रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 816, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ें[अध्याय] [रामचरितसम्बन्धी लेख] [७३९]
के अनुसार विद्वान् का कर्तव्य है कि वह कर्माधिकारियों में भेद-बुद्धि न उत्पन्न कर के स्वयं भी कर्म करता हुआ उनको अधिकारानुसार कर्मों में लगाये, तथापि उत्तमाधिकारी के लिए काम्यकर्म का उपदेश नहीं ही करना चाहिये— “स्वयं निःश्रेयसं विद्वान्न वक्त्यज्ञाय कर्म हि। न राति रोगिणोऽपथ्यं वाञ्छतोऽपि भिषक्तमः ॥” स्वयं निःश्रेयस को जानता हुआ भी पुरुष अज्ञों के लिए काम्य कर्म का उपदेश नहीं करते जैसे वैद्यप्रवर रोगी के मांगने पर भी कुपथ्य नहीं देता। यहाँ यह भी विवेक समझ लेना चाहिये कि सकाम अधिकारियों के लिए सकाम कर्म का विधान होता है। उत्तम अधिकारी भगवच्चरण में समर्पण बुद्धि से निष्काम कर्म करता है और उत्तम अधिकारियों के लिए भगवद्भक्ति, भगवच्चरित्र-स्मरणादि का अधिकार होता हैं। कहा जाता है कि “इतिहास तो हमें उन लोगों से जोड़ देता हैं, जिनसे हमें आज कुछ भी लेना-देना नहीं है। उन पात्रों के प्रति भी हमारे मन में राग-रोष उत्पन्न करता हैं। इस तरह वह हमारा बोझ हल्का करने के स्थान पर ऐसा अनावश्यक बोझ लाद देता है, जिसे केवल ढोना-ही है। प्रत्येक जाति और देश उसी परम्परा को ढोने का प्रयास कर रहा है। किसी जाति ने किसी दूसरी जाति को उत्पीडित किया था, अतः उसका बदला लेने के लिए आज भी उस घृणा-वृत्ति को जीवित रखता है। एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र का प्रतिद्वन्द्वी है और अपनी श्रेष्ठता की सुरा पीकर अन्य राष्ट्रों के विरुद्ध संघर्ष करता है और इस तरह हिंसा-प्रतिहिंसा के चक्र को आगे बढ़ाता ही जाता है। घृणा और संघर्ष की ये प्रवृत्तियाँ मानव-मन में आदिम काल से विद्यमान है। उन्हें उकसाना बहुत सरल है। इससे नेतृत्व प्राप्त कर लेना अत्यन्त सरल हो जाता है। किन्तु इसके द्वारा व्यक्ति और समाज को क्या प्राप्त होता है ? विचार करें तो देखेंगे कि अशान्ति ही इसकी उपलब्धि है। इसी को नारद हवा के थपेड़ों से भटकती हुई नौका के दृष्टान्त से स्पष्ट करते हैं। व्यक्ति और समाज के जीवन में आँधी की सृष्टि करने में इतिहास का बहुत बड़ा भाग है।” कहना न होगा कि यह स्थाणु का दोष नहीं है, जो उसे अन्धा नहीं देख पाता। इसी से गोस्वामी जी कहते हैं— “अज्ञ अकोविद अंध अभागी। काई विषय मुकुर मन लागी ॥ कहहिं ते वेद असम्रत बानी। जिन्ह के सूझ लाभ नहिं हानी ॥ मुकुर मलिन अरु नयन विहीना। रामरूप देखहिं किमि दीना ॥” (रा० मा० १।११४।१,२) यह इतिहास का दोष नहीं, जो पढ़नेवाला उसका अभिप्राय न समझे। श्रीमद्भागवत महाभारत की प्रशंसा करता है और महाभारत की बहुत सी कथाओं का वह भी वर्णन करता है। फिर भी बिना प्रमाण के ही लेखक ने श्रीमद्भागवत के द्वारा महाभारत जैसे पवित्र ग्रन्थ पर एवं उसके रचयिता पर निरर्थक दोषारोपण करने का गर्हित प्रयास किया है। श्रीनारदजी का तो इतना ही तात्पर्य था कि आपने जैसे प्रधानता से धर्म, अर्थ, काम आदि का वर्णन किया है, वैसे भगवान् की महिमा का वर्णन नहीं किया। अतः चित्तशान्ति के लिए भगवान् के यश का वर्णन करें। महाभारत और रामायण आर्ष इतिहास हैं, इनमें सामान्य इतिहासों के दूषण भी नहीं हैं, क्योंकि ये दोनों ग्रन्थ राग-द्वेष से ऊँचे उठे हुए महर्षियों द्वारा वर्णित है। उनका किसी से राग-द्वेष नहीं था। उन्होंने प्रजा के कल्याण की कामना से ही महाभारत एवं रामायण जैसे इतिहास की रचना की और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष एवं उनके निर्दोष साधनों का वर्णन किया। श्रीभागवतकार ने कहा ही है— “भारतव्यपदेशेन ह्याम्नायार्थश्च दर्शितः ।” (भाग० १।४।३०) “सर्ववर्णाश्रमाणां यद्दध्यौ हितममोघदृक् ।।” (भाग० १।४।१८)