भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 814, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 814

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७३७ एवं आर्षकल्प ऋषियों की स्मृति को भी बोझिल कहना होगा। “इतिहास उन घटनाओं से स्मृति को बोझिल बनाता है, जो बीत चुकी हैं। वह देश, प्रान्त और जातियों में वैमनस्य की सृष्टि करता है।” यह सब कथन पूर्णतया असङ्गत है, क्योंकि किसी भी समझदार को अतीत का अध्ययन, वर्तमान का अनुभव, भविष्य का अनुमान कर के ही कर्तव्य-निर्धारण करना उचित होता है। फिर महाभारत और रामायण जैसे आर्ष इतिहासों को शवच्छेदन की उपमा देना, अत्यन्त अनभिज्ञता है। यह तो पद-पद पर शिक्षाप्रद एवं पुण्यप्रद ही है। कहा ही गया है— “इतिहासमिमं पुण्यं महार्थं वेदसम्मितम् । व्यासोक्तं श्रूयते येन कृत्वा ब्राह्मणमग्रतः ॥ स नरः सर्वकामांश्च कीर्ति प्राप्येह शौनक । गच्छेत् परमिकां सिद्धिमत्र मे नास्ति संशयः ॥” अर्थात् जो मनुष्य व्यासजी के द्वारा कथित महान् अर्थमय और वेदतुल्य इस पवित्र महाभारत इतिहास को श्रेष्ठ ब्राह्मण द्वारा श्रवण करता है, वह इस लोक में सब मनोरथों को और कीर्ति को प्राप्त करता है और अन्त में परमसिद्धि मोक्ष को प्राप्त होता है। इसमें सन्देह नहीं है। वाल्मीकिरामायण के लिए प्रसिद्ध ही है कि— “एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ।” शवच्छेद विद्यार्थी को सीखना पड़ता है ओर सीखकर जीवित पुरुषों के अङ्गच्छेदनादि चिकित्सा में उसका उपयोग किया जाता है। “देवर्षि भक्तिशास्त्र के आचार्य हैं।” देवर्षि नारद ही नहीं भगवान् व्यास भी भक्तिशास्त्र के आचार्य हैं। इतना ही नहीं भगवान् के चौबीस अवतारों में एक हैं। नारदजी ने भागवत में कहा ही है— ‘अजं प्रजातं जगतः शिवाय ।” (भाग० १।५।२१ ) यह कहना भी सङ्गत नहीं है कि “भक्ति का मुख्य उद्देश्य 'सत्यं शिवं सुन्दर' की सृष्टि है। इसी लिए वह व्यक्ति के इतिहास के स्थान पर भगवान् की लीला को अपना मुख्य केन्द्र बनाती है।” क्योंकि 'सत्यं शिवं सुन्दर' नित्य परमात्मा ही है। वह नित्य है, उसकी सृष्टि नहीं होती। भारतीय महाभारत और रामायण में भी व्यक्ति की कथाओं का प्राधान्य न होकर भगवान् की लीलाओं का ही प्राधान्य है। महाभारत ग्रन्थ के मुख्य विषय हैं—स्वयं सनातन परब्रह्मस्वरूप वासुदेव भगवान् कृष्ण, उन्हीं का इसमें कीर्तन किया गया है। वे ही सत्य, ऋत, पवित्र और पुण्य हैं। “भगवान् वासुदेवश्च कीर्त्यतेऽत्र सनातनः । स हि सत्यमृतं चैव पवित्रं पुण्यमेव च ॥” (महा० आदिपर्व ) अतः महाभारत में भजनीय भगवान् कृष्ण की भक्ति, उनका तत्त्वज्ञान एवं भक्ति तथा ज्ञान के साधनरूप में ही धर्म, अर्थ, नीति आदि का भी वर्णन है। कहा जाता है कि “इस लीला को गुण-दोष की दृष्टि से श्रवण और पठन का विषय नहीं बनाया जाना चाहिये।” परन्तु यह भी गलत है। भगवान् की मङ्गलमयी लीला का श्रवण, वर्णन स्वयं में परम पुरुषार्थ है, उससे दोषों का निराकरण तथा गुणों का संग्रह भी होता ही है। कहा जाता है “श्रीमद्भागवत पुराण की रचना के पीछे यही प्रेरणा थी। देवर्षि ने बड़े विस्तार से इतिहास के स्थान पर भगवद्गुणगायन की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने ऐतिहासिक दृष्टि के जो दोष ९३