रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७३६ रामायणमीमांसा एकविंश “धर्मार्थकाममोक्षाणामुपदेशसमन्वितम् । पूर्ववृत्तकथायुक्तमितिहासं प्रचक्षते ॥” “पुराणमितिवृत्तमाख्यायिकोदाहरणं धर्मशास्त्रमर्थशास्त्रं चेतिहासः ।” (कौटिल्य अर्थशास्त्र १।५।१४) “इतिहासपुराणाभ्यां वेदार्थमुपबृंहयेत् ।” इत्यादि प्रमाणों के अनुसार इतिहास और पुराण द्वारा वेदों का उपबृंहण या विवरण किया जाता है। साथ ही भारतीय इतिहास एक जाज्वल्यमान दीपक है। यह मोह का अन्धकार मिटाकर लोगों के अन्तःकरणरूप सम्पूर्ण अन्तरङ्ग-गृह को भली भाँति ज्ञानालोक से प्रकाशित कर देता है— “इतिहासप्रदीपेन मोहावरणघातिना । लोकगर्भगृहं कृत्स्नं यथावत् सम्प्रकाशितम् ॥” इसी लिए “रामचरितमानस” में भी यही कहा गया— “सुनहु परम पुनीत इतिहासा। जो सुनि सकल लोकभ्रम नासा ॥” (रा० मा० ७।५४।४) इसी तरह इतिहासकथन द्वारा शोकनिवारण का वर्णन भी मानस में ही आया है— “तब वसिष्ठ मुनि समय सम कहि अनेक इतिहास । शोक निवारेउ सबहिं कर निज विज्ञान प्रकास ॥” (रा० मा० २।१५५) साथ ही इतिहास-श्रवण का विधान भी गोस्वामीजी को इष्ट है तभी तो अपने इष्ट श्रीरामभद्र को चित्र- कूट में वटछाया-वेदिका पर समासीन कर, मुनिजनों के साथ इतिहासश्रवण का उल्लेख करते हैं— “जहाँ बैठि मुनिगन सहित नित सियाराम सुजान । सुनहिं कथा इतिहास सब आगम निगम पुरान ॥” (रा० मा० २।२३६) स्मरण रहे कि श्रीरामचरितमानस भी इतिहास ही है, क्योंकि भगवान् शङ्करजी ने कथा का उपसंहार करते हुए पूरे श्रीरामचरितमानस को परम पुनीत इतिहास कहा है— “कहेउँ परम पुनीत इतिहासा। सुनत श्रवन छूटहि भवपासा ॥” अतः यह कहना कि केवल व्यक्तियों के राग-द्वेष, संघर्ष, गुण-अवगुण की व्याख्या ही तो इतिहास है। वह भी मानस के वक्ता द्वारा कहाँ तक उचित है ? साथ ही जिस भागवत की आड़ में लेखक ने महाभारत जैसे वेदतुल्य इतिहास पर कीचड़ उछाला है, उसी भागवत के तृतीय स्कन्द में यह कहा गया है कि सर्वदर्शी भगवान् ब्रह्मा ने अपने चारों मुखों से इतिहास-पुराण रूप पाँचवाँ वेद बनाया--- “इतिहासपुराणानि पञ्चमं वेदमीश्वरः । सर्वेभ्य एव वक्त्रेभ्यः ससृजे सर्वदर्शनः ॥” (भा० ३।१२।३९) इसी प्रकार छान्दोग्य उपनिषद् में इतिहास-पुराण को पञ्चम वेद कहा गया है— “नाम वा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेद आथर्वणश्चतुर्थ इतिहासपुराणः पञ्चमो वेदानां वेदः । (छा० उ० ७।१।४) यह कथन भी निर्मूल है कि “इतिहास मनुष्य की स्मृति को बोझिल बनाता है” क्योंकि दर्शन भी तो यही करता है, जिस वस्तु की स्मृति सुरक्षित रखनी आवश्यक होगी, वह बोझिल होगी। इस दृष्टि से तो ईश्वर