड़न विहित है। इसके अतिरिक्त एक ताड़न

७३२ रामायणमीमांसा एकविंश शृङ्गाररस का अनिवार्य अङ्ग है। उसकी विशेष जानकारी "ऋग्वेद" के उर्वशी-पुरूरवा-संवाद से प्राप्त करनी चाहिये। जिस ताड़न को उर्वशी ने शर्त के रूप में रखा था। ताड़न शब्द का प्रयोग केवल मारना, पीटना ही नहीं है, अनुशासन और डांटना भी ताड़न है। प्रकृत में भी भिन्न भिन्न पात्रों में ताड़न एक जैसा नहीं कहा जा सकता है। ढोल के ताड़न का अर्थ हाथ से या हथोड़ी से स्वर मिलाना या कपड़ा लपेटे हुए छोटे काष्ठ के डण्डे से बजाना। गँवार का भी अर्थ अज्ञ होता है। शूद्र का भी अर्थ अशिक्षित शूद्र है। उसके ताड़न का अर्थ है। उसे शिक्षित करना। वैसे तुलसीदासजी ने निषाद, चित्रकूट के कोल, भिल्ल, किरातों का भी गुण-गान किया है, जो कि शूद्र से भी निकृष्ट कोटि के माने जाते थे। जिनकी छाया के स्पर्श से भी जल-प्रोक्षण किया जाता है— "जासु छाँह छुइ लेइय सींचा।" (रा० मा० २।१९२।२) घोड़ा, बैल आदि पशु यदि ठीक नहीं चलते हैं तो उनका छोटे हल्के डण्डे या चाबुक आदि से भी ताड़न किया जाता है या शिक्षण के लिए भी कुछ ताड़न करना पड़ता है। अतः पाँचों के लिए एक प्रकार का ताड़न नहीं हो सकता। उक्त सन्दर्भ में यह भी नहीं भूलना चाहिये कि श्रोतुलसीदासजी ने मानस में नारी-जाति के बहुत अधिक सम्मान का वर्णन किया है— “जो केवल पितु आयसु ताता। तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता।।” (रा० मा० २।५५।१) अर्थात् यदि केवल पिता की आज्ञा है वन जाने की, तो माता को बड़ी मान कर तुम मुझ माता के आज्ञा- नुसार वन मत जाओ। यह मनुजी की उस उक्ति के अनुसार कहा गया है जिसमें उन्होंने पिता से सहस्रगुना माता का सम्मान करना कहा है— “सहस्रं तु पितृन् माता गौरवेणातिरिच्यते।” (मनु० २।१४५) भगवती सुनयना, सुमित्रा, अनसूया, सीताजी आदि नारियों के सम्बन्ध में उन्होंने बहुत कुछ कहा ही है। अरण्यकाण्ड में श्रीराम-नारद-संवाद में जो स्त्री-दोष का वर्णन है, वह शुद्ध वैराग्य के लिए ही और वह पुरुषों का भी उपलक्षण है। जैसे पुरुषों को परस्त्रियों से रागनिवृत्ति के लिए दुष्ट स्त्रियों का दोषानुसन्धान करके सावधान रहना चाहिये, उसी प्रकार स्त्रियों को दुष्ट पुरुषों का दोष जानकर सावधान हो स्वधर्म-निष्ठ होना चाहिये। इसी प्रकार मानस के प्रत्येक प्रसङ्ग को देश, काल, पात्र और परिस्थिति के सन्दर्भ में देखते हुए विचार करना चाहिये; तभी निर्णय में सुगमता सिद्ध होगी। महाभारत केवल इतिवृत्त ही नहीं ज्ञानमय प्रदीप है कहा जाता है कि "इतिहास यथार्थ घटना का वर्णन करता है, पर इससे व्यासजी को सन्तोष नहीं हुआ। इतिहास से राग-द्वेष ही बढ़ता है। एक-एक समाज या राष्ट्र इतिहास के कारण दुश्मन बन जाते हैं। उस राग-द्वेष की आँधी में पड़ी हुई नाव से किसी लक्ष्य पर नहीं पहुँचा जा सकता। अतः नारदजी के उपदेश से व्यासजी ने भावा- त्मक भक्ति का आश्रयण किया और सन्तुष्ट हुए। अतः जैसे शवच्छेदन के निष्कर्ष लेखरूप में उपयुक्त हो सकते हैं, पर उनका प्रदर्शन वीभत्स ही दृश्य उपस्थित करता है, उसी तरह इतिहास का निष्कर्ष लाभदायक हो सकता है, परन्तु स्वयं में वह बीभत्स ही होगा।"

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७३३ कहना न होगा कि उक्त विचार भ्रामक एवं भ्रमपूर्ण हैं। वस्तुतः महाभारत कोरा इतिहास नहीं है, किन्तु महाभारत के ब्याज से भगवान् व्यास ने वेदार्थ प्रदर्शित किया है— "भारतव्यपदेशेन ह्याम्नायार्थश्च दर्शितः ।" (भाग० पृ० १।४।३०) वस्तुतः रामायण, महाभारत एवं अष्टादश पुराण वेदों के आर्ष भाष्य ही हैं। इतिहास पुरानी घटनाओं का दोहराना मात्र नहीं है, क्योंकि वैसा करना गड़े मुर्दों को उखाड़ने के अतिरिक्त और कुछ न होगा, किन्तु उन्हीं घटनाओं एवं व्यक्तियों का उल्लेख इतिहास कहा जा सकता है जिनके स्मरण से समाज को धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक तथा राजनीतिक क्षेत्र में कुछ सबक सीखने को मिलता हो। इसी लिए तो हरएक घटना ऐतिहासिक घटना नहीं होती और न हरएक व्यक्ति ऐतिहासिक व्यक्ति होता है। वैसा होना सम्भव भी नहीं है। नगरपालिका में नगर में उत्पन्न होनेवाले और मरनेवाले मनुष्यों का उल्लेख होता है, परन्तु नगर में कितने मच्छर उत्पन्न हुए या मरे इसका लेखा-जोखा नहीं होता। क्योंकि वैसा करना संभव नहीं है और सार्थक भी नहीं। ठीक इसी तरह सभी मनुष्यों एवं घटनाओं का इतिहास में उल्लेख नहीं होता है, क्योंकि वैसा सम्भव नहीं और न उससे लाभ ही संभव हैं। यदि संसार भर के एक-एक साल का इतिहास एक ही पन्ने में रखा जाय तो भी आधुनिक ऐतिहासिकों की दृष्टि में सारी दुनियां ६-७ हजार वर्षों की है, परन्तु भारतीय शास्त्रों के अनुसार कुछ कम दो अरब वर्षों की सृष्टि है। सुतरां दो अरब पन्नों का संक्षिप्त इतिहास होगा। फिर उसे कितने दिनों में कौन पढ़ेगा, कब निष्कर्ष निकालेगा और कब उससे सबक सीखेगा ? ऐसी स्थिति में भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार महत्वपूर्ण व्यक्तियों के प्रसङ्ग से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतिपादन करना ही इतिहास है। अतएव महाभारत में विस्तृत रूप से धर्म, अर्थ, नीति, काम, मोक्ष आदि का वर्णन है। गीता भी उसी का महत्वपूर्ण अंश है। फिर भी नारदजी का अभिप्राय यह था कि भगवान् के गुणों का वर्णन करने में ही अधिक शक्ति लगानी उचित है। इसी अभिप्राय से शुकदेवजी ने भी कहा कि मैंने जो बड़े-बड़े यशस्वी राजाओं का वर्णन किया है वह विज्ञान-वैराग्य के लिए ही है। उनके वर्णन में कुछ तात्पर्य नहीं है, परन्तु जो उत्तमश्लोक भगवान् के गुणों का वर्णन है उसी का श्रवण करना उचित है वही अमूल्य धन है और उसी से भगवान् में भक्ति हो सकती है। इतिहास सबक सिखानेवाली वस्तु है। पूर्वजों के महत्त्वपूर्ण वृत्तान्तों से शुभ कर्मों के लिए प्रोत्साहन मिलता है और विविध विषयों की शिक्षा मिलती है : "कथा इमास्ते कथिता महीयसां विताय लोकेषु यशः परेयुषाम् । विज्ञान-वैराग्य-विवक्षया विभो वचोविभूतीर्न तु पारमार्थ्यम् ॥ यस्तूत्तमश्लोकगुणानुवादः संगीयतेऽभीक्ष्णममङ्गलघ्नः । तमेव नित्यं शृणुयादभीक्ष्णं कृष्णेऽमलां भक्तिमभीप्समानः ॥" (भाग० १२।३।१४,१५) यह आप मानते हैं कि भगवान् व्यास सच्चे इतिहासकार एवं अपने विषय में तथा अपने पात्रों के सम्बन्ध में निष्पक्ष सत्य वर्णन करने में सर्वाग्रणी हैं। यह भी मानते हैं कि यह एकदम सही हैं— "यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न कुत्रचित् ॥" कहा जाता है—"इतनी उत्कृष्ट रचना के बाद भी व्यास का असन्तोष एक प्रश्नचिह्न बनकर सामने आ जाता है। वह असन्तोष जिसका अनुभव प्रत्येक यथार्थवादी इतिहासकार कर सकता है। प्रश्न यह है कि इतिहास व्यक्ति और समाज को क्या देता है ? स्वयं इतिहासकार की उपलब्धि क्या है ? जो लोग यथार्थ का उद्देश्य केवल यथार्थ ही मानते हैं, वे केवल इस गर्वमात्र से सन्तुष्ट हो सकते हैं, या उसका तात्त्विक समर्थन कर सकते हैं कि उन्होंने सत्य को बिना किसी आवरण के उपस्थित किया है। किन्तु यह तो बौद्धिक विवाद में विजयी बनने का एक कौशल है। विश्व के इतिहास में बड़ा से बड़ा यथार्थवादी भी जीवन को सर्वथा नग्नरूप में नहीं जी सकता है। उसे यह

७३४ रामायणमीमांसा एकविंश सत्य ज्ञात होता है कि सर्वथा यथार्थ में जीना असम्भव है। इसी लिए वे स्वयं तो आवरण में ही जीते हैं। वस्त्र, भोजन, भाषण इन सबको परिवर्तन के आवरण से आवृत्त करके ही व्यक्ति जीवन को जीने योग्य बनाता है। यथार्थ- वाद के प्रति उसका आग्रह केवल बौद्धिक गोष्ठियों में विवाद के लिए ही दिखायी देता है। वह एक चतुर व्यापारी की भाँति यथार्थवाद को दूसरों के हाथ में बेचकर स्वयं के लिए सुख-सुविधा की सामग्री एकत्र करता है।" यदि उक्त वक्ता को इतिहास और उसके यथार्थवाद का यही स्वरूप इष्ट है, तो स्पष्ट है कि उसने दोनों बातों को नहीं समझा और उसका यह कहना गलत है कि कृष्णद्वैपायन व्यास को सच्चे इतिहासकार के रूप में ही देखना चाहिये, क्योंकि इतिहासकार होने के साथ-साथ वे महान् दार्शनिक और महान् योगी भी थे। उन्होंने "गीता" जैसी वस्तु भी संसार को प्रदान की है, जिससे सारा संसार उपकृत है। उत्कृष्ट कोटि का नीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र एवं धर्मशास्त्र प्रदान किया हैं। मोक्षधर्म द्वारा उत्कृष्ट ज्ञान-विज्ञान का भी वर्णन किया हैं। ब्रह्मसूत्र जैसे वेदान्तदर्शन द्वारा उन्होंने औपनिषद ब्रह्म के अपरोक्ष स्वरूपसाक्षात्कार का प्रकार और विधान भी बताया है। वे स्वयं साधक ही नहीं सिद्ध भी थे। फिर उनकी तुलना, उन इतिहासकारों से कैसे की जा सकती है, जो "चतुर व्यापारी की भाँति यथार्थवाद को दूसरों के हाथ बेचकर स्वयं के लिए सुख-सुविधाओं की सामग्री एकत्र करते हैं।" महाभारत एवं अन्य पुराणों की दृष्टि से ही नहीं, श्रीमद्भागवत की दृष्टि से भी महर्षि व्यास ऋतम्भरा प्रज्ञासम्पन्न महान् योगी थे । देवर्षि नारद से उन्होंने स्वयं कहा था— “परावरे ब्रह्मणि धर्मतो व्रतैः स्नातस्य मे न्यूनमलं विचक्ष्व ।” ( भाग० १।५।९ ) धर्मानुष्ठानों एवं व्रतों के द्वारा परावर ब्रह्म में मैंने अवगाहन किया है, फिर भी मुझे सन्तोष नहीं है। मेरी इस न्यूनता का जो कारण हो, वह आप कहिये। इसपर नारदजी ने यही कहा कि आपके असन्तोष का कारण यह है कि आपने धर्म आदि अर्थों का जितने विस्तार से वर्णन किया है, वैसा भगवान् की महिमा का वर्णन नहीं किया— “यथा धर्मादयश्चार्था मुनिवर्यानुकीर्तिताः । न तथा वासुदेवस्य महिमा ह्यनुवर्णितः ॥” ( भाग० १।५।९ ) इसी कारण नारदजी ने विस्तृत वर्णन किया है— चाहे कितने ही चित्र-पद वाक्य क्यों न हों अगर उनमें श्रीहरि के यश का वर्णन नहीं है तो वे वायसतीर्थमात्र हैं, और जिन काव्यों में भगवान् के यशोङ्कित नामों का वर्णन हो, वे भले असम्बद्ध हों तो भी सज्जन उनका सादर श्रवण, वर्णन और गान करते हैं। भगवत्प्रेमवर्जित नैष्कर्म्य ब्रह्मात्मसाक्षात्कारात्मक ज्ञान भी शोभित नहीं होता । फिर भला भगवत्प्रेम के बिना कर्म का क्या महत्त्व हो सकता है ? श्रीनारदजी स्वयं भगवान् व्यास को सामान्य इतिहासकार न मानते हुए कहते हैं— “अथो महाभाग भवानमोघदृक् शुचिश्रवाः सत्यरतो धृतव्रतः । उरुक्रमस्याखिलबन्धमुक्तये समाधिनानुस्मर तद्विचेष्टितम् ॥” (भाग० १।५।१३) अर्थात् हे महाभाग व्यासजी ! आपकी दृष्टि अमोघ है, आपकी कीर्ति पवित्र है। आप सत्यरत एवं धृतव्रत हैं। आप सम्पूर्ण जीवों की बन्ध से मुक्ति के लिए समाधि द्वारा भगवान् की दिव्य लीलाओं का स्मरण करें और उनका वर्णन करें । क्या अन्य इतिहासकार भी व्यास के समान सत्यरत, धृतव्रत एवं अमोघदृक् हैं ? अन्त में व्यासजी ने भक्तियोग में समाहित हो निर्मल अन्तःकरण से साक्षात् परम पुरुष और माया, जीव तथा भक्ति का प्रत्यक्ष अनुभव किया और श्रीभागवतसंहिता की रचना की ।

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७१५ "तस्मिन् स्व आश्रमे व्यासो बदरीखण्डमण्डिते । आसीनोऽप उपस्पृश्य प्रणिदध्यौ मनः स्वयम् ॥ भक्तियोगेन मनसि सम्यक्प्रणिहितेऽमले । अपश्यत् पुरुषं पूर्वं मायां च तदपाश्रयाम् !!" ( भाग० १।७।३,४ ) इस दृष्टि से भगवान् व्यास की तुलना सामान्य इतिहासकारों से करना अन्याय ही है । भारतीय दृष्टिकोण से तो व्यास भगवान् चौबीस अवतारों में एक हैं । यह भी कहना गलत है कि "व्यास स्वयं को सत्यनिष्ठ मानकर ही ऐसे इतिहास का सृजन करते हैं । किन्तु वह सत्यनिष्ठा उन्हें सन्तुष्ट नहीं कर पाती ।" क्योंकि ऐसे वचनों का अभिप्राय आप जैसे लोग समझ नहीं पाते । सत्य एक महान् धर्म है । शास्त्रों ने कहा है कि तराजू पर एक तरफ एक सत्य रखो और दूसरी तरफ हजारों अश्वमेध रखो, पर हजार अश्वमेधों से एक सत्य ही उत्कृष्ट होगा । प्रकृत में तो भगवद्गुणवर्णन और श्रवण के बिना, भगवद्- भक्ति के बिना केवल अन्य साधन धर्मों से उतनी सफलता नहीं मिलती, जितनी भक्तियुक्त कर्मों से मिलती है । इसको यों समझना चाहिये कि— "राम नाम एक अङ्क है, सब साधन हैं सून । अङ्क गये कछु हाथ नहिं, अङ्क रहे दस गून ॥" रामनाम अङ्क के तुल्य है और साधन शून्य के समान हैं, फिर भी शून्य व्यर्थ नहीं । हाँ, अङ्क के न रहने पर शून्य का कोई महत्त्व नहीं है । परन्तु अङ्क के रहने पर उनका अत्यन्त महत्त्व है । एक अङ्क के सामने एक शून्य बना देने पर वही एक १० हो जाता है । दो शून्य हों तो वही एक १०० हो जाता है । यह बात ठीक है कि अङ्क न रहने पर लाखों शून्य बेकार होते हैं । परन्तु यदि किसी को १० अरब रुपया मिलने का सरकारी आर्डर हुआ हो और उसमें से शून्य सब हटा दिये जायें, तो १० अरब रुपयों के बदले एक ही रुपया मिलेगा । इस दृष्टि से सत्य आदि का परमोत्कृष्ट महत्त्व है । भगवच्चरित्र के वर्णन, श्रवण और कथन करने की दृष्टि से ही व्यासजी का वह असन्तोष कहा गया है । साथ ही दूसरी तरफ देखें, यदि कोई भगवद्गुण वर्णन और श्रवण करता हो और वह असत्यनिष्ठ हो तो कोई समझदार उसे भक्त कहेगा क्या ? लोक-परलोक सब जगह सत्य से ही सब फल मिलते हैं । भगवच्चरित्र भी सत्य होने से ही आदरणीय है । यदि कोई झूठी कथा का वर्णन करे, तो वह असत्य में ही पर्यवसित होगी । इसी लिए महर्षि वाल्मीकि ने समाधि के द्वारा सत्य अबाधित चरित्रों का प्रत्यक्ष कर के वर्णन किया है । आज भी यदि जनता को विदित हो कि वक्ताजी बिना प्रमाण की सब काल्पनिक कथाएँ कहते हैं तो उसपर किसी भी समझदार की श्रद्धा नहीं होगी । भगवत्कथा के सम्बन्ध में भी सत्यता अपेक्षित है । अन्यथा उपन्यास और गल्प के तुल्य भगवत्कथा भी एक विनोद की वस्तु बन जायगी । यह कहना भी गलत है कि "केवल व्यक्तियों के राग, द्वेष, संघर्ष, गुण, अवगुण की व्याख्या ही तो इतिहास है" क्योंकि भारतीय दृष्टिकोण से इतिहास में किन्हीं विशेष व्यक्तियों के जीवन की घटनाओं के प्रसङ्ग से धर्म, उपासना और तत्त्वज्ञान का ही प्रतिपादन होता है । शुक्र के अनुसार राजचरित्र के वर्णन प्रसङ्ग से प्राग्वृत्त का कथन इतिहास है— "प्राग्वृत्तकथनं चैकराज्यवृत्तमिशादितः । यस्मिन् स इतिहासः स्यात् पुरावृत्तः स एव हि ॥" ( शुक्रनीति ४।२९३ ) काव्यमीमांसा के अनुसार धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के उपदेशों से समन्वित कथायुक्त पूर्ववृत्त का वर्णन इतिहास है—

७३६ रामायणमीमांसा एकविंश “धर्मार्थकाममोक्षाणामुपदेशसमन्वितम् । पूर्ववृत्तकथायुक्तमितिहासं प्रचक्षते ॥” “पुराणमितिवृत्तमाख्यायिकोदाहरणं धर्मशास्त्रमर्थशास्त्रं चेतिहासः ।” (कौटिल्य अर्थशास्त्र १।५।१४) “इतिहासपुराणाभ्यां वेदार्थमुपबृंहयेत् ।” इत्यादि प्रमाणों के अनुसार इतिहास और पुराण द्वारा वेदों का उपबृंहण या विवरण किया जाता है। साथ ही भारतीय इतिहास एक जाज्वल्यमान दीपक है। यह मोह का अन्धकार मिटाकर लोगों के अन्तःकरणरूप सम्पूर्ण अन्तरङ्ग-गृह को भली भाँति ज्ञानालोक से प्रकाशित कर देता है— “इतिहासप्रदीपेन मोहावरणघातिना । लोकगर्भगृहं कृत्स्नं यथावत् सम्प्रकाशितम् ॥” इसी लिए “रामचरितमानस” में भी यही कहा गया— “सुनहु परम पुनीत इतिहासा। जो सुनि सकल लोकभ्रम नासा ॥” (रा० मा० ७।५४।४) इसी तरह इतिहासकथन द्वारा शोकनिवारण का वर्णन भी मानस में ही आया है— “तब वसिष्ठ मुनि समय सम कहि अनेक इतिहास । शोक निवारेउ सबहिं कर निज विज्ञान प्रकास ॥” (रा० मा० २।१५५) साथ ही इतिहास-श्रवण का विधान भी गोस्वामीजी को इष्ट है तभी तो अपने इष्ट श्रीरामभद्र को चित्र- कूट में वटछाया-वेदिका पर समासीन कर, मुनिजनों के साथ इतिहासश्रवण का उल्लेख करते हैं— “जहाँ बैठि मुनिगन सहित नित सियाराम सुजान । सुनहिं कथा इतिहास सब आगम निगम पुरान ॥” (रा० मा० २।२३६) स्मरण रहे कि श्रीरामचरितमानस भी इतिहास ही है, क्योंकि भगवान् शङ्करजी ने कथा का उपसंहार करते हुए पूरे श्रीरामचरितमानस को परम पुनीत इतिहास कहा है— “कहेउँ परम पुनीत इतिहासा। सुनत श्रवन छूटहि भवपासा ॥” अतः यह कहना कि केवल व्यक्तियों के राग-द्वेष, संघर्ष, गुण-अवगुण की व्याख्या ही तो इतिहास है। वह भी मानस के वक्ता द्वारा कहाँ तक उचित है ? साथ ही जिस भागवत की आड़ में लेखक ने महाभारत जैसे वेदतुल्य इतिहास पर कीचड़ उछाला है, उसी भागवत के तृतीय स्कन्द में यह कहा गया है कि सर्वदर्शी भगवान् ब्रह्मा ने अपने चारों मुखों से इतिहास-पुराण रूप पाँचवाँ वेद बनाया--- “इतिहासपुराणानि पञ्चमं वेदमीश्वरः । सर्वेभ्य एव वक्त्रेभ्यः ससृजे सर्वदर्शनः ॥” (भा० ३।१२।३९) इसी प्रकार छान्दोग्य उपनिषद् में इतिहास-पुराण को पञ्चम वेद कहा गया है— “नाम वा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेद आथर्वणश्चतुर्थ इतिहासपुराणः पञ्चमो वेदानां वेदः । (छा० उ० ७।१।४) यह कथन भी निर्मूल है कि “इतिहास मनुष्य की स्मृति को बोझिल बनाता है” क्योंकि दर्शन भी तो यही करता है, जिस वस्तु की स्मृति सुरक्षित रखनी आवश्यक होगी, वह बोझिल होगी। इस दृष्टि से तो ईश्वर

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७३७ एवं आर्षकल्प ऋषियों की स्मृति को भी बोझिल कहना होगा। “इतिहास उन घटनाओं से स्मृति को बोझिल बनाता है, जो बीत चुकी हैं। वह देश, प्रान्त और जातियों में वैमनस्य की सृष्टि करता है।” यह सब कथन पूर्णतया असङ्गत है, क्योंकि किसी भी समझदार को अतीत का अध्ययन, वर्तमान का अनुभव, भविष्य का अनुमान कर के ही कर्तव्य-निर्धारण करना उचित होता है। फिर महाभारत और रामायण जैसे आर्ष इतिहासों को शवच्छेदन की उपमा देना, अत्यन्त अनभिज्ञता है। यह तो पद-पद पर शिक्षाप्रद एवं पुण्यप्रद ही है। कहा ही गया है— “इतिहासमिमं पुण्यं महार्थं वेदसम्मितम् । व्यासोक्तं श्रूयते येन कृत्वा ब्राह्मणमग्रतः ॥ स नरः सर्वकामांश्च कीर्ति प्राप्येह शौनक । गच्छेत् परमिकां सिद्धिमत्र मे नास्ति संशयः ॥” अर्थात् जो मनुष्य व्यासजी के द्वारा कथित महान् अर्थमय और वेदतुल्य इस पवित्र महाभारत इतिहास को श्रेष्ठ ब्राह्मण द्वारा श्रवण करता है, वह इस लोक में सब मनोरथों को और कीर्ति को प्राप्त करता है और अन्त में परमसिद्धि मोक्ष को प्राप्त होता है। इसमें सन्देह नहीं है। वाल्मीकिरामायण के लिए प्रसिद्ध ही है कि— “एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ।” शवच्छेद विद्यार्थी को सीखना पड़ता है ओर सीखकर जीवित पुरुषों के अङ्गच्छेदनादि चिकित्सा में उसका उपयोग किया जाता है। “देवर्षि भक्तिशास्त्र के आचार्य हैं।” देवर्षि नारद ही नहीं भगवान् व्यास भी भक्तिशास्त्र के आचार्य हैं। इतना ही नहीं भगवान् के चौबीस अवतारों में एक हैं। नारदजी ने भागवत में कहा ही है— ‘अजं प्रजातं जगतः शिवाय ।” (भाग० १।५।२१ ) यह कहना भी सङ्गत नहीं है कि “भक्ति का मुख्य उद्देश्य 'सत्यं शिवं सुन्दर' की सृष्टि है। इसी लिए वह व्यक्ति के इतिहास के स्थान पर भगवान् की लीला को अपना मुख्य केन्द्र बनाती है।” क्योंकि 'सत्यं शिवं सुन्दर' नित्य परमात्मा ही है। वह नित्य है, उसकी सृष्टि नहीं होती। भारतीय महाभारत और रामायण में भी व्यक्ति की कथाओं का प्राधान्य न होकर भगवान् की लीलाओं का ही प्राधान्य है। महाभारत ग्रन्थ के मुख्य विषय हैं—स्वयं सनातन परब्रह्मस्वरूप वासुदेव भगवान् कृष्ण, उन्हीं का इसमें कीर्तन किया गया है। वे ही सत्य, ऋत, पवित्र और पुण्य हैं। “भगवान् वासुदेवश्च कीर्त्यतेऽत्र सनातनः । स हि सत्यमृतं चैव पवित्रं पुण्यमेव च ॥” (महा० आदिपर्व ) अतः महाभारत में भजनीय भगवान् कृष्ण की भक्ति, उनका तत्त्वज्ञान एवं भक्ति तथा ज्ञान के साधनरूप में ही धर्म, अर्थ, नीति आदि का भी वर्णन है। कहा जाता है कि “इस लीला को गुण-दोष की दृष्टि से श्रवण और पठन का विषय नहीं बनाया जाना चाहिये।” परन्तु यह भी गलत है। भगवान् की मङ्गलमयी लीला का श्रवण, वर्णन स्वयं में परम पुरुषार्थ है, उससे दोषों का निराकरण तथा गुणों का संग्रह भी होता ही है। कहा जाता है “श्रीमद्भागवत पुराण की रचना के पीछे यही प्रेरणा थी। देवर्षि ने बड़े विस्तार से इतिहास के स्थान पर भगवद्गुणगायन की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने ऐतिहासिक दृष्टि के जो दोष ९३

७३८ रामायणमीमांसा एकविंश बताये हैं, वे बड़े महत्त्व के हैं—जो मनुष्य भगवान् की लीला छोड़कर अन्य कुछ कहने को इच्छा करता है वह उस-इस इच्छा से ही निर्मित अनेक नाम और रूपों के चक्कर से पड़ जाता है। उसकी बुद्धि भेद-भाव से भर जाती है। जैसे हवा के झकोरों से डगमगाती हुई नौका को कहीं भी ठहरने का ठौर नहीं मिलता, वैसे ही उसकी चंचल बुद्धि कहीं भी स्थिर नहीं हो पाती— “ततोऽन्यथा किंचन यद्विवक्षतः पृथग्दृशस्तत्कृतरूपनामभिः । न कुत्रचित्क्वापि च दुःस्थिता मतिर्लभेत वाताहतनौरिवास्पदम् ।। (भाग० १।५।१४)” वस्तुतः उक्त वचन में न तो इतिहास की चर्चा है और न महान् महाभारत के पवित्र इतिहास की निन्दा है। महाभारत में तो अनेकधा भगवान् की दिव्य लीलाओं का ही वर्णन है। श्रीधर स्वामी आदि की टीकाओं के अनुसार उक्त श्लोक द्वारा काम्य कर्म आदि की निन्दा की गयी है— “ततो भगवच्चेष्टितात् पृथग्दृशोऽत एवान्यथा प्रकारान्तरेणं यत्किञ्चिदर्थान्तरं विवक्षतः तयो विवक्षया तत्कृतैः स्फुरितै रूपैः नामभिश्च वक्तव्यत्वेनोपस्थितैः दुःस्थिताऽनवस्थिता मतिः कदाचित् क्वापि विषये आस्पदं न लभेत वाताहतनौरिव ।” अर्थात् भगवल्लीला से भिन्न अर्थान्तर की विवक्षा से वक्तव्यरूप से उपस्थित अनेक नाम और रूपों से दुःस्थिता बुद्धि वात से आहत नौका के समान कभी भी किसी विषय में स्थिति नहीं प्राप्त कर सकती। गीता में भी यही बात कही गयी है— “व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ।। ( गीता २।४१ ) सर्ववेदों का परम तात्पर्य परब्रह्म में ही है। कर्मकाण्डों का तात्पर्य भी भगवच्चरण-पङ्कज में समर्पण बुद्धि से निष्काम कर्म द्वारा, बुद्धि-शुद्धिसाधन चतुष्टयसम्पत्ति द्वारा ब्रह्म में ही पर्यवसान होना है। परन्तु जिनकी ऐसी बुद्धि नहीं है उनकी बुद्धि नाना प्रकार की कामनाओं में भटकती है। एक-एक कामना की पूर्ति के लिए अनेक साधनों में दौड़ती है। कामनाओं को अगणित शाखाएँ होती हैं। महाभारत तथा अन्य पुराणों में ब्रह्मात्मतत्त्व का पर्याप्त वर्णन है; परन्तु उसके सम्बन्ध में भी नारदजी का कहना था कि कोई बड़ा विचक्षण विद्वान् ही निवृत्ति- मार्ग से अनन्तपार विभु, व्यापक ब्रह्म का सुख ले सकता है। सर्वसाधारण का उसमें अधिकार नहीं है। अतः आप गुणों से प्रवर्तमान प्राणियों के लिए भगवान् की लीला चेष्टित का वर्णन करो, जिससे सर्वसाधारण का भी कल्याण हो सके— “जुगुप्सितं धर्मकृतेऽनुशासतः स्वभावरक्तस्य महान् व्यतिक्रमः । यद्वाक्यतो धर्म इतीतरः स्थितो न मन्यते तस्य निवारणं जनः ॥ विचक्षणोऽस्यार्हति वेदितुं विभोरनन्तपारस्य निवृत्तितः सुखम् । प्रवर्त्तमानस्य गुणैरनात्मनस्ततो भवान् दर्शय चेष्टितं विभोः ।।” (भाग० १।५।१५,१६) काम्य कर्मों का उपदेश करते हुए आप से कहीं महान् व्यतिक्रम भी हो गया है। जिसको स्वभाव से ही राग है उसे जब किसी आप्त पुरुष से भी काम्य कर्मों का समर्थन मिल जाता है, तब वह उसी में अडिग हो जाता है। फिर अन्यत्र आपके निषेध करने पर भी वह उससे निवृत्त नहीं होता। वेदों और भगवान् के कहने पर भी उसे नहीं छोड़ता। यद्यपि— “जोषयेत् सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन् । न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसंगिनाम् ।।” ( गीता० ३।२६ )

[अध्याय] [रामचरितसम्बन्धी लेख] [७३९]

के अनुसार विद्वान् का कर्तव्य है कि वह कर्माधिकारियों में भेद-बुद्धि न उत्पन्न कर के स्वयं भी कर्म करता हुआ उनको अधिकारानुसार कर्मों में लगाये, तथापि उत्तमाधिकारी के लिए काम्यकर्म का उपदेश नहीं ही करना चाहिये— “स्वयं निःश्रेयसं विद्वान्न वक्त्यज्ञाय कर्म हि। न राति रोगिणोऽपथ्यं वाञ्छतोऽपि भिषक्तमः ॥” स्वयं निःश्रेयस को जानता हुआ भी पुरुष अज्ञों के लिए काम्य कर्म का उपदेश नहीं करते जैसे वैद्यप्रवर रोगी के मांगने पर भी कुपथ्य नहीं देता। यहाँ यह भी विवेक समझ लेना चाहिये कि सकाम अधिकारियों के लिए सकाम कर्म का विधान होता है। उत्तम अधिकारी भगवच्चरण में समर्पण बुद्धि से निष्काम कर्म करता है और उत्तम अधिकारियों के लिए भगवद्भक्ति, भगवच्चरित्र-स्मरणादि का अधिकार होता हैं। कहा जाता है कि “इतिहास तो हमें उन लोगों से जोड़ देता हैं, जिनसे हमें आज कुछ भी लेना-देना नहीं है। उन पात्रों के प्रति भी हमारे मन में राग-रोष उत्पन्न करता हैं। इस तरह वह हमारा बोझ हल्का करने के स्थान पर ऐसा अनावश्यक बोझ लाद देता है, जिसे केवल ढोना-ही है। प्रत्येक जाति और देश उसी परम्परा को ढोने का प्रयास कर रहा है। किसी जाति ने किसी दूसरी जाति को उत्पीडित किया था, अतः उसका बदला लेने के लिए आज भी उस घृणा-वृत्ति को जीवित रखता है। एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र का प्रतिद्वन्द्वी है और अपनी श्रेष्ठता की सुरा पीकर अन्य राष्ट्रों के विरुद्ध संघर्ष करता है और इस तरह हिंसा-प्रतिहिंसा के चक्र को आगे बढ़ाता ही जाता है। घृणा और संघर्ष की ये प्रवृत्तियाँ मानव-मन में आदिम काल से विद्यमान है। उन्हें उकसाना बहुत सरल है। इससे नेतृत्व प्राप्त कर लेना अत्यन्त सरल हो जाता है। किन्तु इसके द्वारा व्यक्ति और समाज को क्या प्राप्त होता है ? विचार करें तो देखेंगे कि अशान्ति ही इसकी उपलब्धि है। इसी को नारद हवा के थपेड़ों से भटकती हुई नौका के दृष्टान्त से स्पष्ट करते हैं। व्यक्ति और समाज के जीवन में आँधी की सृष्टि करने में इतिहास का बहुत बड़ा भाग है।” कहना न होगा कि यह स्थाणु का दोष नहीं है, जो उसे अन्धा नहीं देख पाता। इसी से गोस्वामी जी कहते हैं— “अज्ञ अकोविद अंध अभागी। काई विषय मुकुर मन लागी ॥ कहहिं ते वेद असम्रत बानी। जिन्ह के सूझ लाभ नहिं हानी ॥ मुकुर मलिन अरु नयन विहीना। रामरूप देखहिं किमि दीना ॥” (रा० मा० १।११४।१,२) यह इतिहास का दोष नहीं, जो पढ़नेवाला उसका अभिप्राय न समझे। श्रीमद्भागवत महाभारत की प्रशंसा करता है और महाभारत की बहुत सी कथाओं का वह भी वर्णन करता है। फिर भी बिना प्रमाण के ही लेखक ने श्रीमद्भागवत के द्वारा महाभारत जैसे पवित्र ग्रन्थ पर एवं उसके रचयिता पर निरर्थक दोषारोपण करने का गर्हित प्रयास किया है। श्रीनारदजी का तो इतना ही तात्पर्य था कि आपने जैसे प्रधानता से धर्म, अर्थ, काम आदि का वर्णन किया है, वैसे भगवान् की महिमा का वर्णन नहीं किया। अतः चित्तशान्ति के लिए भगवान् के यश का वर्णन करें। महाभारत और रामायण आर्ष इतिहास हैं, इनमें सामान्य इतिहासों के दूषण भी नहीं हैं, क्योंकि ये दोनों ग्रन्थ राग-द्वेष से ऊँचे उठे हुए महर्षियों द्वारा वर्णित है। उनका किसी से राग-द्वेष नहीं था। उन्होंने प्रजा के कल्याण की कामना से ही महाभारत एवं रामायण जैसे इतिहास की रचना की और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष एवं उनके निर्दोष साधनों का वर्णन किया। श्रीभागवतकार ने कहा ही है— “भारतव्यपदेशेन ह्याम्नायार्थश्च दर्शितः ।” (भाग० १।४।३०) “सर्ववर्णाश्रमाणां यद्दध्यौ हितममोघदृक् ।।” (भाग० १।४।१८)

गुण और दोष को न देखना ही सबसे बड़ा गुण है। गुण एवं दोष देखना ही दोष है— “गुणदोषदृशिर्दोषो गुणस्तूभयवर्जितः ।” (भाग० ११।१९।४५) “गुन यह उभय न देखिअहि देखिअ सो अबिबेक ॥” (रा० मा० ७।३१) परन्तु यह बहुत ऊँची स्थिति है। समाधिदशा में ही यह बात बन पाती है। व्यवहार में गुण-दोष को तो जानना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी होता है। जितना भर भी व्यवहार है, विधि-निषेध से ही सम्बद्ध है। गोस्वामीजी भी कहते हैं— “विधिप्रपंच गुन अवगुन साना । ( रा० मा० १।५।२) “तेहि तें कछु गुन दोष बखाने । संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने ॥ (रा० मा० १।५।१) गुणों का ज्ञान होने पर ही उनका संग्रह किया जा सकता है और दोषों का ज्ञान होने से ही उनके त्याग का प्रयत्न सम्भव है। इसी लिए पूर्वमीमांसा में धर्मजिज्ञासा के साथ अधर्म की जिज्ञासा भी की जाती है। महाभारत एवं रामायण में भी दोनों पक्ष हैं। कौरवपक्ष, पाण्डवपक्ष, रावणपक्ष और रामपक्ष । प्रथम पक्ष में तामस तथा राजस भावों का प्राधान्य है। अन्य पक्ष में सत्त्व का प्राधान्य है। इसी लिए सिद्धान्त यह है— “रामादिवत् वर्तितव्यं न रावणादिवत् ।” (काव्यप्र० १।२) रामादि के समान बर्ताव करना चाहिये रावणादि के समान बर्ताव नहीं करना चाहिये। यह रामायण का सार है। “युधिष्ठिरादिवत् व्यवहर्तव्यं न दुर्योधनादिवत् ।” युधिष्ठिर आदि के समान व्यवहार करना चाहिये, दुर्योधन आदि के समान बर्ताव करना उचित नहीं है। यह महाभारत का सार है। संसार में भली-बुरी सब प्रकार की वस्तुएँ होती हैं। वेदादि-शास्त्रों ने गुण-दोष की दृष्टि से सबका विश्लेषण किया है— “भलेउ पोच सब विधि उपजाए । गनि गुन दोष बेद - बिलगाए ॥” (रा० मा० १।५।२ ) जैसे हंस क्षीर-नीर का विश्लेषण करके विकार-वारि को त्यागकर क्षीर ग्रहणकर लेता है, उसी तरह सन्तजन गुण-दोषमय संसार से दोष त्यागकर गुण ग्रहणकर लेते हैं— “संत हंस गुन गहहिं पय, परिहरि बारि बिकार ।” (रा० मा० १।६) ऐसा बिना किये रामायण पढ़ने से भी लाभ न होगा, क्योंकि 'रामायण' भी इतिहास ही है। उसमें भी दोनों ही पक्ष हैं। उसके पढ़ने से भी एक पक्ष में राग और अन्य पक्ष में द्वेष सम्भव है। अतएव इतिहास के रूप में आरोपित पूर्वोक्त दोष आ सकते हैं; और घृणादि दोषों से मन का बोझ बढ़ जायगा। किन्तु सिद्धान्ततः ऐसा नहीं होता, क्योंकि उसके अनुसार रावण का दोष वर्णन ही केवल त्याग के लिए है। वह मन में धरने की वस्तु नहीं । राम के गुणों का वर्णन ही ग्रहण के लिए है। इतना ही नहीं, रामचरित्र का अङ्ग होने से रावण के चरित्र के वर्णन से भी पुण्य की उत्पत्ति मान्य है। तभी तो— “एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ।” की संगति बैठेगी। 'मानस' की कथा कहनेवाले लोग भी जब तक उक्त सिद्धान्त नहीं समझेंगे, तब तक इस भ्रम से मुक्त नहीं हो सकते हैं। किन्तु जिनको समझना ही नहीं है, उनके सामने कोई कितना भी राम और रावण का अनैतिहासिक एवं आध्यात्मिक अर्थ लगाये, परन्तु उनपर उसका कुछ भी असर पड़नेवाला नहीं होता। इसी