रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७४२ रामायणमीमांसा एकविंश कोई भी समझदार कैसे आक्षेप कर सकता है ? महाभारत में भी पाण्डवों का परस्पर दृढ़ प्रेम था ही। विपक्षियों के किसी प्रयत्न से उनमें आपस में फूट नहीं पड़ी, धर्मराज तो यह मानते थे कि हमारे आपस में संघर्ष होगा, तो कौरव १०० और पाण्डव पांच होंगे, परन्तु अन्य से संघर्ष होने पर हम एक सो पाँच हैं— “वयं पञ्च शतं च ते वयं पञ्चोत्तरं शतम् ।” यदि पाण्डवों के सामने जो स्थिति थी वही स्थिति राम के सामने होती तो राम को भी वही करना पड़ता, जो पाण्डवों ने किया था। जैसे पाण्डवों की पत्नी को भरी सभा में नग्न करने का प्रयास किया गया, यदि वैसी ही बात राम की पत्नी के साथ उनकी जाति का ही कोई करता तो क्या राम रावण के समान ही उसका संहार न करते ? वस्तुतः राम अपने भाई-बन्धुओं से भी ज्यादा सम्मान ब्राह्मणों का करते थे । वे ब्राह्मणों के उपासक थे—‘‘ब्राह्मणानामुपासिता’’ किन्तु ब्राह्मण ने भी उनकी पत्नी का हरण किया तो उन्होंने उस ब्राह्मण को कुल-कुटुम्ब सहित मौत के घाट उतार दिया । फिर पाण्डवों ने ही कौन सा अपराध किया ? किसी भी समझदार को वही करना पड़ता । वस्तुतः युधिष्ठिर तो सदा ही युद्ध टालने का प्रयास करते थे । अर्जुन, भीम, द्रौपदी सात्यकि, सहदेव आदि ही युद्ध के पक्ष में थे । नकुल भी युद्ध के पक्षधर नहीं थे । फिर भी युद्ध के समय ऐन मोके पर अर्जुन ने युद्ध करने से इनकार कर दिया । उसने स्पष्ट कहा कि त्रैलोक्य के राज्य के लिए भी विपक्षियों को न मारूँगा, भले ही वे मुझपर शस्त्र चलाएँ । यदि मुझ अशस्त्र पर वे शस्त्रपाणि प्रहार भी करें तो अच्छा ही होगा । मैं भिक्षाचर्या द्वारा जीवन चलाना ठीक समझूँगा, किन्तु राज्य के लिए बन्धुओं का वध करना उचित नहीं— “एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन । अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किंनु महीकृते ॥” ( गीता १।३५ ) “श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके····················।” ( गीता २।५ ) “स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ।” ( गीता २।३६ ) “धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥” ( गीता १।४५ ) क्या कोई बन्धु-प्रेमी इससे अधिक औदार्य प्रदर्शित कर सकता है ? किन्तु क्या यह उचित था ? तुलसीदासजी महाराज इसे उचित मानते थे ? भगवान् कृष्ण ने, जो साक्षात् भगवान् राम ही थे, क्योंकि वाल्मीकि ने राम को बृहद्बल कृष्ण ही माना है— “शाङ्गधन्वा हृषीकेशः पुरुषः पुरुषोत्तमः । अजित खड्गधृग् विष्णुः कृष्णश्चैव बृहद्बलः॥” ( वा० रा० ६।११६।१५ ) स्पष्टरूप में इसे अनुचित माना और कहा— “कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् । अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ! ॥” ( गीता २।२ ) अर्थात् हे अर्जुन ! अनार्यसेवित, अकीर्तिकर, अस्वर्ग्य कश्मल ऐसे विषम अवसर में तुम्हें कैसे प्राप्त हो गया है; फिर गीता ज्ञान का उपदेश करके उससे कहा कि यदि तुम इस धर्मयुक्त सङ्ग्राम से विमुख होगे तो स्वधर्म और कीर्ति को त्याग कर पाप के भागी होगे— “अथ चेत् त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि । ततः स्वधर्मं कीर्ति च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥” ( गीता २।३३ ) और कहा—‘‘तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ।” ( गीता २।३७ )