भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 815

७३८ रामायणमीमांसा एकविंश बताये हैं, वे बड़े महत्त्व के हैं—जो मनुष्य भगवान् की लीला छोड़कर अन्य कुछ कहने को इच्छा करता है वह उस-इस इच्छा से ही निर्मित अनेक नाम और रूपों के चक्कर से पड़ जाता है। उसकी बुद्धि भेद-भाव से भर जाती है। जैसे हवा के झकोरों से डगमगाती हुई नौका को कहीं भी ठहरने का ठौर नहीं मिलता, वैसे ही उसकी चंचल बुद्धि कहीं भी स्थिर नहीं हो पाती— “ततोऽन्यथा किंचन यद्विवक्षतः पृथग्दृशस्तत्कृतरूपनामभिः । न कुत्रचित्क्वापि च दुःस्थिता मतिर्लभेत वाताहतनौरिवास्पदम् ।। (भाग० १।५।१४)” वस्तुतः उक्त वचन में न तो इतिहास की चर्चा है और न महान् महाभारत के पवित्र इतिहास की निन्दा है। महाभारत में तो अनेकधा भगवान् की दिव्य लीलाओं का ही वर्णन है। श्रीधर स्वामी आदि की टीकाओं के अनुसार उक्त श्लोक द्वारा काम्य कर्म आदि की निन्दा की गयी है— “ततो भगवच्चेष्टितात् पृथग्दृशोऽत एवान्यथा प्रकारान्तरेणं यत्किञ्चिदर्थान्तरं विवक्षतः तयो विवक्षया तत्कृतैः स्फुरितै रूपैः नामभिश्च वक्तव्यत्वेनोपस्थितैः दुःस्थिताऽनवस्थिता मतिः कदाचित् क्वापि विषये आस्पदं न लभेत वाताहतनौरिव ।” अर्थात् भगवल्लीला से भिन्न अर्थान्तर की विवक्षा से वक्तव्यरूप से उपस्थित अनेक नाम और रूपों से दुःस्थिता बुद्धि वात से आहत नौका के समान कभी भी किसी विषय में स्थिति नहीं प्राप्त कर सकती। गीता में भी यही बात कही गयी है— “व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ।। ( गीता २।४१ ) सर्ववेदों का परम तात्पर्य परब्रह्म में ही है। कर्मकाण्डों का तात्पर्य भी भगवच्चरण-पङ्कज में समर्पण बुद्धि से निष्काम कर्म द्वारा, बुद्धि-शुद्धिसाधन चतुष्टयसम्पत्ति द्वारा ब्रह्म में ही पर्यवसान होना है। परन्तु जिनकी ऐसी बुद्धि नहीं है उनकी बुद्धि नाना प्रकार की कामनाओं में भटकती है। एक-एक कामना की पूर्ति के लिए अनेक साधनों में दौड़ती है। कामनाओं को अगणित शाखाएँ होती हैं। महाभारत तथा अन्य पुराणों में ब्रह्मात्मतत्त्व का पर्याप्त वर्णन है; परन्तु उसके सम्बन्ध में भी नारदजी का कहना था कि कोई बड़ा विचक्षण विद्वान् ही निवृत्ति- मार्ग से अनन्तपार विभु, व्यापक ब्रह्म का सुख ले सकता है। सर्वसाधारण का उसमें अधिकार नहीं है। अतः आप गुणों से प्रवर्तमान प्राणियों के लिए भगवान् की लीला चेष्टित का वर्णन करो, जिससे सर्वसाधारण का भी कल्याण हो सके— “जुगुप्सितं धर्मकृतेऽनुशासतः स्वभावरक्तस्य महान् व्यतिक्रमः । यद्वाक्यतो धर्म इतीतरः स्थितो न मन्यते तस्य निवारणं जनः ॥ विचक्षणोऽस्यार्हति वेदितुं विभोरनन्तपारस्य निवृत्तितः सुखम् । प्रवर्त्तमानस्य गुणैरनात्मनस्ततो भवान् दर्शय चेष्टितं विभोः ।।” (भाग० १।५।१५,१६) काम्य कर्मों का उपदेश करते हुए आप से कहीं महान् व्यतिक्रम भी हो गया है। जिसको स्वभाव से ही राग है उसे जब किसी आप्त पुरुष से भी काम्य कर्मों का समर्थन मिल जाता है, तब वह उसी में अडिग हो जाता है। फिर अन्यत्र आपके निषेध करने पर भी वह उससे निवृत्त नहीं होता। वेदों और भगवान् के कहने पर भी उसे नहीं छोड़ता। यद्यपि— “जोषयेत् सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन् । न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसंगिनाम् ।।” ( गीता० ३।२६ )