रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७१५ "तस्मिन् स्व आश्रमे व्यासो बदरीखण्डमण्डिते । आसीनोऽप उपस्पृश्य प्रणिदध्यौ मनः स्वयम् ॥ भक्तियोगेन मनसि सम्यक्प्रणिहितेऽमले । अपश्यत् पुरुषं पूर्वं मायां च तदपाश्रयाम् !!" ( भाग० १।७।३,४ ) इस दृष्टि से भगवान् व्यास की तुलना सामान्य इतिहासकारों से करना अन्याय ही है । भारतीय दृष्टिकोण से तो व्यास भगवान् चौबीस अवतारों में एक हैं । यह भी कहना गलत है कि "व्यास स्वयं को सत्यनिष्ठ मानकर ही ऐसे इतिहास का सृजन करते हैं । किन्तु वह सत्यनिष्ठा उन्हें सन्तुष्ट नहीं कर पाती ।" क्योंकि ऐसे वचनों का अभिप्राय आप जैसे लोग समझ नहीं पाते । सत्य एक महान् धर्म है । शास्त्रों ने कहा है कि तराजू पर एक तरफ एक सत्य रखो और दूसरी तरफ हजारों अश्वमेध रखो, पर हजार अश्वमेधों से एक सत्य ही उत्कृष्ट होगा । प्रकृत में तो भगवद्गुणवर्णन और श्रवण के बिना, भगवद्- भक्ति के बिना केवल अन्य साधन धर्मों से उतनी सफलता नहीं मिलती, जितनी भक्तियुक्त कर्मों से मिलती है । इसको यों समझना चाहिये कि— "राम नाम एक अङ्क है, सब साधन हैं सून । अङ्क गये कछु हाथ नहिं, अङ्क रहे दस गून ॥" रामनाम अङ्क के तुल्य है और साधन शून्य के समान हैं, फिर भी शून्य व्यर्थ नहीं । हाँ, अङ्क के न रहने पर शून्य का कोई महत्त्व नहीं है । परन्तु अङ्क के रहने पर उनका अत्यन्त महत्त्व है । एक अङ्क के सामने एक शून्य बना देने पर वही एक १० हो जाता है । दो शून्य हों तो वही एक १०० हो जाता है । यह बात ठीक है कि अङ्क न रहने पर लाखों शून्य बेकार होते हैं । परन्तु यदि किसी को १० अरब रुपया मिलने का सरकारी आर्डर हुआ हो और उसमें से शून्य सब हटा दिये जायें, तो १० अरब रुपयों के बदले एक ही रुपया मिलेगा । इस दृष्टि से सत्य आदि का परमोत्कृष्ट महत्त्व है । भगवच्चरित्र के वर्णन, श्रवण और कथन करने की दृष्टि से ही व्यासजी का वह असन्तोष कहा गया है । साथ ही दूसरी तरफ देखें, यदि कोई भगवद्गुण वर्णन और श्रवण करता हो और वह असत्यनिष्ठ हो तो कोई समझदार उसे भक्त कहेगा क्या ? लोक-परलोक सब जगह सत्य से ही सब फल मिलते हैं । भगवच्चरित्र भी सत्य होने से ही आदरणीय है । यदि कोई झूठी कथा का वर्णन करे, तो वह असत्य में ही पर्यवसित होगी । इसी लिए महर्षि वाल्मीकि ने समाधि के द्वारा सत्य अबाधित चरित्रों का प्रत्यक्ष कर के वर्णन किया है । आज भी यदि जनता को विदित हो कि वक्ताजी बिना प्रमाण की सब काल्पनिक कथाएँ कहते हैं तो उसपर किसी भी समझदार की श्रद्धा नहीं होगी । भगवत्कथा के सम्बन्ध में भी सत्यता अपेक्षित है । अन्यथा उपन्यास और गल्प के तुल्य भगवत्कथा भी एक विनोद की वस्तु बन जायगी । यह कहना भी गलत है कि "केवल व्यक्तियों के राग, द्वेष, संघर्ष, गुण, अवगुण की व्याख्या ही तो इतिहास है" क्योंकि भारतीय दृष्टिकोण से इतिहास में किन्हीं विशेष व्यक्तियों के जीवन की घटनाओं के प्रसङ्ग से धर्म, उपासना और तत्त्वज्ञान का ही प्रतिपादन होता है । शुक्र के अनुसार राजचरित्र के वर्णन प्रसङ्ग से प्राग्वृत्त का कथन इतिहास है— "प्राग्वृत्तकथनं चैकराज्यवृत्तमिशादितः । यस्मिन् स इतिहासः स्यात् पुरावृत्तः स एव हि ॥" ( शुक्रनीति ४।२९३ ) काव्यमीमांसा के अनुसार धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के उपदेशों से समन्वित कथायुक्त पूर्ववृत्त का वर्णन इतिहास है—
७३६ रामायणमीमांसा एकविंश “धर्मार्थकाममोक्षाणामुपदेशसमन्वितम् । पूर्ववृत्तकथायुक्तमितिहासं प्रचक्षते ॥” “पुराणमितिवृत्तमाख्यायिकोदाहरणं धर्मशास्त्रमर्थशास्त्रं चेतिहासः ।” (कौटिल्य अर्थशास्त्र १।५।१४) “इतिहासपुराणाभ्यां वेदार्थमुपबृंहयेत् ।” इत्यादि प्रमाणों के अनुसार इतिहास और पुराण द्वारा वेदों का उपबृंहण या विवरण किया जाता है। साथ ही भारतीय इतिहास एक जाज्वल्यमान दीपक है। यह मोह का अन्धकार मिटाकर लोगों के अन्तःकरणरूप सम्पूर्ण अन्तरङ्ग-गृह को भली भाँति ज्ञानालोक से प्रकाशित कर देता है— “इतिहासप्रदीपेन मोहावरणघातिना । लोकगर्भगृहं कृत्स्नं यथावत् सम्प्रकाशितम् ॥” इसी लिए “रामचरितमानस” में भी यही कहा गया— “सुनहु परम पुनीत इतिहासा। जो सुनि सकल लोकभ्रम नासा ॥” (रा० मा० ७।५४।४) इसी तरह इतिहासकथन द्वारा शोकनिवारण का वर्णन भी मानस में ही आया है— “तब वसिष्ठ मुनि समय सम कहि अनेक इतिहास । शोक निवारेउ सबहिं कर निज विज्ञान प्रकास ॥” (रा० मा० २।१५५) साथ ही इतिहास-श्रवण का विधान भी गोस्वामीजी को इष्ट है तभी तो अपने इष्ट श्रीरामभद्र को चित्र- कूट में वटछाया-वेदिका पर समासीन कर, मुनिजनों के साथ इतिहासश्रवण का उल्लेख करते हैं— “जहाँ बैठि मुनिगन सहित नित सियाराम सुजान । सुनहिं कथा इतिहास सब आगम निगम पुरान ॥” (रा० मा० २।२३६) स्मरण रहे कि श्रीरामचरितमानस भी इतिहास ही है, क्योंकि भगवान् शङ्करजी ने कथा का उपसंहार करते हुए पूरे श्रीरामचरितमानस को परम पुनीत इतिहास कहा है— “कहेउँ परम पुनीत इतिहासा। सुनत श्रवन छूटहि भवपासा ॥” अतः यह कहना कि केवल व्यक्तियों के राग-द्वेष, संघर्ष, गुण-अवगुण की व्याख्या ही तो इतिहास है। वह भी मानस के वक्ता द्वारा कहाँ तक उचित है ? साथ ही जिस भागवत की आड़ में लेखक ने महाभारत जैसे वेदतुल्य इतिहास पर कीचड़ उछाला है, उसी भागवत के तृतीय स्कन्द में यह कहा गया है कि सर्वदर्शी भगवान् ब्रह्मा ने अपने चारों मुखों से इतिहास-पुराण रूप पाँचवाँ वेद बनाया--- “इतिहासपुराणानि पञ्चमं वेदमीश्वरः । सर्वेभ्य एव वक्त्रेभ्यः ससृजे सर्वदर्शनः ॥” (भा० ३।१२।३९) इसी प्रकार छान्दोग्य उपनिषद् में इतिहास-पुराण को पञ्चम वेद कहा गया है— “नाम वा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेद आथर्वणश्चतुर्थ इतिहासपुराणः पञ्चमो वेदानां वेदः । (छा० उ० ७।१।४) यह कथन भी निर्मूल है कि “इतिहास मनुष्य की स्मृति को बोझिल बनाता है” क्योंकि दर्शन भी तो यही करता है, जिस वस्तु की स्मृति सुरक्षित रखनी आवश्यक होगी, वह बोझिल होगी। इस दृष्टि से तो ईश्वर
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७३७ एवं आर्षकल्प ऋषियों की स्मृति को भी बोझिल कहना होगा। “इतिहास उन घटनाओं से स्मृति को बोझिल बनाता है, जो बीत चुकी हैं। वह देश, प्रान्त और जातियों में वैमनस्य की सृष्टि करता है।” यह सब कथन पूर्णतया असङ्गत है, क्योंकि किसी भी समझदार को अतीत का अध्ययन, वर्तमान का अनुभव, भविष्य का अनुमान कर के ही कर्तव्य-निर्धारण करना उचित होता है। फिर महाभारत और रामायण जैसे आर्ष इतिहासों को शवच्छेदन की उपमा देना, अत्यन्त अनभिज्ञता है। यह तो पद-पद पर शिक्षाप्रद एवं पुण्यप्रद ही है। कहा ही गया है— “इतिहासमिमं पुण्यं महार्थं वेदसम्मितम् । व्यासोक्तं श्रूयते येन कृत्वा ब्राह्मणमग्रतः ॥ स नरः सर्वकामांश्च कीर्ति प्राप्येह शौनक । गच्छेत् परमिकां सिद्धिमत्र मे नास्ति संशयः ॥” अर्थात् जो मनुष्य व्यासजी के द्वारा कथित महान् अर्थमय और वेदतुल्य इस पवित्र महाभारत इतिहास को श्रेष्ठ ब्राह्मण द्वारा श्रवण करता है, वह इस लोक में सब मनोरथों को और कीर्ति को प्राप्त करता है और अन्त में परमसिद्धि मोक्ष को प्राप्त होता है। इसमें सन्देह नहीं है। वाल्मीकिरामायण के लिए प्रसिद्ध ही है कि— “एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ।” शवच्छेद विद्यार्थी को सीखना पड़ता है ओर सीखकर जीवित पुरुषों के अङ्गच्छेदनादि चिकित्सा में उसका उपयोग किया जाता है। “देवर्षि भक्तिशास्त्र के आचार्य हैं।” देवर्षि नारद ही नहीं भगवान् व्यास भी भक्तिशास्त्र के आचार्य हैं। इतना ही नहीं भगवान् के चौबीस अवतारों में एक हैं। नारदजी ने भागवत में कहा ही है— ‘अजं प्रजातं जगतः शिवाय ।” (भाग० १।५।२१ ) यह कहना भी सङ्गत नहीं है कि “भक्ति का मुख्य उद्देश्य 'सत्यं शिवं सुन्दर' की सृष्टि है। इसी लिए वह व्यक्ति के इतिहास के स्थान पर भगवान् की लीला को अपना मुख्य केन्द्र बनाती है।” क्योंकि 'सत्यं शिवं सुन्दर' नित्य परमात्मा ही है। वह नित्य है, उसकी सृष्टि नहीं होती। भारतीय महाभारत और रामायण में भी व्यक्ति की कथाओं का प्राधान्य न होकर भगवान् की लीलाओं का ही प्राधान्य है। महाभारत ग्रन्थ के मुख्य विषय हैं—स्वयं सनातन परब्रह्मस्वरूप वासुदेव भगवान् कृष्ण, उन्हीं का इसमें कीर्तन किया गया है। वे ही सत्य, ऋत, पवित्र और पुण्य हैं। “भगवान् वासुदेवश्च कीर्त्यतेऽत्र सनातनः । स हि सत्यमृतं चैव पवित्रं पुण्यमेव च ॥” (महा० आदिपर्व ) अतः महाभारत में भजनीय भगवान् कृष्ण की भक्ति, उनका तत्त्वज्ञान एवं भक्ति तथा ज्ञान के साधनरूप में ही धर्म, अर्थ, नीति आदि का भी वर्णन है। कहा जाता है कि “इस लीला को गुण-दोष की दृष्टि से श्रवण और पठन का विषय नहीं बनाया जाना चाहिये।” परन्तु यह भी गलत है। भगवान् की मङ्गलमयी लीला का श्रवण, वर्णन स्वयं में परम पुरुषार्थ है, उससे दोषों का निराकरण तथा गुणों का संग्रह भी होता ही है। कहा जाता है “श्रीमद्भागवत पुराण की रचना के पीछे यही प्रेरणा थी। देवर्षि ने बड़े विस्तार से इतिहास के स्थान पर भगवद्गुणगायन की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने ऐतिहासिक दृष्टि के जो दोष ९३
७३८ रामायणमीमांसा एकविंश बताये हैं, वे बड़े महत्त्व के हैं—जो मनुष्य भगवान् की लीला छोड़कर अन्य कुछ कहने को इच्छा करता है वह उस-इस इच्छा से ही निर्मित अनेक नाम और रूपों के चक्कर से पड़ जाता है। उसकी बुद्धि भेद-भाव से भर जाती है। जैसे हवा के झकोरों से डगमगाती हुई नौका को कहीं भी ठहरने का ठौर नहीं मिलता, वैसे ही उसकी चंचल बुद्धि कहीं भी स्थिर नहीं हो पाती— “ततोऽन्यथा किंचन यद्विवक्षतः पृथग्दृशस्तत्कृतरूपनामभिः । न कुत्रचित्क्वापि च दुःस्थिता मतिर्लभेत वाताहतनौरिवास्पदम् ।। (भाग० १।५।१४)” वस्तुतः उक्त वचन में न तो इतिहास की चर्चा है और न महान् महाभारत के पवित्र इतिहास की निन्दा है। महाभारत में तो अनेकधा भगवान् की दिव्य लीलाओं का ही वर्णन है। श्रीधर स्वामी आदि की टीकाओं के अनुसार उक्त श्लोक द्वारा काम्य कर्म आदि की निन्दा की गयी है— “ततो भगवच्चेष्टितात् पृथग्दृशोऽत एवान्यथा प्रकारान्तरेणं यत्किञ्चिदर्थान्तरं विवक्षतः तयो विवक्षया तत्कृतैः स्फुरितै रूपैः नामभिश्च वक्तव्यत्वेनोपस्थितैः दुःस्थिताऽनवस्थिता मतिः कदाचित् क्वापि विषये आस्पदं न लभेत वाताहतनौरिव ।” अर्थात् भगवल्लीला से भिन्न अर्थान्तर की विवक्षा से वक्तव्यरूप से उपस्थित अनेक नाम और रूपों से दुःस्थिता बुद्धि वात से आहत नौका के समान कभी भी किसी विषय में स्थिति नहीं प्राप्त कर सकती। गीता में भी यही बात कही गयी है— “व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ।। ( गीता २।४१ ) सर्ववेदों का परम तात्पर्य परब्रह्म में ही है। कर्मकाण्डों का तात्पर्य भी भगवच्चरण-पङ्कज में समर्पण बुद्धि से निष्काम कर्म द्वारा, बुद्धि-शुद्धिसाधन चतुष्टयसम्पत्ति द्वारा ब्रह्म में ही पर्यवसान होना है। परन्तु जिनकी ऐसी बुद्धि नहीं है उनकी बुद्धि नाना प्रकार की कामनाओं में भटकती है। एक-एक कामना की पूर्ति के लिए अनेक साधनों में दौड़ती है। कामनाओं को अगणित शाखाएँ होती हैं। महाभारत तथा अन्य पुराणों में ब्रह्मात्मतत्त्व का पर्याप्त वर्णन है; परन्तु उसके सम्बन्ध में भी नारदजी का कहना था कि कोई बड़ा विचक्षण विद्वान् ही निवृत्ति- मार्ग से अनन्तपार विभु, व्यापक ब्रह्म का सुख ले सकता है। सर्वसाधारण का उसमें अधिकार नहीं है। अतः आप गुणों से प्रवर्तमान प्राणियों के लिए भगवान् की लीला चेष्टित का वर्णन करो, जिससे सर्वसाधारण का भी कल्याण हो सके— “जुगुप्सितं धर्मकृतेऽनुशासतः स्वभावरक्तस्य महान् व्यतिक्रमः । यद्वाक्यतो धर्म इतीतरः स्थितो न मन्यते तस्य निवारणं जनः ॥ विचक्षणोऽस्यार्हति वेदितुं विभोरनन्तपारस्य निवृत्तितः सुखम् । प्रवर्त्तमानस्य गुणैरनात्मनस्ततो भवान् दर्शय चेष्टितं विभोः ।।” (भाग० १।५।१५,१६) काम्य कर्मों का उपदेश करते हुए आप से कहीं महान् व्यतिक्रम भी हो गया है। जिसको स्वभाव से ही राग है उसे जब किसी आप्त पुरुष से भी काम्य कर्मों का समर्थन मिल जाता है, तब वह उसी में अडिग हो जाता है। फिर अन्यत्र आपके निषेध करने पर भी वह उससे निवृत्त नहीं होता। वेदों और भगवान् के कहने पर भी उसे नहीं छोड़ता। यद्यपि— “जोषयेत् सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन् । न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसंगिनाम् ।।” ( गीता० ३।२६ )
[अध्याय] [रामचरितसम्बन्धी लेख] [७३९]
के अनुसार विद्वान् का कर्तव्य है कि वह कर्माधिकारियों में भेद-बुद्धि न उत्पन्न कर के स्वयं भी कर्म करता हुआ उनको अधिकारानुसार कर्मों में लगाये, तथापि उत्तमाधिकारी के लिए काम्यकर्म का उपदेश नहीं ही करना चाहिये— “स्वयं निःश्रेयसं विद्वान्न वक्त्यज्ञाय कर्म हि। न राति रोगिणोऽपथ्यं वाञ्छतोऽपि भिषक्तमः ॥” स्वयं निःश्रेयस को जानता हुआ भी पुरुष अज्ञों के लिए काम्य कर्म का उपदेश नहीं करते जैसे वैद्यप्रवर रोगी के मांगने पर भी कुपथ्य नहीं देता। यहाँ यह भी विवेक समझ लेना चाहिये कि सकाम अधिकारियों के लिए सकाम कर्म का विधान होता है। उत्तम अधिकारी भगवच्चरण में समर्पण बुद्धि से निष्काम कर्म करता है और उत्तम अधिकारियों के लिए भगवद्भक्ति, भगवच्चरित्र-स्मरणादि का अधिकार होता हैं। कहा जाता है कि “इतिहास तो हमें उन लोगों से जोड़ देता हैं, जिनसे हमें आज कुछ भी लेना-देना नहीं है। उन पात्रों के प्रति भी हमारे मन में राग-रोष उत्पन्न करता हैं। इस तरह वह हमारा बोझ हल्का करने के स्थान पर ऐसा अनावश्यक बोझ लाद देता है, जिसे केवल ढोना-ही है। प्रत्येक जाति और देश उसी परम्परा को ढोने का प्रयास कर रहा है। किसी जाति ने किसी दूसरी जाति को उत्पीडित किया था, अतः उसका बदला लेने के लिए आज भी उस घृणा-वृत्ति को जीवित रखता है। एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र का प्रतिद्वन्द्वी है और अपनी श्रेष्ठता की सुरा पीकर अन्य राष्ट्रों के विरुद्ध संघर्ष करता है और इस तरह हिंसा-प्रतिहिंसा के चक्र को आगे बढ़ाता ही जाता है। घृणा और संघर्ष की ये प्रवृत्तियाँ मानव-मन में आदिम काल से विद्यमान है। उन्हें उकसाना बहुत सरल है। इससे नेतृत्व प्राप्त कर लेना अत्यन्त सरल हो जाता है। किन्तु इसके द्वारा व्यक्ति और समाज को क्या प्राप्त होता है ? विचार करें तो देखेंगे कि अशान्ति ही इसकी उपलब्धि है। इसी को नारद हवा के थपेड़ों से भटकती हुई नौका के दृष्टान्त से स्पष्ट करते हैं। व्यक्ति और समाज के जीवन में आँधी की सृष्टि करने में इतिहास का बहुत बड़ा भाग है।” कहना न होगा कि यह स्थाणु का दोष नहीं है, जो उसे अन्धा नहीं देख पाता। इसी से गोस्वामी जी कहते हैं— “अज्ञ अकोविद अंध अभागी। काई विषय मुकुर मन लागी ॥ कहहिं ते वेद असम्रत बानी। जिन्ह के सूझ लाभ नहिं हानी ॥ मुकुर मलिन अरु नयन विहीना। रामरूप देखहिं किमि दीना ॥” (रा० मा० १।११४।१,२) यह इतिहास का दोष नहीं, जो पढ़नेवाला उसका अभिप्राय न समझे। श्रीमद्भागवत महाभारत की प्रशंसा करता है और महाभारत की बहुत सी कथाओं का वह भी वर्णन करता है। फिर भी बिना प्रमाण के ही लेखक ने श्रीमद्भागवत के द्वारा महाभारत जैसे पवित्र ग्रन्थ पर एवं उसके रचयिता पर निरर्थक दोषारोपण करने का गर्हित प्रयास किया है। श्रीनारदजी का तो इतना ही तात्पर्य था कि आपने जैसे प्रधानता से धर्म, अर्थ, काम आदि का वर्णन किया है, वैसे भगवान् की महिमा का वर्णन नहीं किया। अतः चित्तशान्ति के लिए भगवान् के यश का वर्णन करें। महाभारत और रामायण आर्ष इतिहास हैं, इनमें सामान्य इतिहासों के दूषण भी नहीं हैं, क्योंकि ये दोनों ग्रन्थ राग-द्वेष से ऊँचे उठे हुए महर्षियों द्वारा वर्णित है। उनका किसी से राग-द्वेष नहीं था। उन्होंने प्रजा के कल्याण की कामना से ही महाभारत एवं रामायण जैसे इतिहास की रचना की और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष एवं उनके निर्दोष साधनों का वर्णन किया। श्रीभागवतकार ने कहा ही है— “भारतव्यपदेशेन ह्याम्नायार्थश्च दर्शितः ।” (भाग० १।४।३०) “सर्ववर्णाश्रमाणां यद्दध्यौ हितममोघदृक् ।।” (भाग० १।४।१८)
गुण और दोष को न देखना ही सबसे बड़ा गुण है। गुण एवं दोष देखना ही दोष है— “गुणदोषदृशिर्दोषो गुणस्तूभयवर्जितः ।” (भाग० ११।१९।४५) “गुन यह उभय न देखिअहि देखिअ सो अबिबेक ॥” (रा० मा० ७।३१) परन्तु यह बहुत ऊँची स्थिति है। समाधिदशा में ही यह बात बन पाती है। व्यवहार में गुण-दोष को तो जानना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी होता है। जितना भर भी व्यवहार है, विधि-निषेध से ही सम्बद्ध है। गोस्वामीजी भी कहते हैं— “विधिप्रपंच गुन अवगुन साना । ( रा० मा० १।५।२) “तेहि तें कछु गुन दोष बखाने । संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने ॥ (रा० मा० १।५।१) गुणों का ज्ञान होने पर ही उनका संग्रह किया जा सकता है और दोषों का ज्ञान होने से ही उनके त्याग का प्रयत्न सम्भव है। इसी लिए पूर्वमीमांसा में धर्मजिज्ञासा के साथ अधर्म की जिज्ञासा भी की जाती है। महाभारत एवं रामायण में भी दोनों पक्ष हैं। कौरवपक्ष, पाण्डवपक्ष, रावणपक्ष और रामपक्ष । प्रथम पक्ष में तामस तथा राजस भावों का प्राधान्य है। अन्य पक्ष में सत्त्व का प्राधान्य है। इसी लिए सिद्धान्त यह है— “रामादिवत् वर्तितव्यं न रावणादिवत् ।” (काव्यप्र० १।२) रामादि के समान बर्ताव करना चाहिये रावणादि के समान बर्ताव नहीं करना चाहिये। यह रामायण का सार है। “युधिष्ठिरादिवत् व्यवहर्तव्यं न दुर्योधनादिवत् ।” युधिष्ठिर आदि के समान व्यवहार करना चाहिये, दुर्योधन आदि के समान बर्ताव करना उचित नहीं है। यह महाभारत का सार है। संसार में भली-बुरी सब प्रकार की वस्तुएँ होती हैं। वेदादि-शास्त्रों ने गुण-दोष की दृष्टि से सबका विश्लेषण किया है— “भलेउ पोच सब विधि उपजाए । गनि गुन दोष बेद - बिलगाए ॥” (रा० मा० १।५।२ ) जैसे हंस क्षीर-नीर का विश्लेषण करके विकार-वारि को त्यागकर क्षीर ग्रहणकर लेता है, उसी तरह सन्तजन गुण-दोषमय संसार से दोष त्यागकर गुण ग्रहणकर लेते हैं— “संत हंस गुन गहहिं पय, परिहरि बारि बिकार ।” (रा० मा० १।६) ऐसा बिना किये रामायण पढ़ने से भी लाभ न होगा, क्योंकि 'रामायण' भी इतिहास ही है। उसमें भी दोनों ही पक्ष हैं। उसके पढ़ने से भी एक पक्ष में राग और अन्य पक्ष में द्वेष सम्भव है। अतएव इतिहास के रूप में आरोपित पूर्वोक्त दोष आ सकते हैं; और घृणादि दोषों से मन का बोझ बढ़ जायगा। किन्तु सिद्धान्ततः ऐसा नहीं होता, क्योंकि उसके अनुसार रावण का दोष वर्णन ही केवल त्याग के लिए है। वह मन में धरने की वस्तु नहीं । राम के गुणों का वर्णन ही ग्रहण के लिए है। इतना ही नहीं, रामचरित्र का अङ्ग होने से रावण के चरित्र के वर्णन से भी पुण्य की उत्पत्ति मान्य है। तभी तो— “एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ।” की संगति बैठेगी। 'मानस' की कथा कहनेवाले लोग भी जब तक उक्त सिद्धान्त नहीं समझेंगे, तब तक इस भ्रम से मुक्त नहीं हो सकते हैं। किन्तु जिनको समझना ही नहीं है, उनके सामने कोई कितना भी राम और रावण का अनैतिहासिक एवं आध्यात्मिक अर्थ लगाये, परन्तु उनपर उसका कुछ भी असर पड़नेवाला नहीं होता। इसी
लिए 'द्रविड़मुन्नेत्रकड़गम' वाले आपके अनुसार रावण को अपना पूर्वज मानकर उनका बदला चुकाने की दृष्टि से राम, सीता और लक्ष्मण का भी पुतला जलाते हैं । क्या लेखक के अनुसार राम-भक्तों को रामलीला बन्द कर देनी चाहिये ? क्या लेखक रामायण या मानस की कथा बन्द कर देंगे ? यदि महाभारत की कथा से सामूहिक द्वेष की आँधी चल पड़ने पर बुद्धि की नौका गड़बड़ा सकती है तो रामायण की कथा से वैसा क्यों न होगा ? व्यक्ति और समाज के जीवन में इस आँधी की सृष्टि करने में यदि महाभारत के इतिहास का बड़ा भाग हो सकता है, तो वही की वही आपत्ति रामायण की कथा पर भी आ सकती हैं। क्योंकि यह भी इतिहास है। अतएव यह मिथ्या ही कल्पना है कि 'नारदजी ने महाभारत पर कटाक्ष किया है।' "महाभारत के जातीय युद्ध की गाथा और व्यक्तियों के इतिहास को लेकर वे प्रश्न-चिह्न अवश्य प्रस्तुत करते हैं। इस दृष्टि से महाभारत की उपयोगिता संदिग्ध है।" उक्त कथन सर्वथा निर्मूल है। व्यास-नारद संवाद में इसकी यत्कि- ञ्चित् भी चर्चा नहीं है, प्रत्युत श्रीमद्भागवत में भी भूमिका के रूप में महाभारत के युद्ध की ही चर्चा है। कौरव और पाण्डवों का भीषण संग्राम उभयपक्षीय वीरों के संहार के अनन्तर अश्वत्थामा के द्वारा अन्तिम भीषण संग्राम-लीला का वर्णन किया गया है। यह कहना भी गलत है कि तुलसीदासजी ने— “रामायन सिख अनुहरत, जग भयो भारत रीति । तुलसी सठ की को सुनै, कलि कुचालि पर प्रीति ॥” इस दोहे के द्वारा "मैं तो चाहता हूँ कि लोग रामायण की शिक्षा का अनुगमन करें, किन्तु समाज तो महाभारत का अनुकरण कर रहा है। मुझ जैसे दुष्ट की कौन सुने ? कलियुग का स्वभाव ही कुचाल से प्रेम करना है।" ऐसा कहकर 'महाभारत' पर कटाक्ष किया है। "महाभारत के मुख्य नायक पाण्डव हैं और प्रतिपक्षी उनके ही बन्धु कौरव हैं। दोनों राज्य के लिए संघर्ष करते हैं और करोड़ों व्यक्तियों को कट जाने देते हैं। रामचरित- मानस में बन्धुत्व के आदर्श राम और भरत हैं, जो एक-दूसरे के लिए राज्य का परित्याग कर देने में सन्तोष का अनुभव करते हैं। स्वभावतः संघर्षप्रिय मानव-मन कौरव-पाण्डवों के चरित्र को अपना आदर्श बना लेता है। वह यह सोचकर सन्तुष्ट हो जाता है कि यदि द्वैपायन व्यास जैसा महापुरुष पाण्डवों को आदर्श मानता है तो उसका अनुगमन करना क्या बुरा है ?" उक्त कथन सब अविचारितरमणीय हैं, क्योंकि श्रीमद्भागवत और रामायण में भी इतिहास की कमी नहीं है। सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी राजाओं का वर्णन और अनेक युद्धों का वर्णनं है। रामायण के बराबर तो दुनियाँ में कोई युद्ध ही नहीं हुआ— “रामरावणयोर्युद्धं रामरावणयोरिव” राम-रावण युद्ध राम-रावण के युद्ध के ही समान था। इससे यह सिद्ध हुआ कि राम-रावणयुद्ध के सदृश दूसरा युद्ध हुआ ही नहीं। तुलसीदासजी तो इतना ही कहना चाहते हैं कि राम और भरत के समान बन्धुत्व का अनुकरण नहीं करते किन्तु महाभारत के कौरव-पाण्डवों के संघर्ष का ही अनुकरण करते हैं। परन्तु इसमें महाभारत का क्या दोष ? उसने तो सच्ची घटनाओं का वर्णन किया है। काल का भी भेद है। रामायण का काल त्रेताकाल है। महाभारत का द्वापरकाल है। कलियुग की घटनाएँ उससे भी विलक्षण हो सकती हैं। विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या महाभारत में व्यासजी ने अपनी कल्पना के आधार पर कोई गलत आदर्श स्थापित किया है ? आप भी मानते हैं कि उन्होंने परमसत्यनिष्ठ होकर ही महाभारत लिखा है। तब इसमें उनपर या उनके महाभारत पर
७४२ रामायणमीमांसा एकविंश कोई भी समझदार कैसे आक्षेप कर सकता है ? महाभारत में भी पाण्डवों का परस्पर दृढ़ प्रेम था ही। विपक्षियों के किसी प्रयत्न से उनमें आपस में फूट नहीं पड़ी, धर्मराज तो यह मानते थे कि हमारे आपस में संघर्ष होगा, तो कौरव १०० और पाण्डव पांच होंगे, परन्तु अन्य से संघर्ष होने पर हम एक सो पाँच हैं— “वयं पञ्च शतं च ते वयं पञ्चोत्तरं शतम् ।” यदि पाण्डवों के सामने जो स्थिति थी वही स्थिति राम के सामने होती तो राम को भी वही करना पड़ता, जो पाण्डवों ने किया था। जैसे पाण्डवों की पत्नी को भरी सभा में नग्न करने का प्रयास किया गया, यदि वैसी ही बात राम की पत्नी के साथ उनकी जाति का ही कोई करता तो क्या राम रावण के समान ही उसका संहार न करते ? वस्तुतः राम अपने भाई-बन्धुओं से भी ज्यादा सम्मान ब्राह्मणों का करते थे । वे ब्राह्मणों के उपासक थे—‘‘ब्राह्मणानामुपासिता’’ किन्तु ब्राह्मण ने भी उनकी पत्नी का हरण किया तो उन्होंने उस ब्राह्मण को कुल-कुटुम्ब सहित मौत के घाट उतार दिया । फिर पाण्डवों ने ही कौन सा अपराध किया ? किसी भी समझदार को वही करना पड़ता । वस्तुतः युधिष्ठिर तो सदा ही युद्ध टालने का प्रयास करते थे । अर्जुन, भीम, द्रौपदी सात्यकि, सहदेव आदि ही युद्ध के पक्ष में थे । नकुल भी युद्ध के पक्षधर नहीं थे । फिर भी युद्ध के समय ऐन मोके पर अर्जुन ने युद्ध करने से इनकार कर दिया । उसने स्पष्ट कहा कि त्रैलोक्य के राज्य के लिए भी विपक्षियों को न मारूँगा, भले ही वे मुझपर शस्त्र चलाएँ । यदि मुझ अशस्त्र पर वे शस्त्रपाणि प्रहार भी करें तो अच्छा ही होगा । मैं भिक्षाचर्या द्वारा जीवन चलाना ठीक समझूँगा, किन्तु राज्य के लिए बन्धुओं का वध करना उचित नहीं— “एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन । अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किंनु महीकृते ॥” ( गीता १।३५ ) “श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके····················।” ( गीता २।५ ) “स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ।” ( गीता २।३६ ) “धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥” ( गीता १।४५ ) क्या कोई बन्धु-प्रेमी इससे अधिक औदार्य प्रदर्शित कर सकता है ? किन्तु क्या यह उचित था ? तुलसीदासजी महाराज इसे उचित मानते थे ? भगवान् कृष्ण ने, जो साक्षात् भगवान् राम ही थे, क्योंकि वाल्मीकि ने राम को बृहद्बल कृष्ण ही माना है— “शाङ्गधन्वा हृषीकेशः पुरुषः पुरुषोत्तमः । अजित खड्गधृग् विष्णुः कृष्णश्चैव बृहद्बलः॥” ( वा० रा० ६।११६।१५ ) स्पष्टरूप में इसे अनुचित माना और कहा— “कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् । अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ! ॥” ( गीता २।२ ) अर्थात् हे अर्जुन ! अनार्यसेवित, अकीर्तिकर, अस्वर्ग्य कश्मल ऐसे विषम अवसर में तुम्हें कैसे प्राप्त हो गया है; फिर गीता ज्ञान का उपदेश करके उससे कहा कि यदि तुम इस धर्मयुक्त सङ्ग्राम से विमुख होगे तो स्वधर्म और कीर्ति को त्याग कर पाप के भागी होगे— “अथ चेत् त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि । ततः स्वधर्मं कीर्ति च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥” ( गीता २।३३ ) और कहा—‘‘तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ।” ( गीता २।३७ )
[अध्याय : रामचरितसम्बन्धी लेख : ७४३]
स्वयं श्रीमद्भागवत के परम भागवत भीष्म ने शर-शय्या पर पड़े हुए, अन्तिम श्रीकृष्णस्तुति में कहा था— "व्यवहितपृतनामुखं निरीक्ष्य स्वजनवधाद् विमुखस्य दोषबुद्ध्या । कुमतिमहरदात्मविद्यया यश्चरणरतिः परमस्य तस्य मेऽस्तु ॥" (भाग० १।९।३६) जब दोनों सेनाओं को सामने सामने निहार कर अर्जुन ममता, राग आदि दोष-बुद्धि के कारण स्वजनवध से विमुख हो गया । तब जिस भगवान् ने आत्मविद्या प्रदान कर के अर्जुन की उस कुमति का हरण किया था, उस परम पुरुष के चरणों में मेरी रति हो । इससे स्पष्ट है कि वैसे युद्ध से विमुख होना ही दोष था । वह युद्ध धर्म था, उसके त्यागने से ही अकीर्ति और पाप था । अब कहिये, क्या तुलसीदासजी इस युद्ध को अनुचित कहेंगे ? कदापि नहीं । फिर वे महाभारत पर कटाक्ष कैसे कर सकते थे ? श्रीनारद के उपदेश से श्रीव्यास ने जिस श्रीमद्भागवत का निर्माण किया है, उसमें भी अनेक युद्धों का वर्णन है । भगवान् कृष्ण का जन्म ही दुष्टों के संहार के लिए हुआ था । अर्जुन उन्हीं कृष्ण का अंश था । महाभारत संग्राम में भी भगवान् की प्रेरणा से ही क्षत्रियत्वरूप में प्रकट असुरों का संहार हुआ । अर्जुन और कृष्ण दोनों ने भूभार-हरण का कार्य किया था । यह मुख्य प्रश्न नहीं है कि किसने बन्धुओं को मारा और किसने गैर को मारा । विवेकी की दृष्टि में अपराधियों का वध होना चाहिये । चाहे वे बन्धु हों, चाहे गैर लोग हों । न्यायशील राजा निरपराध शत्रु-पुत्र का भी वध नहीं करेगा और अपराधी होने पर अपने औरस पुत्र को भी प्राणदण्ड दे सकता है । अपराधी होने से ही कौरवों का वध करना उचित था । अपराधी होने के कारण ही राम द्वारा रावण का वध उचित था । अपराधी बन्धु को न मारना, अन्य को मारना यह भारी पक्षपात और अन्याय कहा जायगा । फिर पाण्डवों ने तो श्रीकृष्ण पर छोड़ दिया था कि आप जैसा चाहें, कौरवों से सन्धि कर के युद्ध टालने का प्रयत्न करें । भगवान् कृष्ण स्वयं दूत बनकर अनेक महर्षियों को साथ लेकर कौरवों की सभा में गये । बहुत कुछ प्रयत्न किया, किन्तु सन्धि न हो सकी । अन्त में भगवान् श्रीकृष्ण के परामर्श से तथा उन्हीं के नेतृत्व में पाण्डवों ने युद्ध किया । यदि पाण्डव युद्ध के दोषी हैं तो उनके पहले भगवान् कृष्ण दोषी ठहरेंगे ? क्योंकि पाण्डवों के तो एकमात्र चक्षु श्रीकृष्ण ही थे ओर कृष्ण की शक्ति से अर्जुन एक ही रथ से दुरत्यय कौरव-सैन्य-सागर पार कर सका था । सन्त तुलसीदासजी या कोई भी पाण्डवों को युद्ध का दोषी नहीं कह सकते हैं । श्रीमद्भागवत में भी युधिष्ठिर को अजातशत्रु और 'धर्मभृतां वरिष्ठः' कहा गया है । कहां तक कहें श्रीभागवत के अनुसार भगवान् कृष्ण ने ब्रह्मशाप के व्याज से अपने कुल का भी संहार करा दिया, जो संसार में 'यादवन्याय' के नाम से प्रसिद्ध है । इसे श्रीतुलसीदासजी क्या कहेंगे ? लेकिन भागवतकार कहते हैं— "कण्टकं कण्टकेनैव द्वयं चापीशितुः समम् ।" ( भाग० १।१५।३४ ) "एवं बलिष्ठैर्यदुभिर्महद्भिरितरान् विभुः । यदून् यदुभिरन्योन्यं भूभारान् संजहार ह ॥" ( भाग० १।१५।२६ ) श्रीभगवान् ने अतिशय बलिष्ठ यदुओं से इतर राजाओं का संहार कराकर, तत्पश्चात् उन्हें भी आपस में ही लड़ाकर भू-भार का संहार किया था । श्रीभागवत में भगवत्प्रिय पाण्डवों के संप्रयाण को परमपवित्र स्वस्त्ययन कहा गया है उसके श्रवण से हरिभक्ति की प्राप्ति कही गयी है— "यः श्रद्धयैतद् भागवत्प्रियाणां पाण्डोः सुतानामिति संप्रयाणम् । श्रृणोत्यलं स्वस्त्ययनं पवित्रं लब्ध्वा हरौ भक्तिमुपैति सिद्धिम् ॥" (भाग० १।१५।५२) कहा जाता है कि "श्रीमद्भागवत में भी इतिहास का अभाव नहीं है। उसमें भी राजाओं का इतिहास और उनकी वंशावली का वर्णन है; किन्तु इसमें दो भिन्नताएँ हैं—पाण्डवों के स्थान पर इसके केन्द्र भगवान् कृष्ण हैं और इतिहास वर्णन का उद्देश्य इतिहास न होकर उसके प्रति वितृष्णा और वैराग्य उत्पन्न करना है । सारे इति-
७४४ रामायणमीमांसा एकविंश ह्रास का वर्णन करने के बाद उसकी निरर्थकता की घोषणा की गयी है। इतिहास किस दिशा में प्रेरित करता है, इसका बड़ा ही मार्मिक चित्र श्रीमद्भागवत के अन्तिम परिच्छेद में प्रस्तुत किया गया है— “कथं सेयमखण्डा भूः पूर्वैर्मे पुरुषैर्धृता । मत्पुत्रस्य च पौत्रस्य मत्पूर्वा वंशजस्य वा ।। तेजोऽबन्नमयं कायं गृहीत्वाऽऽत्मतयाऽबुधाः । महीं ममतया चोभो हित्वाऽन्तेऽदर्शनं गताः ।। ये ये भूपतयो राजन् भुञ्जन्ति भुवमौजसा । कालेन ते कृताः सर्वे कथामात्राः कथासु च ।।” (भाग० १२।२।४२-४४) वे लोग यही सोचा करते हैं कि मेरे दादा-परदादा इस अखण्ड भूमण्डल का शासन करते थे, अब वह मेरे वंशज किस प्रकार इसका उपभोग करें। वे मूर्ख इस आग, पानी और मिट्टी के शरीर को अपना आपा मान बैठते हैं, और बड़े अभिमान के साथ डींग हाँकते हैं कि यह पृथ्वी मेरी है। अन्त में शरीर और पृथ्वी, दोनों को छोड़कर स्वयं अदृश्य हो जाते हैं। सबको काल ने अपने विकराल गाल में धर दबाया। इतिहास में उनकी कहानी ही शेष रह गयी है। संसार में बहुत-से महान् पुरुष हो गये हैं, जो सम्पूर्ण लोकों में अपने यश का विस्तार कर के यहाँ से चल बसे। उनकी कथाएँ तुम्हें ज्ञान और वैराग्य का उपदेश करने के लिए कही गयी हैं। इन्हें वाणी का वैभव-मात्र न समझो। इनमें परमार्थ-तत्त्व भरा हुआ है। भगवान् श्रीकृष्ण का गुणानुवाद समस्त अमङ्गलों का नाश करनेवाला है। बड़े-बड़े महात्मा उसी का गान करते हैं। जो भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों में अनन्य प्रेममयी भक्ति की लालसा रखता हो, उसे नित्य-निरन्तर भगवान् के दिव्यगुणानुवाद का ही श्रवण करते रहना चाहिये— “कथा इमास्ते कथिता महीयसां विताय लोकेषु यशः परेयुषाम् । विज्ञान-वैराग्य-विवक्षया विभो वचोविभूतीर्न तु पारमार्थ्यम् ॥ यस्तूत्तमश्लोक-गुणानुवादः सङ्गीयतेऽभीक्ष्णममङ्गलघ्नः । तमेव नित्यं शृणुयादभीक्ष्णं कृष्णेऽमलां भक्तिमभीप्समानः ।।” (भाग० १२।३।१४,१५) वस्तुतः लेखक को भ्रम है। गोस्वामी तुलसीदास ने ठीक ही कहा है— ‘जब जेहि दिसि भ्रम होइ खगेसा । सो कह पच्छिम उयउ दिनेसा ।।’ (रा० मा० ७।७२।२) किन्हीं भी इतिहास की घटनाओं का दुहरानामात्र इतिहास का उद्देश्य नहीं है, किन्तु पूर्वजों के इतिहास से उत्तम-उत्तम शिक्षा ग्रहण करने के लिए ही इतिहास पढ़ा जाता है। पीछे लिखा जा चुका है कि किसी वृत्त-वर्णन के प्रसङ्ग से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का वर्णन इतिहास है। उक्त श्लोक का अर्थ यह है कि राजन्, संसार में यश फैलाकर अन्त में परलोक चले जानेवाले महापुरुषों की जो कथाएँ मैंने सुनायी हैं, वह विज्ञान तथा वैराग्य उपदेश के लिए ही हैं। इसके अतिरिक्त सब वाणी का वैभवमात्र है। उसमें परमार्थ कुछ नहीं है। “इन्हें वाणी का वैभव मात्र न समझो। इनमें परमार्थ-तत्त्व भरा हुआ है।” यह अर्थ असङ्गत है, क्योंकि वह संस्कृत शब्दों की मर्यादा के विरुद्ध है। पर इन पङ्क्तियों के लेखक के लिए संस्कृत का काला अक्षर भैंस बराबर है, फिर यदि कोई इनसे पूछे कि रामायण में भी वाली-सुग्रीव, रावण-विभीषण आदि की लड़ाई ठीक महाभारत के भाइयों की लड़ाई के समान क्यों न मान लें तो इन रामायणजी की पैरों के नीचे की धरती खिसक जायेगी। महाभारत के अध्ययन से तो पद-पद पर विवेक, विज्ञान, वैराग्य और पुण्य का ही लाभ होता है। कहा ही है—
“भारताध्ययनं पुण्यमपि पादमधीयतः । श्रद्दधानस्य पूयन्ते सर्वपापान्यशेषतः ॥” महाभारत का अध्ययन अन्तःकरण को शुद्ध करनेवाला है । जो कोई श्रद्धा के साथ इसके किसी एक श्लोक के एक पाद का भी अध्ययन करता है उसके सब पाप सम्पूर्णरूप से मिट जाते हैं। स्त्रीपर्व, श्राद्धादि, अनुशासनपर्व, शान्तिपर्व, मोक्षधर्म आदि में तो उच्चकोटि का विवेक-विज्ञान आदि का वर्णन है। श्रीमद्भागवत में भी कहा गया है कि व्यास मुनि ने भगवद्गुणों की विवक्षा से ही महाभारत की रचना की थी— “मुनिर्विवक्षुर्भगवद्गुणानां सखापि ते भारतमाह कृष्णः ।” (भा० ३।५।१२) इतिहास का वर्णन वाल्मीकिरामायण एवं श्रीमद्भागवत में भी है ही, वहाँ इतिहास-वर्णन का जो उद्देश्य अभीष्ट है, वही भारत में अभीष्ट है । यद्यपि महाभारत में मुख्यरूप से श्रीकृष्ण का ही वर्णन है, तथापि यदि धर्मराज, अर्जुन आदि पाण्डवों को ही उसका मुख्य नायक माना जाय, तो भी कोई हानि नहीं; क्योंकि श्रीमद्भागवत के अनुसार पाण्डव भगवत्प्रिय परमभक्त हैं । गोस्वामीजी के अनुसार “राम ते अधिक राम कर दासा ।” श्रीभागवत के अनुसार जो सुख भगवान् के चरणारविन्दों के ध्यान और भगवद्भक्तजनों की कथा के श्रवण में मिलता है, वह सुख स्वमहिम ब्रह्म में भी नहीं मिलता । फिर, काल की तलवार से विलुलित विमानों से गिरनेवाले देवताओं के सुख की तो उससे तुलना ही कैसे की जा सकती है ? “या निर्वृतिस्तनुभृतां तव पादपद्मध्यानाद् भवज्जनकथाश्रवणेन वा स्यात् । सा ब्रह्मणि स्वमहिमन्यपि नाथ मा भूत् किन्त्वन्तकासिलुलितात्पततां विमानात् ॥” (भाग० ४।९।१०) अतः यह कहना नितान्त अशुद्ध और पाप है—“यदि व्यास ने अपने उसी जन्म में महाभारत के बाद श्रीमद्भागवत की रचना करके अपनी भूल का परिमार्जन किया था, तो वाल्मीकि ने तुलसी के रूप में जन्म लेकर अपनी धारणा को संशोधित रूप दिया है। वाल्मीकिरामायण में ऐतिहासिक दृष्टि की प्रधानता थी । इसके स्थान पर रामचरितमानस भावनात्मक दर्शन को साकार रूप प्रदान करता है। इसके वर्ण्य भगवान् श्रीराम हैं।” ऐसे लोगों के लिए ही भगवान् शङ्कर उमाजी से कहते हैं— “बातुल भूतबिबस मतवारे । ते नहिं बोलहि बचन सँभारे ॥ जिन्ह कृत महामोह मद पाना । तिन्ह कर कहा करिअ नहिं काना ॥” (रा० मा० १।११४।४) श्रीगोस्वामी तुलसीदासजी स्वयं कपीश्वर हनुमान्जी के समान ही कवीश्वर वाल्मीकि को विशुद्ध विज्ञान- वाले मानते हैं और सीताराम-गुणग्राम-पुण्यारण्य विहारी मानकर दोनों की एक साथ वन्दना करते हैं— “सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ । वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ ॥” (रा० मा० १। मङ्गलाचरण ४) इसी प्रकार महर्षि व्यासजी की वन्दना करके गोस्वामीजी उनसे मनोरथ-पूर्ति की कामना करते हैं— “व्यास आदि कविपुङ्गव नाना । जिन्ह सादर हरि सुजस बखाना ॥ चरनकमल बन्दौ तिन्ह केरे। पूरहु सकल मनोरथ मेरे ॥” (रा० मा० १।१३।१,२) फिर उनकी भूल सुधार या उनकी पुरानी धारणा का तुलसीदास द्वारा संशोधन मानना घोर पाप है। इसे तुलसीदास कभी भी सहन नहीं कर सकते । वे स्वयं कहते हैं—जैसे किसी नृप द्वारा निर्मित सेतु के सहारे पिपीलिका (चींटी) बिना श्रम के नदी पार कर जाती है, वैसे ही व्यास, वाल्मीकि मुनिराजों से निर्मित रामायण का सहारा लेकर हम लोग भी रामचरित्र वर्णन का रस प्राप्त कर लेते हैं— ९४
७४६ रामायणमीमांसा एकविंश “अति अपार जे सरित बर, जौ नृप सेतु कराहिं । चढ़ि पिपीलिकउ परम लघु, बिनु श्रम पारहिं जाहिं ॥” ( रा० मा० १।१३ ) यह लिखा जा चुका है कि वाल्मीकिरामायण के एक-एक अक्षर से ब्रह्महत्या का पातक दूर होता है, यह व्यास भगवान् ने कहा है । वाल्मीकिचरित में नाभादास ने भी यही स्वीकार किया है । अतः रामायण का रावणचरित भी रामचरित्र का अङ्ग होने से पवित्र एवं पापनाशक है । रामायण के अनुष्ठानों में सभी श्लोकों को मन्त्र मानकर संपुटित पाठ किया जाता है । तुलसी जिन्हें विशुद्ध-विज्ञान कहते हैं, उन्हीं को तुलसीदास के भक्त बननेवाले “मानसप्रवक्ता” भ्रान्त कहते हुए लज्जित नहीं होते, यह आश्चर्य है । वस्तुतः रामचरितमानस जैसी ही वस्तु अध्यात्मरामायण है । तुलसीदास ने अधिकांश उसी का अनुसरण किया है । अध्यात्मरामायण के अनुसार ही तुलसी ने इतिहास की गौणता और श्रीराम के ऐश्वर्य-विशिष्ट चरित्र का चित्रण किया है । उसके अनुसार शिव-पार्वती-संवाद के रूप में रामचरित्र प्रस्तुत किया है; फिर तो यही कहना ज्यादा सङ्गत है कि अध्यात्मरामायण द्वारा वाल्मीकि की धारणा का संशोधन किया गया, परन्तु यह सब भी निःसार ही है; क्योंकि सभी रामचरित्रों के प्रामाण्य की कसौटी वाल्मीकिरामायण ही है । इसी लिए महाभारत की भावदीप टीका के रचयिता ने रामचरित्रों में वाल्मीकिरामायण का ही परम प्रामाण्य मानकर उसी के अनुसार महाभारत के रामचरित्र का अर्थ किया है । महाभारत में लक्ष्मण के द्वारा कुम्भकर्ण का वध वर्णित है । उसे उन्होंने यों कहकर समाहित किया कि लक्ष्मण के द्वारा कुम्भकर्ण मृतप्राय हो गया था किन्तु वध तो वाल्मीकिरामायण के अनुसार श्रीराम द्वारा ही मानना उचित है । ठीक ही है, महर्षि वाल्मीकि ने ब्रह्माजी के आदेशानुसार समाधि द्वारा श्रीराम, लक्ष्मण, श्रीसीता आदि सभी रामायण के पात्रों का चरित्र हसित, भाषित, इङ्गित, चेष्टित आदि का प्रत्यक्ष अनुभव करके वर्णन किया है । संवाददाताओं के तारों व टेलीप्रण्टरों के अनुसार या सुनी-सुनायी कथाओं के अनुसार नहीं लिखा है। अतः ऐतिहासिक तथ्य न होने पर तो कोई भी रामायण या महाभारत या भागवत केवल गप्प या उपन्यासमात्र रह जायगा । इसलिए रामचरितमानस के राम एवं उनके चरित्र की तथ्यरूपता या सच्चाई का आधार वाल्मीकिरामायण ही है । कहा जाता है कि “व्यास और तुलसीदास दोनों ही श्रीकृष्ण और श्रीराम को इतना ठोस मानते हैं कि उनकी तुलना में उन्हें सारा इतिहास मिथ्या प्रतीत होता है ।” परन्तु यह कहना असङ्गत है, क्योंकि इसका अर्थ यह है कि राम और कृष्ण वेदान्तवेद्य पारमार्थिक सत्य हैं और इतिहास आदि मिथ्या है। यदि यही बात है तो क्या राम और कृष्ण के चरित्र आदि भी मिथ्या हैं ? यदि इतिहास और चरित्र दोनों ही मिथ्या हैं तो भी उस पूर्वोक्त कथन का क्या अर्थ है ? राजा आदि की कथाएँ मिथ्या हैं, राम और कृष्ण की कथाएँ सत्य हैं, तो इस कथन में क्या आधार है ? वेदान्त का एक अंश लेकर एक अंश छोड़ देना तो अर्धजरतीय न्याय ही होगा । महानुभाव ! यदि आप इतिहास-पुराणों का प्रामाण्य न स्वीकार करेंगे और राम, कृष्ण आदि के जन्मों तथा चरित्रों को ऐतिहासिक तथ्य न मानेंगे तो लेने के देने पड़ जायेंगे । यह भी कहना गलत है कि “श्रीराम और श्रीकृष्ण दोनों इस पृथ्वी पर स्थूलरूप में काल-विशेष में अवतरित होते हैं, किन्तु उनका जन्म नहीं होता । यद्यपि तत्कालीन अधिकांश व्यक्तियों ने उन्हें साधारण बालकों की भाँति ही जन्म लेते हुए देखा था ।” यह सब भी अनर्गल प्रलापमात्र है । यदि भगवान् का जन्म नहीं होता, तो उनके जन्म और कर्म के चिन्तन, वर्णन का महत्त्व ही क्यों है ? गीता तो स्पष्ट कहती है जो मेरे ( भगवान् के ) दिव्य जन्म और कर्म को तत्त्वतः जानते हैं, वे जन्म तथा कर्म के बन्धनों से मुक्त होकर मुझ ( भगवान् ) को प्राप्त करते हैं—
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७४७ “जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः । त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ।। ( गीता ४।९ ) गीता में भगवान् यह भी कहते हैं कि मैं अज, अव्यय एवं सब भूतों का ईश्वर होकर भी अपनी सच्चिदा- नन्दलक्षणा प्रकृति का आश्रयण कर के माया कृपा शक्ति से उत्पन्न होता हूँ— “अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया ।। यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।। परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ।। ( गीता ४।६-८ ) तुलसीदासजी महाराज ठीक इसी प्रकार कहते हैं— “जब जब होइ धरम कै हानी । बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी ।। तब तब धरि प्रभु बिबिध सरीरा । हरहिं कृपानिधि सज्जनपीरा ।। (रा० मा० १।१२०।३-४) “असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुतिसेतु । जग बिस्तारहिं बिसद जस रामजन्म कर हेतु ।।'' ( रा० मा० १।१२१ ) “रामजनम के हेतु अनेका । परम बिचित्र एक तें एका ।। जनम एक दुइ कहउँ बखानी । सावधान सुनु सुमति भवानी ।। (रा० मा० १।१२१।१,२) “एक जनम कर कारन एहा । जेहि लगि राम धरी नरदेहा ।।” ( रा० मा० १।१२३।२) “जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल । चर अरु अचर हर्षजुत रामजनम सुखमूल ।।” ( रा० मा० ३।१९० ) “जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं ।” ( रा० मा० १।३३।३ ) इससे अधिक भगवान् के जन्म में क्या प्रमाण हो सकता है । आखिर शरीर धारण ही तो जन्म है । जीव भी तो देह ही ग्रहण कर जन्म लेता है । वस्तुतः देखा जाय तो जीव भी अजन्मा ही है— “न जायते म्रियते वा कदाचित् ।” ( गीता २।२० ) जीव के लिए भी कहा गया है कि वह कभी “जायते, अस्ति, वर्धते, विपरिणमंते, अपक्षीयते, विनश्यति” इन षड्विध भाव-विकारों से संसृष्ट नहीं होता । भेद यही है कि जीवों के भौतिक शरीर होते हैं और ईश्वर अपनी दिव्य लीलाशक्ति के योग से सच्चिदानन्दमय दिव्य श्रीविग्रह धारण करते हैं । अविद्या वश जीव अल्पज्ञ एवं अल्पशक्ति होता है और परमेश्वर सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, नित्य तथा शुद्धबुद्ध-मुक्तस्वभाव होते हैं । उनका श्रीविग्रह प्रकटरूप से अमुक-अमुक देश और काल में अनुभूत होता है, अप्रकट रूप से वह नित्य एवं विभु भी है । “यथा अनेक वेष धरि, नृत्य करइ नट कोइ । सोइ सोइ भाव देखावइ, आपु न होइ न सोइ ।। ( रा० मा० ७।७२ ) इस दोहे का यह अर्थ नहीं कि ऐतिहासिक दृष्टि के राम से भिन्न ही कोई राम तुलसी को अभीष्ट थे । किन्तु इसका अर्थ इतना ही है कि राम, कृष्ण, विष्णु, शिव आदि अनेक रूपों में वेदान्त-वेद्य परब्रह्म का प्रादुर्भाव होता है ।
यह भी कहना ठीक नहीं कि “रङ्गमञ्च पर अभिनेता के रूप में जो क्रियाएँ की जाती हैं, उनके द्वारा उनके चरित्र की आलोचना नहीं की जाती केवल अभिनय के उद्देश्य पर ही दृष्टि रखी जाती है।” क्योंकि अभिनय भी मनमानी नहीं किया जाता। उसके लिए भी नाट्यशास्त्र का आश्रयण करना पड़ता है। अप्रामाणिक अभिनय कभी भी लक्ष्यसिद्धि का साधक नहीं होता है। भगवान् राम मर्यादापुरुषोत्तम हैं। श्रीभागवत के अनुसार भी उनका अवतरण मर्त्यशिक्षण के लिए होता है— “मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं रक्षोवधायैव न केवलं विभोः ॥” ( भाग० ५।१९।५) वाल्मीकिरामायण या अध्यात्मरामायण या रामचरितमानस की दृष्टि से राम के चरित्र मानवों के लिए आदर्श हैं। वेदादि-शास्त्रों ने मानव-जीवन का जो विधान बताया है, उसे कार्यान्वित कर के आदर्श रूप उपस्थित करना बहुत कठिन और महत्त्वपूर्ण काम है। इसी लिए इस कठिन काम को राम ने उठाया और निभाया। कर्म क्या हैं, कैसे हैं, उनका कैसे और कौन कब अनुष्ठान करें ? उसे गीता स्पष्ट शब्दों में कहती है कि जो शास्त्रविधि का उल्लङ्घन करके यथेष्ट चेष्टा करता है उसे सिद्धि, परा गति कुछ भी नहीं मिलती— “तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ । ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥” ( गीता १६।२४ ) अतः हर एक कर्तव्य और अकर्तव्य को शास्त्र के अनुसार जानकर ही कर्म करना उचित है। गोस्वामी तुलसीदास भी यही कहते हैं— “बरनाश्रम निज-निज धरम निरत बेदपथ लोग । चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग ॥” ( रा० मा० ७।२० ) “सब नर करहिं परस्पर प्रीती । चलहिं स्वधर्मनिरत श्रुतिरीती ॥”(रा० मा० ७।२०।१) भक्ति के साधन रूप में यही कहा— “निज निज धरम निरत श्रुतिरीती ॥” ( रा० मा० ३।१५।३ ) श्रीकृष्ण ने गीता में भी यही कहा—यदि मैं शास्त्रानुसारी कर्म न करूँ तो ये लोग नष्ट हो जायेंगे और मैं सङ्कर का कर्ता बन जाऊँगा— “उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् । सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥” ( गीता ३।२४ ) अतएव इस कथन में भी कुछ सार नहीं है कि “भगवान् यदि राम की भूमिका में उतरते हैं तो उनके पार्षद जय-विजय रावण-कुम्भकर्ण की भूमिका में आते हैं। सत्-असत् के शाश्वत संघर्ष को विश्व के समक्ष प्रस्तुत करना ही उसका उद्देश्य था, जिससे व्यक्ति अपने हृदयस्थ रावण को पहचान कर उसके विनाश की प्रक्रिया को जान ले।” क्योंकि उस स्थिति में प्रश्न होगा कि राम-रावण नाम के कोई प्रामाणिक वस्तु हैं या केवल काल्पनिक भावरूप ही हैं ? यदि पहली बात है तब तो ऐतिहासिकता से पिण्ड नहीं छूटेगा, यदि काल्पनिक ही हैं तब तो फिर रावण अपने भीतर की ही कोई दुर्वृत्तियों का पुञ्ज हैं, वैसे ही राम भी सद्वृत्तियों का पुञ्ज ही हैं, फिर राम नाम का जप, रामचरित्र का श्रवण, पठन, पाठ आदि का क्या महत्त्व होगा ? सिद्धान्ततः राम ऐतिहासिक होने पर भी नित्य हैं, क्योंकि वेद के तुल्य ही रामायण तथा महाभारत भी नित्य हैं। इसी लिए वे वेद के उपबृंहण हैं। जैसे प्रतिकल्प में वेदों का प्रादुर्भाव होता है, वैसे ही महाभारत, रामायण का प्रादुर्भाव होता है। भेद यह है कि वेदों की अक्षरानुपूवीं में कोई परिवर्तन नहीं होता है, किन्तु रामायण तथा महाभारत की आनुपूर्वी में परिवर्तन होता है। परार्थ और सिद्धान्त एक से रहने पर भी अक्षरानुपूवीं में परिवर्तन हो सकता है। भगवान् का गोलोक, साकेत
में प्रकटरूप से रहना सिद्ध ही है। भगवान् नित्य एवं सर्वत्र सुलभ होने पर भी प्रकटरूप से ऐतिहासिक रूप में ही भगवान् के जन्म और कर्म होते हैं। उन्हीं का वर्णन और श्रवण होता है। उन्हीं से प्राणियों की सद्गति होती है। "ऐतिहासिक दृष्टि से राम का चरित्र देखने पर अनगिनत प्रश्न उठ खड़े होते हैं।" यह कथन जल्पवाद है। केवल सहस्रों प्रश्न खड़े होंगे, इसलिए सत्य का अपलाप कर के भगवान् को एक भावात्मक वस्तु ही मान लेना उचित नहीं, “सति कुड्ये चित्रोल्लेखः” भित्ति होने पर हो चित्र होता है। यदि कोई ऐतिहासिक तथ्य वस्तु है, तभी उसमें आध्यात्मिक कल्पनाएँ भी सङ्गत हो सकेंगी। ऐसा नहीं तो आकाश-चित्रवत् सब कल्पनामात्र ही रह जायेगी और हर प्रश्न का समाधान है ही। "ऐतिहासिक दृष्टि से राम को एक भूतकालीन राजकुमार के रूप में देखना उसी दलदल में फँस जाना है जिससे भक्तों ने हमें उबारने की चेष्टा की है।" इसका उत्तर स्पष्ट है—श्री- राम ऐतिहासिक राजकुमार के रूप में परब्रह्म परमात्मा के अवतार थे और वे आज भी साकेत धाम में प्रकटरूप से रहते हैं। जहाँ भी भक्त उनका शुद्ध भाव से आह्वान करता है वहीं वे प्रकट होते हैं। इस सम्बन्ध में सम्पूर्ण महाभारत, रामायण तथा पौराणिक साहित्य प्रमाण हैं। किसी भक्त ने कहीं भी यह नहीं कहा कि श्रीराम दशरथ के यहाँ राजकुमाररूप से प्रकट नहीं हुए थे। तुलसी तो मानते हैं— "जेहि इमि गावहिं बेद बुध जाहि धरहि मुनि ध्यान । सुइ दसरथसुत भगतहित कोसलपति भगवान् ॥” (रा० मा० १।११८) इतना ही नहीं निर्गुण निराकार ब्रह्म के समान ही सगुण साकार ब्रह्म भी सर्वव्यापी होता है। इस विषय पर जीवगोस्वामी प्रभृति आचार्यों ने बहुत-कुछ लिखा है। अतः राम का ऐतिहासिक स्वरूप मानना दलदल में फँसना नहीं है, किन्तु वैसा न मानना ही नास्तिकता के दलदल में फँस जाना है। कहा जाता है कि "आजकल ऐसे लोग बहुत बड़ी संख्या में हैं, जो श्रीराम को ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में रखकर दुर्भावनाओं की सृष्टि में संलग्न हैं। कुछ लोग इसमें उत्तर और दक्षिण का सङ्घर्ष देखते हैं। यह आर्य और द्रविड़ के सङ्घर्ष के रूप में देखा जा रहा है। दक्षिण में यह बहुत प्रचलित तथ्य बनता जा रहा है कि उत्तर ने दक्षिण पर आक्रमण किया था। आर्य राम ने द्रविड़ रावण को परास्त किया। भूत काल का बदला अब श्रीराम के चित्रों से लेने की चेष्टा की जा रही है।" श्रीरामचरित्र को ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में रखकर दुर्भावनाओं की सृष्टि में जो लोग लगे हैं, वे वेदादि- शास्त्रों का प्रामाण्य नहीं मानते। रामायण का भी प्रामाण्य नहीं मानते, उनको आप तो क्या ! कोई भी नहीं मना सकता है। किन्तु जो रामायण पढ़ेगा, उसका प्रामाण्य स्वीकार करेगा, वह कभी राम-रावण के सङ्घर्ष को आर्य- द्रविड़ का सङ्घर्ष नहीं कह सकता, क्योंकि वाल्मीकिरामायण से ही सिद्ध है कि रावण महर्षि पुलस्त्य का पौत्र और विश्रवा का पुत्र था। मानस में भी कहा गया है—'उत्तम कुल पुलस्ति कर नाती।' (रा० मा० ६।१९।२) वह वैदिक ब्राह्मण था। पुलस्त्य आदि वैदिक आर्य थे, अनार्य नहीं थे। श्रीराम भी वैदिक आर्य थे—"आर्यः सर्वसमश्चैव''''।'' हाँ, वह (रावण) असुरों और राक्षसों की भावनाओं का पोषक था और स्वयं माता के सम्बन्ध द्वारा उनसे सम्बन्धित था। वस्तुतः भगवान् का पार्षद था और भगवान् की इच्छा से ही उनकी युद्ध की चिक्रीडिषा की पूर्ति के लिए सनकादि के शाप के व्याज से रावण रूप में अवतीर्ण था। यह सब रामायणप्रामाण्य से ही सिद्ध है। यदि रामायण का प्रामाण्य अमान्य है, तो न तो आपके भावात्मक राम सिद्ध होंगे और न रावण सिद्ध होगा। क्योंकि आधुनिक इतिहास में उनका अस्तित्व है ही नहीं। आधुनिक ऐतिहासिक एवं प्रागैतिहासिक काल सब ६ हजार वर्ष के भीतर का ही है; उसमें न राम हैं और न रावण है। अतएव यह सब निर्मूल है कि "उत्तर ने
७५० रामायणमीमांसा एकविंश दक्षिण पर आक्रमण किया । आर्य राम ने द्रविड़ रावण को परास्त किया । भूतकाल का बदला श्रीराम के चित्रों से लेने की चेष्टा की जा रही है ।” क्योंकि रामायण की दृष्टि से वैसा सिद्ध नहीं है । अन्य प्रामाणिक इतिहास भी वैसा नहीं है । आपका यह कहना कि “वर्तमान युग की राजनीति को उसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है—सावधान ! वही इतिहास फिर लौटने न पावे । मिथ्या उन्माद की सृष्टि करके राजनीतिक-लाभ प्राप्त करने की चेष्टा की जा रही है ।” परन्तु इस उन्माद का समाधान है, ऐतिहासिक वस्तुस्थिति का सम्यक् प्रचार, न कि पलायनवाद । याद रहे । आप कितना भी कहें कि राम-रावण ऐतिहासिक पुरुष नहीं हैं, किन्तु वे आध्यात्मिक सत्-असत् के प्रतीक हैं तो भी राम का पुतला जलाना बन्द नहीं करेंगे । उनका स्पष्ट कहना है कि आप लोग रामलीला करना कराना बन्द कर दो । क्या आप यह स्वीकार करेंगे ? काशी में श्रीतुलसीदासजी के समय से ही रामलीला प्रचलित है और उस पराधीनता के युग में जब कि हिन्दुओं का अपना कोई राजा नहीं था । उस समय रामलीला के जादू से लोगों के मुर्दार मन में उत्साहित जीवन आया था और सभी बाल, वृद्ध, स्त्री, पुरुष गरज कर बोलते थे--बोलो राजा रामचन्द्र भगवान् की जय । आज भी वह गर्जन की परम्परा सुरक्षित है ही । वे स्पष्ट मानने लगे थे कि वास्तव में हम स्वतन्त्र हैं । हमारा राजा रामचन्द्र ही हैं और नहीं । यदि आप जैसे लोग रामलीला बन्द भी कर दें, तो उनका यह भी आग्रह होगा कि आप राम-रावण की कथा भी बन्द करो । अन्त में वाल्मीकिरामायण और मानस की पुस्तकों को जप्त करायेंगे और प्रत्यक्ष उनकी होली खेलेंगे । अतः पलायनवाद समाधान नहीं है । हम मन्दिरों में शङ्ख-घड़ि- याल बजाते हैं । बहुत लोगों को बहुत बुरा लगता है और कुत्ते बेचारे तो रोने ही लगते हैं । क्या करें, बन्द कर दें घण्टा, घड़ियाल और शङ्ख बजाना, बन्द कर दें पूजा करना ? इसी तरह यह भी कहना निरर्थक है कि “उत्तरभारत में भी राम निर्विवाद नहीं हैं । एक ओर तो उन्हें वर्ण-व्यवस्था के आधार पर आलोचना का विषय बनाया जा रहा है । राम शूद्रविरोधी और ब्राह्मणवादी हैं । इससे लगता होगा कि ब्राह्मण तो उनके समर्थक होंगे ही; किन्तु कई ब्राह्मणपुङ्गव कहते हैं कि क्षत्रिय राम के समक्ष भगवान् परशुराम की पराजय और स्तुति कराकर तुलसीदास ने अनर्थ कर डाला । कई लोग राम-रावण के युद्ध को ब्राह्मण-क्षत्रिय के संघर्ष के रूप में देखते हैं । हो सकता है आगे चलकर श्रीराम को ब्राह्मण-द्वेषी सिद्ध किया जाय ।” उक्त सभी बातें रामायण के विरुद्ध ही हैं । अगर रामायण का प्रामाण्य मान्य नहीं, तो राम होना ही असिद्ध है । यदि रामायण का प्रामाण्य मान्य है तो उसके अनुसार श्रीराम एक निष्पक्ष वेदादिशास्त्रानुसारी सम्राट् के रूप में अवतीर्ण परब्रह्म थे । वे धर्मविरुद्ध आचरण करने पर रावण जैसे ब्राह्मण को भी प्राणदण्ड दे सकते हैं तो किसी धर्मविरुद्ध शूद्र को भी प्राणदण्ड दे सकते हैं । अतएव वसिष्ठादि ब्राह्मण और निषादराज, कोल, भिल्ल और किरात ही क्यों बन्दर, भालू, गीध, कौए आदि भी राम के अनन्य उपासक थे । -आज भी रामलीलाओं में स्त्री-पुरुष, बाल- वृद्ध, ब्राह्मण-शूद्र सभी सम्मिलित होकर अपने निष्पक्ष सर्वहितकारी राजा रामचन्द्रजी महाराज की जय-जयकार करते हुए उनके रथ को खींचते हैं । उनके विमान में कन्धा लगाकर धन्य-धन्य होते हैं । राम-परशुराम की कथा शास्त्र- प्रामाण्यवादियों की दृष्टि में वस्तुस्थिति है, अपमान का वहाँ प्रश्न ही क्या है ? पुराणों के अनुसार एक भगवान् विष्णु ही राम हैं । विष्णु के ही अंश परशुराम हैं । वाल्मीकिरामायण के अनुसार श्रीराम “ब्राह्मणानामुपासिता” ब्राह्मणों के उपासक हैं । श्रीतुलसी के अनुसार श्रीराम विप्रपदपूजा का कवच पहनते हैं— “कवच अभेद विप्रपद पूजा ।” (रा० मा० ६।७९।५) और उनकी भक्ति का मुख्य आधार ही विप्रचरणप्रीति है— “प्रथमहिं बिप्रचरन अति प्रीती ।” (रा० मा० ३।१५।३)
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ७५१ हाँ, पलायनवाद की नीति में भले ही ऐतिहासिक राम से पिण्ड छुड़ाकर कोई काल्पनिक राम का गुणगान करो तो भी वेदादि शास्त्र न माननेवालों का मन आप बदल नहीं सकते । संसार में लोग रामायण की कथा को एक सत्य घटना मानकर ही उसके अनुसार परमात्मा का श्रीरामरूप में अवतरण मानते हैं और उनके चरित्रों के सुनने में पुण्य-प्राप्ति है, अतः उससे लाभ उठाते हैं । वस्तुतः ऐतिहासिक दृष्टि से भगवान् राम के चरित्र की समीक्षा से घबड़ाने की बात नहीं है। राम अनादि अनन्त ब्रह्माण्ड में भी हैं और सब व्यक्तियों के अन्तरात्मा हैं। फिर भी अवतार की दृष्टि से वे व्यक्ति भी हैं। सर्वरहित एवं सर्वस्वरूप हैं तो भी वे धर्मसंस्थापन के लिए अवतीर्ण थे, अतः उस धर्म का पालन करते थे। साथ ही वे एक धार्मिक सम्राट् एवं वैदिक धर्म के रक्षक थे । वे आर्य, अनार्य, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र न होते हुए भी अवतार की दृष्टि से क्षत्रिय थे । उन्होंने कहा— “हम क्षत्रिय मृगया बन करहीं। तुम्ह से खल मृग खोजत फिरहीं ॥” (रा० मा० ३।१८।५) "राम जाति-पाँति नहीं मानते थे ।” यह कहना सत्य का अपलाप करना है। जब वे धर्म-संस्थापनार्थ आये थे और वैदिक धर्म जातिमूलक ही है, तब यह कैसे हो सकता है कि राम जाति-पाँति न मानें । “मानउँ एक भगति कर नाता ।” (रा० मा० ३।३४।२) का यही अर्थ है कि किसी भी जाति का व्यक्ति उनको भजकर कृतार्थ हो सकता है। भक्ति न होने पर जाति, पाँति, कुल, धर्म सब व्यर्थ होते हैं। किन्तु भक्ति के साथ वे वैसे ही महत्त्वपूर्ण होते हैं जैसे अङ्क रहने पर शून्य का गौरव होता है। कोई भी समझदार शून्य को निरर्थक नहीं कह सकता, क्योंकि शून्य अङ्क बिना शून्य हैं पर अङ्क रहने पर दशगुना विस्तार के हेतु होते हैं। इसी अर्थ में यह पंक्ति कही गयी है— “भगतिहीन नर सोहइ कैसा । बिनु जल बारिद देखिअ जैसा ॥” (रा० मा० ३।३४।३) कहा जाता है कि-- “सहज सरूप कथा मुनि बरनत रहत सकुचि सिर नाई । केवट मीत कहे सुख मानत वानर बन्धु बड़ाई ॥” कहा जाता है कि “ब्राह्मणों को समादर देते हैं पर आनन्द उन्हें तभी आता है जब केवट उन्हें मित्र कह कर पुकारता है ।” परन्तु इससे यह कहाँ सिद्ध होता है कि राम जाति पाँति नहीं मानते । “नीचहूँ सो करत प्रीति....।” इस पद्य से तो स्पष्ट है कि राम जाति मानते थे क्योंकि उक्त पद में जातिवाचक शब्द का संप्रयोग है । रही बात प्रीति की सो जाति प्रेम में बाधक नहीं है। इसी लिए तो राम उच्च कुल के होते हुए भी नीच, कुजाति वालों से प्रेम करते थे । यह उनकी महत्ता है। गीध, शबरी, वानर, भालू, कोल-भील, किरातों से भगवान् राम प्रेम करते हैं, उनके मित्र हैं, इन बातों में विवाद नहीं है; परन्तु— 'बरनाश्रम निज निज धरम निरत वेदपथ लोग । चलहिं सदा पावहिं सुखहिं नहि भय सोक न रोग ॥” ( रा० मा० ७।२०) यह वाणी श्रीराम को अस्वीकृत है क्या ? कहा जाता है कि “ऐतिहासिक दृष्टि से राम के चरित्र को देखने से अनेक प्रश्न खड़े होते हैं ।” यही क्यों परमेश्वर पर क्या कम विवाद है ? जैनों और बौद्धों का बहुत बड़ा समाज है । उनकी दृष्टि में जगतकारण ईश्वर मानना भी अनेक मूर्खताओं में से एक है । सांख्य और मीमांसकों की दृष्टि में भी ईश्वर की समालोचना की गयी है । इस तरह क्या आस्तिक ईश्वर मानना छोड़ देंगे ? संसार में लोग अपने-अपने विश्वास एवं धारणाओं के अनुसार भिन्न-भिन्न मत रखते हैं, तो भी ईश्वरवादी अपनी-अपनी भावना के अनुसार ईश्वर की भक्ति करते ही हैं। वैसे ही
७५२ रामायणमीमांसा एकविंश
ऐतिहासिक दृष्टि से लोगों की समालोचनाओं के रहते हुए भी श्रीराम का ऐतिहासिक, आध्यात्मिक, आधिदैविक रूप भी मान्य है। वाल्मीकि तथा व्यास के द्वारा रचित रामायण, महाभारत, पुराण, संहिता, तन्त्र, आगम एवं मन्त्र, ब्राह्मण, उपनिषद्, वेद के आधार पर ही राम व्यापक परमात्मा और ऐतिहासिक अवतारी भी हैं। उनकी विस्तृत कथा का आधार वाल्मीकिरामायण ही है। कोई भी कथा प्रामाणिक होने पर आदरणीय हो सकती है। श्रीराम वानरों के मित्र थे, शबरी के फल खानेवाले हैं। निषादराज के मित्र हैं। उनका गीध तथा भुशुण्डि से भी सम्बन्ध था, यह सब यदि ऐतिहासिक नहीं है, तब क्या कल्पनामात्र है ? याद रहे, अपौरुषेय-वेद एवं तन्मूलक आर्ष वचनों के आधार पर ही श्रीराम एवं उनके मित्र सिद्ध होगें, अन्यथा निर्मूल गल्पमात्र सब बात समझी जा सकती है। किसी साधु-सन्त, महात्मा या वक्ता तथा कल्पक की कल्पना कल्पना ही रह जायेगी। तुलसीदास की रामायण भी उनकी अपनी कल्पना नहीं है। उन्होंने “नानापुराणनिगमागम” के आधार पर ही रामचरित गाया है। वे वाल्मीकिरामायण के सेतु द्वारा ही रामचरित का रसास्वादन करते हैं। यदि वाल्मीकिरामायण की उपेक्षा करनेवाला कोई भी हो निश्चित ही तुलसी एवं उनके राम का भक्त नहीं हो सकता। यह ठीक है कि “तुलसी के राम प्रत्येक देश, काल और व्यक्ति के हैं। उन्हें देश, काल तथा जाति की संकीर्ण परिधि में नहीं बाँधा जा सकता है। अनाथ तुलसी इन्हीं राम का आश्रय पाकर धन्य हुए थे।” परन्तु वे राम क्या दशरथनन्दन नहीं थे ? क्या वे कौशल्यानन्दवर्धन नहीं थे ? वस्तुतः कौन कहता है कि दशरथनन्दन ऐतिहासिक राम ईश्वर नहीं, वे प्रत्येक देश एवं काल के नहीं हैं ? वे सब देश तथा सब काल के होते हुए भी ऐतिहासिक भी हैं। अयोध्या ऐतिहासिक नगरी थी। सूर्यवंशी राजा दशरथ उसके सम्राट् थे। वसिष्ठजी उनके पुरोहित थे। उनके प्रयत्न से सर्वव्यापी राम उनके पुत्ररूप में प्रकट हुए थे— जग निवास प्रभु प्रगटे अखिललोक विश्राम।” (रा० मा० १।१९१) इस ऐतिहासिक तथ्य का अपलाप करने से ईश्वर राम की भक्ति भी असम्भव हो है। निर्गुण निराकार राम को सगुण साकार रामरूप या श्रीकृष्ण के रूप में प्रकट होने के लिए और अपनी लीलाओं का रसास्वादन कराने के लिए भी किसी देश और काल में किसी माता-पिता से प्रकट होना पड़ता है। लीलाओं के लिए भी अनेक ऐतिहासिक व्यक्तियों का उपयोग करना पड़ता है। इसी लिए तो “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति” के अनुसार “जब जब होइ धर्म कै हानी” तब तब भगवान् का प्रादुर्भाव माना जाता है। यह कहना सङ्गत नहीं है कि “व्याकरण शब्दानुशासन है। वह व्यक्ति के लिए है न कि व्यक्ति शब्दा- नुशासन के लिए। व्याकरण जब एक भवन की भाँति होता है। तब वह भाषा को सुरक्षा प्रदान करता है। किन्तु उसका अतिरेक व्याकरण को कारागार बना देता है। जहाँ भाषा का सहज स्वरूप समाप्त होकर केवल कृत्रिमता शेष रह जाती है।” (मा० मु० ३) क्योंकि व्याकरण तो अपशब्दों से साधु शब्दों का विश्लेषण करता है। वही शब्दों का संस्कार है। शब्दों के सहज स्वरूप की अभिव्यक्ति व्याकरण के द्वारा होती है। सूत्रों से प्रकृति और प्रत्ययों द्वारा शब्द-संस्कार की पद्धति केवल बाल-व्युत्पादनार्थ है। शब्द तो नित्य ही हैं। यदि शब्द का निश्चित स्वरूप न होगा तो उसके रूपान्तरण की कोई सीमा न रहेगी। फिर तो उसका अर्थसम्बन्ध भी न रह सकेगा। ऐसी स्थिति में अन्य भाषाओं के समान संस्कृत शब्दों का रूपान्तरण होने से कालान्तर में उनका ज्ञान भी असम्भव हो जायगा। नियमित रूप होने का ही परिणाम है कि लाखों वर्ष पुराने वाल्मीकिरामायण का अर्थ आज भी समझा जा सकता है। परन्तु जिन भाषाओं का रूप बदल जाता है उनका अर्थ पचास वर्षों में ही दुर्ज्ञेय हो जाता है।
जिस सम्बन्ध में पूर्ण परिचय न हो उचित है कि उस सम्बन्ध में प्राणी अनधिकार चेष्टा न करे । पृ० २३ मानसमुक्ता का सारा प्रसङ्ग काल्पनिक एवं आभासमय है । “भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ । याभ्यां बिना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तस्थमीश्वरम् ॥” वस्तुतः भवानी और शङ्कर दोनों ही नित्य वस्तु हैं । शङ्कर अनन्तकोटि ब्रह्माण्डों के अधिपति परमेश्वर हैं । भवानी अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोत्पादिनी शक्ति हैं । केवल ब्रह्म की उपासना नहीं बनती, किन्तु शक्तिविशिष्ट ब्रह्म एवं साधिष्ठाना शक्ति की ही पूजा होती है । स्वरूपतः दोनों ही एक हैं । साधिष्ठाना शक्ति एवं शक्तिमद् ब्रह्म का एक ही अर्थ होता है । इसी लिए जैसे श्रीतुलसीदास ने—'नमामीशमीशान' आदि स्तोत्र में शिवजी को ब्रह्मरूप कहा है वैसे ही पार्वती के लिए भी—"भव भव विभव पराभवकारिणि" कहकर उन्हें भी ब्रह्मरूप ही कहा है, क्योंकि “जन्माद्यस्य यतः” (ब्रह्मसूत्र १।१।२) के अनुसार जो सम्पूर्ण जगत् का उत्पादक, पालक और संहारक है वही ब्रह्म है । जैसे राम और कृष्ण दोनों ही में ब्रह्म के लक्षण सम्पूर्ण हैं वैसे ही शिव और पार्वती दोनों में ब्रह्म के सम्पूर्ण लक्षण हैं । वही बात सीता-राम और राधा-कृष्ण के सम्बन्ध में जाननी चाहिये । जैसे एक नट अनेक रूपों में रङ्गमञ्च पर आता है वैसे ही वेदान्तवेद्य परब्रह्म अनेक रूपों में आता है । ब्रह्म का ऊँचा से ऊँचा जो रूप है वह सीतोपनिषद् में सीता के लिए कहा गया है । सीता या राम, भवानी या शङ्कर दोनों ही निर्गुण निराकार, सगुण निराकार एवं सगुण साकार हैं । यह बात वेदों, उपनिषदों, महाभारत, रामायण, पुराणों एवं तन्त्रों में स्पष्ट है । उन्हीं भवानी और शङ्कर में श्रद्धा और विश्वास का आरोप है : भवानी और शङ्कर के स्वरूप में ही श्रद्धा और विश्वास को महत्त्वपूर्ण मानकर उनका आदर करना चाहिये । वस्तुतः वे दोनों तो नित्य ब्रह्मरूप हैं । किन्तु श्रद्धा तथा विश्वास दोनों ही अन्तःकरण के धर्म हैं । शास्त्रों ने तो गुरु तथा वेदान्त वाक्यों में विश्वास को ही श्रद्धा कहा है फिर भी जैसे भवानी और शङ्कर एक होते हुए भी व्यावहारिक रूप में एक में जननीस्वभाव-सुलभ कोमलता का अधिक प्राधान्य है— ‘कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ।" ( अपराधक्षमा० स्तो० ) और दूसरे में ईश्वर के अनुगुण मर्यादा-पालन में दृढ़ता का प्राधान्य है। श्रद्धा में कोमलता का झुकाव अधिक होता है । विश्वास में दृढ़ता, स्थिरता और कठोरता अधिक है । यदि और सूक्ष्मदृशा से देखें तो शिव अग्निरूप हैं तथा भवानी सोमरूप हैं । सोम में कोमलता तथा सरसता है । अग्नि में प्रकाश, उष्णता और दृढ़ता होती है । सारा संसार ही अग्नीषोमात्मक है । संसार की जितनी भी कोमल वस्तुएँ हैं उन सब में सोम का प्राधान्य है । जितनी कठोर वस्तुएँ हैं उनमें अग्नि का प्राधान्य है । उपनिषदों में यज्ञगत जल, दधि, दुग्ध, घृत, सोमरस आदि श्रद्धापदवाच्य कहे गये हैं । उन श्रद्धापदवाच्य पदार्थों से समवेत कर्मों एवं तज्जन्य अपूर्व या अदृष्ट को भी श्रद्धा या अप् शब्द से व्यवहृत किया जाता है । श्रद्धा होने पर ही प्राणी में इष्ट के प्रति झुकाव होता है । जिसके प्रति श्रद्धा होती है उसके प्रति प्राणी का अन्तःकरण, अन्तरात्मा और सिर झुक जाता है । विश्वास से उसमें दृढ़ता आ जाती है । भक्ति में भी द्रवता होती है, कोमलता रहती है । अन्तःकरण को लाक्षा ( लाह ) के समान कठोर द्रव्य माना गया है । वह तापक भावों से द्रवीभूत हो जाता है । स्नेह, काम, क्रोध, द्वेष, ईर्ष्या आदि के सम्पर्क से अन्तःकरण पिघलता है । जैसे पिघली हुई लाक्षा ९५
७५४ रामायणमीमांसा एकविंश में डाला हुआ रङ्ग स्थिर हो जाता है वैसे ही पिघले हुए अन्तःकरण में अभिव्यक्त भगवान् भी अन्तःकरण में स्थिर हो जाते हैं । हम अनेक पदार्थों को देखते हैं, किन्तु उनका स्मरण नहीं रहता है । परन्तु जिसे स्नेह, काम, भय, द्वेष आदि से द्रवीभूत मन से देखते हैं उसे भुलाने का प्रयत्न करने पर भी भुला नहीं पाते । किसी प्रिय मित्र या प्रेयसी कामिनी की विस्मृति नहीं होती । सर्प, व्याघ्र या शत्रु को भय तथा द्वेष से द्रुत अन्तःकरण से ग्रहण करने के कारण ही हम उन्हें भी नहीं भूल पाते हैं । सोमजातीय होने के कारण ही जल, दुग्ध, दधि, सोमलता आदि में द्रवता-कोमलता है । सोमांश होने के कारण ही भक्ति, स्नेह, करुणा, श्रद्धा आदि अन्तःकरण के गुण प्रकट होते हैं । विश्वास भी अन्तःकरण का धर्म है । श्रद्धा और विश्वास जब दोनों ही निर्दोष प्रमाण के आधार पर होते हैं तभी आदरणीय होते हैं । अविवेक के कारण भी श्रद्धा तथा विश्वास होते हैं पर वे अन्धविश्वास एवं अन्धश्रद्धा ही होते हैं । संसार अनन्त है । परन्तु मनुष्य का ज्ञान बहुत सीमित होता है । चक्षु, श्रोत्र, घ्राण आदि इन्द्रियाँ, मन आदि ज्ञान के साधन हैं । चक्षु तथा घ्राण के द्वारा बहुत सीमित वस्तुओं को जाना जा सकता है । मन, बुद्धि आदि भी आन्तर सुख, दुःखादि के ज्ञान में स्वतन्त्र होते हुए भी बाह्य विषयों में वे स्वतन्त्र नहीं हैं । चक्षुरादि के परतन्त्र होकर ही वे कुछ विषयों का ज्ञान करा सकते हैं । योगशास्त्र के अनुसार यदि प्रातिभ ज्ञान या ऋतम्भरा प्रज्ञा प्राप्त हो तो अधिक ज्ञान हो सकता है । योगजनित दिव्य ज्ञान के सामने तो सम्पूर्ण ज्ञेय ही ज्ञान की अपेक्षा कम हो जाता है । पर जो उत्कृष्ट कोटि की सम्प्रज्ञात समाधि या असम्प्रज्ञात समाधि से सम्पन्न नहीं हैं उसके लिए ज्ञान के द्वार बहुत ही सीमित हैं । साथ ही दम्भ की महिमा से गैर योगी भी योगी होकर पूजित होते हैं । फिर किस प्रकार सत्य वस्तु का ज्ञान हो सकता है ? अतः अपौरुषेय मन्त्र-ब्राह्मणात्मक वेद एवं वेदमूलक आर्ष ग्रन्थों के द्वारा ही प्राणी अपने अभ्युदय एवं निःश्रेयस के उपायों को जान सकता है । जैसे अकारणकरुणावरुणालय भगवान् प्राणियों के कल्याणार्थ ही उनके कर्मों के अनुसार अनन्त कोटि ब्रह्माण्डात्मक प्रपञ्च का निर्माण करते हैं, वैसे ही वही प्रभु अभ्युदय एवं निःश्रेयस के उपायों को प्रकट करते हैं । श्रीभागवत में कहा गया है कि वेद साक्षात् नारायण ही हैं— "वेदो नारायणः साक्षात् स्वयंभूरिति शुश्रुमः ।” ( भाग० ६।१।४० ) उन वेदादिशास्त्रों एवं तदनुसारी श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरुओं के वाक्यों में विश्वास ही श्रद्धा है । ऐसी स्थिति में कबीरदास का व्यङ्ग्यभरा निम्नोक्त उत्तर निःसार है— “तू कहता कागद की लेखी । मैं कहता आँखिन की देखी ॥” वेदशास्त्र साक्षात् ईश्वर का निःश्वास है कागद की लेखी नहीं है । स्मृति क्षीण होने पर स्मृति की सहायता के लिए कागद की लेखी का भी उपयोग होता है । धर्म और ब्रह्म दोनों ही आँखों के ही नहीं प्राणियों के मन और बुद्धि के भी सर्वथा अगोचर ही हैं । जिस वस्तु को प्रत्यक्ष या अनुमान से नहीं जाना जाता । उसी वस्तु के ज्ञान के लिए वेदों का आविर्भाव होता है— "प्रत्यक्षेणानुमित्या वा यस्तूपायो न वेद्यते । एनं विदन्ति वेदेन तस्माद् वेदस्य वेदता ॥”