भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 818, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 818

लिए 'द्रविड़मुन्नेत्रकड़गम' वाले आपके अनुसार रावण को अपना पूर्वज मानकर उनका बदला चुकाने की दृष्टि से राम, सीता और लक्ष्मण का भी पुतला जलाते हैं । क्या लेखक के अनुसार राम-भक्तों को रामलीला बन्द कर देनी चाहिये ? क्या लेखक रामायण या मानस की कथा बन्द कर देंगे ? यदि महाभारत की कथा से सामूहिक द्वेष की आँधी चल पड़ने पर बुद्धि की नौका गड़बड़ा सकती है तो रामायण की कथा से वैसा क्यों न होगा ? व्यक्ति और समाज के जीवन में इस आँधी की सृष्टि करने में यदि महाभारत के इतिहास का बड़ा भाग हो सकता है, तो वही की वही आपत्ति रामायण की कथा पर भी आ सकती हैं। क्योंकि यह भी इतिहास है। अतएव यह मिथ्या ही कल्पना है कि 'नारदजी ने महाभारत पर कटाक्ष किया है।' "महाभारत के जातीय युद्ध की गाथा और व्यक्तियों के इतिहास को लेकर वे प्रश्न-चिह्न अवश्य प्रस्तुत करते हैं। इस दृष्टि से महाभारत की उपयोगिता संदिग्ध है।" उक्त कथन सर्वथा निर्मूल है। व्यास-नारद संवाद में इसकी यत्कि- ञ्चित् भी चर्चा नहीं है, प्रत्युत श्रीमद्भागवत में भी भूमिका के रूप में महाभारत के युद्ध की ही चर्चा है। कौरव और पाण्डवों का भीषण संग्राम उभयपक्षीय वीरों के संहार के अनन्तर अश्वत्थामा के द्वारा अन्तिम भीषण संग्राम-लीला का वर्णन किया गया है। यह कहना भी गलत है कि तुलसीदासजी ने— “रामायन सिख अनुहरत, जग भयो भारत रीति । तुलसी सठ की को सुनै, कलि कुचालि पर प्रीति ॥” इस दोहे के द्वारा "मैं तो चाहता हूँ कि लोग रामायण की शिक्षा का अनुगमन करें, किन्तु समाज तो महाभारत का अनुकरण कर रहा है। मुझ जैसे दुष्ट की कौन सुने ? कलियुग का स्वभाव ही कुचाल से प्रेम करना है।" ऐसा कहकर 'महाभारत' पर कटाक्ष किया है। "महाभारत के मुख्य नायक पाण्डव हैं और प्रतिपक्षी उनके ही बन्धु कौरव हैं। दोनों राज्य के लिए संघर्ष करते हैं और करोड़ों व्यक्तियों को कट जाने देते हैं। रामचरित- मानस में बन्धुत्व के आदर्श राम और भरत हैं, जो एक-दूसरे के लिए राज्य का परित्याग कर देने में सन्तोष का अनुभव करते हैं। स्वभावतः संघर्षप्रिय मानव-मन कौरव-पाण्डवों के चरित्र को अपना आदर्श बना लेता है। वह यह सोचकर सन्तुष्ट हो जाता है कि यदि द्वैपायन व्यास जैसा महापुरुष पाण्डवों को आदर्श मानता है तो उसका अनुगमन करना क्या बुरा है ?" उक्त कथन सब अविचारितरमणीय हैं, क्योंकि श्रीमद्भागवत और रामायण में भी इतिहास की कमी नहीं है। सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी राजाओं का वर्णन और अनेक युद्धों का वर्णनं है। रामायण के बराबर तो दुनियाँ में कोई युद्ध ही नहीं हुआ— “रामरावणयोर्युद्धं रामरावणयोरिव” राम-रावण युद्ध राम-रावण के युद्ध के ही समान था। इससे यह सिद्ध हुआ कि राम-रावणयुद्ध के सदृश दूसरा युद्ध हुआ ही नहीं। तुलसीदासजी तो इतना ही कहना चाहते हैं कि राम और भरत के समान बन्धुत्व का अनुकरण नहीं करते किन्तु महाभारत के कौरव-पाण्डवों के संघर्ष का ही अनुकरण करते हैं। परन्तु इसमें महाभारत का क्या दोष ? उसने तो सच्ची घटनाओं का वर्णन किया है। काल का भी भेद है। रामायण का काल त्रेताकाल है। महाभारत का द्वापरकाल है। कलियुग की घटनाएँ उससे भी विलक्षण हो सकती हैं। विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या महाभारत में व्यासजी ने अपनी कल्पना के आधार पर कोई गलत आदर्श स्थापित किया है ? आप भी मानते हैं कि उन्होंने परमसत्यनिष्ठ होकर ही महाभारत लिखा है। तब इसमें उनपर या उनके महाभारत पर