भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 812

अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७१५ "तस्मिन् स्व आश्रमे व्यासो बदरीखण्डमण्डिते । आसीनोऽप उपस्पृश्य प्रणिदध्यौ मनः स्वयम् ॥ भक्तियोगेन मनसि सम्यक्प्रणिहितेऽमले । अपश्यत् पुरुषं पूर्वं मायां च तदपाश्रयाम् !!" ( भाग० १।७।३,४ ) इस दृष्टि से भगवान् व्यास की तुलना सामान्य इतिहासकारों से करना अन्याय ही है । भारतीय दृष्टिकोण से तो व्यास भगवान् चौबीस अवतारों में एक हैं । यह भी कहना गलत है कि "व्यास स्वयं को सत्यनिष्ठ मानकर ही ऐसे इतिहास का सृजन करते हैं । किन्तु वह सत्यनिष्ठा उन्हें सन्तुष्ट नहीं कर पाती ।" क्योंकि ऐसे वचनों का अभिप्राय आप जैसे लोग समझ नहीं पाते । सत्य एक महान् धर्म है । शास्त्रों ने कहा है कि तराजू पर एक तरफ एक सत्य रखो और दूसरी तरफ हजारों अश्वमेध रखो, पर हजार अश्वमेधों से एक सत्य ही उत्कृष्ट होगा । प्रकृत में तो भगवद्गुणवर्णन और श्रवण के बिना, भगवद्- भक्ति के बिना केवल अन्य साधन धर्मों से उतनी सफलता नहीं मिलती, जितनी भक्तियुक्त कर्मों से मिलती है । इसको यों समझना चाहिये कि— "राम नाम एक अङ्क है, सब साधन हैं सून । अङ्क गये कछु हाथ नहिं, अङ्क रहे दस गून ॥" रामनाम अङ्क के तुल्य है और साधन शून्य के समान हैं, फिर भी शून्य व्यर्थ नहीं । हाँ, अङ्क के न रहने पर शून्य का कोई महत्त्व नहीं है । परन्तु अङ्क के रहने पर उनका अत्यन्त महत्त्व है । एक अङ्क के सामने एक शून्य बना देने पर वही एक १० हो जाता है । दो शून्य हों तो वही एक १०० हो जाता है । यह बात ठीक है कि अङ्क न रहने पर लाखों शून्य बेकार होते हैं । परन्तु यदि किसी को १० अरब रुपया मिलने का सरकारी आर्डर हुआ हो और उसमें से शून्य सब हटा दिये जायें, तो १० अरब रुपयों के बदले एक ही रुपया मिलेगा । इस दृष्टि से सत्य आदि का परमोत्कृष्ट महत्त्व है । भगवच्चरित्र के वर्णन, श्रवण और कथन करने की दृष्टि से ही व्यासजी का वह असन्तोष कहा गया है । साथ ही दूसरी तरफ देखें, यदि कोई भगवद्गुण वर्णन और श्रवण करता हो और वह असत्यनिष्ठ हो तो कोई समझदार उसे भक्त कहेगा क्या ? लोक-परलोक सब जगह सत्य से ही सब फल मिलते हैं । भगवच्चरित्र भी सत्य होने से ही आदरणीय है । यदि कोई झूठी कथा का वर्णन करे, तो वह असत्य में ही पर्यवसित होगी । इसी लिए महर्षि वाल्मीकि ने समाधि के द्वारा सत्य अबाधित चरित्रों का प्रत्यक्ष कर के वर्णन किया है । आज भी यदि जनता को विदित हो कि वक्ताजी बिना प्रमाण की सब काल्पनिक कथाएँ कहते हैं तो उसपर किसी भी समझदार की श्रद्धा नहीं होगी । भगवत्कथा के सम्बन्ध में भी सत्यता अपेक्षित है । अन्यथा उपन्यास और गल्प के तुल्य भगवत्कथा भी एक विनोद की वस्तु बन जायगी । यह कहना भी गलत है कि "केवल व्यक्तियों के राग, द्वेष, संघर्ष, गुण, अवगुण की व्याख्या ही तो इतिहास है" क्योंकि भारतीय दृष्टिकोण से इतिहास में किन्हीं विशेष व्यक्तियों के जीवन की घटनाओं के प्रसङ्ग से धर्म, उपासना और तत्त्वज्ञान का ही प्रतिपादन होता है । शुक्र के अनुसार राजचरित्र के वर्णन प्रसङ्ग से प्राग्वृत्त का कथन इतिहास है— "प्राग्वृत्तकथनं चैकराज्यवृत्तमिशादितः । यस्मिन् स इतिहासः स्यात् पुरावृत्तः स एव हि ॥" ( शुक्रनीति ४।२९३ ) काव्यमीमांसा के अनुसार धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के उपदेशों से समन्वित कथायुक्त पूर्ववृत्त का वर्णन इतिहास है—